হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (11081)


11081 - عن أم سلمة أن النبي صلى الله عليه وسلم كان إذا خرج من بيته قال:"بسم الله توكلت على الله، اللهم! إنا نعوذ بك من أن نزل أو نضل أو نظلم أو نُظلَم أو نجهل أو يُجهل علينا".

صحيح: رواه أبو داود (5094)، والترمذي (3427)، والنسائي (5486)، وابن ماجه (3884)، وأحمد (26616، 26704)، وابن السني في عمل اليوم والليلة (177)، والحاكم (1/ 519) كلهم من طرق عن منصور، عن الشعبي، عن أم سلمة فذكرته، والسياق للترمذي.

وقال الترمذي:"هذا حديث حسن صحيح".

وقال الحاكم:"هذا حديث صحيح على شرط الشيخين ولم يخرجاه، وربما توهم متوهم أن الشعبي لم يسمع من أم سلمة، وليس كذلك، فإنه دخل على عائشة وأم سلمة جميعا، ثم أكثر الرواية عنهما جميعا" اهـ.

كذا قال، وتعقبه ابن حجر في نتائج الأفكار (1/ 160 - 161) بقوله:"هكذا قال! وقد خالف ذلك في علوم الحديث له فقال: لم يسمع الشعبي من عائشة، وقال علي بن المديني في كتاب العلل: لم يسمع الشعبي من أم سلمة، وعلى هذا فالحديث منقطع".

مع أنه قال قبل ذلك:"هذا حديث حسن".

والمنقطع لا يقال له:"حسن فإنه من أقسام الضعيف، فلا بد أن نحمل قول علي بن المديني على التصريح بثبوت اللقاء على مذهبه ومذهب تلميذه البخاري في شرط اللقاء، والجمهور كما هو معروف يكتفون بالمعاصرة وهي حاصلة للشعبي فإنه وُلد في حدود عشرين وتوفي بعد المائة، وتوفيت أم سلمة سنة (62 هـ) فأدرك من عمرها نحو أربعين سنة، وقد صرح أبو داود السجستاني بأن الشعبي سمع من أم سلمة، واتفق الترمذي والحاكم والنووي وابن حجر بأنه حديث صحيح أو حسن وهو الصواب والله الموفق.

وبمعناه ما روي عن أنس بن مالك قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا خرج الرجل من بيته فقال: بسم الله توكلت على الله، لا حول ولا قوة إلا بالله، قال: يقال حينئذ: هُديت وكفيت ووقيت فتنحى له الشياطين، فيقول شيطان آخر: كيف لك برجل قد هدي وكفي ووقي".

رواه أبو داود (5095)، والترمذي (3426)، والنسائي في عمل اليوم والليلة (89)، وابن السني (179)، وابن حبان (822) كلهم من طرق، عن ابن جريج قال: عن إسحاق بن عبد الله بن أبي طلحة، عن أنس بن مالك فذكره. والسياق لأبي داود.

وقال الترمذي:"هذا حديث حسن غريب، لا نعرفه إلا من هذا الوجه".

كذا قال! وقد قال في العلل الكبير (2/ 911):"سألت محمدا -يعني البخاري- عن هذا الحديث، فقال: حدثوني عن يحيى بن سعيد، عن ابن جريج بهذا الحديث، ولا أعرف لابن جريج
عن إسحاق بن عبد الله بن أبي طلحة غير هذا الحديث، ولا أعرف له سماعا منه". اهـ

وقال الدارقطني في العلل (12/ 13):"والصحيح أن ابن جريج لم يسمعه من ابن إسحاق" اهـ

وقال ابن حجر في نتائج الأفكار (1/ 164):"رجاله رجال الصحيح، ولذلك صحّحه ابن حبان، لكن خفيت عليه علته". ثم ذكر قول البخاري والدارقطني.

وروي عن أبي هريرة أن النبي صلى الله عليه وسلم كان إذا خرج من بيته قال:"بسم الله لا حول ولا قوة إلا بالله، التكلان على الله".

رواه ابن ماجه (3885)، والبخاري في الأدب المفرد (1197)، وابن السني في عمل اليوم والليلة (178)، والحاكم (1/ 519) كلهم من طرق، عن حاتم بن إسماعيل، عن عبد الله بن حسين ابن عطاء بن يسار، عن سهيل بن أبي صالح، عن أبيه، عن أبي هريرة فذكره.

وقال الحاكم:"هذا حديث صحيح على شرط مسلم".

كذا قال! وفي إسناده عبد الله بن حسين بن عطاء، لم يخرج له مسلم وهو ضعيف، وقد أنكر عليه أبو زرعة هذا الحديث. انظر: سؤالات البرذعي له (2/ 537 - 538).

وروي عنه أيضا أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إذا خرج الرجل من باب بيته -أو من باب داره- كان معه ملكان موكلان به. فإذا قال: بسم الله قالا: هديت. وإذا قال: لا حول ولا قوة إلا بالله قالا: وقيت. وإذا قال: توكلت على الله قالا: كفيت. قال: فيلقاه قريناه فيقولان: ماذا تريدان من رجل قد هدي وكفي ووقي".

رواه ابن ماجه (3886)، والطبراني في الدعاء (409)، وابن عدي (7/ 2586) كلهم من طرق عن ابن أبي فديك قال: حدثني هارون بن هارون، عن الأعرج، عن أبي هريرة فذكره.

وهارون بن هارون هو ابن عبد الله التيمي ضعيف باتفاق أهل العلم قال ابن حبان:"كان يروي الموضوعات عن الثقات، لا يجوز الاحتجاج به".



قلت: عمرو بن دينار قهرمان آل الزبير قال فيه أحمد:"ضعيف منكر الحديث". وقال ابن معين:"ليس بشيء" وقال البخاري:"فيه نظر" وقال أبو زرعة:"واهي الحديث" وقال أبو حاتم:"ضعيف الحديث، روى عن سالم بن عبد الله بن عمر عن أبيه غير حديث منكر، وعامة حديثه منكر". وقال النسائي:"ليس بثقة روى عن سالم، عن ابن عمر أحاديث منكرة".

وقد سئل أبو حاتم الرازي عن حديثه هذا فقال:"هذا حديث منكر جدا لا يحتمل سالم هذا الحديث" العلل (2006).

وللحديث طرق أخرى كلها معلولة، وقد نص غير واحد من الأئمة منهم: ابن المديني وأحمد والبخاري على أنه حديث منكر.

ولعل من صحّح هذا الحديث ظن أن عمرو بن دينار هو المكي الثقة والله المستعان.




