হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (10641)


10641 - عن أبي هريرة قال: سألوا رسول الله صلى الله عليه وسلم كيف نُصلِّي عليك؟ قال:"قولوا: اللّم صَلِّ على محمد وبارك على محمد وعلى آل محمد، كما صلَّيت وباركت على إبراهيم وآل إبراهيم في العالمين، إنك حميد مجيد، والسلام كما علمتم".

صحيح: رواه البزار - كشف الأستار (565) عن أحمد بن عبدة، أنبأ سُلَيم بن أخضر، ثنا داود بن قيس، عن نُعيم، عن أبي هريرة فذكر الحديث.

وقال الحافظ في"نتائج الأفكار" (2/ 208):"هذا حديث صحيح.

ورواه أبو داود (982) عن أبي هريرة بإسناد آخر ولفظه يختلف قليلا، وفي إسناده مقال.

وفي الباب أحاديث أخرى مذكورة في كتاب الصلاة.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সাহাবীগণ আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করলেন: আমরা কিভাবে আপনার প্রতি দরূদ পড়ব? তিনি বললেন: "তোমরা বলো: 'আল্লাহুম্মা সাল্লি 'আলা মুহাম্মাদ ওয়া বারিক 'আলা মুহাম্মাদ ওয়া 'আলা আলি মুহাম্মাদ, কামা সল্লাইতা ওয়া বারাকতা 'আলা ইবরাহীমা ওয়া আলি ইবরাহীম ফিল 'আলামীন। ইন্নাকা হামীদুম মাজীদ।' (অর্থাৎ: হে আল্লাহ! মুহাম্মাদ-এর উপর রহমত ও বরকত বর্ষণ করুন, এবং মুহাম্মাদ-এর পরিবারের উপরও। যেমন আপনি ইবরাহীম ও ইবরাহীম-এর পরিবারের উপর বিশ্বজগতের মধ্যে রহমত ও বরকত বর্ষণ করেছেন। নিশ্চয়ই আপনি প্রশংসিত, মহিমান্বিত।) আর সালাম (আদব) হলো, যেমন তোমরা শিখেছো।"









আল-জামি` আল-কামিল (10642)


10642 - عن عامر بن ربيعة عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"ما من مسلم يصلي علي إلا صلت عليه الملائكة ما صلى علي، فليقلّ العبدُ من ذلك أو ليُكثرْ".

حسن: رواه ابن ماجه (907)، وأحمد (15680) كلاهما من طريق شعبة، عن عاصم بن عبيد الله قال: سمعت عبد الله بن عامر بن ربيعة يحدث عن أبيه فذكره.
وعاصم بن عبيد الله بن عاصم بن عمر بن الخطاب هو العدوي المدني ضعيف إلا أنه توبع فقد رواه عبد الرزاق (3115) عن عبد الله بن عمر، عن عبد الله بن عامر بن ربيعة، عن أبيه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من صلى علي صلاةً، صلى الله عليه فأكثروا أو أقلّوا".

وعبد الله بن عمر هو العمري ضعيف، وبمجموع الطريقين يكون الحديث حسنا.

قال ابن القيم في جلاء الأفهام (ص 142):"فرواية هذا الحديث من هذين الوجهين المختلفين يدل على أن له أصلا، وهذا لا ينزل عن وسط درجات الحسن والله أعلم" اهـ.

وفي معناه ما روي عن عبد الله بن مسعود أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"أولى الناس بي يوم القيامة أكثرهم علي صلاةً".

رواه الترمذي (484) عن محمد بن بشار، حدثنا محمد بن خالد بن عثمة، حدثنا موسى بن يعقوب الزمعي، حدثني عبد الله بن كيسان أن عبد الله بن شداد أخبره، عن عبد الله بن مسعود فذكره.

وقال الترمذي:"هذا حديث حسن غريب".

قلت: في إسناده موسى بن يعقوب الزمعي مختلف فيه إلا أنه حسن الحديث ما لم يتبين خطؤه، وقد اختلف عليه في إسناد هذا الحديث على عدة أوجه، وقال الدارقطني في العلل (5/ 113):"والاضطراب فيه من موسى بن يعقوب، ولا يحتج به".

وعبد الله بن كيسان هو القرشي الزهري فيه جهالة.




আমের ইবনে রাবি'আ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "এমন কোনো মুসলিম নেই যে আমার ওপর দরুদ পাঠ করে, কিন্তু ফেরেশতারা তার ওপর ততক্ষণ পর্যন্ত দরুদ পাঠ করতে থাকে, যতক্ষণ সে আমার ওপর দরুদ পাঠ করে। সুতরাং, বান্দা যেন (দরুদ পাঠের পরিমাণ) কমিয়ে দেয় অথবা বাড়িয়ে দেয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (10643)


10643 - عن أبي هريرة: أن النبي صلى الله عليه وسلم رقى المنبر فقال:"آمين، آمين، آمين"، قيل له: يا رسول الله! ما كنت تصنع هذا؟ فقال:"قال لي جبريل: رغم أنف عبد أدرك أبويه أو أحدهما لم يدخله الجنة، قلت: آمين، ثم قال: رغم أنف عبد دخل عليه رمضان لم يغفر له، فقلت: آمين. ثم قال: رغم أنف امرئ ذكرت عنده فلم يصل عليك، فقلت: آمين".

حسن: رواه البخاري في الأدب المفرد (646)، وصحّحه ابن خزيمة (1888) كلاهما من طريق كثير بن زيد، عن الوليد بن رباح، عن أبي هريرة فذكره.

وإسناده حسن من أجل الوليد بن رباح وهو الدوسي المدني، وكثير بن زيد وهو الأسلمي المدني فإنهما حسنا الحديث.

