হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (9441)


9441 - عن أبي أمامة بن سهل قال: كانت قبيعة سيف رسول الله صلى الله عليه وسلم من فضة.

صحيح: رواه النسائي (5373) عن عمران بن يزيد قال: حدثنا عيسى بن يونس، حدثنا عثمان ابن حكيم، عن أبي أمامة بن سهل، فذكره.

وإسناده صحيح، وقد صححه ابن حجر في التلخيص الحبير (1/ 64).

وأبو أمامة بن سهل، مشهور بكنيته مختلف في اسمه، ولد في عهد النبي صلى الله عليه وسلم ولم يسمع منه، ولكن لا مانع من رؤيته سيف النبي صلى الله عليه وسلم.

وقبيعة السيف -كسفينة-: ما على طرف مقبضه من فضة أو حديد.

وأما ما روي عن أنس قال: كانت قبيعة سيف رسول الله صلى الله عليه وسلم من فضة، فالصواب أنه مرسل.

رواه أبو داود (2583) والترمذي (1691) من طريق جرير بن حازم، والنسائي (5374) من طريق همام (هو ابن يحيى) وجرير، والطحاوي في شرح المشكل (1398) من طريق أبي عوانة، كلهم عن قتادة، عن أنس، فذكره.

وقال الترمذي:"هذا حديث حسن غريب، وهكذا رُوي عن همام، عن قتادة، عن أنس، وقد روى بعضهم عن قتادة، عن سعيد بن أبي الحسن قال: كانت قبيعة سيف رسول الله صلى الله عليه وسلم من فضة". اهـ

قلت: هكذا رواه هشام الدستوائي عن قتادة، عن سعيد بن أبي الحسن، وهو من أثبت أصحاب قتادة، أخرج روايته أبو داود (2584) والنسائي (5375) والترمذي في الشمائل (100).

وهذا الذي رجحه جمع من الأئمة، منهم الإمام أحمد كما في العلل برواية عبد الله (1/ 239 - 240) والنسائي كما نقل عنه الضياء في المختارة (6/ 348) والمزي في التحفة (1/ 301) وأبو داود، والدارمي (2501) والدارقطني في العلل (12/ 150) والبيهقي (4/ 143) وغيرهم، وانظر التلخيص الحبير (1/ 52).

وأما ما روي عن ابن سيرين قال: صنعت سيفي على سيف سمرة بن جندب، وزعم سمرة أنه صنع سيفه على سيف رسول الله صلى الله عليه وسلم، وكان حنفيًّا. فضعيف.

رواه الترمذي في جامعه (1683) وفي الشمائل (102) وأحمد (20229) من طرق عن عثمان ابن سعد، عن ابن سيرين، فذكره.

وقال الترمذي: هذا حديث غريب لا نعرفه إلا من هذا الوجه، وقد تكلم يحيى بن سعيد القطان في عثمان بن سعد الكاتب من قبل حفظه".

وروي نحوه من مرسل مجاهد وزياد بن أبي مريم رواه ابن سعد في الطبقات (1/ 486) وأبو
الشيخ في أخلاق النبي صلى الله عليه وسلم (410) من طريق عبد الواحد بن زياد، عن خصيف بن عبد الرحمن، عن مجاهد وزياد بن أبي مريم قالا: كان سيف رسول الله صلى الله عليه وسلم حنفيا، قائمه من قرن.

وهو مرسل رجاله ثقات إلا خصيفًا، فقد تكلم فيه، إلا أنه حسن الحديث.

وقوله: حنفيًا أي على هيئة سيوف بني حنيفة قوم مسيلمة الكذاب، لأن صانعه منهم، أو ممن يعمل كعملهم.

وأما ما رُوي عن مزيدة العبدي قال: دخل رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم الفتح، وعلى سيفه ذهب وفضة فضعيف.

رواه الترمذي في جامعه (1690) وفي العلل الكبير (2/ 716) عن محمد بن صدران أبي جعفر البصري، حدثنا طالب بن حجير، عن هود بن عبد الله بن سعد، عن جده فريدة، فذكره. قال طالب: فسألته (أي هودًا) عن الفضة، فقال: كانت قبيعة السيف من فضة.

وفي إسناده هود بن عبد الله البصري لم يذكر له راو غير طالب بن حجير، ولم يوثقه أحد إلا أن ابن حبان ذكره في ثقاته (5/ 516)، ولذا قال ابن القطان في بيان الوهم (3/ 482): مجهول الحال، وقال ابن حجر:"مقبول" أي عند المتابعة.

