আল-জামি` আল-কামিল
9841 - عن عبد الله بن شقيق قال: قلت لعائشة: أي أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم كان أحب إلى رسول الله؟ قالت: أبو بكر، قلت: ثم من؟ قالت: عمر، قلت: ثم من؟ قالت: ثم أبو عبيدة بن الجراح، قلت ثم من؟ قال: فسكتت.
صحيح: رواه الترمذي (3657)، وابن ماجه (102)، وأبو يعلى (4732) كلهم من طرق عن الجريري -هو سعيد بن إياس-، عن عبد الله بن شقيق فذكره.
والجريري ثقة إلا أنه اختلط لكن الحديث عند الترمذي من طريق إسماعيل ابن علية، وعند أبي يعلى من طريق وهيب بن خالد، وهما قد رويا عن الجريري قبل اختلاطه.
وقال الترمذي:"هذا حديث حسن صحيح".
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবদুল্লাহ ইবনু শাকীক বলেন: আমি আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করলাম, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীদের মধ্যে তাঁর কাছে কে সবচেয়ে বেশি প্রিয় ছিলেন? তিনি বললেন: আবূ বকর। আমি বললাম: তারপর কে? তিনি বললেন: উমার। আমি বললাম: তারপর কে? তিনি বললেন: তারপর আবূ উবাইদাহ ইবনুল জাররাহ। আমি বললাম: তারপর কে? তিনি (বর্ণনাকারী) বলেন: অতঃপর তিনি (আয়েশা) চুপ থাকলেন।
9842 - عن عمرو بن العاص أن النبي صلى الله عليه وسلم بعثه على جيش ذات السلاسل، فأتيته فقلت: أي الناس أحب إليك؟ قال:"عائشة"، فقلت: من الرجال؟ فقال:"أبوها"، قلت: ثم من؟ قال:"ثم عمر بن الخطاب"، فعد رجالًا.
متفق عليه: رواه البخاري في فضائل الصحابة (3662)، ومسلم في فضائل الصحابة (2348 - 8) كلاهما من طريق خالد بن عبد الله الحذاء، عن أبي عثمان، ثني عمرو بن العاص، فذكره.
روي عن أنس قال: قيل: يا رسول الله! من أحب الناس إليك؟ قال:"عائشة". قيل: من الرجال؟ قال:"أبوها".
رواه الترمذي (3890)، وابن ماجه (101) كلاهما من طريق المعتمر بن سليمان، عن حميد، عن أنس فذكره.
وقال:"هذا حديث حسن صحيح غريب من هذا الوجه من حديث أنس".
وقوله:"حديث حسن غريب" ليس بصحيح فقد سئل أبو حاتم عن هذا الحديث بهذا الإسناد فقال: هذا حديث منكر، يمكن أن يكون: حميد عن الحسن عن النبي صلى الله عليه وسلم.
وقال في موضع آخر:"إنما هو عن الحسن، عن النبي صلى الله عليه وسلم، وأما عن أنس فليس بمحفوظ".
انظر علل ابن أبي حاتم (2666، 2651). وكذا صحَّح أيضا الدارقطني في علله (2439) فقال:"والصحيح عن معمر، عن حميد، عن الحسن مرسلًا".
আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে যাতুস সালাসিল নামক বাহিনীর উপর সেনাপতি করে প্রেরণ করেন। (জিহাদ থেকে ফিরে) আমি তাঁর কাছে এসে বললাম: আপনার নিকট সবচেয়ে প্রিয় মানুষ কে? তিনি বললেন: "আয়িশা।" আমি বললাম: পুরুষদের মধ্যে কে? তিনি বললেন: "তাঁর (আয়িশার) পিতা (অর্থাৎ আবূ বকর)।" আমি বললাম: তারপর কে? তিনি বললেন: "তারপর উমর ইবনুল খাত্তাব।" অতঃপর তিনি আরো কয়েকজন পুরুষের নাম উল্লেখ করলেন।
9843 - عن بريدة بن الحصيب قال: كان أحب النساء إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فاطمة، ومن الرجال علي.
حسن: رواه الترمذي (3868)، والطبراني في الأوسط (7258)، والحاكم (3/ 155) كلهم من طريق الأسود بن عامر شاذان، عن جعفر بن زياد الأحمر، عن عبد الله بن عطاء، عن عبد الله بن بريدة، عن أبيه قال: فذكره.
وإسناده حسن من أجل جعفر الأحمر وعبد الله بن عطاء فإنهما حسنا الحديث.
والحديث محمول على أهل بيته وأقاربه من حيث النسب كما ذكر الترمذي عن شيخه إبراهيم بن سعد الجوهري.
فعلى هذا لا تعارض بين هذا الحديث وبين الحديث الذي ورد فيه أن أحب الناس إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم:"عائشة". ومن الرجال:"أبوها".
বুরাইদাহ ইবনুল হুসাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট প্রিয়তম নারী ছিলেন ফাতিমা এবং পুরুষদের মধ্যে ছিলেন আলী।
9844 - عن عائشة: خرج النبي صلى الله عليه وسلم غداة وعليه مرط مرحل، من شعر أسود، فجاء الحسن بن علي فأدخله، ثم جاء الحسين فدخل معه، ثم جاءت فاطمة فأدخلها، ثم جاء علي فأدخله. ثم قال: {إِنَّمَا يُرِيدُ اللَّهُ لِيُذْهِبَ عَنْكُمُ الرِّجْسَ أَهْلَ الْبَيْتِ وَيُطَهِّرَكُمْ تَطْهِيرًا} [الأحزاب: 33].