উম্মে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন তাঁর ঘর থেকে বের হতেন, তখন তিনি বলতেন: "বিসমিল্লাহি, তাওয়াক্কালতু আলাল্লাহ। আল্লাহুম্মা! ইন্না না‘ঊযু বিকা মিন আন নাযিল্লা আও নাদিল্লা আও নাযলিমা আও নুযলামা আও নাজহালা আও ইয়ুজহালা ‘আলাইনা।" (অর্থ: আল্লাহর নামে, আমি আল্লাহর উপর ভরসা করলাম। হে আল্লাহ! আমরা আপনার কাছে আশ্রয় চাই যেন আমরা পদস্খলিত না হই, পথভ্রষ্ট না হই, জুলুম না করি, অথবা আমাদের প্রতি কেউ জুলুম না করে, অথবা আমরা মূর্খতাসুলভ আচরণ না করি, কিংবা আমাদের প্রতি কেউ মূর্খতাসুলভ আচরণ না করে।)









আল-জামি` আল-কামিল (11082)


11082 - عن عبد الله بن عمر، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من استعاذ بالله فأعيذوه، ومن سأل بالله فأعطوه، ومن دعاكم فأجيبوه، ومن صنع إليكم معروفا فكافئوه، فإن لم تجدوا ما تكافئونه، فادعوا له حتى تروا أنكم قد كافأتموه".

صحيح: رواه أبو داود (1672، 5109)، والنسائي (2568)، وأحمد (5365)، وصحّحه ابن حبان (3408)، والحاكم (2/ 63 - 64) كلهم من طريق الأعمش، عن مجاهد، عن عبد الله بن عمر فذكره. وإسناده صحيح.

وقال الحاكم:"صحيح الإسناد على شرط الشيخين ولم يخرجاه للخلاف بين أصحاب الأعمش".

والكلام عليه مبسوط في الزكاة.




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে আল্লাহর নামে আশ্রয় চায়, তাকে আশ্রয় দাও। আর যে আল্লাহর নামে তোমাদের কাছে কিছু চায়, তাকে দাও। আর যে তোমাদেরকে দাওয়াত করে, তোমরা তার ডাকে সাড়া দাও। আর যে তোমাদের প্রতি কোনো অনুগ্রহ করে, তোমরা তাকে প্রতিদান দাও। যদি তোমরা তাকে প্রতিদান দেওয়ার মতো কিছু না পাও, তবে তোমরা তার জন্য (আল্লাহর কাছে) দু'আ করো, যতক্ষণ না তোমরা মনে করো যে তোমরা তাকে প্রতিদান দিয়ে ফেলেছ।"









আল-জামি` আল-কামিল (11083)


11083 - عن أسامة بن زيد قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من صنع إليه معروف فقال لفاعله: جزاك الله خيرا، فقد أبلغ في الثناء".

حسن: رواه الترمذي (2035)، والنسائي في عمل اليوم والليلة (180)، وصحّحه ابن حبان (3413)، والضياء في المختارة (4/ 110) كلهم من طريق أبي الجواب الأحوص بن جواب، عن سعير بن الخمس، عن سليمان التيمي، عن أبي عثمان النهدي، عن أسامة بن زيد فذكره.

وقال الترمذي:"هذا حديث حسن جيد غريب، لا نعرفه من حديث أسامة بن زيد إلا من هذا الوجه".

قلت: وهو كما قال ففي إسناده سعير بن الخمس والأحوص بن جواب وهما حسنا الحديث.

لكن قال الترمذي في العلل (2/ 803):"سألت محمدا عن هذا الحديث فقال: هذا منكر، وسعير بن الخمس كان قليل الحديث، ويروون عنه مناكير.
وقال أبو حاتم:"هذا حديث منكر بهذا الإسناد". العلل (2570).

قلت: لعلهما يعنيان بالمنكر أن هذا الحديث مما تفرد به سعير بن الخمس، ولا يضر تفرده فقد وثقه ابن معين والفسوي والدارقطني وقال الترمذي: هو ثقة عند أهل الحديث.

وقال أبو حاتم:"صالح الحديث، يكتب حديثه ولا يحتج به.

وأما قول أبي حاتم:"هذا حديث عندي موضوع بهذا الإسناد" العلل (2197). فلا يظهر وجهه فليس في إسناده من يتهم، وليس في متنه ما ينكر بل يشهد له حديث أبي هريرة مع ضعف فيه.

وفي معناه ما روي عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا قال الرجل لأخيه جزاك الله خيرا فقد أبلغ في الثناء".

رواه عبد الرزاق (3118)، وابن أبي شيبة (27049)، والبزار (كشف الأستار 1944) كلهم من طريق موسى بن عبيدة، عن محمد بن ثابت، عن أبي هريرة فذكره.

وقال البزار:"ومحمد بن ثابت لا نعلم روى عنه إلا موسى بن عبيدة، ولا روى عن أبي هريرة هذا الحديث غيره".

قلت: محمد بن ثابت الذي يروي عنه موسى بن عبيدة مجهول، وموسى ضعيف.




উসামা ইবনু যায়দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কেউ যদি কারো প্রতি কোনো অনুগ্রহ করে, আর সে (উপকার লাভের পর) তার উপকারকারীকে বলে, 'জাযাকাল্লাহু খাইরান' (আল্লাহ আপনাকে উত্তম প্রতিদান দিন), তবে সে (তার) প্রশংসায় পূর্ণতা দিলো।"









আল-জামি` আল-কামিল (11084)


11084 - عن عائشة قالت: أهديت لرسول لله صلى الله عليه وسلم شاة قال:"اقسميها" قال: فكانت عائشة إذا رجع الخادم قالت: ما قالوا؟ قال: يقولون: بارك الله فيكم. فتقول عائشة: وفيهم بارك الله، فنرد عليهم مثل ما قالوا، وبقي أجرنا لنا.

حسن: رواه النسائي في عمل اليوم والليلة (303) -وعنه ابن السني (279) - عن طليق بن محمد ابن السكن قال: أخبرنا أبو معاوية، حدثنا يزيد بن زياد، عن عبيد بن أبي الجعد، عن عائشة فذكرته.

وإسناده حسن من أجل عبيد بن أبي الجعد ويزيد بن زياد (وهو ابن أبي الجعد) فإنهما حسنا الحديث. الظاهر أن فيه تقريرًا من النبي صلى الله عليه وسلم لقول عائشة، فإن القصة وقعت بحضرة النبي صلى الله عليه وسلم.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য একটি বকরি হাদিয়া (উপহার) হিসেবে পাঠানো হয়েছিল। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "এটি বণ্টন করে দাও।" তিনি বলেন, যখন খাদেম (বণ্টনের পর) ফিরে আসত, তিনি (আয়িশা) জিজ্ঞেস করতেন, তারা (যাদের মাঝে বণ্টন করা হয়েছে) কী বলেছে? সে বলল, তারা বলেছে: 'আল্লাহ তোমাদের প্রতি বরকত দিন (বারাকাল্লাহু ফিকুম)'। তখন আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলতেন: 'এবং আল্লাহ তাদের প্রতিও বরকত দিন (ওয়া ফিহিম বারাকাল্লাহ)'— আমরা তাদের প্রতিদানে ঠিক একই কথা বলি, ফলে আমাদের সাওয়াব আমাদের জন্য বাকি থাকে।









আল-জামি` আল-কামিল (11085)


11085 - عن عائشة قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا رأى ما يحب قال:"الحمد لله الذي بنعمته تتم الصالحات". وإذا رأى ما يكره قال:"الحمد لله على كل حال".

