হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (10701)


10701 - عن أبي هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه قال:"لا يزال يستجاب للعبد ما لم يدع بإثم أو قطيعة رحم ما لم يستعجل". قيل: يا رسول الله ما الاستعجال؟ قال: يقول:"قد دعوت وقد دعوت فلم أر يستجيب لي فيستحسر عند ذلك ويدع الدعاء".

صحيح: رواه مسلم في الذكر والدعاء (2735: 92) عن أبي الطاهر، أخبرنا ابن وهب، أخبرني معاوية (وهو ابن صالح)، عن ربيعة بن يزيد، عن أبي إدريس الخولاني، عن أبي هريرة فذكره.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: বান্দার দু’আ ততক্ষণ পর্যন্ত কবুল হতে থাকে, যতক্ষণ না সে কোনো পাপ অথবা আত্মীয়তার সম্পর্ক ছিন্ন করার জন্য দু’আ করে এবং যতক্ষণ না সে তাড়াহুড়ো করে। জিজ্ঞাসা করা হলো, "হে আল্লাহর রাসূল! তাড়াহুড়ো কী?" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: (তাড়াহুড়ো হলো এই যে,) সে বলে, "আমি তো দু’আ করলাম, দু’আ করলাম, কিন্তু দেখলাম না যে আমার দু’আ কবুল করা হয়েছে।" তখন সে নিরাশ হয়ে যায় এবং দু’আ করা ছেড়ে দেয়।









আল-জামি` আল-কামিল (10702)


10702 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما من رجل يدعو الله بدعاء إلا
استجيب له، فإما أن يُعجل له في الدنيا، وإما أن يدخر له في الآخرة، وإما أن يكفر عنه من ذنوبه بقدر ما دعا ما لم يدع بإثم أو قطيعة رحم أو يستعجل" قالوا: يا رسول الله! وكيف يستعجل؟ قال:"يقول دعوت ربي فما استجاب لي".

حسن: رواه الترمذي (3406/ 3) عن يحيى بن موسى قال: أخبرنا أبو معاوية، أخبرنا الليث هو ابن أبي سليم، عن زياد، عن أبي هريرة فذكره.

وقال: هذا حديث غريب من هذا الوجه.

قلت: وهو كما قال فإن ليث بن أبي سليم ضعيف، وشيخه زياد ترجم له المزي في تهذيب الكمال (3/ 62) فقال: زياد غير منسوب عن أبي هريرة … وذكر له الحديث المذكور ثم قال: يحتمل أن يكون الطائي اهـ.

وزياد الطائي مجهول أرسل عن أبي هريرة كما في التقريب.

وقال الذهبي في الميزان: لا يُعرف.

ولكن رواه البخاري في الأدب المفرد (711)، وأحمد (9785)، والحاكم (1/ 497) كلهم من طريق عبيد الله بن عبد الرحمن بن موهب، عن عمه عبيد الله، عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"ما من مؤمن ينصب وجهه إلى الله يسأله مسألة إلا أعطاه إياها، إما عجلها له في الدنيا، وإما دخرها له في الآخرة ما لم يعجل. قال: يا رسول الله وما عجلته؟ قال: يقول: دعوت ودعوت ولا أراه يستجاب لي". واللفظ للبخاري، وسياق أحمد والحاكم مختصر. وقال الحاكم:"صحيح الإسناد".

قلت: في إسناده عبيد الله بن عبد الرحمن بن عبد الله بن موهب هو حسن الحديث لكن عمه هو عبيد الله بن عبد الله بن موهب لا يعرف حاله.

وبمجموع الإسنادين يصير الحديث حسنا.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "এমন কোনো ব্যক্তি নেই যে আল্লাহর কাছে কোনো দুআ করে, আর তার দুআ কবুল করা হয় না। হয়তো তাকে দুনিয়াতেই তা দ্রুত দেওয়া হয়, অথবা তার জন্য তা আখেরাতের জন্য সঞ্চয় করে রাখা হয়, অথবা তার দুআর পরিমাণে তার পাপসমূহ থেকে ক্ষমা করে দেওয়া হয়। যদি না সে পাপের জন্য, বা আত্মীয়তার সম্পর্ক ছিন্ন করার জন্য দুআ করে, অথবা সে তাড়াহুড়ো করে।" সাহাবায়ে কেরাম বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল! তাড়াহুড়ো করা কেমন?" তিনি বললেন: "(তাড়াহুড়ো হলো) সে বলে, 'আমি আমার রবের কাছে দুআ করলাম, কিন্তু তিনি আমার দুআ কবুল করলেন না'।"









আল-জামি` আল-কামিল (10703)


10703 - عن أبي سعيد، أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"ما من مسلم يدعو بدعوة ليس فيها إثم، ولا قطيعة رحم، إلا أعطاه الله بها إحدى ثلاث: إما أن تعجل له دعوته، وإما أن يدخرها له في الآخرة، وإما أن يصرف عنه من السوء مثلها" قالوا: إذا نكثر، قال:"الله أكثر".