ورواه أبو يعلى (5922) - وعنه ابن حبان (907) - من حديث أبي معمر الهذلي (وهو إسماعيل بن إبراهيم بن معمر)، عن حفص بن غياث، عن محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة فذكر نحوه.

وهذا إسناد حسن أيضا من أجل محمد بن عمرو وهو ابن علقمة الليثي فإنه حسن الحديث.
ورواه مسلم في البر والصلة (2551) من طريق سهيل، عن أبيه، عن أبي هريرة مقتصرا على جزء الوالدين.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মিম্বরে আরোহণ করলেন এবং বললেন: "আমীন, আমীন, আমীন।" তাঁকে জিজ্ঞেস করা হলো: হে আল্লাহর রাসূল! আপনি তো এর আগে এমন করতেন না? তিনি বললেন: "জিবরাঈল আমাকে বলেছেন: সেই ব্যক্তির নাক ধূলায় মলিন হোক যে তার পিতা-মাতা উভয়কে অথবা তাদের একজনকে পেলো, কিন্তু (তাদের সেবার মাধ্যমে) জান্নাতে প্রবেশ করতে পারলো না। আমি বললাম: আমীন। অতঃপর তিনি বললেন: সেই ব্যক্তির নাক ধূলায় মলিন হোক যার সামনে রমযান মাস এলো, কিন্তু তাকে ক্ষমা করা হলো না। আমি বললাম: আমীন। অতঃপর তিনি বললেন: সেই ব্যক্তির নাক ধূলায় মলিন হোক যার সামনে আমার নাম উল্লেখ করা হলো, কিন্তু সে আমার উপর দরূদ পড়লো না। আমি বললাম: আমীন।"









আল-জামি` আল-কামিল (10644)


10644 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"رغم أنف رجل ذكرت عنده فلم يصل علي، ورغم أنف رجل دخل عليه رمضان ثم انسلخ قبل أن يغفر له، ورغم أنف رجل أدرك عنده أبواه الكبرَ فلم يدخلاه الجنة".

حسن: رواه الترمذي (3545)، وأحمد (7451)، وصحّحه ابن حبان (908)، والحاكم (1/ 549) كلهم من طرق، عن عبد الرحمن بن إسحاق عن سعيد بن أبي سعيد المقبري، عن أبي هريرة فذكره.

واقتصر الحاكم على ذكر الصلاة على النبي صلى الله عليه وسلم.

وإسناده حسن من أجل عبد الرحمن بن إسحاق وهو المدني فإنه حسن الحديث.

وقال الترمذي:"هذا حديث حسن غريب من هذا الوجه".




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ধ্বংস হোক (বা তার নাক ধূলায় লুণ্ঠিত হোক) সেই ব্যক্তির, যার কাছে আমার নাম উল্লেখ করা হলো, অথচ সে আমার ওপর দরূদ পাঠ করলো না। এবং ধ্বংস হোক সেই ব্যক্তির, যার জীবনে রমযান মাস এলো, অতঃপর মাসটি অতিবাহিত হয়ে গেল কিন্তু তাকে ক্ষমা করা হলো না। এবং ধ্বংস হোক সেই ব্যক্তির, যে তার মাতা-পিতাকে অথবা তাদের কোনো একজনকে বার্ধক্যে পেল, কিন্তু তারা তাকে জান্নাতে প্রবেশ করাতে পারলো না।"









আল-জামি` আল-কামিল (10645)


10645 - عن حسين بن علي بن أبي طالب قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"البخيل الذي من ذكرت عنده فلم يصل عليّ".

حسن: رواه الترمذي (3546)، وأحمد (1736)، والنسائي في عمل اليوم والليلة (55، 56)، وصحّحه ابن حبان (909)، والحاكم (1/ 549) كلهم من طرق، عن سليمان بن بلال، عن عمارة بن غزية، عن عبد الله بن علي بن حسين بن علي بن أبي طالب، عن أبيه، عن حسين بن علي بن أبي طالب فذكره.

وإسناده حسن من أجل عبد الله بن علي بن حسين فإنه حسن الحديث فقد روى عنه جمع، وذكره ابن حبان وابن خلفون في الثقات.

وقال الترمذي:"هذا حديث حسن صحيح غريب" وفي بعض النسخ:"هذا حديث حسن غريب".

وقال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد".

وقد اختلف في إسناده وقول سليمان بن بلال أشبه بالصواب كما قال الدارقطني في العلل (304).




হুসাইন ইবন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "সেই ব্যক্তি কৃপণ, যার সামনে আমার নাম উল্লেখ করা হয়, অথচ সে আমার প্রতি সালাত (দরুদ) পাঠ করে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (10646)


10646 - عن عبد الله بن عمرو بن العاص أنه سمع النبي صلى الله عليه وسلم يقول:"إذا سمعتم المؤذن فقولوا مثل ما يقول: ثم صلوا عليَّ، فإنه من صلى عليَّ صلاةً صلَّى الله عليه بها عشرًا، ثم سَلُوا الله لي الوسيلةَ، فإنها منزلة في الجنة لا ينبغي إلا لعبد من عباد الله، وأرجو أن أكون أنا هو، فمن سأل لي الوسيلةَ حلَّتْ له الشفاعة".

صحيح: رواه مسلم في الصلاة (384) من طريق كعب بن علقمة، عن عبد الرحمن بن جبير، عن عبد الله بن عمرو بن العاص فذكره.




