আল-জামি` আল-কামিল
10021 - عن جابر أنه قال: رُمِيَ يوم الأحزاب سعد بن معاذ فقطعوا أكحله - أو أبجله - فحسمه رسول الله صلى الله عليه وسلم بالنار، فانتفخت يده، فتركه فنزفه الدم، فحسمه أخرى فانتفخت يده، فلما رأى ذلك قال: اللهم! لا تخرج نفسي حتى تقر عيني من بني قريظة. فاستمسك عرقه فما قطر قطرة حتى نزلوا على حكم سعد بن معاذ، فأرسل إليه، فحكم أن يقتل رجالهم وتستحيى نساؤهم، يستعين بهن المسلمون. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أصبت حكم الله فيهم"، وكانوا أربعمائة، فلما فرغ من قتلهم انفتق عرقه فمات.
صحيح: رواه الترمذي (1582)، وأحمد (14773)، وابن حبان (4784) كلهم من طرق عن الليث بن سعد، عن أبي الزبير، عن جابر قال: فذكره.
وإسناده صحيح، وقال الترمذي: حسن صحيح.
صحَّح إسناده أيضا الحافظ في الفتح (7/ 414).
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: খন্দকের যুদ্ধের দিন সা'দ ইবনু মু'আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আহত হয়েছিলেন। তাঁকে তীর নিক্ষেপ করা হয়েছিল এবং এতে তাঁর প্রধান শিরা ('আকহাল')—অথবা বলেছেন 'আবজাল' (ভেতরের শিরা)—কেটে গিয়েছিল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আগুন (গরম লোহা) দিয়ে সেটি সেঁকে দিলেন। ফলে তাঁর হাত ফুলে গেল। তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ছেড়ে দিলে আবার রক্ত ঝরতে শুরু করল। তিনি দ্বিতীয়বার সেটি সেঁকে দিলেন, ফলে তাঁর হাত আবার ফুলে গেল। যখন তিনি (সা'দ) তা দেখলেন, তখন বললেন: "হে আল্লাহ! বনু কুরায়যা সম্পর্কে আমার চোখ শীতল না হওয়া পর্যন্ত আমার রূহ কবয করো না।" ফলে তাঁর রক্তনালী থেমে গেল এবং এক ফোঁটা রক্তও ঝরল না, যতক্ষণ না তারা (বনু কুরায়যা) সা'দ ইবনু মু'আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ফয়সালার ওপর রাজি হয়ে আত্মসমর্পণ করল। তখন তাঁর কাছে লোক পাঠানো হলো। তিনি ফয়সালা দিলেন যে, তাদের পুরুষদের হত্যা করা হবে এবং তাদের নারীদের জীবন্ত রাখা হবে, যেন মুসলিমরা তাদের দ্বারা সাহায্য নিতে পারে। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি তাদের বিষয়ে আল্লাহর হুকুম মোতাবেক ফয়সালা দিয়েছ।" তারা সংখ্যায় চারশো জন ছিল। যখন তাদের হত্যা শেষ হলো, তখন সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর রক্তনালী আবার ফেটে গেল এবং তিনি মৃত্যুবরণ করলেন।
10022 - عن عائشة قالت: أصيب سعد يوم الخندق، رماه رجل من قريش يقال له: حبان بن العرقة، رماه في الأكحل، فضرب النبي صلى الله عليه وسلم خيمة في المسجد ليعوده من قريب، فلما رجع رسول الله صلى الله عليه وسلم من الخندق وضع السلاح واغتسل، فأتاه جبريل عليه السلام وهو ينفض رأسه من الغبار، فقال: وضعت السلاح، والله! ما وضعته، اخرج إليهم. قال النبي صلى الله عليه وسلم:"فأين؟" فأشار إلى بني قريظة، فأتاهم رسول الله صلى الله عليه وسلم، فنزلوا على حكمه، فرد الحكم إلى سعد، قال: فإني أحكم فيهم: أن تقتل المقاتلة، وأن تسبى النساء والذرية، وأن تقسم أموالهم.
قال هشام: فأخبرني أبي، عن عائشة، أن سعدا قال: اللهم! إنك تعلم أنه ليس أحد أحب إليَّ أن أجاهدهم فيك من قوم كذبوا رسولك صلى الله عليه وسلم وأخرجوه، اللهم! فإني أظن أنك قد وضعت الحرب
بيننا وبينهم، فإن كان بقي من حرب قريش شيء فأبقني له حتى أجاهدهم فيك، وإن كنت وضعت الحرب فافجرها، واجعل موتتي فيها. فانفجرت من لبته، فلم يرعهم وفي المسجد خيمة من بني غفار إلا الدم يسيل إليهم. فقالوا: يا أهل الخيمة، ما هذا الذي يأتينا من قبلكم؟ فإذا سعد يغذو جرحه دما، فمات منها رضي الله عنه.
متفق عليه: رواه البخاري في المغازي (4122) ومسلم في الجهاد (1769 - 65) كلاهما من طريق عبد الله بن نمير، حدثنا هشام، عن أبيه، عن عائشة فذكرته.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: খন্দকের যুদ্ধের দিন সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আহত হন। কুরাইশের এক ব্যক্তি, যার নাম ছিল হাব্বান ইবনুল আরিকাহ, তাকে তীর নিক্ষেপ করেছিল। সে তাঁর আকহল (রগের) স্থানে আঘাত করে। এরপর নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর সেবা-শুশ্রূষার জন্য নিকটেই মসজিদের মধ্যে একটি তাঁবু স্থাপন করলেন। যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম খন্দক থেকে ফিরে এলেন, তখন তিনি অস্ত্র রেখে গোসল করলেন। এমতাবস্থায় জিবরীল (আঃ) তাঁর নিকট এলেন, তিনি তখন মাথা থেকে ধুলো ঝেড়ে ফেলছিলেন। জিবরীল (আঃ) বললেন: আপনি অস্ত্র রেখে দিলেন? আল্লাহর কসম! আমি তো রাখিনি। আপনি তাদের দিকে বের হোন। নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "কোথায়?" তখন তিনি বনু কুরাইযার দিকে ইশারা করলেন। এরপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাদের কাছে গেলেন। তারা তাঁর (রাসূলের) ফায়সালার উপর রাজি হলো। কিন্তু তিনি ফায়সালার ভার সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর দিকে ফিরিয়ে দিলেন। সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি তাদের ব্যাপারে এই ফায়সালা করছি যে, তাদের যোদ্ধাদের হত্যা করা হবে, নারী ও শিশুদের বন্দী করা হবে এবং তাদের সম্পদ ভাগ করে দেওয়া হবে।