وقال ابن عبد البر في ترجمة فريدة العبدي من الاستيعاب: وإسناده ليس بالقوي. وقال الذهبي في ترجمة طالب بن حجير من الميزان (2/ 333):"وهذا منكر، فما علمنا في حلية سيفه صلى الله عليه وسلم ذهبًا.




আবূ উমামা ইবনু সাহল থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের তরবারির কাবি‘আহ (হাতলের অগ্রভাগ) রুপার ছিল।









আল-জামি` আল-কামিল (9442)


9442 - عن الزبير بن العوام قال: كان على النبي صلى الله عليه وسلم درعان يوم أحد، فنهض إلى الصخرة فلم يستطع، فأقعد طلحة تحته، فصعد النبي صلى الله عليه وسلم عليه، حتى استوى على الصخرة، فقال: سمعت النبي صلى الله عليه وسلم يقول:"أوجب طلحة".

حسن: رواه الترمذي (1692)، (3738) وأحمد (1417) وابن حبان (6979) والحاكم (3/ 374) والبيهقي (6/ 370، 9/ 46) من طرق عن محمد بن إسحاق وهو في سيرته كما في سيرة ابن هشام (2/ 86) قال: حدثني يحيى بن عباد بن عبد الله بن الزبير، عن أبيه، عن جده عبد الله بن الزبير، عن الزبير بن العوام، فذكره، وسقط ذكر أبيه من الإحسان. وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق.

وقال الترمذي:"وهذا حديث حسن غريب، لا نعرفه إلا من حديث محمد بن إسحاق". اهـ.

وقال الحاكم:"هذا حديث صحيح على شرط مسلم".

وقوله:"أوجب طلحة" أي عمل عملا أوجب له الجنة.

وفي الباب أحاديث أخرى ذكرت في كتاب الجهاد والمغازي.




যুবাইর ইবনুল আওয়াম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উহুদ যুদ্ধের দিন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের শরীরে দুটি বর্ম ছিল। তিনি একটি পাথরের উপর উঠতে চেষ্টা করলেন, কিন্তু পারলেন না। তখন তিনি তালহাকে তাঁর নিচে বসালেন। এরপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর (তালহার) উপর ভর করে আরোহণ করলেন, যতক্ষণ না তিনি পাথরের উপর স্থির হলেন। তিনি (যুবাইর) বলেন: আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “তালহা (জান্নাত) ওয়াজিব করে নিয়েছে।”









আল-জামি` আল-কামিল (9443)


9443 - عن جابر بن عبد الله أن النبي صلى الله عليه وسلم دخل مكة وعليه عمامة سوداء بغير إحرام.
صحيح: رواه مسلم في الحج (451: 1358) من طرق عن معاوية بن عمار الدهني، عن أبي الزبير، عن جابر بن عبد الله الأنصاري قال: فذكره.

وبين إسماعيل بن أبان أن معاوية بن عمار الدهني سمعه من أبي الزبير مع أبيه. ذكره الدارمي (1982).




জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কায় প্রবেশ করেছিলেন, তখন তাঁর মাথায় কালো পাগড়ি ছিল এবং তিনি ইহরামবিহীন অবস্থায় ছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (9444)


9444 - عن ابن عباس قال: خرج رسول الله صلى الله عليه وسلم وعليه ملحفة متعطفًا بها على منكبيه، وعليه عصابة دسماء … الحديث في فضائل الأنصار.

صحيح: رواه البخاري في مناقب الأنصار (3800) عن أحمد بن يعقوب، حدثنا ابن الغسيل (واسمه عبد الرحمن بن الغسيل، والغسيل هو حنظلة الأنصاري) سمعت عكرمة يقول: سمعت ابن عباس يقول: فذكره.

قوله:"عصابة" أي عمامة.

قوله:"دسماء" المتلطخة بدسومة شعره من الطيب والمراد بها: السوداء.

وفي معناه ما روي عن عبد الله بن عمر قال: كان النبي صلى الله عليه وسلم إذا اعتمّ سدل عمامته بين كتفيه. إلا أنه ضعيف.

رواه الترمذي في سننه (1736) وفي الشمائل (110) وصححه ابن حبان (6397) وأبو الشيخ في أخلاق النبي (ص 103) والخطيب في تاريخه (11/ 293) من طرق عن عبد العزيز بن محمد (هو الدراوردي) عن عبيد الله بن عمر، عن نافع، عن ابن عمر قال: فذكره.

قال الترمذي: حسن غريب.

قلت: عبد العزيز بن محمد الدراوردي حسن الحديث إذا لم يخالف، ولكنه خالف هنا فرواه عن عبيد الله مرفوعًا، وغيره رواه عنه موقوفًا.