حسن: رواه ابن ماجه (3803)، وابن السني في عمل اليوم والليلة (379)، والحاكم (1/ 499) كلهم من طرق عن الوليد بن مسلم، حدثنا زهير بن محمد، عن منصور بن عبد الرحمن الحجبي، عن أمه صفية بنت شيبة، عن عائشة فذكرته.

وقال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد".

وجوّد النووي إسناده في الأذكار، وهو كذلك فإن إسناده حسن على الأقل، فإن زهير بن محمد
ثقة إلا أن رواية أهل الشام عنه غير مستقيمة، والوليد بن مسلم شامي إلا أنه لم يخطئ فيه لوجود شواهد كثيرة وإن كانت هذه الشواهد لا تخلو من مقال.

فقد رواه البزار (533) عن علي بن أبي طالب، وأبو نعيم في الحلية (3/ 157) عن أبي هريرة وغيرهما.

ومجموعه يدل على أنه له أصلا، وأصحها حديث عائشة وبالله التوفيق.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন এমন কিছু দেখতেন যা তিনি পছন্দ করতেন, তখন বলতেন: "আলহামদু লিল্লাহিল্লাযী বিনিয়মাতিহী তাতিম্মুস সালিহাত" (সমস্ত প্রশংসা আল্লাহর জন্য, যার অনুগ্রহে নেক কাজসমূহ সম্পন্ন হয়)। আর যখন তিনি এমন কিছু দেখতেন যা তিনি অপছন্দ করতেন, তখন বলতেন: "আলহামদু লিল্লাহি আলা কুল্লি হাল" (সমস্ত প্রশংসা আল্লাহর জন্য সর্বাবস্থায়)।









আল-জামি` আল-কামিল (11086)


11086 - عن أنس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما أنعم الله على عبد نعمة فقال: الحمد لله إلا كان الذي أعطى أفضل مما أخذ".

حسن: رواه ابن ماجه (3805)، والبزار (7514) كلاهما من طريق أبي عاصم، عن شبيب بن بشر، عن أنس فذكره.

وقال البزار:"وهذا الحديث لا نعلمه يروى عن أنس إلا من هذا الوجه بهذا الإسناد".

قلت: هذا إسناد حسن من أجل شبيب بن بشر فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث وقد حسنه البوصيري في مصباح الزجاجة.

وقوله:"كان الذي أعطى" أي الذي قلته من الحمد أفضل مما أخذته من النعمة. قال تعالى: {وَإِذْ تَأَذَّنَ رَبُّكُمْ لَئِنْ شَكَرْتُمْ لَأَزِيدَنَّكُمْ وَلَئِنْ كَفَرْتُمْ إِنَّ عَذَابِي لَشَدِيدٌ} [سورة إبراهيم: 7].




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "আল্লাহ কোনো বান্দাকে এমন কোনো নেয়ামত দেননি, যার পর সে 'আলহামদুলিল্লাহ' (সকল প্রশংসা আল্লাহর) বলেছে, কিন্তু তাকে যা প্রদান করা হয়েছে, তা সেই নেয়ামতের চেয়ে উত্তম যা সে গ্রহণ করেছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (11087)


11087 - عن أنس أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"اللهم! لا سهل إلا ما جعلته سهلا، وأنت تجعل الحزن سهلا إذا شئت".

صحيح: رواه ابن السني في عمل اليوم والليلة (352)، والبيهقي في الدعوات (266)، وصحّحه ابن حبان (974)، والضياء في المختارة (5/ 62 - 63) كلهم من طرق، عن حماد بن سلمة، عن ثابت، عن أنس فذكره. وإسناده صحيح.

وقد روي عن حماد بن سلمة عن ثابت مرسلا، والموصول أصح لأن الذين وصلوه أصح، وصحّحه أيضا ابن حجر في الفتوحات الربانية (4/




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "হে আল্লাহ! কোনো বিষয় সহজ নয়, তবে তুমি যাকে সহজ করে দাও। আর তুমি চাইলে কঠিন বিষয়কেও সহজ করে দাও।"









আল-জামি` আল-কামিল (11088)


11088 - عن عبد الله بن سرجس قال: رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم وأكلت معه فقلت: غفر الله لك يا رسول الله قال:"ولك". قلت لعبد الله: استغفر لك رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ قال: نعم ولكم، ثم تلا هذه الآية {فَاعْلَمْ أَنَّهُ لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ وَاسْتَغْفِرْ لِذَنْبِكَ وَلِلْمُؤْمِنِينَ وَالْمُؤْمِنَاتِ وَاللَّهُ يَعْلَمُ مُتَقَلَّبَكُمْ وَمَثْوَاكُمْ} [سورة محمد: 19] ثم درت حتى صرت خلفه ثم نظرت إلى
خاتم النبوة.

صحيح: رواه النسائي في عمل اليوم والليلة (422) -وعنه ابن السني في عمل اليوم والليلة (359) - عن أحمد بن عبدة، عن عبد الواحد بن زياد، عن عاصم (وهو الأحول)، عن عبد الله بن سرجس فذكره.

ورواه مسلم في الفضائل (2346) عن حامد بن عمر البكراوي، عن عبد الواحد بن زياد به نحوه.




আব্দুল্লাহ ইবনু সারজিস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখেছি এবং তাঁর সাথে আহার করেছি। অতঃপর আমি বললাম: ইয়া রাসূলুল্লাহ! আল্লাহ যেন আপনাকে ক্ষমা করে দেন। তিনি বললেন: “আর তোমাকেও।” (বর্ণনার মাঝে) আমি আব্দুল্লাহকে (ইবনু সারজিসকে) জিজ্ঞেস করলাম: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কি আপনার জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করেছিলেন? তিনি বললেন: হ্যাঁ, আর তোমাদের জন্যও। এরপর তিনি এই আয়াতটি তিলাওয়াত করলেন: “সুতরাং জেনে রাখুন যে, আল্লাহ ছাড়া আর কোনো ইলাহ নেই এবং আপনার ত্রুটি-বিচ্যুতির জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করুন, আর মুমিন পুরুষ ও মুমিন নারীদের জন্যও। আল্লাহ তোমাদের গতিবিধি ও তোমাদের অবস্থানস্থল সম্পর্কে অবগত আছেন।” (সূরা মুহাম্মাদ: ১৯)। এরপর আমি তাঁর পেছন দিকে গেলাম এবং তাঁর পিছনে পৌঁছে গেলাম। অতঃপর আমি নুবুওয়াতের মোহর (খাতামুন নুবুওয়াহ) দেখতে পেলাম।









আল-জামি` আল-কামিল (11089)


11089 - عن أنس قال: قدم عبد الرحمن بن عوف المدينة فآخى النبي صلى الله عليه وسلم، بينه وبين سعد بن الربيع الأنصاري، وكان سعد ذا غنى، فقال لعبد الرحمن: أقاسمك مالي نصفين وأزوجك، قال: بارك الله لك في أهلك ومالك، دلوني على السوق، فما رجع حتى استفضل أقطا وسمنا … الحديث.

