আল-জামি` আল-কামিল
10341 - عن أنس بن مالك قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"الإيمان يمان" هكذا إلى لخم وجذام.
حسن: رواه أحمد (13346) عن عليّ بن عَيَّاش (هو الألهاني)، حَدَّثَنَا محمد بن مهاجر، عن عروة بن رويم قال: أقبل أنس بن مالك إلى معاوية بن أبي سفيان وهو بدمشق قال: فدخل عليه، فقال له معاوية: حَدَّثَنِي بحديث سمعته من نبي الله صلى الله عليه وسلم ليس بينك وبينه أحد. قال: قال أنس: فذكره.
وإسناده حسن من أجل عروة بن رويم اللخمي فإنه حسن الحديث.
وجاء تصريحه بالسماع عن أنس عند البخاريّ في تاريخه (5/ 87 - 88).
قال الهيثميّ في"المجمع" (10/ 55):"رواه أحمد ورجاله رجال الصَّحيح خلا عروة بن رويم وهو ثقة".
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “ঈমান হলো ইয়ামানী।” তিনি এভাবে লাخم ও জুযামের দিকেও ইঙ্গিত করলেন।
10342 - عن عتبة بن عبد أن رجلًا قال: يا رسول الله! العن أهل اليمن، فإنهم شديد بأسهم، كثير عددهم، حصينة حصونهم، فقال:"لا" ثمّ لعن رسول الله صلى الله عليه وسلم الأعجميين فارس والروم، وقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا مر بكم أهل اليمن يسوقون نساءهم ويحملون أبناءهم على عواتقهم فإنهم مني وأنا منهم".
حسن: رواه أحمد (17647)، والطَّبرانيّ في الكبير (17/ 123) كلاهما من طريق بقية بن الوليد، حَدَّثَنِي بحير بن سعد، عن خالد بن معدان، عن عتبة بن عبد قال: فذكره.
ورواه الطبرانيّ أيضًا في مسند الشاميين (1139) عن أحمد بن عبد الوهّاب بن نجدة، عن أبيه، ثنا إسماعيل بن عَيَّاش، عن بحير بن سعد به مثله.
وإسناده حسن من أجل بقية بن الوليد فإنه حسن الحديث إذا صرَّح بالسماع.
قال الهيثميّ في"المجمع" (10/ 56):"رواه أحمد والطَّبرانيّ وإسنادهما حسن، فقد صرَّح بقية بالسماع".
উতবাহ ইবনে আবদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি বলল: হে আল্লাহর রাসূল! ইয়েমেনবাসীদের প্রতি লা'নত করুন, কারণ তারা ভীষণ শক্তিশালী, তাদের সংখ্যা অনেক এবং তাদের দুর্গগুলো সুরক্ষিত। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "না।" এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দুই অনারব জাতি ফারিস (পারস্য) ও রোমের প্রতি লা'নত করলেন। আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যখন তোমরা ইয়েমেনবাসীদের তোমাদের পাশ দিয়ে যেতে দেখবে—তারা তাদের স্ত্রীদের (সাথে করে) হাঁকাচ্ছে এবং তাদের সন্তানদের কাঁধে বহন করছে—তখন (জেনে রাখো) তারা আমার থেকে আর আমি তাদের থেকে।"
10343 - عن ابن عباس قال: لما نزلت: {إِذَا جَاءَ نَصْرُ اللَّهِ وَالْفَتْحُ} حتَّى ختم السورة قال: نعيت لرسول الله صلى الله عليه وسلم نفسه حين نزلت، قال: فأخذ بأشد ما كان قطّ اجتهادا في أمر الآخرة، وقال رسول الله صلى الله عليه وسلم بعد ذلك:"جاء الفتح ونصر الله وجاء أهل اليمن" فقال رجل: يا رسول الله! وما أهل اليمن؟ قال:"قوم رقيقة قلوبهم، لينة قلوبهم، الإيمان يمان والفقه يمان".
حسن: رواه الطبرانيّ في الكبير (11/ 328 - 329) عن زكريا بن يحيى الساجي، ثنا أبو الكامل الجحدري، ثنا أبو عوانة، عن هلال بن خباب، عن عكرمة، عن ابن عباس قال: فذكره.
ورواه من طريق آخر (11904) عن هلال بن خباب بهذا الإسناد وزاد فيه:"والحكمة يمانية".
وإسناده حسن من أجل هلال بن خباب فإنه حسن الحديث.
قال الهيثميّ في"المجمع" (9/ 22 - 23):"رواه الطبرانيّ في الكبير والأوسط بأسانيد وزاد"والحكمة يمانية" وأحد أسانيده رجاله رجال الصَّحيح.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন সূরা ‘ইযা জা-আ নাসরুল্লাহি ওয়াল ফাত্হ’ শেষ পর্যন্ত নাযিল হলো, তখন এই সূরা নাযিলের মাধ্যমে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে তাঁর নিজের মৃত্যুর খবর জানানো হয়েছিল। তিনি বলেন: তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আখিরাতের বিষয়ে সবচেয়ে বেশি প্রচেষ্টা ও কঠোরতা অবলম্বন করলেন, যা তিনি আগে কখনো করেননি। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "বিজয় এসেছে, আল্লাহর সাহায্য এসেছে এবং ইয়েমেনের লোকেরা এসেছে।" তখন একজন লোক জিজ্ঞেস করল: "হে আল্লাহর রাসূল! ইয়েমেনের লোক কারা?" তিনি বললেন: "তারা এমন এক সম্প্রদায় যাদের অন্তর কোমল, যাদের হৃদয় নরম। ঈমান হলো ইয়েমেনের, আর ফিকহ (ধর্মীয় গভীর জ্ঞান) হলো ইয়েমেনের।"
10344 - عن جابر قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يومًا، ونظر إلى الشام فقال:"اللَّهم أقبل بقلوبهم" ونظر إلى العراق فقال نحو ذلك، ونظر قبل كل أفق، ففعل ذلك، وقال:"اللهم ارزقنا من ثمرات الأرض، وبارك لنا في مدنا وصاعنا".