আব্দুল্লাহ ইবনু আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছেন: "যখন তোমরা মুআযযিনকে (আযান দিতে) শুনবে, তখন সে যা বলে তোমরাও তাই বলো। এরপর আমার উপর দরূদ পড়ো। কারণ, যে আমার উপর একবার দরূদ পড়ে, আল্লাহ তার উপর দশবার রহমত বর্ষণ করেন। এরপর আল্লাহর নিকট আমার জন্য 'ওয়াসীলা' প্রার্থনা করো। কেননা তা জান্নাতের এমন একটি স্থান, যা আল্লাহর বান্দাদের মধ্যে কেবল একজনের জন্যই উপযুক্ত। আর আমি আশা করি যে, আমিই হবো সেই বান্দা। অতএব, যে আমার জন্য 'ওয়াসীলা' প্রার্থনা করবে, তার জন্য আমার শাফাআত (সুপারিশ) আবশ্যক হয়ে যাবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (10647)


10647 - عن فَضالة بن عُبيد صاحب رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: سمع رسولُ الله صلى الله عليه وسلم رجلًا يدعو في صلاته، لم يُمجّد اللهَ، ولم يُصلِّ على النبي صلى الله عليه وسلم فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"عَجِل هذا" ثم دعاه فقال له، أو لغيره:"إذا صلَّى أحدكم فليبدأ بتمجيد ربه والثناء عليه، ثم يُصَلّي على النبي صلى الله عليه وسلم، ثم يدعو بعد بما شاء".

صحيح: رواه أبو داود (1481)، والترمذي (3477) كلاهما من طريق عبد الله بن يزيد المُقرئ، ثنا حيوة بن شريح، أخبرني أبو هانئ حُميد بن هانئ، أن أبا علي عمرو بن مالك الجَنْبيَّ أخبره، أنه سمع فَضالة بن عبيد فذكر مثله. واللفظ لأبي داود. وإسناده صحيح.




ফাদ্বালাহ ইবনু উবাইদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক ব্যক্তিকে তার সালাতে দুআ করতে শুনলেন। সে আল্লাহর মহিমা বর্ণনা করেনি এবং নবীর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উপর দরূদও পড়েনি। তখন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এ ব্যক্তি দ্রুত করে ফেলেছে।" এরপর তিনি তাকে ডাকলেন এবং তাকে অথবা অন্য কাউকে বললেন: "যখন তোমাদের কেউ সালাত আদায় করে (এবং দুআ করতে চায়), তখন তার উচিত প্রথমে তার রবের মহিমা বর্ণনা করা ও তাঁর প্রশংসা করা, তারপর নবীর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উপর দরূদ পড়া এবং এরপর যা ইচ্ছা দুআ করা।"









আল-জামি` আল-কামিল (10648)


10648 - عن أبي أمامة بن سهل بن حنيف قال: السنة في الصلاة على الجنائز أن يكبر، ثم يقرأ بأم القرآن، ثم يصلى على النبي صلى الله عليه وسلم، ثم يخلص الدعاء للميت، ولا يقرأ إلا في التكبيرة الأولى، ثم يسلم في نفسه عن يمينه.

صحيح: رواه عبد الرزاق (6428) - ومن طريقه ابن الجارود في المنتقى (540) - عن معمر، عن الزهري قال: سمعت أبا أمامة بن سهل بن حنيف يحدث ابن المسيب قال فذكره. وإسناده صحيح.

وصحّحه أيضا ابن القيم في جلاء الأفهام (ص 193).

وأبو أمامة هو: أسعد بن سهل بن حُنيف الأنصاري، وُلِد في حياة النبي صلى الله عليه وسلم، ولم يسمع منه، فروايته عن النبي صلى الله عليه وسلم من باب مراسيل الصحابة. وهي مقبولة باتفاق أهل العلم.

وللحديث طرق أخرى مذكورة في كتاب الجنائز.




আবূ উমামা ইবনু সাহল ইবনু হুনাইফ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: জানাযার সালাতের সুন্নাত হলো এই যে, তিনি তাকবীর বলবেন, তারপর উম্মুল কুরআন (সূরা ফাতিহা) পাঠ করবেন, তারপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর প্রতি সালাত (দরূদ) পাঠ করবেন, তারপর একনিষ্ঠভাবে মাইয়্যেতের (মৃত ব্যক্তির) জন্য দু‘আ করবেন। আর তিনি প্রথম তাকবীর ছাড়া আর কোনো (কিছুর) তিলাওয়াত করবেন না, তারপর তিনি নীরবে ডানদিকে সালাম ফেরাবেন।









আল-জামি` আল-কামিল (10649)


10649 - عن عبد الرحمن بن عبدٍ القاري - وكان في عهد عمر بن الخطاب مع عبد الله بن الأرقم على بيت المال - أن عمر خرج ليلة في رمضان، فخرج معه عبد الرحمن بن عبدٍ القاري، فطاف بالمسجد، وأهل المسجد أوزاع متفرقون، يصلي الرجل لنفسه، ويصلي الرجل فيصلي بصلاته الرهط، فقال عمر: والله! إني أظن لو جمعنا هؤلاء على قارئ واحد لكان أمثل، ثم عزم عمر على ذلك، وأمر أبي بن كعب أن يقوم لهم في رمضان، فخرج عمر عليهم، والناس يصلون بصلاة قارئهم فقال عمر: نعم البدعة هي، والتي تنامون عنها أفضل من التي تقومون - يريد آخر الليل - فكان الناس يقومون أوله، وكانوا يلعنون الكفرة في النصف: اللهم! قاتل الكفرة الذين
يصدون عن سبيلك، ويكذبون رسلك، ولا يؤمنون بوعدك، وخالف بين كلمتهم، وألق في قلوبهم الرعب، وألق عليهم رجزك وعذابك إله الحق، ثم يصلي على النبي صلى الله عليه وسلم، ويدعو للمسلمين بما استطاع من خير، ثم يستغفر للمؤمنين.

قال: وكان يقول إذا فرغ من لعنة الكفرة وصلاته على النبي واستغفاره للمؤمنين والمؤمنات ومسألته:"اللهم! إياك نعبد، ولك نصلي ونسجد، وإليك نسعى ونحفد، ونرجو رحمتك ربنا، ونخاف عذابك الجد، إن عذابك لمن عاديت ملحق، ثم يكبر ويهوى ساجدا".