صحيح: رواه البخاري في البيوع (2049) عن أحمد بن يونس، حدثنا زهير، حدثنا حميد، عن أنس فذكره.

وبعض القصة عند مسلم في النكاح (1427)، وليس فيه الجزء المذكور.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আব্দুর রহমান ইবনে আউফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মদীনায় আগমন করলেন। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর ও সা'দ ইবনুর রাবী' আনসারীর মধ্যে ভ্রাতৃত্ব স্থাপন করে দিলেন। সা'দ ছিলেন সম্পদশালী। তিনি আব্দুর রহমানকে বললেন: আমি আমার সম্পদকে দুই ভাগে ভাগ করে তার অর্ধেক আপনাকে দিয়ে দিচ্ছি এবং আপনাকে বিবাহ করাবো। আব্দুর রহমান বললেন: আল্লাহ আপনার পরিবার ও সম্পদে বরকত দিন। আমাকে বাজারের পথ দেখিয়ে দিন। এরপর তিনি কিছু পনীর ও ঘি উপার্জন না করে (ঘরে) ফিরে আসেননি।









আল-জামি` আল-কামিল (11090)


11090 - عن إسمعيل بن إبراهيم بن عبد الله بن أبي ربيعة، عن أبيه، عن جده، قال: استقرض مني النبي صلى الله عليه وسلم أربعين ألفا، فجاءه مال فدفعه إلي، وقال:"بارك الله لك في أهلك، ومالك، إنما جزاء السلف الحمد والأداء".

حسن: رواه النسائي (4683)، وابن ماجه (2424) كلاهما من حديث إسماعيل بن إبراهيم بن عبد الله بن أبي ربيعة المخزومي به فذكره.

وإسناده حسن من أجل إسماعيل بن إبراهيم، -وهو ابن عبد الرحمن بن عبد الله- وأبيه فإنهما حسنا الحديث.

أما إسماعيل فقد روى عنه جمع، ووثقه أبو داود وابن حبان، وقال أبو حاتم: شيخ، وأما أبوه إبراهيم فذكره ابن حبان في الثقات وقال ابن خلفون: ثقة مشهور، وأخرج له البخاري في صحيحه.




আব্দুল্লাহ ইবনু আবী রাবী'আ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার নিকট থেকে চল্লিশ হাজার (মুদ্রা) ঋণ গ্রহণ করেছিলেন। এরপর যখন তাঁর নিকট সম্পদ এলো, তখন তিনি তা আমাকে পরিশোধ করলেন এবং বললেন: “আল্লাহ তোমার পরিবারে ও তোমার সম্পদে বরকত দান করুন। নিশ্চয়ই ঋণের প্রতিদান হলো (ঋণদাতার) প্রশংসা করা এবং তা পরিশোধ করা।”









আল-জামি` আল-কামিল (11091)


11091 - عن أنس بن مالك، أن رجلا كان عند النبي صلى الله عليه وسلم، فمر به رجل فقال: يا رسول الله، إني لأحب هذا، فقال له النبي صلى الله عليه وسلم:"أعلمته؟" قال: لا، قال:"أعلمه" قال: فلحقه، فقال: إني أحبك في الله، فقال: أحبك الذي أحببتني له.
صحيح: رواه أبو داود (5125)، والنسائي في عمل اليوم والليلة (182)، وأحمد (12514، 12435)، وصحّحه ابن حبان (571)، والحاكم (4/ 171) كلهم من طرق، عن ثابت البناني، عن أنس فذكره. وإسناده صحيح.

وقال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد".

ولكن اختلف على ثابت البناني فرواه حماد بن سلمة، عن ثابت، عن حبيب بن أبي سبيعة، عن الحارث، عن رجل حدثه هذا الحديث.

رواه النسائي في عمل اليوم والليلة (184) وقال: هذا الصواب عندنا، وكذلك رواه أيضا الدارقطني في العلل، والبيهقي في شعب الإيمان (8593).

وقيل غير ذلك، فإن كان الرجل المبهم من الصحابة فلا يضر إبهامه كما أن الرواة عن ثابت عن أنس جماعة فلا يبعد أن يكون حديثهم أيضا محفوظا، وحديث أنس هذا جاء في الصحيحين مختصرا:"المرء مع من أحب".




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের কাছে উপস্থিত ছিল। অতঃপর তার পাশ দিয়ে এক ব্যক্তি অতিক্রম করলে সে বলল: হে আল্লাহর রাসূল! আমি অবশ্যই এই লোকটিকে ভালোবাসি। তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাকে জিজ্ঞেস করলেন: "তুমি কি তাকে তা জানিয়েছ?" সে বলল: না। তিনি বললেন: "তাকে জানিয়ে দাও।" সে ব্যক্তি তাকে গিয়ে বলল: আমি আল্লাহ্‌র সন্তুষ্টির জন্য তোমাকে ভালোবাসি। তখন সে (অপর ব্যক্তিটি) বলল: যিনি আমাকে ভালোবাসার জন্য তোমাকে ভালোবাসতে শিখিয়েছেন, তিনিও তোমাকে ভালোবাসুন।









আল-জামি` আল-কামিল (11092)


11092 - عن جابر بن عبد الله، يقول: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا كان جنح الليل -أو أمسيتم- فكفوا صبيانكم، فإن الشياطين تنتشر حينئذ، فإذا ذهب ساعة من الليل فخلوهم، فأغلقوا الأبواب، واذكروا اسم الله، فإن الشيطان لا يفتح بابا مغلقا، وأوكوا قربكم، واذكروا اسم الله، وخمروا آنيتكم واذكروا اسم الله، ولو أن تعرضوا عليها شيئا، وأطفئوا مصابيحكم".

متفق عليه: رواه البخاري في الأشربة (5623)، ومسلم في الأشربة (2012: 97) كلاهما من طريق روح بن عبادة، حدثنا ابن جريج، أخبرني عطاء أنه سمع جابر بن عبد الله يقول فذكره.