منهم أبو أسامة حماد بن أسامة فإنه وقّفه ولم يرفعه.

رواه عنه ابن أبي شيبة (25477)

والإمام أحمد لما ذكر له هذا الحديث تبسم وأنكره، وقال: إنما هذا موقوف. ضعفاء العقيلي (977).

وقال الدارقطني: رواه الدراوردي عن عبد الله مرفوعًا وغيره يرويه عن عبد الله موقوفًا وهو المحفوظ. العلل (2969)

وقال النسائي: حديث الدراوردي عن عبيد الله منكر.

وقال أحمد أيضا: ما حدّث الدراوردي عن عبيد الله فهو عن عبد الله بن عمر.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বের হলেন, এমতাবস্থায় তাঁর গায়ে ছিল একটি চাদর, যা তিনি তাঁর দুই কাঁধের উপর জড়িয়ে রেখেছিলেন এবং তাঁর মাথায় ছিল একটি ময়লাযুক্ত (বা কালো) পট্টি (পাগড়ি)। (এই হাদীসটি আনসারদের মর্যাদা সংক্রান্ত)।









আল-জামি` আল-কামিল (9445)


9445 - عن أبي جحيفة قال: أتيت النبي صلى الله عليه وسلم بمكة، وهو بالأبطح في قبة له حمراء من
أدم قال: فخرج بلال بوضوئه فمن نائل وناضح قال: فخرج النبي صلى الله عليه وسلم عليه حلة حمراء كأني أنظر إلى بياض ساقيه … الحديث.

متفق عليه: رواه البخاري في المناقب (3566) ومسلم في الصلاة (249: 503) كلاهما من طريق عون بن أبي جحيفة، عن أبي جحيفة قال: فذكره.

وأبو جحيفة اسمه وهب بن عبد الله السوائي رضي الله عنه.

والحلة: عبارة عن رداء وإزار من جنس واحد.




আবূ জুহায়ফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি মক্কায় এসেছিলাম যখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আল-আবত্বাহ নামক স্থানে চামড়ার তৈরি তাঁর লাল তাঁবুর মধ্যে অবস্থান করছিলেন। তিনি বলেন, তখন বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর ওযুর পানি নিয়ে বের হলেন। ফলে কেউ কেউ তা থেকে পেলেন এবং কেউ কেউ (ছিঁটা) নিলেন। অতঃপর নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম একটি লাল জোড়া বস্ত্র (পোশাক) পরিহিত অবস্থায় বের হলেন। আমি যেন এখনও তাঁর পদদ্বয়ের শুভ্রতা দেখতে পাচ্ছি... [হাদীসের শেষ পর্যন্ত]।









আল-জামি` আল-কামিল (9446)


9446 - عن أبي بردة قال: دخلت على عائشة فأخرجت إلينا إزارًا غليظًا مما يصنع باليمن، وكساء من التي يسمونها الملبّدة، قال: فأقسمت بالله إن رسول الله صلى الله عليه وسلم قبض في هذين الثوبين.

متفق عليه: رواه البخاري في اللباس (5818) ومسلم في اللباس والزينة (34: 2080) كلاهما من طريق حميد بن هلال، عن أبي بردة قال: فذكره واللفظ لمسلم.

الملبّدة: أي مرقّعة أو الثخينة التي صارت كالملبد.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি আমাদের নিকট ইয়ামানে প্রস্তুতকৃত মোটা একটি ইযার (লুঙ্গি) এবং আল-মুলাব্বাদাহ নামে পরিচিত একটি চাদর বের করলেন। অতঃপর তিনি আল্লাহর কসম করে বললেন, এই দুটি কাপড়ের মধ্যেই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম)-এর ওফাত হয়েছিল।









আল-জামি` আল-কামিল (9447)


9447 - عن عكرمة أنه رأى ابن عباس يأتزر، فيضع حاشية إزاره من مقدمه على ظهور قدميه، ويرفع من مؤخره، قلت: لم تأتزر هذه الإزرة؟ قال: رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم يأتزرها.

حسن: رواه أبو داود (4096) وابن سعد (1/ 459) وأبو الشيخ في أخلاق النبي (ص 97) كلهم من طريق محمد بن أبي يحيى، حدثني عكرمة، أنه رأى ابن عباس، فذكره. وإسناده حسن من أجل محمد بن أبي يحيى الأسلمي فإنه حسن الحديث.

روي عن عبيد بن خالد أنه قال: بينا أنا أمشي بالمدينة إذا إنسان خلفي يقول: ارفع إزارك فإنه أتقى وأبقى، فإذا هو رسول الله صلى الله عليه وسلم فقلت: يا رسول الله إنما هي بردة ملحاء، قال: أما لك فيّ أسوة؟ فنظرت فإذا إزاره إلى نصف ساقيه.