صحيح: رواه ابن خزيمة (1100) عن الربيع بن سليمان المرادي، نا عبد الله بن وهب، أخبرني يونس، عن ابن شهاب، أخبرني عروة بن الزبير، عن عبد الرحمن بن عبد القاري فذكره.

ورواه البخاري (2010) من طريق ابن شهاب به الجزء الأول منه إلى قوله:"وكان الناس يقومون أوله".




আবদুর রহমান ইবনে আব্দিল ক্বারী থেকে বর্ণিত—তিনি উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর শাসনামলে আব্দুল্লাহ ইবনুল আরকামের সাথে বাইতুল মালের (কোষাগারের) দায়িত্বে ছিলেন—তিনি বলেন, এক রাতে রমযান মাসে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বের হলেন। আবদুর রহমান ইবনে আব্দিল ক্বারীও তাঁর সাথে বের হলেন। তিনি মসজিদ প্রদক্ষিণ করলেন। মসজিদের লোকেরা বিচ্ছিন্ন ও বিক্ষিপ্ত অবস্থায় ছিল। কেউ একা সালাত পড়ছিল, আবার কেউ সালাত পড়লে একটি ছোট দল তার সাথে সালাত আদায় করছিল। তখন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহর কসম! আমি মনে করি, যদি আমি এই লোকগুলোকে একজন ক্বারীর (ইমামের) পেছনে একত্র করে দেই, তবে তা সর্বোত্তম হবে। এরপর উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সেই সিদ্ধান্ত নিলেন এবং উবাই ইবনে কা'বকে নির্দেশ দিলেন যে তিনি যেন রমযানে তাদের নিয়ে (জামায়াতে) সালাত আদায় করান।

এরপর একদিন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাদের কাছে বের হলেন, আর লোকেরা তাদের ক্বারীর সাথে সালাত আদায় করছিল। তখন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: এই কতই না চমৎকার বিদ'আত! আর তোমরা রাতের যে অংশটুকু ঘুমিয়ে থাকো, তা জেগে সালাত আদায়ের অংশটুকু থেকে উত্তম—তিনি রাতের শেষ অংশকে বোঝাতে চাইলেন। লোকেরা রাতের প্রথম অংশে (সালাত) আদায় করত, আর রাতের মধ্যভাগে তারা কাফিরদের প্রতি অভিশাপ করত (অর্থাৎ কুনুতে): "হে আল্লাহ! তুমি সেই কাফিরদের বিরুদ্ধে যুদ্ধ করো, যারা তোমার পথ থেকে বাধা দেয়, তোমার রাসূলদের মিথ্যা প্রতিপন্ন করে, তোমার প্রতিশ্রুতির উপর ঈমান আনে না। তাদের মধ্যে বিভেদ সৃষ্টি করো, তাদের হৃদয়ে ভয় ঢুকিয়ে দাও এবং তাদের উপর তোমার গজব ও শাস্তি বর্ষণ করো, হে সত্য ইলাহ!"

এরপর তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উপর সালাত (দরুদ) পড়তেন এবং মুসলিমদের জন্য যথাসম্ভব কল্যাণের দু'আ করতেন। তারপর মুমিনদের জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করতেন।

তিনি (আব্দুর রহমান) আরও বলেন: যখন তিনি কাফিরদের উপর অভিশাপ করা, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উপর দরুদ পাঠ করা, মুমিন-মুমিনাদের জন্য ইস্তিগফার (ক্ষমা প্রার্থনা) করা এবং প্রার্থনা করা শেষ করতেন, তখন তিনি বলতেন: "হে আল্লাহ! আমরা কেবল তোমারই ইবাদত করি, তোমারই জন্য সালাত আদায় করি এবং সিজদা করি। আমরা তোমারই দিকে দ্রুত অগ্রসর হই এবং কঠোর পরিশ্রম করি। হে আমাদের রব! আমরা তোমার দয়ার আশা করি এবং তোমার কঠোর শাস্তিকে ভয় করি। নিশ্চয়ই তোমার শাস্তি তাদের উপর আপতিত হবে, যাদের সাথে তুমি শত্রুতা করো।" অতঃপর তিনি তাকবীর বলে সিজদায় যেতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (10650)


10650 - عن أبي حميد أو أبي أسيد الأنصاري قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: إذا دخل أحدكم المسجد فليسلم على النبي صلى الله عليه وسلم ثم ليقل:"اللهم! افتح لي أبواب رحمتك"، فإذا خرج فليقل:"اللهم إني أسألك من فضلك".

صحيح: رواه أبو داود (465)، وابن ماجه (772)، والبيهقي (2/ 441 - 442)، وصحّحه ابن حبان (2048) كلهم من طرق، عن ربيعة بن أبي عبد الرحمن، عن عبد الملك بن سعيد بن سويد، عن أبي حميد أو أبي أسيد فذكره. إلا أنه ليس في رواية ابن ماجه ذكر أبي أسيد. وإسناده صحيح.

ورواه مسلم (713) عن ربيعة به إلا أنه ليس عنده لفظ التسليم.

قال البيهقي:"ولفظ التسليم فيه محفوظ".

وثبت عن كعب الأحبار أنه قال: يا أبا هريرة! احفظ مني اثنين، أوصيك بهما: إذا دخلت المسجد فصل على النبي صلى الله عليه وسلم وقل:"اللهم! افتح لي أبواب رحمتك"، وإذا خرجت من المسجد فصل على النبي صلى الله عليه وسلم وقل:"اللهم! احفظني من الشيطان".

رواه النسائي في عمل اليوم والليلة (91) بإسناد جيد.

وقد روي مرفوعا، والصواب وقفه كما هو مبسوط في كتاب الصلاة.

ورُوي الصلاة على النبي صلى الله عليه وسلم عند دخول المسجد والخروج منه من حديث فاطمة عند الترمذي (314)، وابن ماجه (771)، وإسناده منقطع.