حسن: رواه أحمد (11133)، والبخاري في الأدب المفرد (710)، والحاكم (1/ 493) كلهم من طرق عن علي بن علي الرفاعي قال: سمعت أبا المتوكل الناجي قال: قال أبو سعيد الخدري، عن النبي صلى الله عليه وسلم فذكره.

وإسناده حسن من أجل علي بن علي الرفاعي فإنه حسن الحديث.

وقال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد".




আবু সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: কোনো মুসলিম এমন কোনো দুআ করে না যাতে কোনো পাপ বা আত্মীয়তার বন্ধন ছিন্ন করার বিষয় নেই, কিন্তু আল্লাহ তাকে এর বিনিময়ে তিনটি জিনিসের মধ্যে একটি দান করেন: হয় তার দুআটি দ্রুত কবুল করে নেন, অথবা তা তার জন্য আখেরাতে জমা করে রাখেন, অথবা এর অনুরূপ কোনো মন্দ বিষয় তার থেকে দূর করে দেন। সাহাবাগণ বললেন: তবে তো আমরা বেশি বেশি দুআ করব। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: আল্লাহ (দানের ক্ষেত্রে) আরও বেশি।









আল-জামি` আল-কামিল (10704)


10704 - عن جابر قال سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"ما من أحد يدعو بدعاء إلا آتاه الله
ما سأل أو كف عنه من السوء مثله ما لم يدع بإثم أو قطيعة رحم".

حسن: رواه الترمذي (3381)، وأحمد (14879) كلاهما عن قتيبة بن سعيد، قال: حدثنا ابن لهيعة، عن أبي الزبير، عن جابر فذكره. وإسناده حسن من أجل ابن لهيعة وفيه كلام معروف لكن ما رواه قتيبة بن سعيد عنه مستقيم.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “এমন কোনো ব্যক্তি নেই যে কোনো দু'আ করে, কিন্তু আল্লাহ তাকে তার প্রার্থিত জিনিস দেন অথবা তার থেকে সমপরিমাণ মন্দ দূর করে দেন, যতক্ষণ না সে কোনো পাপের অথবা আত্মীয়তার সম্পর্ক ছিন্ন করার দু'আ করে।”









আল-জামি` আল-কামিল (10705)


10705 - عن عبادة بن الصامت حدثهم أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"ما على الأرض مسلم يدعو الله بدعوة إلا آتاه الله إياها أو صرف عنه من السوء مثلها ما لم يدع بمأثم أو قطيعة رحم". فقال رجل من القوم: إذا نكثر. قال"الله أكثر".

حسن: رواه الترمذي (3573)، وعبد الله بن أحمد في زياداته على المسند (22785) كلاهما من طريق محمد بن يوسف عن ابن ثوبان عن أبيه عن مكحول عن جبير بن نفير أن عبادة بن الصامت حدثهم فذكره.

وقال الترمذي:"هذا حديث حسن صحيح غريب من هذا الوجه وابن ثوبان هو عبد الرحمن بن ثابت بن ثوبان العابد الشامي".

وإسناده حسن من أجل عبد الرحمن بن ثابت بن ثوبان فإنه مختلف فيه إلا أنه حسن الحديث، وبقية رجاله ثقات، وأبوه هو ثابت بن ثوبان العنسي الشامي، ومحمد بن يوسف هو الفريابي.




উবাদা ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যদি কোনো মুসলিম পৃথিবীতে (আল্লাহর কাছে) এমন কোনো দু'আ করে, যা কোনো পাপের বা আত্মীয়তার সম্পর্ক ছিন্ন করার জন্য না হয়, তবে আল্লাহ তাকে হয় সেই দু'আটি মঞ্জুর করেন অথবা তার থেকে সমপরিমাণ খারাপ/অনিষ্ট দূর করে দেন।" তখন উপস্থিত লোকদের মধ্য থেকে একজন বলল: "তাহলে তো আমরা বেশি বেশি দু'আ করব।" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আল্লাহ আরো বেশি দেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (10706)


10706 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من سره أن يستجيب الله له عند الشدائد والكرب فليكثر الدعاء في الرخاء".

حسن: رواه الترمذي (3382)، وأبو يعلى (6396)، والطبراني في الدعاء (45) كلهم من طريق عبيد بن واقد، ثنا سعيد بن عطية الليثي، عن شهر بن حوشب، عن أبي هريرة فذكره.

ورواه أبو نعيم في أخبار أصبهان من طريق عمرو بن علي الصيرفي، ثنا عبيد بن واقد به مثله.