حسن: رواه أحمد (14690) عن حسن (هو ابن موسى الأشيب)، حَدَّثَنَا ابن لهيعة، حَدَّثَنَا أبو الزُّبير، عن جابر قال: فذكره.
وإسناده حسن من أجل ابن لهيعة فإنه حسن الحديث إذا روى عنه العبادلة وقتيبة بن سعيد فقد رواه عبد الله بن وهب عن ابن لهيعة بهذا الإسناد مثله عند ابن عساكر في تاريخه (1/ 281).
ورواه البخاريّ في الأدب المفرد (482)، والبزّار في كشف الأستار (1184) كلاهما من طريق إسماعيل بن أبي أويس قال: حَدَّثَنِي ابن أبي الزّناد، عن موسى بن عقبة، عن أبي الزُّبير، عن جابر به مثله إِلَّا أن فيه: نظر نحو"اليمن" بدل"الشام" فقال:"اللهم أقبل بقلوبهم". الحديث.
وإسناده حسن من أجل إسماعيل بن أبي أويس فإنه حسن الحديث.
قال الهيثميّ في"المجمع" (3/ 304):"رواه أحمد والبزّار وإسناده حسن".
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি একদিন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি যে, তিনি শামের (সিরিয়ার) দিকে তাকালেন এবং বললেন: "হে আল্লাহ! তাদের অন্তরসমূহ (কল্যাণের দিকে) ফিরিয়ে দিন।" তিনি ইরাকের দিকে তাকালেন এবং অনুরূপ কথা বললেন। তিনি প্রতিটি দিগন্তের দিকে তাকালেন এবং সেই কাজটি করলেন, আর বললেন: "হে আল্লাহ! আমাদেরকে যমীনের ফল-ফসল থেকে রিযিক দান করুন এবং আমাদের মুদ ও সা' (পরিমাপের পাত্র)-তে আমাদের জন্য বরকত দান করুন।"
10345 - عن أنس بن مالك: أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم نظر قبل العراق والشام واليمن، فقال:"اللهم أقبل بقلوبهم على طاعتك، وحُطْ من ورائهم".
صحيح: رواه الطبرانيّ في الأوسط (3039)، وفي الصغير (373) عن إسحاق بن خالويه الواسطي، قال: حَدَّثَنَا عليّ بن بحر بن بري، حَدَّثَنَا هشام بن يوسف الصنعاني، أخبرنا معمر، حَدَّثَنَا ثابت البناني، وسليمان التيمي، عن أنس بن مالك قال: فذكره. وإسناده صحيح.
وقال الهيثميّ في"المجمع" (10/ 75): رواه الطبرانيّ في الصغير والأوسط ورجاله رجال الصَّحيح، غير عليّ بن بحر بن بري وهو ثقة.
وشيخ الطبرانيّ إسحاق بن خالويه الواسطي وثّقه الدَّارقطنيّ كما في سؤالات السهمي (188).
قوله:"حُطْ من ورائهم" أي: احفظهم مأخوذ من حاط يحوط إذا حفظه وصانه.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইরাক, শাম (সিরিয়া) ও ইয়েমেনের দিকে তাকালেন এবং বললেন: "হে আল্লাহ! আপনি তাদের অন্তরসমূহকে আপনার আনুগত্যের দিকে ফিরিয়ে দিন এবং তাদের পেছন দিক থেকে রক্ষা করুন।"
10346 - عن زيد بن ثابت قال: نظر رسول الله صلى الله عليه وسلم قبل اليمن فقال:"اللهم! أقبل بقلوبهم" ونظر قبل العراق فقال:"اللهم! أقبل بقلوبهم" ونظر قبل الشام فقال:"اللهم! أقبل بقلوبهم وبارك لنا في صاعنا ومدنا".
حسن: رواه الترمذيّ (3934)، وأحمد (21610)، والطَّبرانيّ في الكبير (5/ 124) كلّهم من طرق عن عمران القطان، عن قتادة، عن زيد بن ثابت فذكره.
وإسناده حسن من أجل عمران بن داور القطان فإنه اختلف فيه أهل العلم فيه إِلَّا أنه حسن الحديث إذا لم يخالف أو يأتي بما ينكر، وقد توبع.
تابعه حجَّاج بن حجَّاج الباهلي عن قتادة كما ذكره المزي في تحفة الأشراف (3/ 207). قال الترمذيّ: هذا حديث حسن غريب.