رواه الترمذي في الشمائل (113) والنسائي في الكبرى (9604، 9603) والطيالسي (1286) وأحمد (23086) كلهم من طريق أشعث بن سليم أبي الشعثاء عن عمته، عن عمّها عبيد بن خالد، قال: فذكره.

وعمة أشعث هي رهم بنت الأسود قال الحافظ في التقريب: لا تعرف.

وبمعناه روي عن سلمة بن الأكوع أنه قال: كان عثمان بن عفان يأترز إلى أنصاف ساقيه، وقال: هكذا كانت إزرة صاحبي يعني النبي صلى الله عليه وسلم.

رواه الترمذي في الشمائل (114) وأبو الشيخ في أخلاق النبي (ص 96) كلاهما من طريق عبد الله بن المبارك، عن موسى بن عبيدة، عن إياس بن سلمة بن الأكوع عن أبيه، فذكره. وإسناده
ضعيف من أجل موسى بن عبيدة الربذي فإنه ضعيف الحديث.

تنبيه: سقط من مطبوعة أبي الشيخ"حدثنا ابن المبارك عن موسى بن عبيدة" وهو موجود في النسخ الأخرى.




ইকরিমা থেকে বর্ণিত, তিনি ইবনে আব্বাসকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দেখেছেন যে, তিনি লুঙ্গি পরিধান করছেন। লুঙ্গি পরিধানের সময় তিনি সেটির সামনের কিনারাকে তাঁর পদদ্বয়ের পাতার (উপরের) উপর ঝুলিয়ে রাখতেন এবং পেছনের অংশকে উঠিয়ে রাখতেন। [ইকরিমা বলেন] আমি তাঁকে জিজ্ঞাসা করলাম: আপনি কেন এই পদ্ধতিতে লুঙ্গি পরলেন? তিনি বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে এইভাবেই লুঙ্গি পরিধান করতে দেখেছি।









আল-জামি` আল-কামিল (9448)


9448 - عن عاصم الأحول قال: رأيت قدح النبي صلى الله عليه وسلم عند أنس بن مالك، وكان قد انصدع، فسلسله بفضة قال: هو قدح جيد عريض من نضار. قال: قال أنس: لقد سقيت رسول الله صلى الله عليه وسلم في هذا القدح أكثر من كذا وكذا.

قال: وقال ابن سيرين: إنه كان فيه حلقة من حديد، فأراد أنس أن يجعل مكانها حلقة من ذهب أو فضة، فقال له أبو طلحة: لا تغيّرن شيئًا صنعه رسول الله صلى الله عليه وسلم فتركه.

صحيح: رواه البخاري في الأشربة (5638) عن الحسن بن مدرك، قال: حدثني يحيى بن حماد، أخبرنا أبو عوانة عن عاصم الأحول قال: فذكره.

قول:"النضار": العود من كل شيء، وقيل: هو أجود الخشب للآنية.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (আসিম আল-আহওয়াল বলেন:) আমি আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর একটি পানপাত্র দেখেছি। সেটি ফেটে গিয়েছিল, তাই তিনি রূপা দিয়ে এটিকে জোড়া লাগিয়েছিলেন। তিনি বলেন, এটি ছিল উত্তম, চওড়া, 'নিদার' কাঠের তৈরি পানপাত্র। আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-কে এই পানপাত্রে অসংখ্যবার পান করিয়েছি।

(বর্ণনাকারী) বলেন, ইবনে সীরীন বলেছেন: পেয়ালাটিতে লোহার একটি আংটা ছিল। আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সেটির পরিবর্তে সোনা বা রূপার আংটা লাগাতে চাইলেন। তখন আবূ তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বললেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম যা তৈরি করেছেন (বা ব্যবহার করেছেন), তার কিছুই পরিবর্তন করবেন না। সুতরাং তিনি (আনাস) তা পরিবর্তন করা থেকে বিরত রইলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (9449)


9449 - عن أنس قال: لقد سقيت رسول الله صلى الله عليه وسلم بقدحي هذا الشراب كله: العسل والنبيذ، والماء، واللبن.

صحيح: رواه مسلم في الأشربة (89: 2008) من طرق عن عفان، حدثنا حماد بن سلمة، عن ثابت عن أنس قال: فذكره.