ثم قال عمرو بن علي:"لا أعلمه رواه غير عبيد بن واقد وكان ثقة.

والحديث ضعّفه الترمذي بقوله:"حديث غريب".

وسبب ضعفه أنه مسلسل بالضعفاء فعبيد بن واقد هو القيسي مختلف فيه وثقه الصيرفي كما سبق، وضعفه أبو حاتم الرازي، وقال ابن عدي:"وعامة ما يرويه لا يتابع عليه".

والحافظ ابن حجر لم يقف على توثيق الصيرفي له - وهو أحد الرواة عنه - ولذلك أطلق القول بتضعيفه.

وأما شيخه سعيد بن عطية الليثي فلم يوثقه غير ابن حبان، ولذأ قال الحافظ:"مقبول" يعني حيث يتابع.

وقد توبع فرواه أبو يعلى (6397) عن عمرو الناقد، ثنا هشيم، ثنا أبو بشر جعفر بن إياس، عن
شهر بن حوشب به مثله.

وإسناده حسن من أجل شهر بن حوشب وفيه كلام معروف غير أنه حسن الحديث إذا لم يخالف، وقد توبع.

فقد رواه الطبراني في الدعاء (44)، والحاكم (1/ 544) كلاهما من طريق عبد الله بن صالح، ثنا معاوية بن صالح، عن أبي عامر الألهاني، عن أبي هريرة مثله.

وقال الحاكم:"حديث صحيح الإسناد احتج البخاري بأبي صالح، وأبو عامر الألهاني أظنه الهوزني وهو صدوق".

قلت: وإسناده حسن من أجل عبد الله بن صالح هو أبو صالح، وأما أبو عامر الألهاني فاسمه عبد الله بن غابر حمصي. قال الدارقطني:"لا بأس به". ووثّقه العجلي وابن حبان وهو أحد شيوخ حريز بن عثمان ولذا أطلق الحافظ القول بتوثيقه.

فالحديث بمجموع طرقه حسن على أقل الأحوال.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যে ব্যক্তি চায় যে, কঠিন বিপদ ও সংকটের সময় আল্লাহ তার দু’আ কবুল করুন, সে যেন স্বাচ্ছন্দ্যের সময় বেশি করে দু’আ করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (10707)


10707 - عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"ينزل الله تبارك وتعالى كلّ ليلة إلى السّماء الدّنيا حين يبقى ثلثُ اللّيل الآخر، فيقول: من يدعوني فأستجيبَ له، من يسألني فأُعطيه، من يستغفرني فأغفرَ له".

متفق عليه: رواه مالك في القرآن (30) عن ابن شهاب، عن أبي عبد الله الأغرّ، وأبي سلمة، عن أبي هريرة، فذكره. ورواه البخاريّ في التهجد (1145) ومسلم في صلاة المسافرين (758) كلاهما من طريق مالك، به، مثله.

وقال الترمذي: وقد روي هذا الحديث من أوجه كثيرة عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم، وروي عنه أنه قال:"ينزل الله عز وجل حين يبقى ثلث الليل الآخر" وهو أصح الروايات.

قلت: وروي عن جمع من الصحابة والكلام عليه مبسوط في كتاب الإيمان.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আল্লাহ তাবারাকা ওয়া তাআলা প্রতি রাতে রাতের শেষ তৃতীয়াংশ বাকি থাকতে দুনিয়ার আসমানে অবতরণ করেন। অতঃপর তিনি বলেন: ‘কে আমাকে ডাকবে যে আমি তার ডাকে সাড়া দেব? কে আমার কাছে চাইবে যে আমি তাকে দান করব? কে আমার কাছে ক্ষমা প্রার্থনা করবে যে আমি তাকে ক্ষমা করে দেব?’









আল-জামি` আল-কামিল (10708)


10708 - عن جابر قال: سمعت النبي صلى الله عليه وسلم يقول:"إن في الليل لساعة لا يوافقها رجل مسلم يسأل الله خيرا من أمر الدنيا والآخرة إلا أعطاه إياه وذلك كل ليلة".

صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (757: 166) عن عثمان بن أبي شيبة، ثنا جرير، عن الأعمش، عن أبي سفيان، عن جابر فذكره.

قوله:"إن في الليل لساعة" لعل المراد به هو ثلث الليل الأخير كما ورد في الحديث السابق.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি, "নিশ্চয়ই রাতের মধ্যে এমন একটি মুহূর্ত (বা সময়) আছে, যখন কোনো মুসলিম ব্যক্তি দুনিয়া ও আখিরাতের কল্যাণের জন্য আল্লাহর কাছে কোনো কিছু চাইবে, আল্লাহ তাকে তা অবশ্যই দান করবেন। আর তা হলো প্রতি রাতেই।"









আল-জামি` আল-কামিল (10709)


10709 - عن معاذ بن جبل أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: ما من مسلم يبيت على ذكر طاهرا فيتعار من الليل يسأل الله خيرا من الدنيا والآخرة إلا أعطيه.
حسن: رواه النسائي في عمل اليوم والليلة (806) عن إبراهيم بن يعقوب قال: حدثنا عفان، قال: حدثنا حماد قال: كنت أنا وعاصم وثابت فحدث عاصم عن شهر، عن أبي ظبية، عن معاذ بن جبل فذكره.