وفي الباب عن جبير بن مطعم قال: بينا نحن مع رسول الله صلى الله عليه وسلم بطريق مكة إذ قال:"يطلع عليكم أهل اليمن كأنهم السحاب، هم خيار من في الأرض"، فقال رجل من الأنصار: ولا نحن يا رسول الله؟ فسكت، قال: ولا نحن يا رسول الله؟ فسكت، قال: ولا نحن يا رسول الله؟ فقال في الثالثة كلمة ضعيفة:"إِلَّا أنتم".
رواه أحمد (16779)، وابن أبي شيبة (33103) عن يزيد بن هارون، قال: أخبرنا ابن أبي ذئب، عن الحارث بن عبد الرحمن، عن محمد بن جبير بن مطعم، عن أبيه قال: فذكره.
والحارث بن عبد الرحمن هو القرشي العامري خال ابن أبي ذئب لم يرو عنه غير ابن أخته محمد بن عبد الرحمن بن أبي ذئب لذا حكم عليه ابن المديني بأنه"مجهول" وقال أحمد والنسائي ليس به بأس. ومع هذا كله فإنه قد تفرّد بهذا الحديث وهو ليس ممن يقبل تفرده.
وفي الباب عن عبد الله بن عباس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"يخرج من عدن أبين اثنا عشر ألفا ينصرون الله ورسوله، هم خير من بيني وبينهم".
رواه أحمد (3079) عن عبد الرزّاق، عن المنذر بن نعمان الأفطس، قال: سمعت وهبا يحدث عن ابن عباس قال: فذكر الحديث.
وقال: قال لي معمر: اذهب فاسأله عن هذا الحديث.
والمنذر بن النعمان الأفطس تفرّد بهذا الحديث ولم يوثّقه غير ابن معين كما في الجرح والتعديل (8/ 242).
وقول معمر في آخر الحديث يدل على أن في المتن نكارة. والله أعلم بالصواب.
যায়েদ ইবনে ছাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইয়ামানের দিকে তাকালেন এবং বললেন, "হে আল্লাহ! তাদের অন্তরগুলোকে (কল্যাণের দিকে) ফিরিয়ে দিন।" আর তিনি ইরাকের দিকে তাকালেন এবং বললেন, "হে আল্লাহ! তাদের অন্তরগুলোকে (কল্যাণের দিকে) ফিরিয়ে দিন।" আর তিনি সিরিয়ার (শাম) দিকে তাকালেন এবং বললেন, "হে আল্লাহ! তাদের অন্তরগুলোকে (কল্যাণের দিকে) ফিরিয়ে দিন এবং আমাদের সা' ও মুদ-এর মধ্যে বরকত দিন।"
10347 - عن أبي برزة قال: بعث رسول الله صلى الله عليه وسلم رجلًا إلى حي من أحياء العرب، فسبوه وضربوه، فجاء إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فأخبره فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لو أن أهل عمان أتيت، ما سبوك ولا ضربوك".
صحيح: رواه مسلم في فضائل الصّحابة (228: 2544) عن سعيد بن منصور، حَدَّثَنَا مهدي بن
ميمون، عن أبي الوازع جابر بن عمرو الراسبي: سمعت أبا برزة يقول: فذكره.
وقوله:"عمان" بضم العين وتخفيف الميم وهي: مدينة بالبحرين وحكى القاضي: أن منهم من ضبطه بفتح العين وتشديد الميم يعني عمان البلقاء وهذا غلط.
আবু বারযাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আরবের গোত্রসমূহের মধ্য থেকে একটি গোত্রের নিকট একজন লোককে প্রেরণ করলেন। তারা তাকে গালি দিল এবং মারধর করল। অতঃপর সে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে তাঁকে অবহিত করল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "যদি তুমি ওমানের (বা উম্মানের) অধিবাসীদের নিকট যেতে, তবে তারা তোমাকে গালিও দিত না এবং প্রহারও করত না।"
10348 - عن أبي ذرّ قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنَّكم ستفتحون مصر، وهي أرض يسمى فيها القيراط، فإذا فتحتموها فأحسنوا إلى أهلها، فإن لهم ذمة ورحما - أو قال: ذمة وصهرا - فإذا رأيت رجلين يختصمان فيهما في موضع لبنة فاخرج منها".
فرأيت عبد الرحمن بن شرحبيل بن حسنة وأخاه ربيعة يختصمان في موضع لبنة، فخرجت منها.
صحيح: رواه مسلم في فضائل الصّحابة (2543: 227) عن زهير بن حرب وعبد الله بن سعيد قالا: حَدَّثَنَا وهب بن جرير، حَدَّثَنَا أبي، سمعت حرملة المصري، يحدث عن عبد الرحمن بن شماسة، عن أبي بصرة، عن أبي ذرّ فذكره.
قوله:"ذمة ورحما" يعني بالرحم أن أم إسماعيل (هاجر) كانت منهم.
وقوله:"ذمة وصهرا" يعني بالصهر أن أم إبراهيم بن محمد صلى الله عليه وسلم (مارية القبطية) كانت منهم.
আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই তোমরা মিসর জয় করবে। এটি এমন একটি ভূমি যেখানে 'ক্বীরাত' নামে কিছু ব্যবহার করা হয়। যখন তোমরা তা জয় করবে, তখন সেখানকার অধিবাসীদের সাথে সদাচার করবে। কেননা, তাদের জন্য রয়েছে অঙ্গীকার ও আত্মীয়তার সম্পর্ক – অথবা তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: অঙ্গীকার ও বৈবাহিক সম্পর্ক। অতঃপর যখন তুমি দেখবে যে দুইজন লোক একটি ইটের স্থান নিয়ে সেখানে বিবাদ করছে, তখন তুমি সেই স্থান থেকে বের হয়ে যাবে।" আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, অতঃপর আমি আবদুর রহমান ইবনু শুরাহবীল ইবনু হাসনাহ এবং তাঁর ভাই রাবিয়াকে একটি ইটের স্থান নিয়ে বিবাদ করতে দেখলাম। ফলে আমি সেখান থেকে বের হয়ে গেলাম।
10349 - عن كعب بن مالك أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إذا فتحتم مصر فاستوصوا بالقبط خيرًا، فإن لهم ذمة ورحما".
صحيح: رواه الطحاويّ في شرح المشكل (2364)، والطَّبرانيّ في الكبير (19/ 61)، وصحّحه الحاكم (2/ 553) كلّهم من طرق عن الزّهري، عن عبد الرحمن بن كعب بن مالك، عن أبيه كعب قال: فذكره. وإسناده صحيح.
قال الهيثميّ في"المجمع" (10/ 63):"رواه الطبرانيّ بإسنادين ورجال أحدهما رجال الصَّحيح".
কা'ব ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন তোমরা মিশর জয় করবে, তখন কিবতীদের (কপ্টিকদের) সাথে উত্তম আচরণের উপদেশ দেবে, কারণ তাদের জন্য রয়েছে অঙ্গীকার (জিম্মা) এবং আত্মীয়তার সম্পর্ক।"
10350 - عن أم سلمة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم أوصى عند وفاته فقال:"الله الله في قبط مصر، فإنكم ستظهرون عليهم، ويكون لكم عدة وأعوانا في سبيل الله".
حسن: رواه الطبرانيّ في الكبير (23/ 265 - 266) من حديث وهب بن جرير، ثنا أبي، عن يحيى بن أيوب، عن يزيد بن أبي حبيب، عن أبي سلمة، عن أم سلمة فذكرته.
وإسناده حسن من أجل يحيى بن أيوب وهو الغافقي المصري فإنه حسن الحديث. وأبو سلمة هو: ابن عبد الرحمن بن عوف.
وقال الهيثميّ في"المجمع" (10/ 63):"رواه الطبرانيّ ورجاله رجال الصَّحيح".
وبمعناه رُوي عن أبي عبد الرحمن الحبلي وهو عبد الله بن يزيد، وعمرو بن حريث أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إنَّكم ستقدمون على قوم جُعْدٍ رؤوسهم فاستوصوا بهم خيرًا، فإنهم قوه لكم وبلاغ إلى عدوكم بإذن الله، يعني قبط مصر".
رواه أبو يعلى (1473)، وابن عبد الحكم في فتوح مصر (ص 5) كلاهما من طريق أبي هانئ حميد بن هانئ الخولاني، أنه سمع أبا عبد الرحمن الحبلي وهو عبد الله بن يزيد وعمرو بن حريث وغيرهما يقولون: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: الحديث.
وعمرو بن حريث مختلف في صحبته وأكثر أهل العلم على أنه تابعي. وأبو عبد الرحمن الحبلي تابعي أيضًا فالحديث مرسل.
উম্মে সালমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর ওফাতের সময় অসিয়ত করে বললেন: "মিসরের কিবতী (কপ্টিক)দের বিষয়ে আল্লাহকে ভয় করো (তাদের প্রতি সদ্ব্যবহার করো)। কারণ তোমরা অবশ্যই তাদের ওপর বিজয়ী হবে এবং তারা তোমাদের জন্য আল্লাহর পথে শক্তি ও সাহায্যকারী হবে।"
10351 - عن أبي هريرة أنه كان يحمل مع النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم إداوة لوضوئه وحاجته، فبينما هو يتبعه بها، فقال:"من هذا؟". فقال: أنا أبو هريرة، فقال:"ابغني أحجارا أستنفض بها، ولا تأتني بعظم ولا بروثة" فأتيته بأحجار أحملها في طرف ثوبي، حتَّى وضعت إلى جنبه ثمّ انصرفت، حتَّى إذا فرغ مشيت، فقلت: ما بال العظم والرَّوْثَة؟ قال:"هما من طعام الجن، وإنه أتاني وفد جن نصيبين، ونعم الجن، فسألوني الزاد، فدعوت الله لهم أن لا يمروا بعظم ولا بروثة إِلَّا وجدوا عليها طعاما".
صحيح: رواه البخاريّ في المناقب (3865) عن موسى بن إسماعيل، حَدَّثَنَا عمرو بن يحيى بن سعيد، قال: أخبرني جدي، عن أبي هريرة قال: فذكره.
وقوله:"نصيبين" مدينة من مدن الجزيرة تقع على الطريق بين الموصل والشام.