صحيح: رواه مسلم في فضائل الصحابة (2424) من طرق، عن محمد بن بشر، عن زكريا، عن مصعب بن شيبة، عن صفية بنت شيبة قالت: قالت عائشة: فذكرته.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক সকালে বের হলেন। তখন তাঁর গায়ে নকশাযুক্ত একটি কালো পশমের চাদর ছিল। অতঃপর হাসান ইবনু আলী এলেন এবং তিনি তাকে (চাদরের ভেতরে) ঢুকিয়ে নিলেন। এরপর হুসাইন এলেন এবং তিনিও তার সাথে ভেতরে প্রবেশ করলেন। এরপর ফাতিমা এলেন এবং তিনি তাকেও ভেতরে ঢুকিয়ে নিলেন। এরপর আলী এলেন এবং তিনি তাকেও ভেতরে ঢুকিয়ে নিলেন। এরপর তিনি বললেন: "হে আহলে বাইত! আল্লাহ কেবল চান তোমাদের থেকে অপবিত্রতা দূর করতে এবং তোমাদের সম্পূর্ণরূপে পবিত্র করতে।" [সূরা আল-আহযাব: ৩৩]
9845 - عن أم سلمة أن النبي صلى الله عليه وسلم كان في بيتها، فأتته فاطمة ببرمة فيها خزيرة، فدخلت بها عليه، فقال لها:"ادعي زوجك وابنيك". قالت: فجاء علي والحسين والحسن، فدخلوا عليه، فجلسوا يأكلون من تلك الخزيرة، وهو على منامة له على دكان تحته كساء خيبري. قالت: وأنا أصلي في الحجرة، فأنزل الله عز وجل هذه الآية: {إِنَّمَا يُرِيدُ اللَّهُ لِيُذْهِبَ عَنْكُمُ الرِّجْسَ أَهْلَ الْبَيْتِ وَيُطَهِّرَكُمْ تَطْهِيرًا} قالت: فأخذ فضل الكساء، فغشاهم به، ثم أخرج يده، فألوى بها إلى السماء، ثم قال:"اللهم هؤلاء أهل بيتي وخاصتي، فأذهب عنهم الرجس، وطهرهم تطهيرا، اللهم هؤلاء أهل بيتي وخاصتي، فأذهب عنهم الرجس، وطهرهم تطهيرا". قالت: فأدخلت رأسي البيت، فقلت: وأنا معكم يا رسول الله، قال:"إنك إلي خير، إنك إلي خير".
حسن: رواه أحمد (26508) عن عبد الله بن نمير، حدثنا عبد الملك - يعني ابن أبي سليمان -، عن عطاء بن أبي رباح قال: حدثني من سمع أم سلمة قالت: فذكرت الحديث.
وقال عبد الملك: وحدثني أبو ليلى عن أم سلمة مثل حديث عطاء.
ورواه الحاكم (2/ 416) من وجه آخر عن شريك بن أبي نمر، عن عطاء بن يسار، عن أم سلمة مختصرا.
وقال: صحيح على شرط البخاري، وقال الذهبي: على شرط مسلم.
قلت: إسناده حسن من أجل عبد الملك بن أبي سليمان فإن فيه كلاما في حفظه ولكنه توبع.
ورواه الترمذي (3871) من وجه آخر عن شهر بن حوشب عن أم سلمة مختصرا.
وشهر بن حوشب فيه كلام معروف، ولكنه لا بأس به في المتابعات.
قال الترمذي:"هذا حديث حسن صحيح، وهو من أحسن شيء روي في هذا الباب".
والمقصود من أهل البيت هنا من حيث النسب، وأما إطهار أهل البيت من الرجس فهو شامل للنسب والصهر جميعا.
উম্মে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর ঘরে ছিলেন, তখন ফাতিমা তাঁর কাছে একটি পাত্র নিয়ে আসলেন, যার মধ্যে ‘খাজীরা’ (মাংস, ময়দা ও ঘি দিয়ে তৈরি এক ধরণের খাবার) ছিল। তিনি তা নিয়ে তাঁর কাছে প্রবেশ করলেন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "তোমার স্বামী ও দুই পুত্রকে ডেকে আনো।" তিনি (উম্মে সালামাহ) বললেন: এরপর আলী, হুসাইন এবং হাসান আসলেন এবং তাঁর কাছে প্রবেশ করলেন। তারা সেই 'খাজীরা' খেতে বসলেন। আর তিনি একটি বিছানায় হেলান দিয়ে বসেছিলেন, যা একটি উঁচু আসনে পাতা ছিল এবং তার নিচে একটি খায়বারী চাদর ছিল। তিনি (উম্মে সালামাহ) বললেন: আমি তখন ঘরের মধ্যে সালাত আদায় করছিলাম। অতঃপর আল্লাহ তা'আলা এই আয়াত নাযিল করলেন: {إِنَّمَا يُرِيدُ اللَّهُ لِيُذْهِبَ عَنْكُمُ الرِّجْسَ أَهْلَ الْبَيْتِ وَيُطَهِّرَكُمْ تَطْهِيرًا} [হে আহলে বাইত (নবী পরিবারের সদস্যগণ)! আল্লাহ কেবল তোমাদের থেকে অপবিত্রতা দূর করতে এবং তোমাদেরকে পূর্ণরূপে পবিত্র করতে চান।] তিনি বললেন: অতঃপর তিনি চাদরের বাড়তি অংশটুকু নিয়ে তাদেরকে তা দিয়ে ঢেকে দিলেন। এরপর তিনি তাঁর হাত বের করলেন এবং তা আকাশের দিকে উঁচু করে ধরলেন, অতঃপর বললেন: "হে আল্লাহ! এরা আমার আহলে বাইত এবং আমার একান্ত আপনজন। সুতরাং তুমি এদের থেকে অপবিত্রতা দূর করে দাও এবং এদেরকে পূর্ণরূপে পবিত্র করে দাও। হে আল্লাহ! এরা আমার আহলে বাইত এবং আমার একান্ত আপনজন। সুতরাং তুমি এদের থেকে অপবিত্রতা দূর করে দাও এবং এদেরকে পূর্ণরূপে পবিত্র করে দাও।" তিনি বললেন: আমি তখন ঘরের মধ্যে আমার মাথা প্রবেশ করিয়ে বললাম: "হে আল্লাহর রাসূল! আমিও কি তাদের সাথে?" তিনি বললেন: "নিশ্চয় তুমি কল্যাণের উপরেই আছো। নিশ্চয় তুমি কল্যাণের উপরেই আছো।"
9846 - عن عمر بن أبي سلمة ربيب النبي صلى الله عليه وسلم قال: نزلت هذه الآية على النبي صلى الله عليه وسلم: {إِنَّمَا يُرِيدُ اللَّهُ لِيُذْهِبَ عَنْكُمُ الرِّجْسَ أَهْلَ الْبَيْتِ وَيُطَهِّرَكُمْ تَطْهِيرًا} في بيت أم سلمة فدعا النبي صلى الله عليه وسلم فاطمة وحسنا وحسينا فجللهم بكساء وعليٌّ خلف ظهره فجلّله بكساء، ثم قال:"اللهم! هؤلاء أهل بيتي فأذهب عنهم الرجس وطهرهم تطهيرا" قالت أم سلمة: وأنا معهم يا رسول الله؟ قال:"أنت على مكانك وأنت إلي خير".