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন রাতের প্রথম ভাগ আসে—অথবা তোমরা যখন সন্ধ্যায় পৌঁছো—তখন তোমরা তোমাদের বাচ্চাদেরকে (ঘোরাফেরা থেকে) বিরত রাখো, কারণ এ সময় শয়তানরা ছড়িয়ে পড়ে। অতঃপর যখন রাতের এক প্রহর (কিছু অংশ) চলে যায়, তখন তোমরা তাদের ছেড়ে দাও। আর তোমরা দরজাগুলো বন্ধ করো এবং আল্লাহর নাম স্মরণ করো, কারণ শয়তান বন্ধ দরজা খুলতে পারে না। আর তোমাদের মশকসমূহের মুখ বেঁধে দাও এবং আল্লাহর নাম স্মরণ করো, এবং তোমাদের পাত্রগুলো ঢেকে দাও ও আল্লাহর নাম স্মরণ করো, যদিও (সম্পূর্ণ ঢাকতে না পারো) সেগুলোর উপর তোমরা কোনো কিছু আড়াআড়িভাবে রেখে দাও। আর তোমাদের বাতিগুলো নিভিয়ে দাও।"









আল-জামি` আল-কামিল (11093)


11093 - عن أبي سعيد، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"يقول الله عز وجل: يا آدم فيقول: لبيك وسعديك، والخير في يديك، قال يقول: أخرج بعث النار قال: وما بعث النار؟ قال: من كل ألف تسعمائة وتسعة وتسعين قال: فذاك حين يشيب الصغير، وتضع كل ذات حمل حملها، وترى النالس سكارى، وما هم بسكارى، ولكن عذاب الله شديد" قال: فاشتد ذلك عليهم قالوا: يا رسول الله! أينا ذلك الرجل؟ فقال:"أبشروا فإن من يأجوج ومأجوج ألفا، ومنكم رجل" قال: ثم قال:"والذي نفسي بيده، إني لأطمع أن تكونوا ربع أهل الجنة" فحمدنا الله وكبرنا. ثم قال:"والذي نفسي بيده، إني لأطمع
أن تكونوا ثلث أهل الجنة" فحمدنا الله وكبرنا. ثم قال:"والذي نفسي بيده، إني لأطمع أن تكونوا شطر أهل الجنة، إن مثلكم في الأمم كمثل الشعرة البيضاء في جلد الثور الأسود، أو كالرقمة في ذراع الحمار".

متفق عليه: رواه البخاري في الرقاق (6530)، ومسلم في الإيمان (222: 379) كلاهما من طريق جرير، عن الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي سعيد الخدري فذكره.




আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লা বলবেন: হে আদম! তিনি (আদম আঃ) বলবেন: আমি আপনার ডাকে সাড়া দিলাম এবং আপনার সেবায় প্রস্তুত আছি, আর সকল কল্যাণ আপনার হাতেই। আল্লাহ বলবেন: জাহান্নামের অংশ বের করে দাও। আদম (আঃ) জিজ্ঞেস করবেন: জাহান্নামের অংশ কী? আল্লাহ বলবেন: প্রতি এক হাজার জনের মধ্যে নয় শত নিরানব্বই জন।"

তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এই সেই সময় যখন ছোটরা বৃদ্ধ হয়ে যাবে, আর প্রত্যেক গর্ভবতী নারী তার গর্ভপাত করে ফেলবে, এবং তুমি মানুষকে মাতাল অবস্থায় দেখবে, অথচ তারা মাতাল হবে না, কিন্তু আল্লাহর শাস্তি অত্যন্ত কঠোর।"

বর্ণনাকারী বলেন: এই কথা তাদের কাছে কঠিন মনে হলো। তারা জিজ্ঞেস করলেন: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমাদের মধ্যে সেই একজন লোক কে হবে (যে জান্নাতে যাবে)?

তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা সুসংবাদ গ্রহণ করো। কারণ, (যে ৯৯৯ জন জাহান্নামে যাবে) তাদের মধ্যে ইয়াজুজ ও মাজুজের মধ্য থেকে এক হাজার এবং তোমাদের মধ্য থেকে একজন।"

তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আবার বললেন: "যাঁর হাতে আমার প্রাণ, আমি অবশ্যই আশা করি তোমরা জান্নাতবাসীদের এক-চতুর্থাংশ হবে।" এরপর আমরা আল্লাহর প্রশংসা করলাম এবং তাকবীর (আল্লাহু আকবার) বললাম।

অতঃপর তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আবার বললেন: "যাঁর হাতে আমার প্রাণ, আমি অবশ্যই আশা করি তোমরা জান্নাতবাসীদের এক-তৃতীয়াংশ হবে।" এরপর আমরা আল্লাহর প্রশংসা করলাম এবং তাকবীর বললাম।

অতঃপর তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আবার বললেন: "যাঁর হাতে আমার প্রাণ, আমি অবশ্যই আশা করি তোমরা জান্নাতবাসীদের অর্ধেক হবে। অন্যান্য উম্মতদের তুলনায় তোমাদের উদাহরণ হলো, কালো গরুর চামড়ার উপর একটি সাদা লোমের মতো, অথবা গাধার বাহুতে থাকা একটি চিহ্নের মতো।"









আল-জামি` আল-কামিল (11094)


11094 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"بينما رجل يسوق بقرة له، قد حمل عليها، التفتت إليه البقرة فقالت: إني لم أخلق لهذا، ولكني إنما خلقت للحرث".

فقال الناس: سبحان الله تعجبا وفزعا، أبقرة تكلم؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم"فإني أومن به وأبو بكر، وعمر".

متفق عليه: رواه البخاري في فضائل أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم (3663)، ومسلم في فضائل الصحابة (2388) كلاهما من طريق ابن شهاب، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن أبي هريرة فذكره.

وقرن مسلم بأبي سلمة سعيد بن المسيب والسياق له.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: এক ব্যক্তি তার একটি গরু হাঁকিয়ে নিয়ে যাচ্ছিল এবং তার উপর কিছু বোঝা চাপিয়ে দিয়েছিল। গরুটি তার দিকে ফিরে বলল, ‘আমাকে এ কাজের জন্য সৃষ্টি করা হয়নি, আমাকে বরং চাষাবাদের জন্য সৃষ্টি করা হয়েছে।’ তখন লোকেরা আশ্চর্যান্বিত ও ভীত হয়ে বলল, সুবহানাল্লাহ! গরুও কি কথা বলে? তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, ‘আমি তাতে বিশ্বাস করি এবং আবু বকর ও উমারও তাতে বিশ্বাস করে।’









আল-জামি` আল-কামিল (11095)


11095 - عن أم سلمة، قالت: استيقظ النبي صلى الله عليه وسلم فقال:"سبحان الله، ماذا أنزل من الخزائن، وماذا أنزل من الفتن، من يوقظ صواحب الحجر -يريد به أزواجه حتى يصلين- رب كاسية في الدنيا عارية في الآخرة".