হিশাম বলেন: আমার পিতা আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে আমার নিকট বর্ণনা করেছেন যে, সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দু'আ করলেন: হে আল্লাহ! আপনি জানেন, আপনার পথে জিহাদ করার জন্য ঐসব লোকের চেয়ে আমার কাছে অন্য কেউ বেশি প্রিয় নয়, যারা আপনার রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে মিথ্যা প্রতিপন্ন করেছে এবং তাঁকে বের করে দিয়েছে। হে আল্লাহ! আমার মনে হচ্ছে আপনি আমাদের ও তাদের মধ্যে যুদ্ধ সমাপ্ত করে দিয়েছেন। যদি কুরাইশের সাথে যুদ্ধের কিছু অবশিষ্ট থাকে, তবে আমাকে তার জন্য বাঁচিয়ে রাখুন, যাতে আমি আপনার পথে তাদের বিরুদ্ধে জিহাদ করতে পারি। আর যদি আপনি যুদ্ধ শেষ করে থাকেন, তবে আমার আঘাত থেকে রক্তপাত শুরু করে দিন এবং আমার মৃত্যু এর মধ্যেই নির্ধারণ করুন। অতঃপর তাঁর আঘাতের স্থান ফেটে গেল (রক্ত বের হতে লাগল)। মসজিদে অবস্থিত বনু গিফারের তাঁবুতে যারা ছিল, তাদের কেউই সেদিকে লক্ষ্য করল না, কেবল দেখল তাদের দিকে রক্ত গড়িয়ে আসছে। তারা বলল: ওহে তাঁবুর লোকেরা! এ কী, যা তোমাদের দিক থেকে আমাদের কাছে আসছে? দেখা গেল, সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ক্ষতস্থান থেকে রক্ত ঝরছে এবং তিনি এর ফলেই ইনতিকাল করলেন, আল্লাহ তাঁর প্রতি সন্তুষ্ট হোন।
10023 - عن أبي هريرة قال: كنا جلوسا عند النبي صلى الله عليه وسلم إذ نزلت عليه سورة الجمعة، فلما قرأ: {وَآخَرِينَ مِنْهُمْ لَمَّا يَلْحَقُوا بِهِمْ} [الجمعة: 3] قال رجل: من هؤلاء يا رسول الله؟ فلم يراجعه النبي صلى الله عليه وسلم حتى سأله مرة أو مرتين أو ثلاثا. قال: وفينا سلمان الفارسي، قال: فوضع النبي صلى الله عليه وسلم يده على سلمان، ثم قال:"لو كان الإيمان عند الثريا لناله رجال من هؤلاء".
متفق عليه: رواه البخاري في التفسير (4898)، ومسلم في فضائل الصحابة (2546 - 231) كلاهما من طريق عبد العزيز بن محمد، أخبرني ثور، عن أبي الغيث، عن أبي هريرة قال: فذكره.
واللفظ لمسلم، ولفظ البخاري مختصر.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট বসা ছিলাম। তখন তাঁর উপর সূরা জুমু'আ নাযিল হলো। যখন তিনি (সূরাটির অংশ): "আর তাদের মধ্যেকার অন্যদের জন্যেও, যারা এখনো তাদের সাথে এসে মিলিত হয়নি" (সূরা জুমু'আ: ৩) - এই আয়াতটি পাঠ করলেন, তখন এক ব্যক্তি বলল: হে আল্লাহর রাসূল! এরা কারা? নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাকে উত্তর দিলেন না, যতক্ষণ না সে একবার, দুইবার কিংবা তিনবার জিজ্ঞাসা করল। (আবূ হুরায়রা রাঃ) বলেন: আমাদের মধ্যে সালমান ফারসী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উপস্থিত ছিলেন। তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর হাত সালমানের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উপর রাখলেন, অতঃপর বললেন: "যদি ঈমান সুরাইয়া তারকার (Pleiades) নিকটও থাকত, তবুও তাদের (সালমানের) এই গোত্রের লোকেরা তা অর্জন করে নিত।"
10024 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لو كان الدين عند الثريا لذهب به رجل من فارس - أو قال: من أبناء فارس - حتى يتناوله".
صحيح: رواه مسلم في فضائل الصحابة (2546) من طرق، عن عبد الرزاق، أخبرنا معمر، عن جعفر الجزري، عن يزيد بن الأصم، عن أبي هريرة فذكره.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যদি দ্বীন 'সুরাইয়া' (নক্ষত্রপুঞ্জ)-এর কাছেও থাকত, অবশ্যই ফারিসের (পারস্যের) একজন লোক—অথবা তিনি বলেছেন: ফারিসের (পারস্যের) বংশধরদের মধ্য থেকে একজন লোক—সেখানে গিয়ে তা লাভ করত।"
10025 - عن قيس بن سعد بن عبادة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لو كان الإيمان معلّقا بالثريا لنالَه رجال من أبناء فارس".
صحيح: رواه أبو يعلى (1438) - واللفظ له -، والبزار (3741)، والطبراني في الكبير (18/ 353) كلهم من طرق عن سفيان بن عيينة، عن ابن نجيح (واسمه: عبد الله المكي) عن أبيه، عن قيس بن سعد بن عبادة قال: فذكره. وإسناده صحيح.
قال الهيثمي في المجمع (10/ 64 - 65):"رواه أبو يعلى والبزار ورجالهما رجال الصحيح".
কায়েস ইবনে সা'দ ইবনে উবাদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যদি ঈমান সুরাইয়া (নক্ষত্রপুঞ্জে) ঝুলে থাকত, তাহলেও পারস্যের সন্তানতুল্য কিছু মানুষ তা লাভ করত।"
10026 - عن عبد الله بن عباس قال: حدَّثني سلمان الفارسي حديثه من فيه، قال: كنت رجلا فارسيا من أهل أصبهان من أهل قرية منها يقال لها: جَيُّ، وكان أبي دهقان قريته، وكنت أحب خلق الله إليه، فلم يزل به حبه إياي حتى حبسني في بيته كما تحبس الجارية، واجتهدت في المجوسية حتى كنت قَطَنَ النار الذي يوقدها لا يتركها تخبو ساعة، قال: وكانت لأبي ضيعة عظيمة، قال: فشُغِلَ في بنيان له يوما، فقال لي: يا بني! إني قد شغلت في بنيانٍ هذا اليوم عن ضيعتي، فاذهب فاطلعها، وأمرني فيها ببعض ما يريد، فخرجت أريد ضيعته، فمررت بكنيسة من كنائس النصارى، فسمعت أصواتهم فيها وهم يصلون، وكنت لا أدري ما أمر الناس لحبس أبي إياي في بيته، فلما مررت بهم وسمعت أصواتهم دخلت عليهم انظر ما يصنعون. قال: فلما رأيتهم أعجبني صلاتهم، ورغبت في أمرهم، وقلت: هذا والله! خير من الدين الذي نحن عليه، فوالله ما تركتهم حتى غربت الشمس، وتركت ضيعة أبي، ولم آتها. فقلت لهم: أين أصل هذا الدين؟ قالوا: بالشام. قال: ثم رجعت إلى أبي، وقد بعث في طلبي، وشغلته عن عمله كله، قال: فلما جئته قال: أي بنيّ! أين كنت؟ ألم أكن عهدت إليك ما عهدت؟ قال: قلت: يا أبت مررت بناس يصلون في كنيسة لهم فأعجبني ما رأيت من دينهم، فوالله! ما زلت عندهم حتى غربت الشمس. قال: أي بنيّ! ليس في ذلك الدين خير، دينك ودين آبائك خير منه. قال: قلت: كلا والله! إنه خير من ديننا. قال: فخافني، فجعل في رجلي قيدا، ثم حبسني في بيته.