ورواه أبو داود (5042)، وابن ماجه (3881)، وأحمد (22048) كلهم من طرق، عن حماد بن سلمة، عن عاصم بن بهدلة به.

قال ثابت البناني: قدم علينا أبو ظبية، فحدثنا بهذا الحديث عن معاذ بن جبل، عن النبي صلى الله عليه وسلم.

وهذا إسناد حسن من أجل أبي ظبية وهو الكلائي فإنه حسن الحديث، فقد وثقه ابن معين وقال الدارقطني:"لا بأس به".

وللحديث طرق أخرى لا تخلو من مقال، والذي ذكرتها أصحها.




মু'আয ইবনে জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: এমন কোনো মুসলিম নেই যে পবিত্র অবস্থায় আল্লাহর যিকির করতে করতে রাত কাটায় (ঘুমায়), অতঃপর রাতের কোনো অংশে জেগে উঠে আল্লাহ্‌র কাছে দুনিয়া ও আখিরাতের কোনো কল্যাণ কামনা করে, আল্লাহ তাকে তা দান না করে থাকেন না (বা আল্লাহ অবশ্যই তাকে তা দান করেন)।









আল-জামি` আল-কামিল (10710)


10710 - عن عمرو بن عبسة يقول: قلت: يا رسول الله! هل من ساعة أقرب من الأخرى؟ أو هل من ساعة يُبتغَى ذكرُها؟ قال:"نعم، إن أقرب ما يكون الرب عز وجل من العبد جوف الليل الآخر، فإن استطعت أن تكون ممن يذكر الله عز وجل في تلك الساعة فكُن، فإن الصلاة محضورة مشهودَةٌ إلى طلوع الشمس".

صحيح: رواه النسائي (572) عن عمرو بن منصور، أخبرنا آدم بن أبي إياس، حدثنا الليث بن سعد، حدثنا معاوية بن صالح، قال: أخبرني أبو يحيى سُليم بن عامر وضمرة بن حبيب وأبو طلحة نعيم بن زياد قالوا: سمعنا أبا أمامة الباهلي يقول: سمعت عمرو بن عَبَسَة فذكره.

ورواه الترمذي (3579) من طريق معاوية بن صالح به مختصرًا وقال:"حسن صحيح غريب من هذا الوجه".

قلت: وهو كما قال فإنه صحيح، وقد صحّحه ابن خزيمة (1147)، والحاكم (1/ 409) كلاهما من هذا الطريق.

قال الحاكم:"على شرط مسلم".

ورواه أبو داود (1277) من وجه آخر عن أبي أمامة وفيه: أي الليل أسمع؟ فقال:"جوف الليل الآخر، فصَلِّ ما شئت، فإن الصلاة مشهودة مكتوبة".

وأبو أمامة هو صُدي بن عجلان الباهليّ، صحابيّ مشهور.

وأصل الحديث في صحيح مسلم (832) في قصة إسلام عمرو بن عبسة.




আমর ইবনে আবাসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি বললাম, "হে আল্লাহর রাসূল! এক সময়ের চেয়ে অন্য কোনো সময় কি (আল্লাহর) বেশি নিকটবর্তী? অথবা এমন কি কোনো সময় আছে যখন আল্লাহর স্মরণ (বিশেষভাবে) কাম্য?" তিনি বললেন, "হ্যাঁ, বান্দা আল্লাহর নিকটবর্তী হয় রাতের শেষ প্রহরে। অতএব, তুমি যদি সেই সময় আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লার স্মরণকারীদের অন্তর্ভুক্ত হতে পারো, তবে হও। কারণ সেই সময়কার সালাত ফজরের উদয় পর্যন্ত উপস্থিত ও সাক্ষ্যীকৃত (ফিরিশতাদের দ্বারা পরিবেষ্টিত) থাকে।"









আল-জামি` আল-কামিল (10711)


10711 - عن أنس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن الدعاء لا يُرد بين الأذان والإقامة فادعوا".

حسن: رواه أبو داود (521) والترمذي (212، 3594) والنسائي في اليوم والليلة (69، 68، 70)، وأحمد (12584، 13357)، وصحّحه ابن خزيمة (425 - 427)، وابن حبان (1696)
كلهم من طرق، عن أنس بن مالك فذكره.

وهو حديث حسن، مخرج في كتاب الصلاة.