صحيح: رواه البخاري في الأدب (6218) عن أبي اليمان، أخبرنا شعيب، عن الزهري، حدثتني هند بنت الحارث، أن أم سلمة قالت: فذكرته.




উম্মে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ঘুম থেকে জেগে উঠলেন এবং বললেন: "সুবহানাল্লাহ! কত ভান্ডার নাযিল করা হয়েছে এবং কত ফিতনা (বিপর্যয়) নাযিল করা হয়েছে! কারা জাগাবে হুজরাবাসিনীদের?" (এর দ্বারা তিনি তাঁর স্ত্রীদের উদ্দেশ্য করলেন, যেন তারা সালাত আদায় করে।) তিনি আরও বললেন: "কত দুনিয়াতে পরিহিতা নারীই না আখেরাতে উলঙ্গ হবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (11096)


11096 - عن زينب بنت جحش: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم دخل عليها يوما فزعا يقول:"لا إله إلا الله، ويل للعرب من شر قد اقترب …" الحديث.

متفق عليه: رواه البخاري في الأنبياء (3346)، ومسلم في الفتن (2880: 2) كلاهما من طريق ابن شهاب، عن عروة بن الزبير، أن زينب بنت أبي سلمة، حدثته عن أم حبيبة بنت أبي سفيان، عن زينب بنت جحش زوج النبي صلى الله عليه وسلم قالت: فذكرته.



الحسن أفلا أعلمك كلمات ينفعك الله بهن، وينفع بهن من علمته، ويثبت ما تعلمت في صدرك؟ قال: أجل يا رسول الله فعلمني قال: إذا كان ليلة الجمعة فإن استطعت أن تقوم في ثلث الليل الآخر فإنها ساعة مشهودة، والدعاء فيها مستجاب، وقد قال أخي يعقوب لبنيه {سَوْفَ أَسْتَغْفِرُ لَكُمْ رَبِّي} [سورة يوسف: 98] يقول حتى تأتي ليلة الجمعة فإن لم تستطع فقم في وسطها، فإن لم تستطع فقم في أولها فصل أربع ركعات، تقرأ في الركعة الأولى بفاتحة الكتاب وسورة يس، وفي الركعة الثانية بفاتحة الكتاب وحم الدخان، وفي الركعة الثالثة بفاتحة الكتاب وآلم تنزيل السجدة، وفي الركعة الرابعة بفاتحة الكتاب وتبارك المفصل، فإذا فرغت من التشهد، فاحمد الله وأحسن الثناء على الله، وصل علي وأحسن وعلى سائر النبيين، واستغفر للمؤمنين والمؤمنات ولإخوانك الذين سبقوك بالإيمان، ثم قل في آخر ذلك: اللهم! ارحمني بترك المعاصي أبدا ما أبقيتني وارحمني أن أتكلف ما لا يعنيني وارزقني حسن النظر فيما يرضيك عني، اللهم! بديع السموات والأرض ذو الجلال والإكرام، والعزة التي لا ترام، أسألك يا الله يا رحمن بجلالك ونور وجهك أن تلزم قلبي حفظ كتابك كما علمتني، وارزقني أن أتلوه على النحو الذي يرضيك عني، اللهم! بديع السموات والأرض، ذا الجلال والإكرام والعزة التي لا ترام أسألك يا الله يا رحمن بجلالك ونور وجهك أن تنور بكتابك بصري، وأن تطلق به لساني، وأن تفرج به عن قلبي، وأن تشرح به صدري، وأن تعمل به بدني؛ لأنه لا يعينني على الحق غيرك، ولا يؤتيه إلا أنت، ولا حول ولا وقوة إلا بالله العلي العظيم، يا أبا الحسن فافعل ذلك ثلاث جمع أو خمسا أو سبعا، تُجَب بإذن الله، والذي بعثني بالحق ما أخطأ مؤمنا قط.

قال عبد الله بن عباس: فوالله! ما لبث علي إلا خمسا أو سبعا حتى جاء علي رسول الله صلى الله عليه وسلم في مثل ذلك المجلس فقال: يا رسول الله! إني كنت فيما خلا لا آخذ إلا أربع آيات أو نحوهن، وإذا قرأتهن على نفسي تفلتن، وأنا أتعلم اليوم أربعين آية أو نحوها، وإذا قرأتها على نفسي فكأنما كتاب الله بين عيني، ولقد كنت أسمع الحديث، فإذا رددته تفلت، وأنا اليوم أسمع الأحاديث فإذا تحدثت بها لم أخرم منها حرفا، فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم عند ذلك:"مؤمن ورب الكعبة يا أبا الحسن".

رواه الترمذي (3570)، والحاكم (1/ 316 - 317) كلاهما من طريق أبي أيوب سليمان بن عبد الرحمن الدمشقي، حدثنا الوليد بن مسلم، حدثنا ابن جريج، عن عطاء بن أبي رباح وعكرمة مولى ابن عباس، عن ابن عباس فذكره.

وقال الترمذي:"هذا حديث غريب لا نعرفه إلا من حديث الوليد بن مسلم".

وأما الحاكم فقال:"صحيح على شرط الشيخين".

وتعقبه الذهبي بقوله:"هذا حديث منكر شاذ أخاف أن لا يكون موضوعا وقد حيّرني والله جودة إسناده … والوليد بن مسلم ذكر مصرحا بقوله: ثنا ابن جريج فقد حدث به سليمان قطعا وهو ثبت.
قلت: سليمان بن عبد الرحمن ابن بنت شرحبيل الدمشقي قال عنه أبو حاتم:"صدوق مستقيم الحديث" ولكنه أروى الناس عن الضعفاء والمجهولين، وكان عندي في حد لو أن رجلا وضع له حديثا لم يفهم وكان لا يميز" اهـ الجرح والتعديل (4/ 129).

وهذا الحديث مما أنكر على سليمان فلعله شبه له، وللحديث طريق آخر أشد ضعفا من المذكور.