قال: وبعثت إلى النصارى، فقلت لهم: إذا قدم عليكم ركب من الشام تجار من
النصارى فأخبِروني بهم. قال: فقدم عليهم ركب من الشام تجار من النصارى، قال: فأخبَروني بهم. قال: فقلت لهم: إذا قضوا حوائجهم وأرادوا الرجعة إلى بلادهم فاذنوني بهم. قال: فلما أرادوا الرجعة إلى بلادهم أخبروني بهم، فألقيت الحديد من رجلي، ثم خرجت معهم حتى قدمت الشام، فلما قدمتها قلت: مَنْ أفضل أهل هذا الدين؟ قالوا: الأسقف في الكنيسة. قال: فجئته، فقلت: إني قد رغبت في هذا الدين، وأحببت ان أكون معك أخدمك في كنيستك، وأتعلم منك وأصلي معك. قال: فادخل. فدخلت معه، قال: فكان رجل سوء، يأمرهم بالصدقة، ويرغبهم فيها، فإذا جمعوا إليه منها أشياء، اكتنزه لنفسه، ولم يعطه المساكين، حتى جمع سبع قلال من ذهب وورق، قال: وأبغضته بغضا شديدا لما رأيته يصنع، ثم مات، فاجتمعت إليه النصارى ليدفنوه، فقلت لهم: إن هذا كان رجل سوء، يأمركم بالصدقة، ويرغبكم فيها، فإذا جئتموه بها اكتنزها لنفسه، ولم يعط المساكين منها شيئا. قالوا: وما علمك بذلك؟ قال: قلت: أنا أدلكم على كنزه. قالوا: فَدُلَّنا عليه. قال: فأريتهم موضعه. قال: فاستخرجوا منه سبع قلال مملوءة ذهبا وورقا، قال: فلما رأوها قالوا: والله لا ندفنه أبدا. فصلبوه، ثم رجموه بالحجارة.
ثم جاؤوا برجل آخر، فجعلوه بمكانه، قال: يقول سلمان: فما رأيت رجلا لا يصلي الخمس، أرى أنه أفضل منه، أزهد في الدنيا ولا أرغب في الآخرة ولا أدأب ليلا ونهارا منه، قال: فأحببته حبا لم أحبه من قبله، فأقمت معه زمانا، ثم حضرته الوفاة، فقلت له: يا فلان إني كنت معك وأحببتك حبا لم أحبه من قبلك، وقد حضرك ما ترى من أمر الله، فإلى من توصي بي، وما تأمرني؟ قال: أي بنيّ! والله، ما أعلم أحدا اليوم على ما كنت عليه، لقد هلك الناس وبدلوا وتركوا أكثر ما كانوا عليه، إلا رجلا بالموصل، وهو فلان، فهو على ما كنت عليه، فالحق به. قال: فلما مات وغُيِّبَ لحقت بصاحب الموصل، فقلت له: يا فلان، إن فلانا أوصاني عند موته أن ألحق بك، وأخبرني أنك على أمره. قال: فقال لي: أقم عندي. فأقمت عنده، فوجدته خير رجل على أمر صاحبه، فلم يلبث أن مات، فلما حضرته الوفاة، قلت له: يا فلان، إن فلانا أوصى بي إليك، وأمرني باللحوق بك، وقد حضرك من الله عز وجل ما ترى، فإلى من توصي بي وما تأمرني؟ قال: أي بنيّ! والله، ما أعلم رجلا على مثل ما كنا عليه الا رجلا بنصيبين، وهو فلان، فالحق به. قال: فلما مات وغُيبَ
لحقت بصاحب نصيبين، فجئته فأخبرته بخبري وما أمرني به صاحبي. قال: فأقم عندي، فأقمت عنده، فوجدته على أمر صاحبيه، فأقمت مع خير رجل، فوالله ما لبث أن نزل به الموت. فلما حُضِرَ قلت له: يا فلان، إن فلانا كان أوصى بي إلى فلان، ثم أوصى بي فلان إليك، فإلى من توصي بي وما تأمرني؟ قال: أي بنيّ! والله، ما نعلم أحدا بقي على أمرنا آمرك أن تأتيه إلا رجلا بعمورية، فإنه على مثل ما نحن عليه، فإن أحببت فأته، قال: فإنه على أمرنا.
قال: فلما مات وغُيِّبَ لحقت بصاحب عمورية، وأخبرته خبري، فقال: أقم عندي، فأقمت مع رجل على هدي أصحابه وأمرهم، قال: واكتسبت حتى كان لي بقرات وغنيمة. قال: ثم نزل به أمر الله، فلما حُضِر قلت له: يا فلان إني كنت مع فلان، فأوصى بي فلان إلى فلان، وأوصى بي فلان إلى فلان، ثم أوصى بي فلان إليك، فإلى من توصي بي وما تأمرني؟ قال: أي بنيّ! والله، ما أعلمه أصبح على ما كنا عليه أحد من الناس امرك أن تأتيه ولكنه قد أظلك زمان نبي هو مبعوث بدين إبراهيم يخرج بأرض العرب، مهاجرا إلى أرض بين حرتين بينهما نخل، به علامات لا تخفى، يأكل الهدية، ولا يأكل الصدقة، بين كتفيه خاتم النبوة، فإن استطعت أن تلحق بتلك البلاد فافعل.
قال: ثم مات وغُيِّبَ، فمكثت بعمورية ما شاء الله أن أمكث، ثم مرَّ بي نفر من كلبٍ تجارا، فقلت لهم: تحملوني إلى أرض العرب، وأعطيكم بقراتي هذه وغنيمتي هذه؟ قالوا: نعم. فأعطيتهموها وحملوني، حتى إذا قدموا بي وادي القرى، ظلموني فباعوني من رجل من يهود عبدا، فكنت عنده، ورأيت النخل، ورجوت أن تكون البلد الذي وصف لي صاحبي، ولم يحق لي في نفسي، فبينما أنا عنده، قدم عليه ابن عم له من المدينة من بني قريظة، فابتاعني منه، فاحتملني إلى المدينة، فوالله، ما هو الا أن رأيتها، فعرفتها بصفة صاحبي، فأقمت بها وبعث الله رسوله، فأقام بمكة ما أقام، لا أسمع له بذكر مع ما أنا فيه من شغل الرق. ثم هاجر إلى المدينة، فوالله، إني لفي رأس عَذْقٍ لسيدي أعمل فيه بعض العمل، وسيدي جالس، إذ أقبل ابن عم له حتى وقف عليه، فقال: فلان، قاتل الله بني قيلة، والله، إنهم الآن لمجتمعون بقباء على رجل قدم عليهم من مكة اليوم، يزعمون أنه نبي. قال: فلما سمعتها أخذتني العرواء، حتى ظننت سأسقط على سيدي، قال: ونزلت عن النخلة، فجعلت أقول لابن عمه
ذلك: ماذا تقول؟ ماذا تقول؟ قال: فغضب سيدي فلكمني لكمة شديدة. ثم قال: ما لَك ولهذا! أقبل على عملك. قال: قلت: لا شيء، إنما أردت أن استثبته عما قال.