وفي رواية: فماذا نقول يا رسول الله؟ قال:"سلوا الله العافية في الدنيا والآخرة". وهذه الزيادة مما تفرد به أحد الرواة.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় আযান ও ইকামতের মধ্যবর্তী সময়ের দু‘আ প্রত্যাখ্যাত হয় না। অতএব তোমরা দু‘আ করো।"

অন্য এক বর্ণনায় (সাহাবীগণ জিজ্ঞাসা করলেন), 'হে আল্লাহর রাসূল! আমরা কী বলব?' তিনি বললেন: "তোমরা আল্লাহর কাছে দুনিয়া ও আখিরাতে عافية (আফিয়াত/নিরাপত্তা ও কল্যাণ) প্রার্থনা করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (10712)


10712 - عن ابن عباس قال: كشف رسول الله صلى الله عليه وسلم الستارة والناس صفوف خلف أبي بكر فقال:"أيها الناس إنه لم يبق من مبشرات النبوة إلا الرؤيا الصالحة يراها المسلم أو ترى له، ألا وإني نهيت أن أقرأ القرآن راكعا أو ساجدا، فأما الركوع فعظموا فيه الرب عز وجل، وأما السجود فاجتهدوا في الدعاء فقمن أن يستجاب لكم".

صحيح: رواه مسلم في الصلاة (479) من طرق، عن سفيان بن عيينة، أخبرني سليمان بن سحيم، عن إبراهيم بن عبد الله بن معبد، عن أبيه، عن ابن عباس فذكره.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম পর্দা সরিয়ে দিলেন, যখন লোকেরা আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পিছনে কাতারবদ্ধ ছিল। তিনি বললেন: "হে লোক সকল! নবুওয়াতের সুসংবাদ দানকারী বিষয়ের মধ্যে শুধু উত্তম স্বপ্নই অবশিষ্ট রয়েছে, যা কোনো মুসলিম নিজে দেখে অথবা তাকে দেখানো হয়। সাবধান! আর আমাকে রুকু অথবা সিজদাবস্থায় কুরআন পাঠ করতে নিষেধ করা হয়েছে। সুতরাং রুকুতে তোমরা মহান রব আয্যা ওয়া জাল্লা-এর মহিমা ঘোষণা করো। আর সিজদায় তোমরা বেশি বেশি দু'আ করার চেষ্টা করো, কারণ তখন তোমাদের দু'আ কবুল হওয়ার উপযুক্ত সময়।"









আল-জামি` আল-কামিল (10713)


10713 - عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"أقرب ما يكون العبد من ربه وهو ساجد فأكثروا الدعاء".

صحيح: رواه مسلم في الصلاة (482) من طريق سُمي مولى أبي بكر، أنه سمع أبا صالح ذكوان، يحدث عن أبي هريرة فذكره.




আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "বান্দা তার রবের সবচেয়ে নিকটবর্তী হয় যখন সে সিজদারত থাকে। অতএব তোমরা (সিজদায়) বেশি বেশি দু'আ করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (10714)


10714 - عن أبي هريرة، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم ذكر يوم الجمعة فقال:"فيها ساعة لا يوافقها عبدٌ مسلمٌ وهو قائمٌ يصلِّي، يسأل الله شيئًا إلَّا أعطاه إيَّاه". وأشار رسول الله صلى الله عليه وسلم بيده يُقلِّلها.

متفق عليه: رواه مالك في الجمعة (15) عن أبي الزناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة، فذكره.

ورواه البخاري في الجمعة (935)، ومسلم في الجمعة (852) كلاهما من طريق مالكٍ به.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জুমু‘আর দিনের কথা উল্লেখ করে বললেন: "এতে এমন একটি মুহূর্ত আছে, যখন কোনো মুসলিম বান্দা নামাযরত অবস্থায় দাঁড়িয়ে আল্লাহ্‌র কাছে কোনো কিছু প্রার্থনা করলে আল্লাহ্‌ তাকে তা দান না করে থাকেন না।" আর রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হাত দ্বারা ইশারা করে বোঝালেন যে, মুহূর্তটি খুবই সংক্ষিপ্ত।









আল-জামি` আল-কামিল (10715)


10715 - عن أبي بردة بن أبي موسى الأشعري، قال: قال لي عبد الله بن عمر: سمعتَ أباك يحدِّث عن رسول الله صلى الله عليه وسلم في شأن ساعةِ الجمعة؟ قال: قلت: نعم، سمعته يقول: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"هي ما بين أن يجلس الإمام إلى أن تُقضى الصلاةُ".

صحيح: رواه مسلم في الجمعة (853) من طريق وهب، عن مخرمة بن بكير، عن أبيه، عن أبي بردة، فذكره.