আবু হুমাইদ অথবা আবু উসাইদ আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যখন তোমাদের কেউ মাসজিদে প্রবেশ করে, তখন সে যেন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর প্রতি সালাম পেশ করে। এরপর সে যেন বলে: "আল্লাহুম্মা! ইফতা’হ লী আবওয়াবা রাহমাতিক" (অর্থাৎ, হে আল্লাহ! আমার জন্য আপনার দয়ার দরজাগুলো উন্মুক্ত করে দিন)। আর যখন সে বের হয়, তখন সে যেন বলে: "আল্লাহুম্মা ইন্নি আসআলুকা মিন ফাদলিক" (অর্থাৎ, হে আল্লাহ! আমি আপনার অনুগ্রহ চাই)।









আল-জামি` আল-কামিল (10651)


10651 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"ما قعد قوم مقعدا لا يذكرون فيه الله عز وجل، ويصلون على النبي إلا كان عليهم حسرة يوم القيامة وإن دخلوا الجنة للثواب".

صحيح: رواه أحمد (9965)، وصحّحه ابن حبان (591، 592) كلاهما من حديث عبد الرحمن بن مهدي، عن شعبة، عن الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرة فذكره. وإسناده صحيح.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: যখনই কোনো সম্প্রদায় কোনো মজলিসে বসে আর সেখানে আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লার যিকির করে না এবং নবীর উপর সালাত (দরূদ) পড়ে না, তবে তা তাদের জন্য কিয়ামতের দিন আফসোস হবে, যদিও তারা সওয়াবের কারণে জান্নাতে প্রবেশ করে।









আল-জামি` আল-কামিল (10652)


10652 - عن جابر قال قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما اجتمع قوم ثم تفرقوا عن غير ذكر الله وصلاة على النبي صلى الله عليه وسلم إلا قاموا عن أنتن جيفة".

حسن: رواه الطيالسي (1863) - ومن طريقه النسائي في عمل اليوم والليلة (411) - عن يزيد بن إبراهيم التستري، عن أبي الزبير، عن جابر فذكره.

وإسناده حسن من أجل أبي الزبير.

وقال ابن القيم في جلاء الأفهم (ص 175):"قال أبو عبد الله المقدسي - وهو الضياء صاحب المختارة -:"هذا عندي على شرط مسلم".




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যখন কোনো দল একত্রিত হয় এবং অতঃপর তারা আল্লাহর স্মরণ ও নবীর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উপর দরূদ পাঠ করা ব্যতীত বিচ্ছিন্ন হয়, তখন তারা যেন নিকৃষ্টতম মৃতদেহ (লাশ) থেকে উঠে দাঁড়াল।









আল-জামি` আল-কামিল (10653)


10653 - عن أوس بن أوس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنَّ من أفضل أيامكم يوم الجمعة، فيه خلق آدم، وفيه قبض، وفيه النفخة، وفيه الصعقة، فأكثروا عليَّ من الصلاة فيه، فإنَّ صلاتكم معروضة عليَّ". قال: قالوا: يا رسول الله! كيف تُعرض صلاتنا عليك وقد أَرِمتَ؟ يقولون: بَليتَ؟ فقال:"إنَّ الله عز وجل حرَّمَ على الأرض أجسادَ الأنبياء".

صحيح: رواه أبو داود (1047) والنسائي (1374) وابن ماجه (1636) وصحّحه ابن خزيمة (1733)، وابن حبان (910) والحاكم (1/ 278) كلّهم من طريق عبد الرحمن بن يزيد بن جابر، عن أبي الأشعث الصنعاني، عن أوس بن أوس، فذكره. وإسناده صحيح.

وصحّحه النووي في"الأذكار" (97) وقد أُعلَّ هذا الحديث بما لا يقدح في صحَّته، انظر"جلاء الأفهام" (66 - 67).

وقوله:"وفيه الصعقة": أي الغشي والموت.




আওস ইবন আওস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় তোমাদের সর্বোত্তম দিনগুলোর মধ্যে হলো জুমুআর দিন। এ দিনেই আদমকে সৃষ্টি করা হয়েছে, এতেই তাঁর রূহ কবজ করা হবে, এতেই শিঙ্গায় ফুঁক দেওয়া হবে এবং এতেই (সকলে) বেহুশ হয়ে যাবে। অতএব তোমরা সেদিন আমার উপর অধিকহারে দরূদ পাঠ করো। কারণ তোমাদের দরূদ আমার নিকট পেশ করা হয়।" সাহাবীগণ বললেন, "হে আল্লাহর রাসূল! আমাদের দরূদ আপনার নিকট কিভাবে পেশ করা হবে, অথচ আপনি তো পচে গলে যাবেন?" (তারা বলতে চাইলেন: আপনি তো বিলীন হয়ে যাবেন)। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "নিশ্চয় আল্লাহ তাআলা জমিনের জন্য নবীদের দেহকে ভক্ষণ করা হারাম করে দিয়েছেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (10654)


10654 - عن أبي بن كعب قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا ذهب ثلثا الليل قام فقال:"يا أيها الناس اذكروا الله اذكروا الله، جاءت الراجفة تتبعها الرادفة، جاء الموت بما فيه، جاء الموت بما فيه".
قال أبي: قلت: يا رسول الله! إني أكثر الصلاة عليك، فكم أجعل لك من صلاتي؟ فقال:"ما شئت". قال: قلت: الربع؟ . قال:"ما شئت، فإن زدت فهو خير لك، قلت: النصف؟ قال:"ما شئت، فإن زدت فهو خير لك"، قال: قلت: فالثلثين. قال:"ما شئت، فإن زدت فهو خير لك"، قلت: أجعل لك صلاتي كلها، قال:"إذًا تكفي همك، ويغفر لك ذنبك".