قوله:"النبيذ": هو ماء يجعل فيه تمرات ليحلو وكان يوضع له التمر أول الليل ويشرب منه إذا أصبح.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আমার এই পাত্র দ্বারা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে সকল প্রকার পানীয় পান করিয়েছি: মধু, নাবীয, পানি এবং দুধ।









আল-জামি` আল-কামিল (9450)


9450 - عن عائشة قالت: إنما كان فراش رسول الله صلى الله عليه وسلم الذي ينام عليه، أدما حشوه ليف.

متفق عليه: رواه البخاري في الرقاق (6456) ومسلم في اللباس والزينة (38: 2082) كلاهما من طريق هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة قالت: فذكرته.

وورد بلفظ: إنما"ضجاع رسول الله صلى الله عليه وسلم" بدل"فراش رسول الله صلى الله عليه وسلم"




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেছেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর বিছানা, যার ওপর তিনি ঘুমাতেন, তা ছিল চামড়ার তৈরি, যার ভেতরে খেজুর গাছের আঁশ (ছোবড়া) ভরা ছিল।









আল-জামি` আল-কামিল (9451)


9451 - عن عائشة قالت: كان وسادة رسول الله صلى الله عليه وسلم التي يتكئ عليها من أدم حشوها ليف.

صحيح: رواه مسلم في اللباس (37: 2082) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حدثنا عبدة بن سليمان، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة قالت: فذكرته.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর বালিশটি যার উপর তিনি হেলান দিতেন, তা ছিল চামড়ার তৈরি এবং এর ভেতরে ছিল খেজুর গাছের আঁশ (পাম ফাইবার)।









আল-জামি` আল-কামিল (9452)


9452 - عن أبي موسى الأشعري قال: أتيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو يستنُّ بسواكٍ بيده، ويقول:"أعْ أعْ" والسواك في فيه، كأنه يتهوَّع.

متفق عليه: أخرجه البخاري في الوضوء (244)، ومسلم في الطهارة (254)، كلاهما من حديث حماد بن زيد، عن غيلان بن جرير، عن أبي بردَة، عن أبيه، فذكره. وهذا لفظ البخاري.

ولفظ مسلم قال:"دخلت على النبي صلى الله عليه وسلم وطرفُ السواك على لسانه".

وقوله:"يتهوع": من التهوع، وهو التقيؤ، يقال: (هاع يهوع هواعا) إذا تقيأ، والمراد به ها هنا: إقلاع النخامة من أقصى الحلق، وإخراجها ليبصقها ويفعل ذلك من يريد أن يتقيَّأ.




আবূ মূসা আল-আশ'আরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলাম, যখন তিনি তাঁর হাতে থাকা মিসওয়াক দ্বারা দাঁত মাজছিলেন এবং মিসওয়াক তাঁর মুখের মধ্যে থাকা অবস্থায় তিনি 'আ'আ' শব্দ বলছিলেন। মনে হচ্ছিল যেন তিনি বমির উদ্বেগ প্রকাশ করছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (9453)


9453 - عن عائشة أن النبي صلى الله عليه وسلم كان إذا دخل بيته بدأ بالسواك.

وفي رواية: قال شريح: سألت عائشة قلت: بأي شيء كان يبدأ النبي صلى الله عليه وسلم إذا دخل بيته؟ قالت: بالسواك.

صحيح: رواه مسلم في الطهارة (253) من حديث مِسْعَر، عن المقدام بن شريح، عن أبيه، عن عائشة، فذكرته.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন তাঁর ঘরে প্রবেশ করতেন, তখন তিনি মিসওয়াক (ব্যবহার) দিয়ে শুরু করতেন।

অন্য এক বর্ণনায় এসেছে, শুরাইহ বলেন: আমি আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করলাম, আমি বললাম: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন তাঁর ঘরে প্রবেশ করতেন, তখন সর্বপ্রথম কী দিয়ে শুরু করতেন? তিনি বললেন: মিসওয়াক দিয়ে।









আল-জামি` আল-কামিল (9454)


9454 - عن حذيفة بن اليمان قال: كان النبي صلى الله عليه وسلم إذا قام من الليل يَشُوص فاه بالسواك.

متفق عليه: رواه البخاري في الوضوء (245)، ومسلم في الطهارة (255) كلاهما من حديث جرير، عن منصور، عن أبي وائل، عن حذيفة، فذكر الحديث. وفي رواية حصين بن عبد الرحمن، عن أبي وائل عند مسلم:"إذا قام ليتهجَّد يشوص فاه بالسواك".

والشوص: هو دلك الأسنان بالسواك عَرْضًا.