আব্দুল্লাহ ইবনে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি আবূ বুরদাহ ইবনে আবী মূসা আল-আশআরীকে বললেন: আপনি কি আপনার পিতাকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে জুমু‘আর (প্রার্থনা কবুলের) সময় সম্পর্কে বর্ণনা করতে শুনেছেন? আবূ বুরদাহ বললেন: হ্যাঁ, আমি তাঁকে বলতে শুনেছি: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “তা হলো ইমাম (মিম্বরে) বসার সময় থেকে নিয়ে সালাত শেষ হওয়া পর্যন্ত সময়টুকু।”









আল-জামি` আল-কামিল (10716)


10716 - عن أبي هريرةَ أنَّه قال: خرجتُ إلى الطورِ، فلقيت كعب الأحبار، فجلستُ معه، فحدَّثني عن التوراة، وحدَّثته عن رسول الله صلى الله عليه وسلم. فكان فيما حدَّثته أن قلتُ: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"خير يومٍ طلعت عليه الشمس يومُ الجمعةِ، فيه خُلِق آدم، وفيه أُهبِطَ من الجنَّة، وفيه تيبَ عليه، وفيه مات، وفيه تقوم الساعةُ، وما من دابَّةٍ إلَّا وهي
مُصيخةٌ يومَ الجمعةِ من حين تصبح حتَّى تطلع الشمس، شفقًا من الساعةِ، إلَّا الجنُّ والإنس. وفيه ساعةٌ لا يصادفها عبدٌ مسلمٌ وهو يُصلِّي يسأل الله شيئًا إلَّا أعطاه إيَّاه". قال كعبٌ: ذلك في كلِّ سنةٍ يومٌ؟ فقلت: بل في كلِّ جمعةٍ. فقرأ كعب التوراةَ فقال: صدق رسول الله صلى الله عليه وسلم …

قال أبو هريرة: ثمَّ لقيتُ عبد الله بن سلام فحدَّثته بمجلسي مع كعب الأحبار، وما حدَّثته به في يوم الجمعةِ، فقلت: قال كعبٌ: ذلك في كلِّ سنةٍ يوم. قَال: قال عبد الله بن سلام: كذب كعبٌ. فقلت: ثمَّ قرأ كعبٌ التوراة فقال: بل هي في كلِّ جمعةٍ. فقال عبد الله بن سلام: صدق كعبٌ. ثمَّ قال عبد الله بن سلام: قد علِمتُ أيَّةَ ساعةٍ هيَ. قال أبو هريرةَ: فقلت له: أخبرني بها ولا تضنَّ عليَّ. فقال عبد الله بن سلام: هي آخر ساعةٍ في يوم الجمعةِ. قال أبو هريرة: فقلت: وكيف تكون آخر ساعة في يوم الجمعة وقد قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا يُصادفها عبد مسلم وهو يصلِّي". وتلك الساعة ساعة لا يُصلَّى فيها؟ فقال عبد الله بن سلام: أَلَم يقل رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من جلس مجلسًا ينتظر الصلاةَ فهو في صلاةٍ حتَّى يُصلِّي"؟ قال أبو هريرة: فقلتُ: بلى. قال: فهو ذلك.

صحيح: رواه مالك في الجمعة (16) عن يزيد بن عبد الله بن الهاد، عن محمد بن إبراهيم بن الحارث التيمي، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن بن عوف، عن أبي هريرةَ، فذكر الحديثَ.

ورواه أبو داود (1046)، والترمذي (491) وصحّحه ابن حبَّان (2772) والحاكم (1/ 178) كلهم من طريق مالك به. ورواه النسائي (1430) عن قتيبة، ثنا بكر (يعني بن مضر) عن ابن الهاد. وإسناده صحيحٌ.

وقال الحاكم:"هذا حديث صحيح على شرط الشّيخين ولم يُخرجاه".

وقوله:"مصيخة" أي مستمعة مصغية تتوقع قيام الساعة.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি তূর পর্বতের দিকে যাচ্ছিলাম। সেখানে কাব আল-আহবার (رحمه الله)-এর সাথে আমার দেখা হলো। আমি তার সাথে বসলাম। তিনি আমাকে তাওরাত সম্পর্কে বর্ণনা করলেন, আর আমি তাকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সম্পর্কে বর্ণনা করলাম।