وقيل: تقع على الحدود بين تركيا وسوريا وهي داخل الحدود التركية.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে তাঁর ওযু ও অন্যান্য প্রয়োজনের জন্য একটি পানির পাত্র বহন করতেন। একবার তিনি যখন তা (পাত্রটি) নিয়ে তাঁর অনুসরণ করছিলেন, তখন তিনি বললেন, "এ কে?" তিনি (আবু হুরায়রা) বললেন, "আমি আবু হুরায়রা।" তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "আমার জন্য কিছু পাথর খুঁজে নিয়ে এসো, যা দিয়ে আমি পবিত্রতা অর্জন করব, কিন্তু আমার কাছে কোনো হাড় বা গোবর এনো না।" তখন আমি কিছু পাথর নিয়ে তাঁর কাছে এলাম, যা আমার কাপড়ের এক প্রান্তে বহন করে এনেছিলাম, এবং তাঁর পাশে রেখে দিলাম। এরপর আমি চলে গেলাম। যখন তিনি (পবিত্রতা অর্জন করে) অবসর হলেন, আমি এগিয়ে গেলাম এবং জিজ্ঞেস করলাম, "হাড় ও গোবরের কী হলো?" (অর্থাৎ কেন এগুলো নিষেধ করা হলো?) তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "এ দুটো হলো জিনদের খাদ্য। নাসীবাইন অঞ্চলের জিনদের একটি প্রতিনিধিদল আমার কাছে এসেছিল—তারা ছিল উত্তম জিন। তারা আমার কাছে খাবার চেয়েছিল। তাই আমি আল্লাহর কাছে তাদের জন্য দু‘আ করেছি যে, তারা যেন যখনই কোনো হাড় বা গোবরের পাশ দিয়ে অতিক্রম করে, তখনই তার উপর খাবার পায়।"
10352 - عن * *
১০৩৫২ - থেকে * *
10353 - عن أنس بن مالك قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم لأبي طلحة:"التمس غلامًا من غلمانكم يخدمني". فخرج بي أبو طلحة يردفني وراءه. فكنت أخدم رسول الله صلى الله عليه وسلم كلما نزل، فكنت أسمعه يكثر أن يقول:"اللهم! إني أعوذ بك من الهم والحزن، والعجز والكسل، والبخل والجبن، وضلع الدين، وغلبة الرجال" فلم أزل أخدمه حتَّى أقبلنا من خيبر، وأقبل بصفية بنت حيي قد حازها، فكنت أراه يحوي وراءه بعباءة أو بكساء، ثمّ يردفها وراءه، حتَّى إذا كنا بالصهباء صنع حيسا في نطع، ثمّ أرسلني فدعوت رجالا فأكلوا، وكان ذلك بناءه بها، ثمّ أقبل حتَّى إذا بدا له أحد، قال:"هذا جبل يحبنا ونحبه" فلمّا أشرف على المدينة قال:"اللهم! إني أحرم ما بين جبليها، مثل ما حرم به إبراهيم مكة، اللهم! بارك لهم في مدهم وصاعهم".
متفق عليه: رواه البخاريّ في كتاب الأطعمة (5425)، ومسلم في الحجّ (1365 - 462) كلاهما من طريق إسماعيل بن جعفر، عن عمرو بن أبي عمرو مولى المطلب بن عبد الله بن حنطب، أنه سمع أنس بن مالك فذكره.
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আবূ তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: "তোমাদের ছেলেদের মধ্যে থেকে এমন একটি ছেলেকে খুঁজে বের করো, যে আমার খেদমত করবে।" এরপর আবূ তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে সাথে নিয়ে বের হলেন এবং আমাকে তাঁর পিছনে সওয়ারী করে নিলেন। আমি যখনই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কোথাও থামতেন, তাঁর খেদমত করতাম। আমি তাঁকে প্রায়ই বলতে শুনতাম: "হে আল্লাহ! আমি তোমার আশ্রয় চাই দুশ্চিন্তা ও মনোকষ্ট থেকে, অপারগতা ও অলসতা থেকে, কৃপণতা ও ভীরুতা থেকে, ঋণের বোঝা ও মানুষের প্রাধান্য (চাপ) থেকে।" আমি তাঁর খেদমত করতে থাকলাম, যতক্ষণ না আমরা খায়বার থেকে ফিরে আসলাম, যখন তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাফিয়্যা বিনত হুয়াইকে লাভ করে (স্ত্রী হিসেবে) নিয়ে আসলেন। আমি তাঁকে দেখতাম যে তিনি তাঁর পিছনে একটি চাদর বা বস্ত্র দিয়ে (সাফিয়্যার জন্য বসার স্থানটি) ঢেকে দিতেন, এরপর তাকে তাঁর পিছনে বসিয়ে নিতেন। অবশেষে যখন আমরা সাহবা নামক স্থানে পৌঁছলাম, তখন তিনি একটি দস্তরখানায় 'হায়স' (খেজুর, ঘি ও পনির মিশ্রিত খাবার) তৈরি করলেন। এরপর আমাকে পাঠালেন। আমি লোকজনকে দাওয়াত দিয়ে আনলাম, আর তারা খেলেন। এটাই ছিল তাঁর সাথে বাসর (বিয়ে) হওয়া। এরপর তিনি ফিরে আসলেন। যখন তাঁর দৃষ্টিতে উহুদ পাহাড় পড়ল, তখন তিনি বললেন: "এটি এমন এক পাহাড় যা আমাদেরকে ভালোবাসে এবং আমরাও তাকে ভালোবাসি।" যখন তিনি মদীনার কাছাকাছি পৌঁছলেন, তখন বললেন: "হে আল্লাহ! ইব্রাহীম (আঃ) যেমন মক্কাকে হারাম করেছেন, তেমনি আমিও এর দুই পাহাড়ের মধ্যবর্তী স্থানকে হারাম ঘোষণা করলাম। হে আল্লাহ! এদের মুদ ও সা'-এর মধ্যে বরকত দাও।"
10354 - عن أنس بن مالك قال: خرجت مع رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى خيبر أخدمه، فلمّا قدم النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم راجعا وبدا له أحد، قال:"هذا جبل يحبنا ونحبه"، ثمّ أشار بيده إلى المدينة وقال:"اللهم! إني أحرم ما بين لابتيها كتحريم إبراهيم مكة، اللهم! بارك لنا في صاعنا ومدنا".