হুযাইফা ইবনুল ইয়ামান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন রাতে (ঘুম থেকে) উঠতেন, তখন তিনি মিসওয়াক দ্বারা তাঁর মুখ পরিষ্কার করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (9455)


9455 - عن عائشة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يسأل في مرضه الذي مات فيه يقول: أين أنا غدا؟ أين أنا غدا؟ يريد يوم عائشة، فأذن له أزواجه يكون حيث شاء، فكان في بيت عائشة حتى مات عندها. قالت عائشة فمات في اليوم الذي كان يدور علي فيه في بيتي، فقبضه الله وإن رأسه لبين نحري وسحري، وخالط ريقه ريقي. ثم قالت: دخل عبد الرحمن بن أبي بكر ومعه سواك يستن به، فنظر إليه رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقلت له: أعطني هذا السواك يا عبد الرحمن، فأعطانيه، فقضمته، ثم مضغته، فأعطيته رسول الله صلى الله عليه وسلم، فاستن به وهو مستند إلى صدري.

متفق عليه: رواه البخاري في المغازي (4450)، ومسلم في فضائل الصحابة (2443: 84) كلاهما من طريق هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة، فذكرته.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর যে রোগে ইন্তেকাল করেন, সেই রোগের সময় জিজ্ঞেস করতেন: "আমি কাল কোথায় থাকব? আমি কাল কোথায় থাকব?"—তিনি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পালা চাইতেন। অতঃপর তাঁর স্ত্রীগণ তাঁকে অনুমতি দিলেন যে, তিনি যেখানে ইচ্ছা থাকতে পারেন। ফলে তিনি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ঘরেই ছিলেন এবং সেখানেই ইন্তেকাল করেন। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, যে দিন আমার ঘরে আমার পালা ছিল, সেই দিনই তিনি ইন্তেকাল করেন। আল্লাহ তাঁকে কব্জা করেন এমতাবস্থায় যে, তাঁর মাথা আমার গলা ও বুকের মধ্যখানে ছিল এবং তাঁর লালা আমার লালার সাথে মিশে গিয়েছিল। অতঃপর তিনি বলেন, আবদুর রহমান ইবনু আবূ বকর প্রবেশ করলেন, তাঁর সাথে একটি মিসওয়াক ছিল যা দিয়ে তিনি মিসওয়াক করছিলেন। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সেটির দিকে তাকালেন। তখন আমি তাঁকে বললাম: হে আবদুর রহমান, আমাকে এই মিসওয়াকটি দিন। তিনি আমাকে সেটি দিলেন। আমি তা চিবিয়ে নিলাম, অতঃপর নরম করে নিলাম, এরপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে দিলাম। তিনি আমার বুকের উপর হেলান দেওয়া অবস্থায় তা দ্বারা মিসওয়াক করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (9456)


9456 - عن ابن عباس، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"نصرت بالصبا، وأهلكت عاد بالدبور".

متفق عليه: رواه البخاري في المغازي (4105) ومسلم في صلاة الاستسقاء (17: 900) كلاهما من طريق شعبة، حدثني الحكم، عن مجاهد، عن ابن عباس عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: فذكره.

قوله:"نصرت بالصبا" بفتح المهملة وتخفيف الموحدة وهي الريح الشرقية.

قوله:"الدبور" هي الريح الغربية.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমি পূর্বের বাতাস দ্বারা সাহায্যপ্রাপ্ত হয়েছি, আর ‘আদ জাতিকে পশ্চিমের বাতাস দ্বারা ধ্বংস করা হয়েছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (9457)


9457 - عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"بعثت بجوامع الكلم، ونصرت بالرعب، فبينا أنا نائم أتيت بمفاتيح خزائن الأرض، فوضعت في يدي".

قال أبو هريرة: وقد ذهب رسول الله صلى الله عليه وسلم وأنتم تنتثلونها.

متفق عليه: رواه البخاري في الجهاد والسير (2977) ومسلم في المساجد (6: 523) من طرق عن ابن شهاب، عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة، فذكره.

قال أبو هريرة: فذهب رسول الله صلى الله عليه وسلم وأنتم تنتثلونها. أي: تستخرجون ما فيها.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “আমাকে সংক্ষিপ্ত অথচ ব্যাপক অর্থবোধক বাক্য (জাওয়ামি'উল কালিম) সহ প্রেরণ করা হয়েছে, এবং (শত্রুদের অন্তরে) ভয় বা ত্রাস সৃষ্টির মাধ্যমে আমাকে সাহায্য করা হয়েছে। আমি ঘুমন্ত অবস্থায় ছিলাম, এমন সময় আমার কাছে পৃথিবীর ধনভাণ্ডারের চাবিসমূহ আনা হলো এবং তা আমার হাতে রাখা হলো।”

আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইন্তেকাল করেছেন, আর তোমরা (এখনও) তা (অর্থাৎ সেই ধনসম্পদ) আহরণ করছো।









আল-জামি` আল-কামিল (9458)


9458 - عن علي بن أبي طالب قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أعطيت ما لم يعط أحد من الأنبياء" فقلنا: يا رسول الله، ما هو؟ قال:"نصرت بالرعب، وأعطيت مفاتح الأرض، وسميت أحمد، وجعل التراب لي طهورا، وجعلت أمتي خير الأمم"

حسن: رواه أحمد (763) وابن أبي شيبة (11/ 434) من طريق زهير (وهو ابن محمد التميمي) عن عبد الله بن محمد بن عقيل، عن محمد بن علي ابن الحنفية، أنه سمع علي بن أبي طالب، فذكره.

وإسناده حسن من أجل عبد الله بن محمد بن عقيل فإنه حسن الحديث.

وقد اختلف في إسناده، وصحح أبو زرعة هذا الوجه الذي ذكرته، كما حكاه ابن أبي حاتم في العلل (س 2705).




আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমাকে এমন কিছু দেওয়া হয়েছে যা অন্য কোনো নবীকে দেওয়া হয়নি।" আমরা বললাম, 'হে আল্লাহর রাসূল, তা কী?' তিনি বললেন: "আমাকে ভীতি (সঞ্চার)-এর মাধ্যমে সাহায্য করা হয়েছে, আর আমাকে পৃথিবীর চাবিগুলো (ভান্ডার/ক্ষমতা) দেওয়া হয়েছে, আর আমার নাম রাখা হয়েছে আহমদ, আর মাটি আমার জন্য পবিত্রতা অর্জনের মাধ্যম (তাইয়াম্মুম) করা হয়েছে, এবং আমার উম্মতকে সর্বশ্রেষ্ঠ উম্মত করা হয়েছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (9459)


9459 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه عن جده: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم عام غزوة تبوك قام من الليل يصلي، فاجتمع وراءه رجال من أصحابه يحرسونه، حتى إذا صلى وانصرف
إليهم، فقال لهم:"لقد أعطيت الليلة خمسًا، ما أعطيهن أحد قبلي: أما أنا فأرسلت إلى الناس كلهم عامة، وكان من قبلي إنما يرسل إلى قومه، ونصرت على العدو بالرعب، ولو كان بيني وبينهم مسيرة شهر لملئ منه رعبًا، وأحلت لي الغنائم آكلها، وكان من قبلي يعظمون أكلها، كانوا يحرقونها، وجعلت لي الأرض مساجد وطهورًا، أينما أدركتني الصلاة تمسحت وصليت، وكان من قبلي يعظمون ذلك، إنما كانوا يصلون في كنائسهم وبيعهم، والخامسة، هي ما هي، قيل لي: سل، فإن كل نبي قد سأل، فأخرت مسألتي إلى يوم القيامة، فهي لكم ولمن شهد أن لا اله إلا الله"

حسن: رواه أحمد (7068) عن قتيبة بن سعيد، حدثنا بكر بن مضر، عن ابن الهاد، عن عمرو ابن شعيب، عن أبيه، عن جده، فذكره.

وإسناده حسن من أجل عمرو بن شعيب، فإنه صدوق.

وابن الهاد هو يزيد بن عبد الله بن أسامة بن الهاد.

وقال ابن كثير في تفسير سورة الأعراف (158): إسناده جيد قوي، ولم يخرجوه.