যয়নাব বিনতে জাহশ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম একদিন তাঁর নিকট ভীত-সন্ত্রস্ত অবস্থায় প্রবেশ করলেন এবং বললেন: "লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ (আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই)। আসন্ন অমঙ্গল থেকে আরবের জন্য দুর্ভোগ..." এরপর তিনি অবশিষ্ট হাদীস বর্ণনা করলেন।

মুত্তাফাকুন আলাইহি। বুখারী এটি বর্ণনা করেছেন ‘আল-আম্বিয়া’ অধ্যায়ে (৩৩৪৬) এবং মুসলিম বর্ণনা করেছেন ‘আল-ফিতান’ অধ্যায়ে (২৮৮০: ২)। উভয়ই এটি বর্ণনা করেছেন ইবনু শিহাবের সূত্রে, তিনি উরওয়া ইবনু যুবাইর থেকে, তাঁকে যায়নাব বিনতে আবী সালামা বর্ণনা করেছেন উম্মু হাবীবা বিনতে আবী সুফিয়ান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে, তিনি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর স্ত্রী যায়নাব বিনতে জাহশ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে। তিনি বলেন: এরপর তিনি হাদীসটি বর্ণনা করলেন।

(হে আবুল) হাসান! আমি কি তোমাকে এমন কিছু বাক্য শিখিয়ে দেব না, যার মাধ্যমে আল্লাহ তোমাকে উপকৃত করবেন এবং তুমি যাকে শেখাবে তাকেও উপকৃত করবেন? আর তুমি যা শিখেছ, তা তোমার বক্ষে সুপ্রতিষ্ঠিত করবেন? তিনি বললেন: ‘হ্যাঁ, ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমাকে শিখিয়ে দিন।’

তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: যখন জুমু‘আর রাত আসবে, তখন যদি তোমার পক্ষে রাতের শেষ তৃতীয়াংশে (নামাযের জন্য) দাঁড়ানো সম্ভব হয়, তবে তা একটি গুরুত্বপূর্ণ সময়, যখন দু‘আ কবুল হয়। আমার ভাই ইয়াকুব (আঃ) তাঁর পুত্রদেরকে বলেছিলেন, "আমি তোমাদের জন্য আমার প্রতিপালকের নিকট ক্ষমা প্রার্থনা করব।" [সূরা ইউসুফ: ৯৮] অর্থাৎ, তিনি জুমু‘আর রাতের অপেক্ষায় ছিলেন। যদি তুমি (শেষ তৃতীয়াংশে) সক্ষম না হও, তবে মাঝরাতে দাঁড়াও। যদি মাঝরাতেও না পারো, তবে রাতের প্রথম অংশে দাঁড়াও। এরপর তুমি চার রাকাত নামায আদায় করো।

প্রথম রাকাতে সূরা ফাতিহা এবং সূরা ইয়াসিন পাঠ করবে। দ্বিতীয় রাকাতে সূরা ফাতিহা এবং হা মীম আদ-দুখান পাঠ করবে। তৃতীয় রাকাতে সূরা ফাতিহা এবং আলিফ লাম মীম তানযীল আস-সাজদাহ পাঠ করবে। চতুর্থ রাকাতে সূরা ফাতিহা এবং তাবারাকাল মুফাসসাল (সূরা মুলক) পাঠ করবে। যখন তুমি তাশাহহুদ শেষ করবে, তখন আল্লাহর প্রশংসা করবে এবং উত্তমভাবে তাঁর গুণগান করবে। আমার উপর উত্তমরূপে দরূদ পাঠ করবে এবং অন্যান্য সকল নবীর উপরও। আর মু’মিন পুরুষ ও মু’মিন নারীদের জন্য এবং যারা ঈমানের সাথে তোমার আগে চলে গেছে, সেই সব ভাইদের জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করবে। তারপর সবশেষে বলবে:

"হে আল্লাহ! যতক্ষণ তুমি আমাকে জীবিত রাখবে, ততক্ষণ সর্বদা গুনাহ বর্জনের মাধ্যমে আমার প্রতি দয়া করো। আর আমার প্রতি দয়া করো যেন আমি অযাচিত বিষয়ে লিপ্ত না হই। আর তুমি আমার প্রতি যে বিষয়ে সন্তুষ্ট হও, তাতে উত্তমরূপে দৃষ্টি দেওয়ার সামর্থ্য আমাকে দান করো। হে আল্লাহ! হে আসমান ও যমিনের স্রষ্টা! হে প্রতাপ ও সম্মানের অধিকারী! হে সেই অপ্রতিরোধ্য ক্ষমতার অধিকারী! আমি তোমার কাছে চাই, হে আল্লাহ! হে রহমান! তোমার প্রতাপ ও তোমার চেহারার নূরের মাধ্যমে, তুমি আমার অন্তরকে তোমার কিতাব মুখস্থ রাখার সাথে এমনভাবে জুড়ে দাও যেমন তুমি আমাকে তা শিখিয়েছ। আর তুমি আমার প্রতি সন্তুষ্ট হও এমন পদ্ধতিতে তা তিলাওয়াত করার সামর্থ্য আমাকে দান করো। হে আল্লাহ! হে আসমান ও যমিনের স্রষ্টা! হে প্রতাপ ও সম্মানের অধিকারী! হে সেই অপ্রতিরোধ্য ক্ষমতার অধিকারী! আমি তোমার কাছে চাই, হে আল্লাহ! হে রহমান! তোমার প্রতাপ ও তোমার চেহারার নূরের মাধ্যমে, তুমি তোমার কিতাবের দ্বারা আমার দৃষ্টিকে আলোকিত করো, এর দ্বারা আমার জিহ্বাকে সাবলীল করো, এর দ্বারা আমার অন্তর থেকে কষ্ট দূর করো, এর দ্বারা আমার বক্ষকে প্রশস্ত করো এবং এর দ্বারা আমার শরীরকে আমল করার সুযোগ দাও। কারণ তুমি ব্যতীত অন্য কেউ আমাকে হক-এর উপর সাহায্যকারী নেই এবং তুমি ব্যতীত আর কেউ তা দিতে পারে না। আর উচ্চতম, মহান আল্লাহ ছাড়া কোনো ক্ষমতা ও শক্তি নেই।"

হে আবুল হাসান! তুমি এটি তিন জুমু‘আ অথবা পাঁচ জুমু‘আ অথবা সাত জুমু‘আ করো। ইনশাআল্লাহ, তোমার দু‘আ কবুল হবে। যিনি হক সহকারে আমাকে প্রেরণ করেছেন, তাঁর শপথ! কোনো মু’মিন এই দু‘আ করলে তা কখনো বিফল হবে না।

আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। তিনি বলেন: আল্লাহর শপথ! আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মাত্র পাঁচ বা সাত জুমু‘আ এই আমলটি করেছিলেন। অতঃপর তিনি সেই একই মজলিসে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর কাছে এসে বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি আগে কেবল চার আয়াত বা তার মতো কিছু মুখস্থ করতে পারতাম, আর যখন সেগুলো আমার নিজের উপর পুনরাবৃত্তি করতাম, তখন তা ভুলে যেতাম। কিন্তু আজ আমি চল্লিশ আয়াত বা তার কাছাকাছি মুখস্থ করছি, আর যখন আমি তা আমার নিজের উপর পাঠ করি, তখন যেন আল্লাহর কিতাব আমার চোখের সামনে রয়েছে। আমি আগে হাদীস শুনতাম, আর যখন তা পুনরাবৃত্তি করতাম, তখন ভুলে যেতাম। কিন্তু আজ আমি হাদীস শুনি, আর যখন তা আলোচনা করি, তখন তার একটি অক্ষরও বাদ দেই না।

তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁকে বললেন: "কাবার রবের শপথ! তুমি মু’মিন, হে আবুল হাসান!"