حسن: رواه الترمذي (2457)، وأحمد (21241 - 21242)، والحاكم (2/ 421) كلهم من طريق سفيان هو الثوري، عن عبد الله بن محمد بن عقيل، عن الطفيل بن أبي بن كعب، عن أبيه قال فذكره. واللفظ للترمذي.

وإسناده حسن من أجل عبد الله بن محمد بن عقيل فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث ما لم يتبين خطؤه.

وحسنه أيضا الترمذي. وقال الحاكم: صحيح الإسناد.

وكان الصحابة يصلون على النبي صلى الله عليه وسلم في المواطن الأخرى، وكل ذلك خير منها:

1 - في الخطب: فقد روى عبد الله بن أحمد (837) عن منصور بن أبي مزاحم، حدثنا خالد الزيات، حدثني عون بن أبي جحيفة، قال: كان أبي من شرط علي، وكان تحت المنبر، فحدثني أبي: أنه صعد المنبر - يعني عليا - فحمد الله تعالى وأثنى عليه، وصلى على النبي صلى الله عليه وسلم، وقال:"خير هذه الأمة بعد نبيها أبو بكر، والثاني عمر، وقال: يجعل الله تعالى الخير حيث أحب".

وإسناده حسن من أجل خالد الزيات فإنه لا بأس به.

وروي الصلاة على النبي صلى الله عليه وسلم في الخطبة عن ابن مسعود وعمرو بن العاص وأبي موسى الأشعري وغيرهم.

قال ابن القيم في جلاء الأفهام (ص 526):" … إن الصلاة على النبي صلى الله عليه وسلم في الخطب كان أمرا مشهورا معروفا عند الصحابة رضي الله عنهم أجمعين" أهـ.

2 - عند زيارة قبره صلى الله عليه وسلم: فقد روى مالك عن عبد الله بن دينار، عن ابن عمر أنه كان يقف على قبر النبي صلى الله عليه وسلم، فيصلي على النبي صلى الله عليه وسلم، ويدعو لأبي بكر وعمر.

هكذا رواه غير واحد عن مالك كما قال ابن عبد البر في الاستذكار (6/ 262 - 263). وإسناده صحيح.

ورواه يحيى الليثي في الموطأ (399) عن مالك، عن عبد الله بن دينار قال: رأيت عبد الله بن عمر يقف على قبر النبي صلى الله عليه وسلم، فيصلي على النبي صلى الله عليه وسلم وعلى أبي بكر وعمر. وأنكر العلماء على يحيى روايته بهذا اللفظ كما ذكر ابن عبد البر في الاستذكار.

وروي الأثر عن ابن عمر من طرق أخرى منها ما رواه البيهقي في الشعب (3854) من طريق محمد بن عبد الله بن نمير، حدثنا محمد بن بشر، حدثنا عبيد الله، عن نافع، عن ابن عمر أنه كان
إذا قدم من سفر بدأ بقبر النبي صلى الله عليه وسلم فصلى عليه وسلم، ودعا له، ولا يمس القبر، ثم يسلم على أبي بكر، ثم قال: السلام عليك يا أبة.

3 - وعلى الصفا والمروة: روى ابن أبي شيبة في المصنف (30253 - 30254) من طرق عن الشعبي، عن وهب بن الأجدع قال: سمعت عمر يقول: إذا قمتم على الصفا فكبروا سبع تكبيرات، بين كل تكبيرتين حمد الله وثناء عليه، وصلاة الله على النبي صلى الله عليه وسلم ودعاء لنفسك، وعلى المروة مثل ذلك. وإسناده صحيح.

وروى إسماعيل بن إسحاق القاضي في الصلاة على النبي صلى الله عليه وسلم - كما في جلاء الأفهام (ص 537) - عن هدبة بن خالد، ثنا همام بن يحيى، ثنا نافع، أن ابن عمر كان يكبر على الصفا ثلاثا يقول: لا إله إلا الله وحده لا شريك له له الملك وله الحمد وهو على كل شيء قدير، ثم يصلي على النبي صلى الله عليه وسلم، ثم يدعو ويطيل القيام والدعاء، ثم يفعل على المروة مثل ذلك. وإسناده صحيح.

4 - عند الخروج إلى السوق أو إلى دعوة ونحوها: فقد روى ابن أبي شيبة في المصنف (30429) عن وكيع، عن مسعر، عن عامر بن شقيق، عن أبي وائل، قال: ما شهد عبد الله مجمعا، ولا مأدبة فيقوم حتى يحمد الله ويصلي على النبي صلى الله عليه وسلم، وإن كان مما يتبع أغفل مكان في السوق فيجلس فيه فيحمد الله ويصلي على النبي صلى الله عليه وسلم. وإسناده صحيح.




উবাই ইবনে কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন রাতের দুই-তৃতীয়াংশ পার হয়ে যেত, তখন তিনি দাঁড়িয়ে বলতেন: "হে লোক সকল! তোমরা আল্লাহকে স্মরণ করো, আল্লাহকে স্মরণ করো! প্রথম মহা কম্পন (আর-রাজাফা) এসে গেছে, যা দ্বিতীয় মহা কম্পন (আর-রাদিফা) দ্বারা অনুসরণ করা হবে। মৃত্যু তার সব কিছু নিয়ে এসে পড়েছে, মৃত্যু তার সব কিছু নিয়ে এসে পড়েছে।"
উবাই (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি বললাম, ইয়া রাসূলুল্লাহ! আমি আপনার প্রতি অধিক পরিমাণে দরূদ পাঠ করে থাকি। আমি আমার দোয়ার কতটুকু অংশ আপনার দরূদের জন্য নির্দিষ্ট করব? তিনি বললেন: "তোমার যা ইচ্ছা।" আমি বললাম: এক-চতুর্থাংশ? তিনি বললেন: "তোমার যা ইচ্ছা। তবে যদি তুমি বাড়াও, তবে তা তোমার জন্য উত্তম হবে।" আমি বললাম: অর্ধেক? তিনি বললেন: "তোমার যা ইচ্ছা। তবে যদি তুমি বাড়াও, তবে তা তোমার জন্য উত্তম হবে।" তিনি বললেন: আমি বললাম: তাহলে দুই-তৃতীয়াংশ? তিনি বললেন: "তোমার যা ইচ্ছা। তবে যদি তুমি বাড়াও, তবে তা তোমার জন্য উত্তম হবে।" আমি বললাম: আমি আমার সব দোয়াই আপনার দরূদের জন্য নির্দিষ্ট করব? তিনি বললেন: "তাহলে তোমার সব দুশ্চিন্তা থেকে মুক্তি দেওয়া হবে এবং তোমার গুনাহসমূহ মাফ করে দেওয়া হবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (10655)