حسن: رواه الترمذي (3205، 3787)، والطبري في تفسيره (19/ 106)، والطبراني في الكبير (8295)
كلهم من طريق محمد بن سليمان بن الأصبهاني، عن يحيى بن عبيد، عن عطاء بن أبي رباح، عن عمر بن أبي سلمة قال: فذكره.
وإسناده حسن من أجل محمد بن سليمان بن عبد الله الأصبهاني فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث إذا لم يخطئ والظاهر أنه لم يخطئ لوجود شواهد صحيحة من حديث عائشة عند مسلم ومن حديث أم سلمة، وواثلة بن الأسقع وغير ذلك.
ويحيى بن عبيد هو المكي كما صرح به الطبراني، وهو ثقة.
উমর ইবনু আবী সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, এই আয়াতটি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উপর উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ঘরে নাযিল হয়েছিল: {হে আহলুল বাইত! আল্লাহ্ কেবল চান তোমাদের থেকে অপবিত্রতা দূর করতে এবং তোমাদেরকে পূর্ণরূপে পবিত্র করতে।} তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফাতিমা, হাসান ও হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে ডাকলেন এবং তাদেরকে একটি চাদর দিয়ে ঢেকে দিলেন। আর আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর পিছনে ছিলেন, তখন তাঁকেও সেই চাদর দ্বারা ঢেকে দিলেন। অতঃপর তিনি বললেন: "হে আল্লাহ! এরা আমার আহলুল বাইত (পরিবারের সদস্যগণ), সুতরাং তাদের থেকে অপবিত্রতা দূর করে দাও এবং তাদের পূর্ণরূপে পবিত্র করে দাও।" উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আমিও কি তাদের সাথে আছি? তিনি বললেন: "তুমি তোমার স্থানেই থাকো, আর তুমি কল্যাণের উপর আছ।"
9847 - عن شداد أبي عمار قال: دخلت على واثلة بن الأسقع وعنده قوم، فذكروا عليا، فلما قاموا قال لي: ألا أخبرك بما رأيت من رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ قلت: بلى، قال: أتيت فاطمة رضي الله عنها أسألها عن علي، قالت: توجه إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فجلست أنتظره حتى جاء رسول الله صلى الله عليه وسلم ومعه علي وحسن وحسين، آخذ كل واحد منهما بيده، حتى دخل فأدنى عليا وفاطمة، فأجلسهما بين يديه، وأجلس حسنا وحسينا كل واحد منهما على فخذه، ثم لف عليهم ثوبه، أو قال: كساء، ثم تلا هذه الآية: {إِنَّمَا يُرِيدُ اللَّهُ لِيُذْهِبَ عَنْكُمُ الرِّجْسَ أَهْلَ الْبَيْتِ وَيُطَهِّرَكُمْ تَطْهِيرًا}. وقال:"اللهم! هؤلاء أهل بيتي، وأهل بيتي أحق".
صحيح: رواه أحمد (16988)، وصحّحه ابن حبان (1976)، والحاكم (2/ 3، 416/ 174)، والبيهقي في الكبرى (2/ 152) كلهم من طرق، عن الأوزاعي، عن شداد أبي عمار قال: فذكره. وإسناده صحيح. وكذا صحّحه أيضا البيهقي.
وزاد ابن حبان والبيهقي في آخر الحديث: قال واثلة من ناحية البيت: وأنا يا رسول الله من أهلك؟ قال:"وأنت من أهلي". قال واثلة: إنها لمن أرجى ما أرتجي. أي من أهل الإسلام ليس من أهلي نسبا.
ওয়াছিলাহ ইবনুল আসকা' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, শাদ্দাদ আবু আম্মার বলেছেন, আমি ওয়াছিলাহ ইবনুল আসকা’র কাছে প্রবেশ করলাম। তাঁর কাছে একদল লোক ছিল। তারা আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর আলোচনা করল। যখন তারা উঠে চলে গেল, তিনি আমাকে বললেন: আমি কি তোমাকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছ থেকে যা দেখেছি তা জানাব না? আমি বললাম: হ্যাঁ, অবশ্যই। তিনি বললেন: আমি ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এসেছিলাম, তাঁকে আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করার জন্য। তিনি বললেন: তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে গেছেন। আমি বসে অপেক্ষা করতে লাগলাম, অবশেষে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আসলেন। তাঁর সাথে আলী, হাসান এবং হুসাইন ছিলেন। তিনি তাদের প্রত্যেকের হাত ধরে রেখেছিলেন। যখন তিনি ঘরে প্রবেশ করলেন, তখন তিনি আলী এবং ফাতিমাকে কাছে ডাকলেন এবং তাদের দু'জনকে তাঁর সামনে বসালেন। আর হাসান ও হুসাইনকে তাঁর দু'ঊরুর উপর বসালেন। অতঃপর তিনি তাদের উপর তাঁর চাদর, অথবা বললেন: কম্বল জড়িয়ে দিলেন। এরপর তিনি এই আয়াতটি তিলাওয়াত করলেন: {إِنَّمَا يُرِيدُ اللَّهُ لِيُذْهِبَ عَنْكُمُ الرِّجْسَ أَهْلَ الْبَيْتِ وَيُطَهِّرَكُمْ تَطْهِيرًا} "আল্লাহ্ কেবল চান তোমাদের থেকে অপবিত্রতা দূর করতে, হে আহলে বায়েত (পরিবারের সদস্যবৃন্দ), আর তোমাদের সম্পূর্ণরূপে পবিত্র করতে।" (সূরা আহযাব ৩৩:৩৩)। এবং তিনি বললেন: "হে আল্লাহ্! এরাই আমার আহলে বায়েত (পরিবার), আর আমার আহলে বায়েত (সম্মান পাওয়ার) অধিক হকদার।"
ইবনে হিব্বান ও বাইহাকী হাদীসের শেষে যোগ করেছেন: ওয়াছিলাহ ঘরের এক কোণ থেকে বললেন, "হে আল্লাহর রাসূল! আমিও কি আপনার পরিবারভুক্ত?" তিনি বললেন: "আর তুমিও আমার পরিবারভুক্ত।" ওয়াছিলাহ বললেন: আমি যা আশা করি, তার মধ্যে এটিই আমার জন্য সবচেয়ে বেশি আশাব্যঞ্জক। (এর ব্যাখ্যা হলো) তিনি ইসলামের দিক থেকে তাঁর পরিবারভুক্ত, বংশের দিক থেকে নয়।
9848 - عن علي أنه دخل على النبي صلى الله عليه وسلم وقد بسط شملة فجلس عليها هو وفاطمة وعلي والحسن والحسين ثم أخذ النبي صلى الله عليه وسلم بمجامعه فعقد عليهم ثم قال:"اللهم! ارض عنهم كما أنا عنهم راض".