আমি তাকে যা বর্ণনা করেছিলাম তার মধ্যে ছিল যে আমি বলেছিলাম: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে দিনের উপর সূর্য উদিত হয়, তার মধ্যে সর্বোত্তম দিন হলো জুমু'আর দিন। এই দিনেই আদমকে সৃষ্টি করা হয়েছিল, এই দিনেই তাকে জান্নাত থেকে (পৃথিবীতে) নামিয়ে দেওয়া হয়েছিল, এই দিনেই তার তাওবা কবুল করা হয়েছিল, এই দিনেই তিনি মৃত্যুবরণ করেছিলেন এবং এই দিনেই কিয়ামত সংঘটিত হবে। জিন ও মানুষ ছাড়া প্রতিটি প্রাণীই জুমু'আর দিন সকাল থেকে সূর্যোদয় পর্যন্ত কিয়ামতের ভয়ে কান পেতে থাকে। আর এই দিনে এমন একটি মুহূর্ত আছে, যদি কোনো মুসলিম বান্দা সালাতরত অবস্থায় সেই মুহূর্ত লাভ করে এবং আল্লাহ্‌র কাছে কোনো কিছু চায়, আল্লাহ অবশ্যই তাকে তা দান করেন।"

কাব বললেন: "এটি কি বছরের মধ্যে মাত্র একটি দিন?" আমি বললাম: "না, বরং এটি প্রতি জুমু'আতেই।" তখন কাব তাওরাত পাঠ করলেন এবং বললেন: "রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সত্য বলেছেন।"

আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এরপর আমি আবদুল্লাহ ইবনু সালাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে দেখা করলাম এবং কাব আল-আহবারের সাথে আমার বসা এবং জুমু'আর দিন সম্পর্কে তাকে যা বলেছিলাম তা তাকে বললাম। আমি বললাম: "কাব বলেছিলেন, এটি বছরের মধ্যে মাত্র একটি দিন।" তখন আবদুল্লাহ ইবনু সালাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: "কাব ভুল বলেছেন।" আমি বললাম: "এরপর কাব তাওরাত পাঠ করে বললেন, না, বরং এটি প্রতি জুমু'আতেই।" তখন আবদুল্লাহ ইবনু সালাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: "কাব সত্য বলেছেন।"

এরপর আবদুল্লাহ ইবনু সালাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: "আমি অবশ্যই জানি সেই মুহূর্তটি কোনটি।" আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি তাকে বললাম: "আমাকে এটি বলে দিন, গোপন করবেন না।" আবদুল্লাহ ইবনু সালাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: "সেটি হলো জুমু'আর দিনের শেষ মুহূর্ত।"

আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি তাকে বললাম: "জুমু'আর দিনের শেষ মুহূর্ত কীভাবে হতে পারে, অথচ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: 'কোনো মুসলিম বান্দা সালাতরত অবস্থায় সেই মুহূর্ত লাভ করে...' কিন্তু সেই মুহূর্তে তো সালাত আদায় করা যায় না (নিষেধ রয়েছে)?" তখন আবদুল্লাহ ইবনু সালাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: "রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কি বলেননি: 'যে ব্যক্তি সালাতের প্রতীক্ষায় কোনো মজলিসে বসে থাকে, সে সালাত আদায় করা পর্যন্ত সালাতের মধ্যেই থাকে?'" আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি বললাম: "হ্যাঁ (বলেছেন)।" তিনি বললেন: "তবে এটাই সেই মুহূর্ত।"









আল-জামি` আল-কামিল (10717)


10717 - عن أنس بن مالك، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"التمسوا الساعة التي ترجى في يوم الجمعة بعد العصر إلى غيبوبة الشمس".

حسن: رواه الترمذي (489) عن عبد الله بن الصباح الهاشمي البصري، قال: حدثنا عبيد الله بن عبد المجيد الحنفي، قال: حدثنا محمد بن أبي حميد، قال: حدثنا موسى بن وردان، عن أنس، فذكره.

في إسناده محمد بن أبي حميد ضعيف، ولكن قال ابن عدي: وهو جمع ضعفه يكتب حديثه أي: للاعتبار. فقد وجدت له متابعا وهو ابن لهيعة، عن موسى بن وردان. أخرجه الطبراني في الأوسط (136) من طريقه.
وابن لهيعة فيه كلام معروف، ولكنه لم يتهم، ولذا يقبل في المتابعة، وبهذا صار الحديث حسنا.

وأما موسى بن وردان فهو مختلف فيه غير أنه حسن الحديث إذا لم يخالف في الإسناد، ولم يأت في حديثه ما ينكر عليه.




আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "তোমরা জুমুআর দিনে সেই সময়টিকে তালাশ করো, যা কবুল হওয়ার জন্য আশা করা হয়—আসরের পর থেকে সূর্য ডোবা পর্যন্ত।"









আল-জামি` আল-কামিল (10718)


10718 - عن جابر بن عبد الله أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"يوم الجمعة اثنتا عشرة - يريد: ساعة -، لا يوجد مسلمٌ يسأل الله عز وجل شيئًا إلَّا آتاه الله عز وجل، فالتمسوها آخر ساعةٍ بعد العصرِ".

حسن: رواه أبو داود (1048) والنسائي (1389) كلاهما من طريق ابن وهب، عن عمرو بن الحارث، عن الجلاح - مولى عبد العزيز -، أنَّ أبا سلمة حدَّثه، عن جابر بن عبد الله، فذكره.