وقد كان عندي شيء قد جمعته، فلما أمسيت أخذته، ثم ذهبت به إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو بقباء، فدخلت عليه، فقلت له: إنه قد بلغني أنك رجل صالح، ومعك أصحاب لك غرباء ذوو حاجة، وهذا شيء كان عندي للصدقة، فرأيتكم أحق به من غيركم. قال: فقرَّبْته إليه. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم لأصحابه:"كلوا" وأمسك يده فلم يأكل. قال: فقلت في نفسي: هذه واحدة ثم انصرفت عنه فجمعت شيئا، وتحول رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى المدينة، ثم جئته به فقلت: إني رأيتك لا تأكل الصدقة، وهذه هدية أكرمتك بها. قال: فأكل رسول الله صلى الله عليه وسلم منها، وأمر أصحابه، فأكلوا معه، قال: فقلت في نفسي: هاتان اثنتان، ثم جئت رسول الله صلى الله عليه وسلم، وهو ببقيع الغرقد. قال: وقد تبع جنازة من أصحابه، عليه شملتان له، وهو جالس في أصحابه، فسلمت عليه، ثم استدرت أنظر إلى ظهره، هل أرى الخاتم الذي وصف لي صاحبي؟ فلما رآني رسول الله صلى الله عليه وسلم استدبرته عرف أني استثبت في شيء وُصِفَ لي، قال: فألقى رداءه عن ظهره، فنظرت إلى الخاتم فعرفته، فانكببت عليه أقبِّله وأبكي، فقال لي رسول الله صلى الله عليه وسلم:"تحوَّل" فتحولت، فقصصت عليه حديثي كما حدثتك يا ابن عباس، قال: فأعجب رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يسمع ذلك أصحابه.
ثم شغَل سلمانَ الرِّقُّ حتى فاته مع رسول الله صلى الله عليه وسلم بدر وأحد، قال: ثم قال لي رسول الله صلى الله عليه وسلم:"كاتِبْ يا سلمان" فكاتبت صاحبي على ثلاثمائة نخلة أحييها له بالفَقِير وبأربعين أوقية. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم لأصحابه:"أعينوا أخاكم" فأعانوني بالنخل: الرجل بثلاثين وَدِيَّةً، والرجل بعشرين، والرجل بخمس عشرة، والرجل بعشر - يعني: الرجل بقدر ما عنده - حتى اجتمعت لي ثلاثمائة ودية، فقال لي رسول الله صلى الله عليه وسلم:"اذهب يا سلمان، ففَقِّرْ لها، فإذا فرغت فائتني، أكون أنا أضعها بيدي" ففقَّرْتُ لها، وأعانني أصحابي، حتى إذا فرغت منها جئته، فأخبرته، فخرج رسول الله صلى الله عليه وسلم معي إليها، فجعلنا نقرب له الودي ويضعه رسول الله صلى الله عليه وسلم بيده، فوالذي نفس سلمان بيده، ما ماتت منها ودية واحدة، فأدَّيتُ النخل، وبقي عليَّ المال، فأُتِيَ رسول الله صلى الله عليه وسلم بمثل بيضة الدجاجة من ذهب من بعض المغازي، فقال:"ما فعل الفارسي المكاتب؟"
قال: فدُعِيْتُ له، فقال:"خذ هذه فأدِّ بها ما عليك يا سلمان" فقلت: وأين تقع هذه يا رسول الله مما عليَّ؟ ! قال:"خذها، فإن الله سيؤدي بها عنك" قال: فأخذتها، فوزنت لهم منها - والذي نفس سلمان بيده - أربعين أوقية، فأوفيتهم حقهم، وعتقت، فشهدت مع رسول الله صلى الله عليه وسلم الخندق، ثم لم يفتني معه مشهد.
حسن: رواه أحمد (23737)، والبزار في مسنده (2499، 2500)، والطبراني في الكبير (6/ 276 - 272)، وابن سعد في الطبقات (4/ 75 - 80) كلهم من طرق، عن محمد بن إسحاق، حدثني عاصم بن عمر بن قتادة الأنصاري، عن محمود بن لبيد، عن عبد الله بن عباس فذكره.
وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق.
ومن أخباره:
আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: সালমান ফারসি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নিজ মুখে আমাকে তাঁর ঘটনা বর্ণনা করেছেন।
তিনি বলেছেন: আমি ছিলাম পারস্যের অধিবাসী, ইস্পাহান শহরের অন্তর্গত 'জি' নামক এক গ্রামের লোক। আমার পিতা ছিলেন সেই গ্রামের প্রধান (দেহকান)। আমি ছিলাম আল্লাহর সৃষ্টিজগতের মধ্যে তাঁর কাছে সবচেয়ে প্রিয়। তাঁর এই ভালোবাসা আমাকে ঘরের মধ্যে আবদ্ধ করে রাখল, যেমনভাবে দাসীকে আটকে রাখা হয়। আমি অগ্নিপূজায় (মাজুসিয়াত) এতটাই আগ্রহী ছিলাম যে আমি আগুনের তত্ত্বাবধায়ক (কতনুন নার) হয়ে গেলাম। আমি দেখতাম যেন আগুন এক মুহূর্তের জন্যও নিভে না যায়।
সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমার পিতার একটি বিশাল জমিদারি ছিল। একদিন তিনি তাঁর একটি নির্মাণ কাজ নিয়ে ব্যস্ত ছিলেন। তিনি আমাকে বললেন, "হে পুত্র! আজ আমি আমার এই নির্মাণ কাজ নিয়ে ব্যস্ত থাকায় জমিদারি দেখতে যেতে পারছি না। তুমি যাও এবং তা দেখাশোনা করে এসো।" তিনি আমাকে সেখানে কিছু কাজ করার আদেশ দিলেন। আমি তাঁর জমিদারি অভিমুখে বের হলাম। পথে খ্রিস্টানদের একটি উপাসনালয় (কনিসা) দেখতে পেলাম। আমি তাদের সেখানে নামাযের (ইবাদতের) শব্দ শুনতে পেলাম। আমার পিতা আমাকে ঘরে আবদ্ধ করে রাখায় আমি লোকজনের ধর্ম সম্পর্কে কিছুই জানতাম না। যখন আমি তাদের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলাম এবং তাদের শব্দ শুনলাম, তখন আমি তাদের কার্যকলাপ দেখার জন্য ভেতরে প্রবেশ করলাম।
সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: যখন আমি তাদের দেখলাম, তখন তাদের নামায আমার কাছে ভালো লাগল এবং আমি তাদের ধর্মের প্রতি আগ্রহী হলাম। আমি বললাম: "আল্লাহর কসম! আমাদের এই ধর্মের চেয়ে এটি উত্তম।" আল্লাহর কসম, সূর্য ডোবা পর্যন্ত আমি তাদের ছেড়ে যাইনি, আর আমার পিতার জমিদারিও যাইনি। আমি তাদের জিজ্ঞাসা করলাম, "এই ধর্মের উৎস কোথায়?" তারা বলল: "শামে (সিরিয়াতে)।"
সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এরপর আমি পিতার কাছে ফিরে গেলাম। তিনি ততক্ষণে আমাকে খোঁজার জন্য লোক পাঠিয়েছেন এবং তাঁর সকল কাজ ফেলে আমাকে নিয়ে ব্যস্ত ছিলেন। যখন আমি তাঁর কাছে পৌঁছলাম, তিনি বললেন, "হে পুত্র! তুমি কোথায় ছিলে? আমি কি তোমাকে যা দায়িত্ব দিয়েছিলাম, তা ভুলে গেলে?" আমি বললাম, "আব্বা, আমি কিছু লোকের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলাম, যারা তাদের উপাসনালয়ে নামায পড়ছিল। তাদের ধর্মীয় রীতিনীতি আমার খুব ভালো লেগেছে। আল্লাহর কসম! সূর্য ডোবা পর্যন্ত আমি তাদের কাছেই ছিলাম।" তিনি বললেন, "হে পুত্র! সেই ধর্মে কোনো কল্যাণ নেই। তোমার এবং তোমার পূর্বপুরুষদের ধর্ম তার চেয়ে উত্তম।" আমি বললাম: "কখনোই না! আল্লাহর কসম, এটি আমাদের ধর্মের চেয়ে উত্তম।" এতে তিনি ভয় পেয়ে গেলেন। তিনি আমার পায়ে শিকল পরিয়ে দিলেন এবং আমাকে ঘরের মধ্যে বন্দী করে রাখলেন।
সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি খ্রিস্টানদের কাছে লোক পাঠালাম এবং বললাম, "শাম থেকে খ্রিস্টান ব্যবসায়ীদের কোনো কাফেলা আসলে আমাকে খবর দেবে।" এরপর শাম থেকে খ্রিস্টান ব্যবসায়ীদের একটি কাফেলা এল। তারা আমাকে সে খবর দিল। আমি তাদের বললাম: "যখন তারা তাদের প্রয়োজন মিটিয়ে তাদের দেশে ফিরে যেতে চাইবে, তখন আমাকে জানাবে।" যখন তারা তাদের দেশে ফিরে যাওয়ার ইচ্ছা করল, তখন তারা আমাকে জানাল। আমি আমার পা থেকে লোহার শিকল খুলে ফেললাম এবং তাদের সাথে বের হলাম। এভাবে আমি শাম পৌঁছলাম। সেখানে পৌঁছে আমি জিজ্ঞাসা করলাম: "এই ধর্মের সর্বোত্তম লোক কে?" তারা বলল: "উপাসনালয়ের বিশপ (আসক্বফ)।" আমি তার কাছে গেলাম এবং বললাম, "আমি এই ধর্মের প্রতি আগ্রহী হয়েছি এবং আপনার সঙ্গে থাকতে, আপনার উপাসনালয়ে আপনার সেবা করতে, আপনার কাছ থেকে শিখতে এবং আপনার সাথে নামায পড়তে পছন্দ করি।" তিনি বললেন: "ভিতরে এসো।" আমি তাঁর সঙ্গে প্রবেশ করলাম।
সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: লোকটি ছিল একজন খারাপ মানুষ। সে লোকদেরকে সাদাকা দিতে বলত এবং তাতে উৎসাহিত করত। কিন্তু যখন তারা কিছু জমা করত, সে তা নিজের জন্য মজুদ করে রাখত এবং অভাবীদের দিত না। এভাবে সে সোনা ও রুপার সাতটি কলস জমা করে ফেলল। সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি যা দেখলাম, তাতে তাকে প্রচণ্ড ঘৃণা করতাম। এরপর সে মারা গেল। খ্রিস্টানরা তাকে দাফন করার জন্য একত্রিত হলো। আমি তাদের বললাম: "এ লোকটি খারাপ ছিল। সে তোমাদেরকে সাদাকা দিতে বলত এবং উৎসাহিত করত। কিন্তু যখন তোমরা তা নিয়ে আসতে, সে তা নিজের জন্য মজুদ করে রাখত এবং অভাবীদের কিছুই দিত না।" তারা বলল: "আপনি কীভাবে তা জানলেন?" আমি বললাম: "আমি তোমাদের তার গুপ্তধন দেখিয়ে দিতে পারি।" তারা বলল: "তাহলে আমাদের দেখান।" আমি তাদের সেই স্থানটি দেখিয়ে দিলাম। তারা সেখান থেকে সোনা ও রুপা ভর্তি সাতটি কলস বের করল। তারা যখন তা দেখল, তখন বলল: "আল্লাহর কসম! আমরা তাকে কখনোই দাফন করব না।" তারা তাকে শূলে চড়াল এবং পাথর মেরে হত্যা করল।
এরপর তারা অন্য একজনকে এনে তার জায়গায় বসাল। সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি সেই দ্বিতীয় ব্যক্তির মতো আর কাউকে দেখিনি, যে পাঁচ ওয়াক্ত নামায পড়ত। আমি তাকেই সর্বোত্তম মনে করি—দুনিয়ার প্রতি সবচেয়ে বেশি অনাসক্ত, আখেরাতের প্রতি সবচেয়ে বেশি আগ্রহী এবং দিনরাত সবচেয়ে বেশি ইবাদতে মগ্ন। সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি তাকে এমন ভালোবাসতাম, যা এর আগে আর কাউকে বাসিনি। আমি তার সঙ্গে অনেক দিন থাকলাম। যখন তার মৃত্যুর সময় এল, আমি তাকে বললাম, "হে অমুক! আমি আপনার সঙ্গে ছিলাম এবং আপনাকে এমন ভালোবেসেছি, যা আগে কাউকে বাসিনি। এখন আপনি আল্লাহর যে অবস্থা দেখছেন, তা আপনার সামনে উপস্থিত। আপনি আমাকে কার কাছে থাকার জন্য অসিয়ত করবেন এবং কী আদেশ দেবেন?" তিনি বললেন, "হে পুত্র! আল্লাহর কসম! আজ আমি এমন কাউকে জানি না যে আমার পথের উপর আছে। লোকেরা ধ্বংস হয়ে গেছে এবং (দ্বীনকে) পরিবর্তন করে ফেলেছে। তারা তাদের অধিকাংশ বিষয় ছেড়ে দিয়েছে, তবে মসুলের অমুক ব্যক্তি ব্যতীত। সে আমার পথের উপরেই আছে। তুমি তার সঙ্গে মিলিত হও।"