10655 - عن جابر بن عبد الله أن امرأة قالت للنبي صلى الله عليه وسلم: صلِّ علي وعلى زوجي، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"صلى اللهُ عليكِ، وعلى زوجكِ".

صحيح: رواه أبو داود (1533)، وأحمد (15281)، والنسائي في عمل اليوم والليلة (423)، وصحّحه ابن حبان (916، 918) كلهم من طريق الأسود بن قيس، عن نبيح العنزي، عن جابر بن عبد الله فذكره. وسياق أحمد أطول. وإسناده صحيح.

وقوله:"صلى الله عليكِ وعلى زوجكِ" أي رَحِمَ الله عليكِ وعلى زوجكِ.




জাবির ইবন আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে এক মহিলা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বললেন: "আপনি আমার ও আমার স্বামীর জন্য দু'আ করুন।" তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আল্লাহ তোমার ও তোমার স্বামীর উপর রহমত বর্ষণ করুন।"









আল-জামি` আল-কামিল (10656)


10656 - عن عبد الله بن أبي أوفى قال: كان النبي صلى الله عليه وسلم إذا أتاه قوم بصدقتهم قال:"اللهم! صلِّ على آل فلان"، فأتاه أبي بصدقته فقال:"اللهم! صلِّ على آل أبي أوفى".

متفق عليه: رواه البخاري في الزكاة (1497)، ومسلم في الزكاة (1078) كلاهما من طريق شعبة، عن عمرو بن مرة، عن عبد الله بن أبي أوفى فذكره.

فقه الباب:

يُصلى ويُسلم على سائر الأنبياء والمرسلين قال تعالى عن نوح عليه السلام: {وَتَرَكْنَا عَلَيْهِ فِي الْآخِرِينَ (78) سَلَامٌ عَلَى نُوحٍ فِي الْعَالَمِينَ (79)} [الصافات: 78، 79].
وقال عن إبراهيم: {وَتَرَكْنَا عَلَيْهِ فِي الْآخِرِينَ (108) سَلَامٌ عَلَى إِبْرَاهِيمَ} [الصافات: 108، 109].

وقال تعالى في موسى وهارون: {وَتَرَكْنَا عَلَيْهِمَا فِي الْآخِرِينَ (119) سَلَامٌ عَلَى مُوسَى وَهَارُونَ} [الصافات: 119، 120].

ورُوي في الصلاة على سائر الأنبياء والمرسلين أحاديث، وفي سندها مقال، وقد حكى النووي وغيره الإجماع على أن الصلاة على جميع النبيين مشروعة. انظر: جلاء الأفهام (ص 635).

وأما غير الأنبياء فلا بأس بالصلاة عليهم أحيانا ما لم يتخذ ذلك عادة. قال ابن القيم في جلاء الأفهام (ص 663 - 664):"وفصل الخطاب في هذه المسألة أن الصلاة على غير النبي صلى الله عليه وسلم، إما أن تكون على آله وأزواجه وذريته أو غيرهم، فإن كان الأول، فالصلاة عليهم مشروعة مع الصلاة على النبي صلى الله عليه وسلم، وجائزة مفردة.

وأما الثاني فإن كان الملائكة وأهل الطاعة عموما الذين يدخل فيهم الأنبياء كلهم وغيرهم، جاز ذلك أيضا، فيقال: اللهم صل على ملائكتك المقربين، وأهل طاعتك أجمعين. وإن كان شخصا معينا، أو طائفة معينة كره أن يتخذ الصلاة عليه شعارا لا يخل به، ولو قيل بتحريمه لكان له وجه، ولا سيما إذا جعلها شعارا له، ومنع منها نظيره، أو من هو خير منه، وهذا كما تفعل الرافضة بعلي فإنهم حيث ذكروه قالوا: عليه الصلاة والسلام، ولا يقولون ذلك فيمن هو خير منه، فهذا ممنوع لا سيما إذا اتخذ شعارا لا يحل به، فتركه حينئذ متعين. وأما إن صلى عليه أحيانا بحيث لا يجعل ذلك شعارا كما صلي على دافع الزكاة، … وكما صلى النبي صلى الله عليه وسلم على المرأة وزوجها … فهذا لا بأس به. وبهذا التفصيل تتفق الأدلة وينكشف وجه الصواب والله الموفق" انتهى.




আব্দুল্লাহ ইবনে আবি আওফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট যখন কোনো সম্প্রদায় তাদের সাদকা (যাকাত) নিয়ে আসত, তখন তিনি বলতেন: "হে আল্লাহ! অমুকদের পরিবারের উপর রহমত বর্ষণ করুন।" অতঃপর আমার পিতা তাঁর সাদকা নিয়ে তাঁর কাছে আসলেন, তখন তিনি (নবী) বললেন: "হে আল্লাহ! আবু আওফার পরিবারের উপর রহমত বর্ষণ করুন।"









আল-জামি` আল-কামিল (10657)


10657 - عن النعمان بن بشير، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"الدعاء هو العبادة" ثم قرأ: {وَقَالَ رَبُّكُمُ ادْعُونِي أَسْتَجِبْ لَكُمْ إِنَّ الَّذِينَ يَسْتَكْبِرُونَ عَنْ عِبَادَتِي سَيَدْخُلُونَ جَهَنَّمَ دَاخِرِينَ} [سورة غافر: 60].