وإسناده حسن من أجل الجلاح؛ فإنه حسن الحديث.

وقال الحاكم: صحيح على شرط مسلم.




জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: জুমু‘আর দিনে বারোটি মুহূর্ত (অর্থাৎ ঘণ্টা) রয়েছে। এমন কোনো মুসলিম পাওয়া যায় না যে আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লার কাছে কিছু চাইবে, আর আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লা তাকে তা দান করবেন না। সুতরাং তোমরা তা আসরের পর শেষ মুহূর্তে (শেষ ঘণ্টায়) অনুসন্ধান করো।









আল-জামি` আল-কামিল (10719)


10719 - عن عبد الله بن سلام، قال: قلت ورسول الله صلى الله عليه وسلم جالسٌ: إنَّا لنجد في كتاب الله في يوم الجمعة ساعة لا يوافقها عبدٌ مؤمن يصلِّي يسأل الله فيها شيئًا إلَّا قضى له حاجته.

قال عبد الله: فأشار إليَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أو بعض ساعة". فقلت: صدقتَ، أو بعض ساعة. قلتُ: أي ساعة هي؟ قال:"هي آخر ساعات النهار". قلت: إنَّها ليست ساعة صلاة. قال:"بلى. إنَّ العبد المؤمن إذا صلَّى ثمَّ جلس، لا يحبسه إلَّا الصلاة فهو في الصلاة".

حسن: رواه ابن ماجه (1139) عن عبد الرحمن بن إبراهيم الدمشقي، ثنا ابن أبي فُديك، عن الضحاك بن عثمان، عن أبي النضر، عن أبي سلمة، عن عبد الله بن سلام، فذكره. وإسناده حسن؛ من أجل الضحاك بن عثمان فإنه صدوق.

وقال البوصيري:"هذا إسناد صحيح، رجاله ثقات على شرط الصحيح".

ورواه أحمد (23781) عن عبد الله بن الحارث، عن الضحاك به مثله. وفيه: قال أبو النضر: قال أبو سلمة: سألته: أي ساعة هي؟ قال: (أي عبد الله بن سلام) آخر ساعات النهار. فقلت: إنها ليست بساعة صلاة. فقال لي: بلى إنَّ العبد المسلم في صلاةٍ إذا صلَّى ثمَّ قعد في مصلاه لا يحبسه إلَّا انتظار الصلاة. انتهى.




আব্দুল্লাহ ইবনে সালাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উপবিষ্ট থাকাবস্থায় আমি বললাম: আমরা আল্লাহর কিতাবে দেখতে পাই যে, জুমু'আর দিনে এমন একটি মুহূর্ত (সা'আত) আছে, যখন কোনো মুমিন বান্দা সালাত আদায়রত অবস্থায় আল্লাহর কাছে কিছু প্রার্থনা করলে, তিনি তার প্রয়োজন অবশ্যই পূরণ করেন।

আব্দুল্লাহ (ইবনে সালাম) বলেন: তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার দিকে ইঙ্গিত করে বললেন: "অথবা অল্প কিছু সময়ের জন্য।" আমি বললাম: আপনি সত্য বলেছেন, অথবা অল্প কিছু সময়ের জন্য। আমি জিজ্ঞেস করলাম: সেই মুহূর্তটি কোনটি? তিনি বললেন: "সেটি হলো দিনের শেষ মুহূর্তগুলো।" আমি বললাম: সেটি তো সালাতের সময় নয়। তিনি বললেন: "হ্যাঁ। নিশ্চয়ই মুমিন বান্দা যখন সালাত আদায় করে এবং অতঃপর (সালাতের জায়গায়) বসে থাকে, আর সালাত ছাড়া অন্য কিছু তাকে আটকে রাখে না, তখন সে সালাতের মধ্যেই থাকে।"









আল-জামি` আল-কামিল (10720)


10720 - عن أبي هريرة أو أبي سعيد قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن لله عتقاء في كل يوم وليلة، لكل عبد منهم دعوة مستجابة".

صحيح: رواه أحمد (7450) عن أبي معاوية، حدثنا الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرة
أو أبي سعيد فذكره.

والشك من الأعمش، والشك في تعيين الصحابي لا يضر.

وهذا المطلق جاء مقيدا بشهر رمضان كما في الحديث الآتي:




আবু হুরায়রা অথবা আবু সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় আল্লাহ্‌র পক্ষ থেকে প্রতি দিন ও রাতে (জাহান্নামের আগুন থেকে) মুক্তিপ্রাপ্ত বান্দা রয়েছে। তাদের প্রত্যেকের জন্য একটি করে কবুলযোগ্য দু'আ রয়েছে।"