যখন তিনি মারা গেলেন এবং তাকে দাফন করা হলো, আমি মসুলের সেই ব্যক্তির কাছে গেলাম। আমি তাকে বললাম, "হে অমুক! অমুক ব্যক্তি তার মৃত্যুর সময় আমার জন্য আপনার কাছে অসিয়ত করে গেছেন এবং আমাকে জানিয়েছেন যে আপনি তাঁর পথের উপর আছেন।" তিনি আমাকে বললেন: "আমার কাছে থাকো।" আমি তাঁর কাছে থাকলাম। আমি তাকে তার পূর্বের সঙ্গীর মতোই উত্তম ব্যক্তি হিসেবে পেলাম। অল্প কিছুদিন পরেই তিনি মারা গেলেন। যখন তার মৃত্যুর সময় এল, আমি তাকে বললাম, "হে অমুক! অমুক ব্যক্তি আমার জন্য আপনার কাছে অসিয়ত করে গেছেন এবং আপনার সঙ্গে মিলিত হওয়ার আদেশ দিয়েছেন। এখন আপনি মহান আল্লাহর পক্ষ থেকে যে অবস্থা দেখছেন, তা আপনার সামনে উপস্থিত। আপনি আমাকে কার কাছে থাকার জন্য অসিয়ত করবেন এবং কী আদেশ দেবেন?" তিনি বললেন, "হে পুত্র! আল্লাহর কসম! আমি এমন কাউকে জানি না, যে আমাদের মতো পথে আছে, তবে নাসিবিনের অমুক ব্যক্তি ব্যতীত। তুমি তার কাছে যাও।"
যখন তিনি মারা গেলেন এবং তাকে দাফন করা হলো, আমি নাসিবিনের সেই ব্যক্তির কাছে গেলাম। আমি তাঁর কাছে এসে আমার ঘটনা এবং আমার সঙ্গীর দেওয়া আদেশ জানালাম। তিনি বললেন: "আমার কাছে থাকো।" আমি তাঁর কাছে থাকলাম। আমি তাঁকে তাঁর দুই পূর্বের সঙ্গীর পথেই পেলাম। আমি এক উত্তম ব্যক্তির সঙ্গে থাকলাম। আল্লাহর কসম, অল্প কিছুদিন পরেই তাঁর মৃত্যু উপস্থিত হলো। যখন তাঁর মৃত্যুর সময় এল, আমি তাঁকে বললাম, "হে অমুক! অমুক ব্যক্তি আমার জন্য অমুক ব্যক্তির কাছে অসিয়ত করেছিলেন, এরপর সেই অমুক ব্যক্তি আমার জন্য আপনার কাছে অসিয়ত করেছেন। আপনি আমাকে কার কাছে অসিয়ত করবেন এবং কী আদেশ দেবেন?" তিনি বললেন, "হে পুত্র! আল্লাহর কসম! আমরা এমন কাউকে জানি না, যিনি আমাদের পথের ওপর অবশিষ্ট আছেন এবং যার কাছে যেতে আমি তোমাকে নির্দেশ দিতে পারি, তবে আম্মুরিয়ার একজন লোক ব্যতীত। সে আমাদের মতোই পথের উপর আছে। যদি তুমি চাও, তবে তুমি তার কাছে যাও। সে আমাদের পথের উপরই আছে।"
যখন তিনি মারা গেলেন এবং তাকে দাফন করা হলো, আমি আম্মুরিয়ার সেই ব্যক্তির কাছে গেলাম এবং তাঁকে আমার ঘটনা জানালাম। তিনি বললেন: "আমার কাছে থাকো।" আমি তাঁর সঙ্গীদের পথ ও নির্দেশের ওপর থাকা এক উত্তম ব্যক্তির সঙ্গে থাকলাম। সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি সেখানে সম্পদ উপার্জন করলাম, এমনকি আমার কিছু গরু ও মেষও হলো। এরপর তাঁর ওপর আল্লাহর ফায়সালা এসে গেল। যখন তাঁর মৃত্যুর সময় এল, আমি তাঁকে বললাম, "হে অমুক! আমি অমুক ব্যক্তির সাথে ছিলাম, এরপর অমুক ব্যক্তি আমার জন্য অমুক ব্যক্তির কাছে অসিয়ত করেন, এরপর অমুক ব্যক্তি আমার জন্য অমুক ব্যক্তির কাছে অসিয়ত করেন, এরপর সেই অমুক ব্যক্তি আমার জন্য আপনার কাছে অসিয়ত করেন। আপনি আমাকে কার কাছে অসিয়ত করবেন এবং কী আদেশ দেবেন?" তিনি বললেন, "হে পুত্র! আল্লাহর কসম! আমি এমন কাউকে জানি না, যে আমাদের পথের ওপর অবশিষ্ট আছে এবং যার কাছে যেতে আমি তোমাকে নির্দেশ দিতে পারি। তবে এখন তোমার উপর এমন এক নবীর সময় ঘনিয়ে এসেছে, যিনি ইব্রাহিমের (আঃ) ধর্মসহ প্রেরিত হবেন। তিনি আরবের ভূমি থেকে বেরিয়ে আসবেন এবং দুই 'হার্রা' (কালো পাথরের ভূমি) এর মধ্যবর্তী স্থানে, যেখানে খেজুরের গাছ আছে, সেখানে হিজরত করবেন। তাঁর এমন কিছু স্পষ্ট আলামত রয়েছে যা গোপন থাকবে না: তিনি হাদিয়া (উপহার) গ্রহণ করবেন কিন্তু সাদাকা (দান) খাবেন না। তাঁর দুই কাঁধের মাঝখানে নবুওয়তের মোহর থাকবে। যদি তুমি সেই দেশে পৌঁছতে পারো, তবে তা করো।"
এরপর তিনি মারা গেলেন এবং তাকে দাফন করা হলো। আমি আম্মুরিয়ায় আল্লাহর ইচ্ছানুসারে কিছুদিন থাকলাম। এরপর কালব গোত্রের কিছু ব্যবসায়ী আমার পাশ দিয়ে যাচ্ছিল। আমি তাদের বললাম: "তোমরা আমাকে আরবের ভূমিতে নিয়ে যাবে, আর এর বিনিময়ে আমি তোমাদেরকে আমার এই গরুগুলো ও মেষগুলো দেব?" তারা বলল: "হ্যাঁ।" আমি তাদের তা দিয়ে দিলাম এবং তারা আমাকে নিয়ে চলল। যখন তারা আমাকে 'ওয়াদি আল-ক্বুরা' নামক স্থানে পৌঁছাল, তখন তারা আমার ওপর জুলুম করল এবং আমাকে এক ইহুদি ব্যক্তির কাছে গোলাম হিসেবে বিক্রি করে দিল। আমি তার কাছে থাকলাম এবং সেখানে খেজুর গাছ দেখলাম। আমি আশা করলাম, এই হয়তো সেই শহর, যার বর্ণনা আমার সঙ্গী দিয়েছিলেন। কিন্তু আমার মন তাতে নিশ্চিত হলো না। আমি তার কাছে ছিলাম। এমন সময় বনি কুরাইযা গোত্রের মদিনার এক চাচাতো ভাই তার কাছে এল এবং সে আমাকে কিনে নিল। সে আমাকে মদিনায় নিয়ে গেল। আল্লাহর কসম! আমি যেই মাত্র শহরটি দেখলাম, আমার সঙ্গীর দেওয়া বর্ণনার কারণে আমি তা চিনতে পারলাম। আমি সেখানে থাকলাম।
আল্লাহ তাঁর রাসূলকে (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পাঠালেন। তিনি মক্কায় আল্লাহর ইচ্ছানুসারে অবস্থান করলেন। আমি দাসত্বের কাজে ব্যস্ত থাকার কারণে তাঁর কোনো খবর শুনতে পেলাম না। এরপর তিনি মদিনায় হিজরত করলেন। আল্লাহর কসম! আমি আমার মালিকের একটি খেজুর গাছের মাথায় কিছু কাজ করছিলাম, আর আমার মালিক নিচে বসা ছিল। এমন সময় তার এক চাচাতো ভাই এসে তার কাছে দাঁড়াল এবং বলল: "অমুক! ক্বায়লা গোত্রের ওপর আল্লাহ অভিশাপ দিন! আল্লাহর কসম, তারা এখন কুবায় এমন এক ব্যক্তির কাছে একত্রিত হয়েছে, যিনি আজ মক্কা থেকে এসেছেন এবং যিনি নিজেকে নবী বলে দাবি করছেন।"
সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: যখন আমি তা শুনলাম, তখন আমার শরীরে এমন কাঁপুনি শুরু হলো যে আমি প্রায় আমার মালিকের ওপর পড়ে যাচ্ছিলাম। সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি খেজুর গাছ থেকে নেমে এলাম এবং তার চাচাতো ভাইকে বলতে লাগলাম: "তুমি কী বলছ? তুমি কী বলছ?" সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমার মালিক রেগে গেলেন এবং আমাকে জোরে ঘুষি মারলেন। এরপর বললেন: "এতে তোমার কী আসে যায়! তোমার কাজে মন দাও।" আমি বললাম: "কিছু না। আমি শুধু তিনি যা বলেছেন, তা নিশ্চিত হতে চেয়েছিলাম।"
আমার কাছে জমানো কিছু জিনিস ছিল। সন্ধ্যা হলে আমি তা নিয়ে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর কাছে গেলাম, যখন তিনি কুবায় ছিলেন। আমি তাঁর কাছে প্রবেশ করলাম এবং বললাম: "আমি জানতে পেরেছি যে আপনি একজন নেককার লোক, আর আপনার সঙ্গে যারা আছে তারা নিঃস্ব ও অভাবী অপরিচিত মানুষ। এটি কিছু সাদাকার জিনিস ছিল যা আমার কাছে ছিল। আমি দেখলাম যে অন্যদের চেয়ে আপনারাই এর বেশি হকদার।" সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি তা তাঁর কাছে পেশ করলাম। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর সাহাবীদের বললেন: "তোমরা খাও।" কিন্তু তিনি নিজের হাত টেনে নিলেন এবং খেলেন না। সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি মনে মনে বললাম: "এই তো প্রথম আলামত!"
এরপর আমি তাঁর কাছ থেকে চলে গেলাম এবং কিছু জিনিসপত্র জোগাড় করলাম। ইতিমধ্যে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মদিনায় চলে এসেছেন। আমি তা নিয়ে তাঁর কাছে এসে বললাম: "আমি দেখলাম যে আপনি সাদাকা খান না। আর এটি একটি হাদিয়া, যা দিয়ে আমি আপনাকে সম্মান জানাচ্ছি।" সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তা থেকে খেলেন এবং তাঁর সাহাবীদেরও তাঁর সাথে খেতে আদেশ দিলেন। সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি মনে মনে বললাম: "এই তো দ্বিতীয় আলামত!"
এরপর আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর কাছে এলাম। তিনি তখন বাকী' আল-গারক্বাদ নামক স্থানে তাঁর সাহাবীদের একজনের জানাযার পেছনে যাচ্ছিলেন। তাঁর গায়ে দু'টি চাদর ছিল এবং তিনি তাঁর সাহাবীদের মাঝে বসেছিলেন। আমি তাঁকে সালাম দিলাম। এরপর আমি তাঁর পিঠের দিকে ঘুরলাম, যেন আমার সঙ্গী যে মোহরের বর্ণনা দিয়েছিলেন, আমি তা দেখতে পাই। যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম দেখলেন যে আমি তাঁর পিঠের দিকে ঘুরছি, তখন তিনি বুঝতে পারলেন যে আমি বর্ণিত কোনো বিষয় নিয়ে নিশ্চিত হতে চাচ্ছি। সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: তিনি তাঁর পিঠ থেকে চাদরটি সরিয়ে দিলেন। আমি নবুওয়তের মোহরটি দেখলাম এবং চিনতে পারলাম। আমি তাঁর ওপর ঝুঁকে পড়লাম, তাঁকে চুম্বন করতে লাগলাম এবং কাঁদতে লাগলাম। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাকে বললেন: "এদিকে এসো।" আমি তাঁর দিকে ফিরলাম এবং হে ইবনে আব্বাস! যেভাবে তোমাকে বর্ণনা করলাম, সেভাবেই তাঁকে আমার পুরো ঘটনা খুলে বললাম। সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর সাহাবীরা এই ঘটনা শুনতে পাওয়ায় তিনি খুব খুশি হয়েছিলেন।
এরপর দাসত্বের কারণে সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ব্যস্ত থাকলেন, ফলে তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর সাথে বদর ও উহুদ যুদ্ধে অংশগ্রহণ করতে পারেননি। সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এরপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাকে বললেন: "হে সালমান! তুমি মুক্ত হওয়ার জন্য চুক্তি (মুকাতাব) করো।" আমি আমার মালিকের সাথে তিনশ খেজুর গাছের বিনিময়ে, যা আমি তার জন্য 'ফাকীর' (ছোট গর্ত) তৈরি করে জীবিত করে দেব, এবং চল্লিশ উকিয়া (স্বর্ণ/রৌপ্য)-এর বিনিময়ে চুক্তি করলাম। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর সাহাবীদের বললেন: "তোমরা তোমাদের ভাইকে সাহায্য করো।"
তারা খেজুর গাছ দিয়ে আমাকে সাহায্য করলেন—কেউ ত্রিশ চারা, কেউ বিশ, কেউ পনেরো, কেউ দশ—অর্থাৎ যার কাছে যা ছিল সেই পরিমাণে—এভাবে আমার জন্য তিনশ চারা একত্রিত হলো। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাকে বললেন: "হে সালমান! যাও, এর জন্য গর্ত তৈরি করো। যখন কাজ শেষ হবে, আমার কাছে এসো। আমি নিজ হাতে তা রোপণ করব।" আমি গর্ত তৈরি করলাম এবং আমার সাহাবীরা আমাকে সাহায্য করলেন। কাজ শেষ হলে আমি তাঁর কাছে এসে তাঁকে জানালাম। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমার সাথে সেখানে গেলেন। আমরা তাঁর কাছে চারাগুলো এগিয়ে দিচ্ছিলাম আর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম নিজ হাতে তা রোপণ করছিলেন। সেই সত্তার কসম, যার হাতে সালমানের প্রাণ, সেই গাছগুলোর একটি চারাও মরেনি।