متفق عليه: رواه البخاري في الجهاد والسير (2889)، ومسلم في الحجّ (1365 - 462) كلاهما من طريق عمرو بن أبي عمرو مولى المطلب بن عبد الله بن حنطب، أنه سمع أنس بن مالك يقول: فذكره.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর সাথে খায়বারের দিকে গেলাম তাঁর খিদমত করার জন্য। যখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফিরছিলেন এবং উহুদ পাহাড় তাঁর সামনে দৃশ্যমান হলো, তখন তিনি বললেন: "এটি এমন একটি পাহাড় যা আমাদেরকে ভালোবাসে এবং আমরাও তাকে ভালোবাসি।" অতঃপর তিনি তাঁর হাত দ্বারা মদিনার দিকে ইশারা করে বললেন: "হে আল্লাহ! আমি মক্কার জন্য ইব্রাহীম (আ)-এর হারাম ঘোষণার মতো এর (মদিনার) উভয় প্রান্তের লাভার মধ্যবর্তী স্থানকে হারাম ঘোষণা করছি। হে আল্লাহ! তুমি আমাদের সা’ ও মুদ্দ-এ (পরিমাপের পাত্র) বরকত দাও।"
10355 - عن أنس بن مالك أن رسول الله صلى الله عليه وسلم طلع له أحد فقال:"هذا جبل يحبنا ونحبه، اللهم! إن إبراهيم حرم مكة وأنا أحرم ما بين لابتيها". وزاد في رواية: اللهم! بارك
لهم في مدهم وصاعهم.
متفق عليه: رواه مالك في الجامع (10) عن عمرو مولى عبد المطلب، عن أنس بن مالك فذكره. ورواه البخاريّ في الاعتصام (7333) من طريق مالك به.
ورواه البخاريّ في الأطعمة (5425)، ومسلم في الحجّ (1365) كلاهما من طرق، عن إسماعيل بن جعفر، عن عمرو مولى المطلب به في سياق طويل، وفيه الزيادة المذكورة.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সামনে উহুদ পাহাড় দেখা গেলে তিনি বললেন: "এই পাহাড় আমাদেরকে ভালোবাসে এবং আমরাও ইহাকে ভালোবাসি। হে আল্লাহ! ইবরাহীম (আঃ) মক্কাকে হারাম (পবিত্র) ঘোষণা করেছিলেন এবং আমি এর দুই লাভাহ্টির মধ্যবর্তী স্থানকে হারাম ঘোষণা করছি।" আর এক বর্ণনায় অতিরিক্ত এসেছে: "হে আল্লাহ! তাদের মুদ্দ ও সা'তে বরকত দান করুন।"
10356 - عن عبد الله بن زيد عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"أن إبراهيم حرم مكة ودعا لها، وحرمت المدينة كما حرم إبراهيم مكة ودعوت لها في مدها وصاعها مثل ما دعا إبراهيم عليه السلام لمكة".
متفق عليه: رواه البخاريّ في كتاب البيوع (2129) من رواية وهيب - ومسلم في كتاب الحجّ (1360 - 455) من رواية عبد العزيز بن المختار، وسليمان بن بلال - ثلاثتهم عن عمرو بن يحيى المازني، عن عباد بن تميم الأنصاري، عن عبد الله بن زيد فذكره.
وفي لفظ:"وإني دعوت في صاعها ومدها بمثلي ما دعا به إبراهيم لأهل مكة". أخرجه مسلم في كتاب الحجّ (1360 - 454) عن قُتَيبة بن سعيد، حَدَّثَنَا عبد العزيز بن محمد الدراوردي، عن عمرو بن يحيى المازني، عن عباد بن تميم، عن عبد الله بن يزيد، فذكره.
فخالف الدراوردي في روايته عن عمرو بن يحيى المازني، الثلاثة المذكورين من أصحاب عمرو فذكر:"بمثلي" والقول ما قاله الجماعة.