صحيح: رواه أبو داود (1479)، والترمذي (3372)، وابن ماجه (3828)، وأحمد (18352)، وصحّحه ابن حبان (890)، والحاكم (1/ 490 - 491) كلهم من طرق عن ذر بن عبد الله الهمداني، عن يُسيع الحضرمي، عن النعمان بن بشير فذكره. وإسناده صحيح.

وقال الترمذي:"هذا حديث حسن صحيح".

وقال الحاكم:"صحيح الإسناد".

وروى الحاكم (1/ 491) - وصحّحه - بإسنادين عن ابن عباس قال: أفضل العبادة هو الدعاء وقرأ: {وَقَالَ رَبُّكُمُ ادْعُونِي أَسْتَجِبْ لَكُمْ إِنَّ الَّذِينَ يَسْتَكْبِرُونَ عَنْ عِبَادَتِي سَيَدْخُلُونَ جَهَنَّمَ دَاخِرِينَ}.

وأما ما روي عن أنس بن مالك أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"الدعاء مخ العبادة". فهو ضعيف. رواه الترمذي (3371)، والطبراني في الأوسط (3220)، والدعاء (8) كلاهما من طريق ابن لهيعة، عن عبيد الله بن أبي جعفر، عن أبان بن صالح، عن أنس بن مالك فذكره.

وقال الترمذي:"غريب من هذا الوجه، لا نعرفه إلا من حديث ابن لهيعة".

وابن لهيعة سيء الحفظ فأخطأ في هذا الحديث فقال:"الدعاء مخ العبادة". والصحيح:"الدعاء هو العبادة" فإنه ليس للدعاء مخ بل الدعاء كله عبادة.




নু'মান ইবনু বাশীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "দোয়া হলো ইবাদত।" অতঃপর তিনি এই আয়াতটি তিলাওয়াত করলেন: "আর তোমাদের রব বলেছেন, তোমরা আমাকে ডাকো, আমি তোমাদের ডাকে সাড়া দেব। নিশ্চয়ই যারা অহংকারবশত আমার ইবাদত থেকে মুখ ফিরিয়ে নেয়, তারা অচিরেই লাঞ্ছিত হয়ে জাহান্নামে প্রবেশ করবে।" (সূরা গাফির: ৬০)।









আল-জামি` আল-কামিল (10658)


10658 - عن أبي هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"ليس شيء أكرم على الله تعالى من الدعاء".

حسن: رواه الترمذي (3370)، وابن ما جه (3829)، وأحمد (7848)، وصحّحه ابن حبان (870)، والحاكم (1/ 490) كلهم من طرق، عن عمران القطان، عن قتادة، عن سعيد بن أبي الحسن، عن أبي هريرة فذكره.

وإسناده حسن من أجل عمران القطان وهو ابن داور البصري وهو مختلف فيه إلا أنه حسن الحديث إذا لم يخالف.
وقال الترمذي:"حديث حسن غريب". وفي نسخة:"حديث غريب".

وقال ابن القطان الفاسي في بيان الوهم والإيهام (3/ 614) بعد أن نقل تحسين الترمذي إياه:"ولا موضع في الإسناد للنظر إلا عمران بن داور القطان وهو رجل ما بحديثه بأس".

وقال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد".




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আল্লাহর কাছে দু’আর চেয়ে অধিক সম্মানিত (মর্যাদাপূর্ণ) আর কিছুই নেই।









আল-জামি` আল-কামিল (10659)


10659 - عن أبي هريرة قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم:"يقول الله تعالى: أنا عند ظن عبدي بي، وأنا معه إذا ذكرني …".

وفي رواية:"إن الله عز وجل يقول: أنا عند ظن عبدي بي، وأنا معه إذا دعاني".

متفق عليه: رواه البخاري في التوحيد (7405)، ومسلم في الذكر والدعاء (2675: 2) كلاهما من طريق الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرة فذكره باللفظ الأول.

واللفظ الآخر: رواه مسلم في الذكر والدعاء (2675: 19) عن أبي كريب محمد بن العلاء، ثنا وكيع، عن جعفر بن برقان، عن يزيد بن الأصم، عن أبي هريرة فذكره.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আল্লাহ তাআলা বলেন: আমি আমার বান্দার ধারণা অনুযায়ী থাকি এবং যখন সে আমাকে স্মরণ করে, আমি তার সাথেই থাকি...

অন্য এক বর্ণনায় (আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লা) বলেন: আমি আমার বান্দার ধারণা অনুযায়ী থাকি এবং যখন সে আমাকে ডাকে (দোয়া করে), আমি তার সাথেই থাকি।

(হাদীসটি) মুত্তাফাকুন আলাইহি।









আল-জামি` আল-কামিল (10660)


10660 - عن أنس بن مالك أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"يقول الله: أنا عند ظن عبدي بي، وأنا معه إذا دعاني".

صحيح: رواه أحمد (13192)، وأبو يعلى (3232) كلاهما من حديث أبي داود سليمان (هو الطيالسي)، حدثنا شعبة، حدثنا قتادة، عن أنس بن مالك فذكره. وإسناده صحيح.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আল্লাহ তাআলা বলেন: আমি আমার বান্দার ধারণা (আশা) অনুযায়ী থাকি যা সে আমার প্রতি পোষণ করে, আর যখন সে আমাকে ডাকে, আমি তার সাথে থাকি।"