আমর ইবনে শুআইবের দাদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাবুক যুদ্ধের বছর রাতে উঠে সালাত আদায় করছিলেন। তখন তাঁর সাহাবীদের মধ্যে থেকে কিছু লোক তাঁকে পাহারা দেওয়ার জন্য তাঁর পিছনে সমবেত হলো। যখন তিনি সালাত শেষ করলেন এবং তাদের দিকে ফিরলেন, তখন তিনি তাদের বললেন: "আজ রাতে আমাকে পাঁচটি জিনিস দেওয়া হয়েছে, যা আমার পূর্বে আর কাউকে দেওয়া হয়নি: প্রথমত, আমাকে সকল মানুষের জন্য সাধারণভাবে রাসূল হিসেবে প্রেরণ করা হয়েছে, আর আমার পূর্বের নবীদেরকে শুধুমাত্র তাদের নিজ জাতির কাছে প্রেরণ করা হয়েছিল। দ্বিতীয়ত, শত্রুর উপর আমাকে ভয়ের (আতঙ্ক) মাধ্যমে সাহায্য করা হয়েছে। যদি আমার ও তাদের মাঝে এক মাসের দূরত্বও থাকে, তবুও তারা সেই ভয়ের দ্বারা পূর্ণ হয়ে যাবে। তৃতীয়ত, আমার জন্য গনীমতের সম্পদ (যুদ্ধলব্ধ ধন) হালাল করা হয়েছে, যাতে আমি তা ভোগ করতে পারি। কিন্তু আমার পূর্বের নবীদের জন্য গনীমত খাওয়াকে কঠোর মনে করা হতো; তারা তা জ্বালিয়ে দিত। চতুর্থত, আমার জন্য জমিনকে সালাতের স্থান এবং পবিত্রতা অর্জনের উপায় বানানো হয়েছে। যেখানেই আমার সালাতের সময় হবে, আমি তায়াম্মুম করে সালাত আদায় করে নিব। কিন্তু আমার পূর্বের নবীরা এটিকে কঠিন মনে করতেন; তারা কেবল তাদের গির্জা ও উপাসনালয়ে সালাত আদায় করতেন। আর পঞ্চমটি, তা হলো—তা কী! আমাকে বলা হয়েছে: ‘আপনি প্রার্থনা করুন, কারণ প্রত্যেক নবীই প্রার্থনা করেছেন।’ কিন্তু আমি আমার সেই প্রার্থনাকে কেয়ামত পর্যন্তের জন্য স্থগিত রেখেছি। সুতরাং, এটি তোমাদের জন্য এবং প্রত্যেক সেই ব্যক্তির জন্য, যে সাক্ষ্য দেবে যে আল্লাহ ছাড়া আর কোনো ইলাহ নেই।"









আল-জামি` আল-কামিল (9460)


9460 - عن أبي أمامة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: فضلني ربي على الأنبياء أو قال: على الأمم بأربع: قال: أرسلت إلى الناس كافة، وجعلت لي الأرض كلها ولأمتي مسجدًا وطهورًا، فأينما أدركت رجلا من أمتي الصلاة فعنده مسجده، وعنده طهوره، ونصرت بالرعب مسيرة شهر يقذفه في قلوب أعدائي، وأحل لنا الغنائم.

حسن: رواه الإمام أحمد (22137) (22209) والترمذي (1553) والبيهقي (1/ 212)، (2/ 433 - 434) من طرق عن سليمان التميمي، عن سيّار، عن أبي أمامة، فذكره، والسياق لأحمد.


واقتصر الترمذي على قوله:"إن الله فضلني على الأنبياء -أو قال: أمتي على الأمم- وأحل لنا الغنائم.

وإسناده حسن من أجل سيار، وهو الأموي مولاهم الدمشقي، روى عنه غير واحد، وذكره ابن حبان وابن خلفون في ثقاتهما.

وحسّن له الترمذي وسيأتي من قول البخاري ما يشير إلى تقوية أمره.

وقال الترمذي: حديث أبي أمامة حديث حسن صحيح.

وقال في العلل الكبير (2/ 663): سألت محمدا عن هذا الحديث، وقلت له: من سيار هذا الذي روى عن أبي أمامة، قال: هو سيار مولى بني معاوية، أدرك أبا أمامة، وروى عنه.

وروى عن سيّار:"سليمان التميمي، وعبد الله بن بحير" اهـ.

وقال الهيثمي في المجمع (8/ 259): رجال أحمد ثقات.
وقال ابن الملقن في البدر المنير (2/ 624):"وفي فوائد أبي عبد الله الثقفي بإسناد صحيح عن أبي أمامة. فذكر نحوه.




আবু উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: আমার প্রতিপালক চারটি জিনিস দ্বারা আমাকে নবীদের উপর অথবা তিনি বললেন: উম্মতদের উপর মর্যাদা দিয়েছেন। তিনি বললেন: আমি সমস্ত মানুষের জন্য প্রেরিত হয়েছি, এবং আমার জন্য ও আমার উম্মতের জন্য সমগ্র পৃথিবীকে সিজদার স্থান ও পবিত্রতা অর্জনের মাধ্যম বানানো হয়েছে। সুতরাং আমার উম্মতের কোনো লোককে যেখানেই সালাত পেয়ে বসবে, সেখানেই তার সিজদার স্থান এবং সেখানেই তার পবিত্রতা অর্জনের ব্যবস্থা বিদ্যমান রয়েছে। আর আমি এক মাসের দূরত্বের পথ থেকে আমার শত্রুদের অন্তরে নিক্ষেপ করা ভয়ের (আতঙ্কের) মাধ্যমে সাহায্যপ্রাপ্ত হয়েছি, এবং গনীমতের মাল আমাদের জন্য হালাল করা হয়েছে।