তিরমিযী (৩৫৭০) এবং হাকিম (১/৩১৬-৩১৭) উভয়ই এটি বর্ণনা করেছেন আবু আইয়ুব সুলায়মান ইবনু আবদির রহমান আদ-দিমাশকী-এর সূত্রে, তিনি আল-ওয়ালীদ ইবনু মুসলিম থেকে, তিনি ইবনু জুরাইজ থেকে, তিনি আতা ইবনু আবী রাবাহ ও ইকরিমা মাওলা ইবনু আব্বাস থেকে, তিনি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে। অতঃপর তিনি হাদীসটি বর্ণনা করলেন।

তিরমিযী বলেন: "এই হাদীসটি গরীব (বিরল)। আমরা এটি আল-ওয়ালীদ ইবনু মুসলিমের হাদীস ছাড়া অন্য সূত্রে জানি না।"

আর হাকিম বলেন: "এটি শায়খাইন (বুখারী ও মুসলিম)-এর শর্তানুযায়ী সহীহ।"

তবে যাহাবী তাঁর মন্তব্য দ্বারা এর বিরোধিতা করে বলেন: "এটি মুনকার (অস্বীকৃত) শা'য (বিরল) হাদীস। আমি আশঙ্কা করি যে এটি মাওযু’ (বানোয়াট) নয় তো! তবে আল্লাহর শপথ! এর ইসনাদের (বর্ণনাকারীর শৃঙ্খলের) মান আমাকে হতবুদ্ধি করেছে... আর আল-ওয়ালীদ ইবনু মুসলিম স্পষ্টভাবে ‘হাদদাসানা ইবনু জুরাইজ’ বলে উল্লেখ করেছেন। সুলায়মান এটি স্পষ্টভাবে বর্ণনা করেছেন এবং তিনি ছাবত (নির্ভরযোগ্য)।"

আমি (ইবনু হাজার) বলি: সুলায়মান ইবনু আবদির রহমান ইবনু বিনতি শুরাহবীল আদ-দিমাশকী সম্পর্কে আবু হাতিম বলেছেন: "তিনি সাদূক (সত্যবাদী), হাদীস বর্ণনায় সরল।" কিন্তু তিনি দুর্বল ও অজ্ঞাত রাবীদের থেকে সর্বাধিক বর্ণনাকারী। আমার নিকট তিনি এমন স্তরের ছিলেন যে, যদি কেউ তার জন্য কোনো হাদীস রচনা করত, তবে তিনি তা বুঝতে পারতেন না এবং তিনি (রাবীদের মধ্যে) পার্থক্য করতেন না। [আল-জারহ ওয়াত-তা’দীল (৪/১২৯)]

আর এই হাদীসটি সুলায়মান-এর উপর আপত্তি করা হয়েছে এমনগুলোর মধ্যে একটি। সম্ভবত তার সন্দেহ হয়েছিল। এই হাদীসটির অন্য একটি সনদ রয়েছে যা উল্লিখিত সনদ থেকে আরও বেশি দুর্বল।









আল-জামি` আল-কামিল (11097)


11097 - عن صهيب، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال في قصة غلام أصحاب الأخدود:"أن الملك دفعه إلى نفر من أصحابه، فقال: اذهبوا به إلى جبل كذا وكذا، فاصعدوا به الجبل، فإذا بلغتم ذروته، فإن رجع عن دينه، وإلا فاطرحوه، فذهبوا به فصعدوا به الجبل، فقال: اللهم! اكفنيهم بما شئت، فرجف بهم الجبل فسقطوا …" الحديث.

صحيح: رواه مسلم في الزهد (3005) عن هداب بن خالد، حدثنا حماد بن سلمة، حدثنا ثابت، عن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن صهيب فذكره.




সুহাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আসহাবুল উখদুদ (খন্দকের অধিবাসী) বালকের ঘটনা সম্পর্কে বলেছেন: "বাদশাহ তাকে তার একদল সঙ্গীর হাতে সোপর্দ করে বলল: তোমরা একে অমুক অমুক পাহাড়ে নিয়ে যাও এবং পাহাড়ের উপর আরোহণ করাও। যখন তোমরা এর চূড়ায় পৌঁছবে, তখন যদি সে তার ধর্ম থেকে ফিরে আসে (তবে ছেড়ে দিও), অন্যথায় তাকে নিচে নিক্ষেপ করো।" এরপর তারা তাকে নিয়ে গেল এবং পাহাড়ে উঠল। (বালকটি) বলল: "হে আল্লাহ! তুমি যেভাবে চাও, এদের মোকাবিলায় আমার জন্য যথেষ্ট হও।" এরপর তাদের নিয়ে পাহাড়টি কেঁপে উঠল এবং তারা নিচে পড়ে গেল।... (সম্পূর্ণ হাদীসটি)।









আল-জামি` আল-কামিল (11098)


11098 - عن * *




১১০৯৮ - থেকে * *









আল-জামি` আল-কামিল (11099)


11099 - عن عائشة قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يستحب الجوامع من الدعاء، ويدع ما سوى ذلك.

صحيح: رواه أبو داود (1482)، وأحمد (25151)، وصحّحه ابن حبان (867)، والحاكم (1/ 539) كلهم من طرق، عن الأسود بن شيبان، عن أبي نوفل بن أبي عقرب، عن عائشة فذكرته. وإسناده صحيح.

وقال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد"




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম جامع দোয়াসমূহ (সংক্ষিপ্ত অথচ ব্যাপক অর্থবোধক দু’আ) পছন্দ করতেন এবং এর বাইরেরগুলো পরিহার করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (11100)


11100 - عن أنس بن مالك قال: كان نبي الله صلى الله عليه وسلم يقول:"اللهم! إني أعوذ بك من العجز، والكسل، والجبن، والهرم، والبخل، وأعوذ بك من عذاب القبر، ومن فتنة المحيا والممات".

متفق عليه: رواه البخاري في الدعوات (6367)، ومسلم في الذكر والدعاء (2706: 50) كلاهما من طريق سليمان التيمي، قال: سمعت أنس بن مالك يقول: فذكره.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলতেন: "হে আল্লাহ! আমি তোমার নিকট অক্ষমতা, আলস্য, ভীরুতা, বার্ধক্য এবং কৃপণতা থেকে আশ্রয় চাই। আর আমি তোমার আশ্রয় চাই কবরের আযাব থেকে এবং জীবন ও মরণের ফিতনা থেকে।"