حسن: رواه الطبراني في الأوسط (5510) عن محمد بن عثمان بن أبي شيبة، حدثنا منجاب بن الحارث، حدثنا يحيى بن عبد الملك بن أبي غنيّة، حدثنا عبيد بن طفيل أبو سيدان، عن ربعي بن حراش، عن علي فذكره.
وإسناده حسن من أجل شيخ الطبراني محمد بن عثمان ويحيى بن عبد الملك بن أبي غنية، وعبيد بن طفيل فإن كلا منهم حسن الحديث.
قال الهيثمي (9/ 169):"رواه الطبراني في الأوسط ورجاله رجال الصحيح غير عبيد بن طفيل وهو ثقة".
وأما ما روي عن أنس بن مالك أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يمر بباب فاطمة ستة أشهر إذا خرج إلى صلاة الفجر يقول:"الصلاة يا أهل البيت" {إِنَّمَا يُرِيدُ اللَّهُ لِيُذْهِبَ عَنْكُمُ الرِّجْسَ أَهْلَ الْبَيْتِ وَيُطَهِّرَكُمْ تَطْهِيرًا} [الأحزاب: 33]. فهو ضعيف. رواه الترمذي (3206) عن عبد بن حميد (1232) - وأحمد (14040) - كلاهما عن عفان بن مسلم، ثنا حماد بن سلمة، عن علي بن زيد (هو ابن جدعان)، عن أنس بن مالك فذكره.
وإسناده ضعيف من أجل علي بن زيد بن جدعان فإنه ضعيف عند جمهور أهل العلم.
ورواه الحاكم (3/ 158) من طريق الحسين بن الفضل البجلي، ثنا عفان بن مسلم، ثنا حماد بن سلمة، أخبرني حميد وعلي بن زيد، عن أنس فذكره.
وهذه الزيادة - يعني زيادة حميد الطويل في الإسناد - زيادة شاذة وذلك لمخالفة الحسين بن الفضل الإمام أحمد وعبد بن حميد.
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট প্রবেশ করলেন। তখন তিনি একটি চাদর বিছিয়ে রেখেছিলেন। অতঃপর তিনি (নবী), ফাতিমা, আলী, হাসান ও হুসাইন তার (চাদরের) উপরে বসলেন। এরপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) চাদরটির চার প্রান্ত ধরলেন এবং তাদের উপর জড়িয়ে দিলেন। অতঃপর তিনি বললেন: "হে আল্লাহ! আপনি তাদের প্রতি সন্তুষ্ট হয়ে যান, যেমন আমি তাদের প্রতি সন্তুষ্ট।"
9849 - عن عطاء بن يسار أن رجلا أخبره أنه رأى النبي صلى الله عليه وسلم يضم إليه حسنا وحسينا يقول:"اللهم! إني أحبهما فأحبهما".
صحيح: رواه أحمد (23133) عن سليمان بن داود (هو الهاشمي)، حدثنا إسماعيل - يعني ابن جعفر -، أخبرني محمد - يعني ابن أبي حرملة -، عن عطاء (هو ابن يسار) قال: فذكره. وإسناده صحيح.
وقال الهيثمي في المجمع (9/ 179):"رواه أحمد ورجاله رجال الصحيح".
وجهالة الصحابي في الحديث لا تضر لأن الصحابة كلهم عدول.
আত্বা ইবনে ইয়াসার থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি তাঁকে জানিয়েছেন যে, তিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখেছেন, তিনি হাসান ও হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে নিজের সাথে জড়িয়ে ধরছেন এবং বলছেন: "হে আল্লাহ! আমি এই দু'জনকে ভালোবাসি, সুতরাং আপনিও এদের দু'জনকে ভালোবাসুন।"
9850 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم للحسن والحسين:"اللهم! إني أحبهما فأحبهما".
صحيح: رواه أحمد (9759)، والبزار (9736)، والطبراني في الكبير (3/ 42) كلهم من طرق، عن أبي حازم (اسمه: سلمان الأشجعي)، عن أبي هريرة قال: فذكره. وزاد الطبراني في آخر الحديث:"وأبغض من أبغضهما". وإسناده صحيح.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হাসান ও হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে লক্ষ্য করে বললেন: "হে আল্লাহ! আমি তাদের দু'জনকে ভালোবাসি, সুতরাং তুমিও তাদের ভালোবাসো।"
9851 - عن عبد الله بن مسعود أن النبي صلى الله عليه وسلم قال للحسن والحسين:"اللهم! إني أحبهما فأحببهما، ومن أحبهما فقد أحبني".
حسن: رواه البزار (1820) عن يوسف بن موسى، حدثنا أبو بكر بن عياش، عن عاصم (هو
ابن بهدلة)، عن زيد (هو ابن حبيش)، عن عبد الله فذكره.
ذكره الهيثمي في المجمع (9/ 180) وقال:"رواه البزار وإسناده جيد".
وهو كما قال فإن عاصم بن بهدلة مختلف فيه غير أنه حسن الحديث إذا لم يخالف ولم يأت بما ينكر عليه.
আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম হাসান ও হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে লক্ষ্য করে বললেন: "হে আল্লাহ! আমি তাদের দুজনকে ভালোবাসি, সুতরাং তুমিও তাদের দুজনকে ভালোবাসো। আর যে তাদের দুজনকে ভালোবাসলো, সে যেন আমাকেই ভালোবাসলো।"
9852 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من أحب الحسن والحسين فقد أحبني، ومن أبغضهما فقد أبغضني".
حسن: رواه النسائي في الكبرى (8112)، وابن ماجه (143)، وأحمد (7876) كلهم من طريق سفيان الثوري، عن أبي الجحاف داود بن أبي عوف، عن أبي حازم، عن أبي هريرة فذكره.
وإسناده حسن من أجل أبي الجحاف فإنه حسن الحديث مع غلوه في تشيعه لكنه توبع تابعه سالم بن أبي حفصة العجلي عن أبي حازم قال: إني لشاهد يوم مات الحسن بن علي، فرأيت الحسين بن علي يقول لسعيد بن العاص: ويطعن في عنقه، ويقول: تقدم، فلولا أنها سنة ما قدمتك وكان بينهم شيء فقال أبو هريرة: لتنفسون على ابن نبيكم صلى الله عليه وسلم بتربة تدفنونه فيها وقد سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: فذكر الحديث.
رواه أحمد (10872)، وأبو يعلى (6215)، وصحّحه الحاكم (3/ 171) ولم يذكر القصة إلا الحاكم. ولأبي الجحاف متابعات أخرى.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি হাসান ও হুসাইন-কে ভালোবাসল, সে অবশ্যই আমাকে ভালোবাসল, আর যে ব্যক্তি তাদের উভয়কে ঘৃণা করল, সে অবশ্যই আমাকে ঘৃণা করল।"
9853 - عن عبد الله بن مسعود قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يصلي، فإذا سجد وثب الحسن والحسين على ظهره، فإذا منعوهما أشار إليهم أن دعوهما، فلما قضى الصلاة وضعهما في حجره فقال:"من أحبني فليحب هذين".
حسن: رواه النسائي في الكبرى (8114)، وصحّحه ابن خزيمة (887) - والسياق له -، وابن حبان (6970)، والطبراني في الكبير (3/ 40) كلهم من طرق عن عاصم (هو ابن بهدلة)، عن زر (هو ابن حبيش)، عن عبد الله فذكره.
وإسناده حسن من أجل عاصم بن بهدلة فإنه مختلف فيه إلا أنه حسن الحديث إذا لم يخالف ولم يأت بما ينكر عليه.
وفي الباب عن علي بن أبي طالب أن رسول الله صلى الله عليه وسلم أخذ بيد حسن وحسين فقال:"من أحبني وأحب هذين وأباهما وأمهما كان معي في درجتي يوم القيامة".
رواه الترمذي (2733)، وعبد الله بن أحمد في زوائده على المسند (576) كلاهما عن نصر بن علي الجهضمي الأزدي، أخبرني علي بن جعفر بن محمد بن علي، حدثني أخي موسى بن جعفر بن محمد، عن أبيه جعفر بن محمد، عن أبيه محمد بن علي، عن أبيه علي بن الحسين، عن أبيه، عن جده علي بن أبي طالب فذكره.
قال الترمذي: هذا حديث غريب لا نعرفه من حديث جعفر بن محمد إلا من هذا الوجه.
وهو كذلك فإن علي بن جعفر بن محمد العلوي لا يعرف فيه جرح ولا تعديل لذا قال فيه الحافظ:"مقبول" يعني إذا توبع وإلا فلين الحديث، ولم أجد له متابعا وذكره الذهبي في السير (3/ 254) وقال:"إسناده ضعيف، والمتن منكر".
وفي الباب عن زيد بن أرقم أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال لعلي وفاطمة والحسن والحسين:"أنا حرب لمن حاربتم وسلم لمن سالمتم".
رواه الترمذي (3870)، وابن ماجه (145)، وابن حبان (6977) كلهم من طريق أسباط بن نصر الهمداني، عن السدي، عن صُبيح مولى أم سلمة، عن زيد بن أرقم قال: فذكره.
وقال الترمذي:"هذا حديث غريب إنما نعرفه من هذا الوجه، وصبيح مولى أم سلمة ليس بمعروف".
وهو كما قال فإن صبيحا مولى أم سلمة لم يوثّقه أحد غير ابن حبان فإنه ذكره في ثقاته على قاعدته في توثيق من لم يوجد فيه جرح.
وفي معناه ما روي عن أسامة بن زيد أنه قال: طرقت النبي صلى الله عليه وسلم ذات ليلة في بعض الحاجة فخرج النبي صلى الله عليه وسلم وهو مشتمل على شيء لا أدري ما هو، فلما فرغت من حاجتي. قلت: ما هذا الذي أنت مشتمل عليه؟ فكشفه فإذا حسن وحسين على وركيه، فقال:"هذان ابناي وابنا ابنتي، اللهم! إني أحبهما فأحبهما وأحب من يحبهما".
رواه الترمذي (3769)، والبزار (2580)، وصحّحه ابن حبان (6967) كلهم من طريق موسى بن يعقوب الزمعي، عن عبد الله بن أبي بكر بن زيد المهاجر، أخبرني مسلم بن أبي سهل النبال، أخبرني الحسن بن أسامة بن زيد، أخبرني أبي أسامة بن زيد فذكره.
وعبد الله بن أبي بكر قال ابن المديني:"مجهول" ولم يوثّقه غير ابن حبان على قاعدته في توثيق من لم يعرف فيه جرح، ومسلم النبال، والحسن بن أسامة قال عنهما الحافظ ابن حجر:"مقبول" أي عند المتابعة وإلا فلين الحديث، ولم أجد لهما متابعا.
لذا أعله ابن المديني فقال:"حديث الحسن بن أسامة حديث مديني، رواه شيخ ضعيف منكر الحديث، يقال له: موسى بن يعقوب الزمعي من ولد عبد الله بن زمعة، عن رجل مجهول عن آخر مجهول". انظر: تهذيب الكمال (ترجمة الحسن بن أسامة).
আবদুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালাত আদায় করছিলেন। যখন তিনি সিজদা করতেন, তখন হাসান ও হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর পিঠের উপর চড়ে বসতেন। যখন (অন্য লোকেরা) তাঁদের বাধা দিত, তখন তিনি তাঁদের (লোকদের) ইঙ্গিত করতেন যেন তাঁদের ছেড়ে দেওয়া হয়। যখন তিনি সালাত শেষ করলেন, তখন তাঁদের দু'জনকে কোলে রাখলেন এবং বললেন: "যে আমাকে ভালোবাসে, সে যেন এই দু'জনকেও ভালোবাসে।"
9854 - عن بريدة بن الحصيب قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يخطبنا إذ جاء الحسن والحسين عليهما قميصان أحمران يمشيان ويعثران، فنزل رسول الله صلى الله عليه وسلم من المنبر فحملهما ووضعهما بين يديه، ثم قال:"صدق الله {أَنَّمَا أَمْوَالُكُمْ وَأَوْلَادُكُمْ فِتْنَةٌ} نظرت إلى هذين الصبيين يمشيان ويعثران فلم أصبر حتى قطعت حديثي ورفعتهما".
حسن: رواه أبو داود (1109)، والترمذي (3774)، والنسائي (1413، 1585)، وابن ماجه (3600)، وصحّحه ابن خزيمة (1456)، وابن حبان (6039)، والحاكم (1/ 287) كلهم من طرق عن حسين بن واقد، حدثني عبد الله بن بريدة، قال: سمعت أبي بريدة يقول: فذكره.
وقال الترمذي:"هذا حديث حسن غريب، إنما نعرفه من حديث الحسن بن واقد".
وهو كما قال، فإن الحسين بن واقد حسن الحديث.
বুরাইদাহ ইবনুল হুসাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাদেরকে খুতবা দিচ্ছিলেন, এমন সময় হাসান ও হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এলেন। তাঁদের দু'জনের গায়ে লাল রঙের দুটি জামা ছিল। তাঁরা হেঁটে আসছিলেন এবং হোঁচট খাচ্ছিলেন। অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মিম্বর থেকে নেমে আসলেন, তাঁদের দু'জনকে তুলে নিলেন এবং নিজের সামনে রাখলেন। তারপর তিনি বললেন: "আল্লাহ সত্য বলেছেন: {তোমাদের ধন-সম্পদ ও সন্তান-সন্ততি পরীক্ষা (ফিতনা) স্বরূপ}। আমি এই দুটি শিশুকে দেখলাম, তারা হেঁটে আসছিল এবং হোঁচট খাচ্ছিল, ফলে আমি ধৈর্য ধারণ করতে পারলাম না এবং আমার বক্তব্য থামিয়ে দিয়ে তাঁদের দু'জনকে তুলে নিলাম।
9855 - عن خالد بن معدان قال: وفد المقدام بن معديكرب وعمرو بن الأسود ورجل من بني أسد من أهل قنسرين إلى معاوية بن أبي سفيان، فقال معاوية للمقدام: أعلمت أن الحسن بن علي توفي؟ فرجع المقدام، فقال له رجل: أتراها مصيبة؟ قال له: ولم لا أراها مصيبة وقد وضعه رسول الله صلى الله عليه وسلم في حجره فقال:"هذا مني وحسين من علي".
حسن: رواه أبو داود (4131)، وأحمد (17189)، والطبراني في الكبير (20/ 269) كلهم من طرق عن بقية بن الوليد، حدثنا بحير بن سعد، عن خالد بن معدان قال: فذكره.
وإسناده حسن من أجل بقية بن الوليد، وقد تقبل عنعنته مطلقا إذا روى عن بحير بن سعد قاله ابن عبد الهادي في تعليقه على علل ابن أبي حاتم.
وهنا قد روى عن بحير بن سعد بالتصريح وقوّى الذهبي هذا الإسناد في السير (3/ 258).
وقوله في الحديث:"هذا مني". يعني الحسن بن علي وذلك من باب إظهار المحبة لأن الحسن كان أكبر من الحسين، ولأنه قال فيه:"إن الله سيصلح على يديه بين فئتين عظيمتين". فقوله:"هذا مني" له مزيد من المزية.
روي عن أنس بن مالك قال: سئل رسول الله صلى الله عليه وسلم أي أهل بيتك أحب إليك؟ قال:"الحسن والحسين". وكان يقول لفاطمة:"ادعي لي ابنيَّ". فيشمُّهما ويضمُّهما إليه. رواه الترمذي (3772)، وأبو يعلى (4294) كلاهما عن أبي سعيد الأشج، حدثنا عقبة بن خالد، حدثني يوسف بن إبراهيم التميمي أنه سمع أنس بن مالك يقول: فذكره.
وقال الترمذي:"هذا حديث غريب من هذا الوجه من حديث أنس".
وهو كما قال: فإن يوسف بن إبراهيم التميمي ضعيف عند جمهور أهل العلم.
মিকদাম ইবনু মা'দীকারিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি, আমর ইবনু আসওয়াদ এবং কিন্নাসরিনের বানু আসাদ গোত্রের এক ব্যক্তি মু'আবিয়া ইবনু আবী সুফিয়ান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে গেলেন। মু'আবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মিকদামকে জিজ্ঞেস করলেন: আপনি কি জানেন যে হাসান ইবনু আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ইন্তেকাল করেছেন? (মিকদাম খবরটি শুনে ফিরে এলে) অন্য একজন লোক তাঁকে জিজ্ঞেস করল: আপনি কি এটিকে মুসিবত (বিপর্যয়) মনে করেন? তিনি তাকে বললেন: কেন আমি এটিকে মুসিবত মনে করব না, যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে (হাসানকে) নিজের কোলে বসিয়ে বলেছিলেন: "এ (হাসান) আমার থেকে এবং হুসাইন আলীর থেকে।"
9856 - عن عبد الله بن عمر - وسأله عن المحرم، قال شعبة: أحسبه، يقتل الذباب؟ - فقال: أهل العراق يسألون عن الذباب وقد قتلوا ابن ابنة رسول الله صلى الله عليه وسلم، وقال النبي صلى الله عليه وسلم:"هما ريحانتاي من الدنيا".