আব্দুল্লাহ ইবনে যায়িদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় ইব্রাহীম (আঃ) মক্কাকে হারাম (পবিত্র) করেছিলেন এবং এর জন্য দু'আ করেছিলেন। আর আমি মদিনাকে হারাম (পবিত্র) করেছি, যেমন ইব্রাহীম মক্কাকে হারাম করেছিলেন। এবং আমি এর মুদ্দ ও সা' (পরিমাপক পাত্র)-এর জন্য ততটুকু বরকতের দু'আ করেছি, যতটুকু দু'আ ইব্রাহীম (আঃ) মক্কার জন্য করেছিলেন।"
10357 - عن أبي سعيد مولى المهري: أنه أصابهم بالمدينة جهد وشدة. وأنه أتى أبا سعيد الخدريّ. فقال له: إني كثير العيال. وقد أصابتنا شدة. فأردت أن أنقل عيالي إلى بعض الريف. فقال أبو سعيد: لا تفعل، الزم المدينة، فإنا خرجنا مع نبي الله صلى الله عليه وسلم (أظن أنه قال) حتَّى قدّمنا عسفان. فأقام بها ليالي. فقال الناس: والله! ما نحن ههنا في شيء. وإن عيالنا لخلوف، ما نأمن عليهم. فبلغ ذلك النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فقال:"ما هذا الذي بلغني من حديثكم؟". (ما أدري كيف قال). قال والذي أحلف به أو والذي نفسي بيده لقد هممت أو إن شئتم (لا أدري أيتهما قال) لآمرن بناقتي ترحل ثمّ لا أحل لها عقدة حتَّى أقدم المدينة". وقال:"اللهم! إن إبراهيم حرم مكة فجعلها حرما، وإني حرمت المدينة حراما ما بين مأزميها، أن لا يهراق فيها دم، ولا يحمل فيها سلاح لقتال، ولا تخبط فيها شجرة إِلَّا لعلف، اللهم! بارك لنا في مدينتنا، اللهم! بارك لنا في صاعنا، اللهم! بارك لنا في مدنا، اللهم! بارك لنا في صاعنا، اللهم! بارك لنا في مدنا، اللهم! بارك لنا في مدينتنا، اللهم! اجعل مع البركة بركتين، والذي
نفسي بيده! ما من المدينة من شعب ولا نقب إِلَّا عليه ملكان يحرسانها حتَّى تقدموا إليها". ثمّ قال للناس:"ارتحلوا". فارتحلنا فأقبلنا إلى المدينة، فوالذي نحلف به أو يحلف به (الشك من حمّاد) ما وضعنا رحالنا حين دخلنا المدينة حتَّى أغار عليها بنو عبد الله بن غطفان، وما يهيجهم قبل ذلك شيء.
صحيح: رواه مسلم في كتاب الحجّ (1374 - 475) عن حمّاد بن إسماعيل ابن علية، حَدَّثَنَا أبي، عن وهيب، عن يحيى بن أبي إسحاق، أنه حدث، عن أبي سعيد مولى المهري، فذكره.
আবু সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবু সাঈদ মাওলা আল-মাহরি তাকে বলেছিলেন যে, মদীনায় তাদের উপর কঠিন কষ্ট ও দুর্দশা এসেছিল। তিনি (মাওলা আল-মাহরি) আবু সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট এসে তাকে বললেন: আমার পরিবার-পরিজন অনেক। আমরা কঠিন কষ্টের শিকার হয়েছি। তাই আমি আমার পরিবারকে গ্রামের কোনো এলাকায় সরিয়ে নিতে চাই।
আবু সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: এমন করো না, মদীনা আঁকড়ে থাকো। আমরা একবার নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে (আমার মনে হয় তিনি বলেছেন) রওয়ানা হলাম, এমনকি আমরা 'আসফান নামক স্থানে পৌঁছলাম। সেখানে তিনি কয়েক রাত অবস্থান করলেন। তখন লোকেরা বলাবলি করতে লাগল: আল্লাহর কসম! এখানে থেকে আমাদের কোনো লাভ হচ্ছে না, আর আমাদের পরিবার-পরিজন পেছনে রয়েছে, তাদের নিরাপত্তার ভয় হচ্ছে। এই কথা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট পৌঁছল। তিনি বললেন: "তোমাদের আলোচনা থেকে আমার কাছে যা পৌঁছেছে, তা কী?" (রাবী বলেন: কীভাবে বলেছেন, তা আমার জানা নেই)। তিনি বললেন: "যার কসম করছি, অথবা যার হাতে আমার প্রাণ, আমি ইচ্ছা করেছি—কিংবা তিনি বলেছেন: যদি তোমরা চাও (আমি জানি না এর মধ্যে কোনটি বলেছেন)—আমি আমার উটনীকে প্রস্তুত করার নির্দেশ দেব, এরপর আমি মদীনায় না পৌঁছা পর্যন্ত তার বাঁধন খুলব না।"
আর তিনি বললেন: "হে আল্লাহ! ইব্রাহীম (আঃ) মক্কাকে হারাম (পবিত্র) করেছিলেন এবং তাকে একটি হারাম এলাকা বানিয়েছিলেন, আর আমি মদীনাকে হারাম (পবিত্র) ঘোষণা করলাম—এর উভয় পর্বত শ্রেণির মধ্যবর্তী স্থানে যেন রক্তপাত না হয়, লড়াই করার জন্য যেন কোনো অস্ত্র বহন করা না হয়, আর ঘাসের জন্য ছাড়া যেন কোনো গাছ কাটা না হয়। হে আল্লাহ! আমাদের মদীনায় আমাদের জন্য বরকত দাও, হে আল্লাহ! আমাদের সা' (পাত্রে) বরকত দাও, হে আল্লাহ! আমাদের মুদ-এ বরকত দাও। হে আল্লাহ! আমাদের সা'তে বরকত দাও, হে আল্লাহ! আমাদের মুদ-এ বরকত দাও। হে আল্লাহ! আমাদের মদীনায় আমাদের জন্য বরকত দাও, হে আল্লাহ! এই বরকতের সাথে আরও দুই বরকত যোগ করো। যার হাতে আমার প্রাণ, মদীনার কোনো শাখা পথ বা প্রবেশ পথ নেই, যেখানে দু'জন ফেরেশতা পাহারায় নিয়োজিত থাকে না—যতক্ষণ না তোমরা সেখানে প্রবেশ করো।"
এরপর তিনি লোকদের বললেন: "তোমরা রওয়ানা দাও।" তখন আমরা রওয়ানা দিয়ে মদীনার দিকে ফিরে এলাম। যার কসম আমরা করি বা যার কসম করা হয় (সন্দেহ হাম্মাদের), আমরা মদীনায় প্রবেশ করার পর আমাদের মালপত্র রাখতেই পারিনি, এর আগেই বানু আব্দুল্লাহ ইবনু গাতফান মদীনার উপর আক্রমণ করে বসল, অথচ এর আগে তাদেরকে কোনো কিছুই উত্তেজিত করেনি।
10358 - عن أبي سعيد الخدريّ أنه سمع رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إنِّي حرمت ما بين لابتي المدينة كما حرم إبراهيم مكة".