صحيح: رواه البخاري في فضائل الصحابة (3753) عن محمد بن بشار، حدثنا غندر، ثنا
شعبة، عن محمد بن أبي يعقوب، سمعت ابن أبي نُعْم، سمعت عبد الله بن عمر فذكره.
وفي لفظ:"قال ابن أبي نُعْم: كنت شاهدا لابن عمر، وسأله رجل عن دم البعوض؟ فقال: ممن أنت؟ فقال: من أهل العراق، قال: انظروا إلى هذا يسألني عن دم البعوض، وقد قتلوا ابن النبي صلى الله عليه وسلم …". رواه البخاري في الأدب (5994) عن موسى بن إسماعيل، حدثنا مهدي، ثنا ابن أبي يعقوب به.
আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁকে মুহরিম (ইহরামকারী) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হয়েছিল। শু‘বাহ বলেন, আমি মনে করি, সে (প্রশ্নকারী) জিজ্ঞাসা করেছিল যে, মুহরিম কি মাছি হত্যা করতে পারে? তখন তিনি বললেন: ইরাকবাসীরা আমাকে মাছি সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করে, অথচ তারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কন্যার পুত্রকে হত্যা করেছে। আর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তারা দুজন হলো দুনিয়াতে আমার সুগন্ধি ফুল।"
অন্য এক বর্ণনায় (ইবনে আবী নু'ম বলেন), আমি ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে উপস্থিত ছিলাম। একজন লোক তাঁকে মশার রক্ত সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলে তিনি বললেন, ‘তুমি কোন অঞ্চলের লোক?’ সে বলল, ‘আমি ইরাকের অধিবাসী।’ তিনি বললেন: ‘এই লোকটিকে দেখুন, সে আমাকে মশার রক্ত সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করে, অথচ তারা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পুত্রকে হত্যা করেছে।’
9857 - عن سعد بن أبي وقاص قال: دخلت على رسول الله صلى الله عليه وسلم والحسن والحسين يلعبان على بطنه فقلت: يا رسول الله أتحبهما؟ قال:"وما لي لا أحبهما، ريحانتاي".
حسن: رواه البزار (1078) عن عباد بن يعقوب، حدثنا علي بن هاشم بن البريد، ثنا عبد الرحمن بن عبد الله بن دينار، عن أبي سهيل بن مالك (واسمه: نافع)، عن سعيد بن المسيب، عن سعد بن أبي وقاص فذكره.
قال الهيثمي في المجمع (9/ 181):"رواه البزار ورجاله رجال الصحيح".
وإسناده حسن من أجل عباد بن يعقوب هو الرواجني، وعلي بن هاشم بن البريد، وعبد الرحمن بن عبد الله بن دينار، فإن كلا من هؤلاء حسن الحديث.
وكون عباد بن يعقوب الرواجني، وعلي بن هاشم بن البريد موصوفا بالتشيع لا يضر ذلك لأن له شاهدا صحيحا.
সা'দ ইবনু আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট প্রবেশ করলাম। তখন হাসান ও হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর পেটের উপর খেলছিলেন। আমি বললাম, ‘হে আল্লাহর রাসূল! আপনি কি তাদের দু’জনকে ভালোবাসেন?’ তিনি বললেন, 'আমি কেন তাদের দু’জনকে ভালোবাসব না? তারা আমার দু’টি সুগন্ধি ফুল (রাইহানাতায়)।'
9858 - عن أبي سعيد الخدري قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"الحسن والحسين سيدا شباب أهل الجنة".
حسن: رواه الترمذي (3768)، وأحمد (10999)، والنسائي في الكبرى (8473، 8474، 8472) كلهم من طرق، عن عبد الرحمن بن أبي نُعم (هو البجلي الكوفي)، عن أبي سعيد الخدري قال: فذكره.
وإسناده حسن من أجل عبد الرحمن بن أبي نُعم فإنه حسن الحديث.
وقال الترمذي:"هذا حديث حسن صحيح".
আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "হাসান এবং হুসাইন হলো জান্নাতবাসীদের যুবকদের সরদার।"
9859 - عن حذيفة قال: سألتني أمي: متى عهدك؟ تعني بالنبي صلى الله عليه وسلم فقلت: ما لي به عهد منذ كذا وكذا، فنالت مني، فقلت لها: دعيني آتي النبي صلى الله عليه وسلم فأصلي معه المغرب وأسأله أن يستغفر لي ولك، فأتيت النبي صلى الله عليه وسلم فصليت معه المغرب، فصلى حتى صلى العشاء ثم انفتل فتبعته، فسمع صوتي فقال:"من هذا؟ حذيفة؟". قلت: نعم، قال:"ما حاجتك، غفر الله لك ولأمك؟". قال:"إن هذا ملك لم ينزل الأرض قط قبل هذه
الليلة، استأذن ربه أن يسلم علي ويبشرني بأن فاطمة سيدة نساء أهل الجنة، وأن الحسن والحسين سيدا شباب أهل الجنة".
حسن: رواه الترمذي (3781) عن عبد الله بن عبد الرحمن وإسحاق بن منصور قالا: أخبرنا محمد بن يوسف، عن إسرائيل، عن ميسرة بن حبيب، عن المنهال بن عمرو، عن زر بن حبيش، عن حذيفة فذكره.
ورواه ابن خزيمة (1194)، وابن حبان (6960)، والحاكم (3/ 381) كلهم من طريق إسرائيل به مثله إلا أن البعض اقتصر على ذكر الصلاه فقط.
قال الترمذي:"حسن غريب من هذا الوجه ولا نعرفه إلا من حديث إسرائيل". انتهى.
قلت: وهو كما قال، فإن إسناده حسن لأجل ميسرة بن حبيب والمنهال بن عمرو فإنهما حسنا الحديث.
ورواه أحمد (23330) من وجه آخر عن إسرائيل، عن أبي السفر، عن الشعبي، عن حذيفة قال: أتيت النبي صلى الله عليه وسلم، فصليت معه الظهر والعصر والمغرب والعشاء، تم تبعته وهو يريد يدخل بعض حجره فقام وأنا خلفه، كأنه يكلم أحدا. قال: ثم قال:"من هذا؟". قلت: حذيفة، قال:"أتدري من كان معي؟". قلت: لا، قال:"فإن جبريل جاء يبشرني أن الحسن والحسين سيدا شباب أهل الجنة". قال: فقال حذيفة: فاستغفر لي ولأمي، لمحال:"غفر الله لك يا حذيفة ولأمك".
رجال إسناده ثقات، وابن أبي السفر هو: عبد الله بن أبي السفر الثوري الكوفي من رجال الجماعة إلا أن الشعبي وهو: عامر بن شراحيل أبو عمرو الكوفي أدرك زمان حذيفة وهو صغير، فإن صحّ قول ابن السمعاني بأنه ولد سنة عشرين، فيكون عمره عند وفاة حذيفة ستة عشر سنة، لأنه توفي في أول خلافة علي سنة ست وثلاثين. ولذا لم أجد من جزم بعدم سماعه منه.
হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমার মা আমাকে জিজ্ঞেস করলেন: নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে তোমার সাক্ষাতের শেষ সময় কবে? আমি বললাম: অনেক দিন হয়ে গেল, তাঁর সাথে আমার কোনো সাক্ষাৎ নেই। এতে তিনি আমার উপর অসন্তুষ্ট হলেন (বা তিরস্কার করলেন)। আমি তাঁকে বললাম: আমাকে ছেড়ে দাও, আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে যাই এবং তাঁর সাথে মাগরিবের সালাত আদায় করি, আর তাঁকে অনুরোধ করি যেন তিনি আমার ও তোমার জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করেন। অতঃপর আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলাম এবং তাঁর সাথে মাগরিবের সালাত আদায় করলাম। তিনি সালাত আদায় করতে থাকলেন, এমনকি ইশার সালাতও আদায় করলেন। এরপর তিনি ফিরে গেলেন, আমিও তাঁর অনুসরণ করলাম। তিনি আমার আওয়াজ শুনতে পেলেন এবং বললেন: "কে এটি? হুযাইফা?" আমি বললাম: হ্যাঁ। তিনি বললেন: "তোমার কী প্রয়োজন? আল্লাহ তোমাকে এবং তোমার মাকে ক্ষমা করুন!" অতঃপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এ এক ফেরেশতা, যিনি আজকের রাতের আগে কখনো পৃথিবীতে অবতরণ করেননি। তিনি তাঁর রবের কাছে অনুমতি চেয়েছেন যেন তিনি আমাকে সালাম দেন এবং আমাকে এই সুসংবাদ দেন যে, ফাতিমা জান্নাতের নারীদের নেত্রী এবং হাসান ও হুসাইন জান্নাতবাসীদের যুবকদের নেতা।"
9860 - عن أبي سعيد الخدري قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"الحسن والحسين سيدا شباب أهل الجنة، وفاطمة سيدة نساء أهل الجنة، إلا ما كان من مريم ابنة عمران".
حسن: رواه النسائي في الكبرى (8416)، وأحمد في مسنده (11618) (11756) وفي فضائل الصحابة (1331)، وأبو يعلى (1169) كلهم من حديث يزيد بن أبي زياد، عن عبد الرحمن بن أبي نعم، عن أبي سعيد الخدري فذكره.
ويزيد بن أبي زياد ضعيف ولكن تابعه منصور بن أبي الأسود.
رواه الحاكم (3/ 154) من وجه آخر عن منصور بن أبي الأسود، عن عبد الرحمن بن أبي نعم، عن أبي سعيد الخدري فذكر نحوه.
وقال: هذا حديث صحيح الإسناد.
قلت: إسناده حسن من أجل منصور بن أبي الأسود فإنه حسن الحديث إلا أن في إسناد الحاكم محمد بن الحسين بن أبي الحسين لم يوثّقه أحد، وذكره ابن حبان في"الثقات" (9/ 136).
وفي معناه ما روي عن البراء بن عازب قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"الحسن والحسين سيدا شباب أهل الجنة".
رواه الطبراني في الأوسط (4329) عن عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني علي بن حكيم الأودي، ثنا شريك (هو ابن عبد الله القاضي)، عن أشعث بن سوار، عن عدي بن ثابت، عن البراء قال: فذكره.
وإسناده ضعيف من أجل أشعث بن سوّار فإنه ضعيف باتفاق أهل العلم.
وذكره الهيثمي في المجمع (9/ 184) وقال:"رواه الطبراني - يعني في الكبير - وإسناده حسن".
ولم أقف على إسناده في القدر المطبوع من المعجم الكبير فالله أعلم بالصواب.
وفي معناه ما روي أيضا عن أبي هريرة قال: أبطأ رسول الله صلى الله عليه وسلم عنا يوما صدر النهار، فلما كان العشي قال له قائلنا: يا رسول الله! قد شق علينا لم نرك اليوم، قال:"إن ملكا من السماء لم يكن رآني، فاستأذن الله في زيارتي، فأخبرني - أو بشرني - أن فاطمة ابنتي سيدة نساء أمتي، وأن حسنًا وحسينًا سيدا شباب أهل الجنة".
رواه النسائي في الكبرى (8462)، والطبراني في الكبير (3/ 22 و 22/ 403) كلاهما من طريق أبي جعفر محمد بن مروان الذهلي - وقيل الهذلي -، حدثني أبو حازم (واسمه: سلمان الأشجعي)، عن أبي هريرة فذكره.
ومحمد بن مروان لم يوثّقه غير ابن حبان لذا قال الحافظ:"مقبول" يعني يتابع وإلا فلين الحديث، ولم أجد له متابعا.
وفي الباب روي عن ابن عمر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"الحسن والحسين سيدا شباب أهل الجنة، وأبوهما خير منهما". إلا أنه ضعيف جدا.
رواه ابن ماجه (118)، والحاكم (3/ 167) كلاهما من طريق محمد بن موسى الواسطي، حدثنا المعلى بن عبد الرحمن، حدثنا ابن أبي ذئب، عن نافع، عن ابن عمر فذكره.
والمعلى بن عبد الرحمن هو الواسطي ضعيف جدا وقد كذبه الدارقطني وقال أبو زرعة: ذاهب الحديث.
আবু সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “হাসান ও হুসাইন জান্নাতের যুবকদের সর্দার এবং ফাতিমা মারইয়াম বিনতে ইমরান (আঃ) ব্যতীত জান্নাতের নারীদের সর্দার।”