قال: ثمّ كان أبو سعيد يأخذ - أو يجد - أحدنا في يده الطير، فيكفه من يده، ثمّ يرسله.
صحيح: رواه مسلم في الحجّ (478: 1374) من طرق عن أبي أسامة، عن الوليد بن كثير، حَدَّثَنِي سعيد بن عبد الرحمن بن أبي سعيد الخدري، أن عبد الرحمن حدَّثه، عن أبيه، عن أبي سعيد فذكره.
আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেন: "আমি মদীনার দুই লাভা ক্ষেত্রের মধ্যবর্তী স্থানকে হারাম (পবিত্র/নিরাপদ) ঘোষণা করেছি, যেরূপ ইবরাহীম (আঃ) মক্কাকে হারাম ঘোষণা করেছিলেন।" তিনি বলেন, অতঃপর আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দেখতেন—অথবা পেতেন—যে, আমাদের কারো হাতে কোনো পাখি আছে, তখন তিনি তার হাত থেকে তা ছাড়িয়ে নিতেন, অতঃপর সেটিকে মুক্ত করে দিতেন।
10359 - عن جابر قال: قال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"إن إبراهيم حرم مكة وإني حرمت المدينة ما بين لابتيها لا يقطع عضاها ولا يصاد صيده".
صحيح: رواه مسلم في كتاب الحجّ (1362: 458) من طرق عن أبي أحمد قال أبو بكر: حَدَّثَنَا عن محمد بن عبد الله الأسدي، حَدَّثَنَا سفيان، عن أبي الزُّبير، عن جابر قال: فذكره.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় ইবরাহীম (আঃ) মক্কাকে হারাম (পবিত্র ও সুরক্ষিত) ঘোষণা করেছেন, আর আমি মদীনাকে হারাম ঘোষণা করেছি এর দুই প্রস্তরময় প্রান্তরের মধ্যবর্তী স্থানকে। এর কাঁটাযুক্ত গাছপালা কাটা যাবে না এবং এর শিকারও ধরা যাবে না।"
10360 - عن نافع بن جبير أن مروان بن الحكم خطب الناس، فذكر مكة وحرمتها وأهلها، ولم يذكر المدينة وأهلها وحرمتها، فناداه رافع بن خديج فقال: ما لي أسمعك ذكرت مكة وأهلها وحرمتها، ولم تذكر المدينة وأهلها وحرمتها، وقد حرم رسول الله صلى الله عليه وسلم ما بين لابتيها، وذلك عندنا في أديم خولاني إن شئت أقرأتكه، قال: فسكت مروان، ثمّ قال: قد سمعت بعض ذلك.
صحيح: رواه مسلم في كتاب الحجّ (1361 - 457) عن عبد الله بن مسلمة بن قعنب، حَدَّثَنَا سليمان بن بلال، عن عتبة بن مسلم، عن نافع بن جبير أن مروان، فذكره.
নাফি' ইবনে জুবাইর থেকে বর্ণিত, মারওয়ান ইবনুল হাকাম লোকদের উদ্দেশ্যে ভাষণ দিলেন। তিনি মক্কা, তার পবিত্রতা ও তার অধিবাসীদের কথা উল্লেখ করলেন, কিন্তু মদীনা, তার অধিবাসীদের ও তার পবিত্রতার কথা উল্লেখ করলেন না। তখন রাফি' ইবনে খাদীজ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে ডেকে বললেন, ‘আমি আপনাকে মক্কা, তার অধিবাসী ও তার পবিত্রতার কথা উল্লেখ করতে শুনছি, অথচ মদীনা, তার অধিবাসী ও তার পবিত্রতার কথা উল্লেখ করছেন না কেন? অথচ রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মদীনার দুই কালো শিলাময় প্রান্তরের মধ্যবর্তী স্থানকে হারাম (পবিত্র) ঘোষণা করেছেন। আর এ সম্পর্কিত প্রমাণ আমাদের কাছে খাওলানি চামড়ার উপর লিপিবদ্ধ আছে। আপনি চাইলে আমি আপনাকে তা পড়ে শোনাতে পারি।’ বর্ণনাকারী বলেন, এরপর মারওয়ান চুপ হয়ে গেলেন। অতঃপর তিনি বললেন, ‘আমি এর কিছু অংশ শুনেছি।’