আমি খেজুর গাছ পরিশোধ করলাম, কিন্তু অর্থ বাকি রইল। এরপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর কাছে কিছু গনীমতের মাল হিসেবে একটি মুরগির ডিমের মতো স্বর্ণখণ্ড এল। তিনি বললেন: "মুকাতাব (চুক্তিভুক্ত) ফারসির কী খবর?" সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমাকে ডাকা হলো। তিনি বললেন: "হে সালমান! এটা নাও এবং এর দ্বারা তোমার দেনা পরিশোধ করো।" আমি বললাম: "হে আল্লাহর রাসূল! আমার এত বড় দেনার কাছে এই সামান্য জিনিস কী কাজে আসবে?!" তিনি বললেন: "এটা নাও। আল্লাহ অবশ্যই এর দ্বারা তোমার দেনা পরিশোধ করিয়ে দেবেন।" সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি তা নিলাম। সেই সত্তার কসম, যার হাতে সালমানের প্রাণ, আমি সেই স্বর্ণখণ্ড থেকে তাদের জন্য চল্লিশ উকিয়া ওজন করে দিলাম। এভাবে আমি তাদের হক আদায় করলাম এবং মুক্ত হলাম। এরপর আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর সাথে খন্দক যুদ্ধে অংশগ্রহণ করলাম। এরপর থেকে তাঁর সাথে আমার আর কোনো যুদ্ধে অংশগ্রহণ করা ফওত হয়নি।
10027 - عن أنس بن مالك قال: اشتكى سلمان فعاده سعد، فرآه يبكي، فقال له سعد: ما يبكيك يا أخي؟ أليس قد صحبت رسول الله صلى الله عليه وسلم، أليس؟ أليس؟ قال سلمان: ما أبكي واحدة من اثنتين، ما أبكي حبا للدنيا، ولا كراهية للآخرة، ولكن رسول الله صلى الله عليه وسلم عهد إلي عهدا، فما أراني إلا قد تعديت، قال: وما عهد إليك؟ قال: عهد إلي:"أنه يكفي أحدكم مثل زاد الراكب، ولا أُراني إلا قد تعديتُ، وأما أنت يا سعد فاتق الله عند حُكْمك إذا حكمت، وعند قَسْمك إذا قسمت، وعند هَمِّك إذا هممتَ" قال ثابت:"فبلغني أنه ما ترك إلا بضعة وعشرين درهما، من نُفَيْقةٍ كانت عنده".
حسن: رواه ابن ماجه (4104)، والطبراني في الكبير (6/ 279)، وأبو نعيم في الحلية (1/ 197) كلهم من طريق الحسن بن أبي الربيع، حدثنا عبد الرزاق، حدثنا جعفر بن سليمان، عن ثابت، عن أنس فذكره.
وإسناده حسن من أجل الحسن بن أبي الربيع - وهو الحسن بن يحيى بن الجعد العبدي الجرجاني -، وجعفر بن سليمان الضبعي فإنهما حسنا الحديث.
وتوفي سلمان سنة خمس وثلاثين، وقيل: سنة ست وثلاثين.
وأما عمره فقيل: إنه تجاوز المئتين وخمسين، وقيل: ثلاثمائة وخمسين، وهذه الأقوال ذكرت بدون مستند معتمد، ولم يذكره ابن قانع ولا ابن عبد البر، وإنما ذكره ابن مندة في"معرفة الصحابة" وأبو نعيم في"معرفة الصحابة" بدون مستند بل وقد قالا: إنه أدرك وصي عيسى عليه السلام، هذا كله بعيد، فإنه لو قُدِّر أنه عاش ثلاثمائة وخمسين فبينه وبين وصي عيسى عليه السلام ثلاثمائة. ولذا قال الذهبي: إنه ما زاد على الثمانين. ولو صح هذا القول لتواترت النقول من الصحابة والتابعين، وعد ذلك من خوارق العادات.
ولذا قال الذهبي بعد أن نقل عن البحراني أنه عاش ثلاثمائة وخمسين سنة:"وقد فتشت فما ظفرت في سنه بشيء سوى قول البحراني، وذلك منقطع لا إسناده له". ثم قال:"لعله عاش بضعا وسبعين سنة، وما أراه بلغ المائة". سير أعلام النبلاء (1/
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) অসুস্থ হলেন। তখন সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে দেখতে এলেন। সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে কাঁদতে দেখলেন এবং বললেন: হে আমার ভাই, আপনি কাঁদছেন কেন? আপনি কি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর সাহচর্য লাভ করেননি? আপনি কি... আপনি কি...?
সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি দুটির মধ্যে কোনোটির জন্যই কাঁদছি না। আমি দুনিয়ার প্রতি ভালোবাসার জন্যও কাঁদছি না, আর আখিরাতের প্রতি বিতৃষ্ণার জন্যও কাঁদছি না। কিন্তু রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমার কাছে একটি অঙ্গীকার নিয়েছিলেন, আর আমি দেখছি আমি তা লঙ্ঘন করে ফেলেছি।
সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তিনি আপনার কাছে কী অঙ্গীকার নিয়েছিলেন?
সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তিনি আমার কাছে অঙ্গীকার নিয়েছিলেন যে, "তোমাদের কারো জন্য একজন আরোহীর পাথেয়র সমপরিমাণ যথেষ্ট, আর আমি দেখছি যে আমি তা অতিক্রম করে ফেলেছি।"
আর হে সা'দ, যখন তুমি বিচার করবে তখন তোমার বিচারে আল্লাহকে ভয় করবে, যখন তুমি বণ্টন করবে তখন তোমার বণ্টনে আল্লাহকে ভয় করবে এবং যখন তুমি কোনো বিষয়ে মনস্থ করবে তখন তোমার মনস্থ করার ক্ষেত্রে আল্লাহকে ভয় করবে।
সাবিত (রাহঃ) বলেন: আমার কাছে এই খবর পৌঁছেছে যে, তাঁর কাছে যে সামান্য খরচ ছিল তা থেকে তিনি বিশের অধিক কয়েকটি দিরহাম (মাত্র) রেখে গেছেন।
10028 - عن يزيد بن أبي عبيد قال: رأيت أثر ضربة في ساق سلمة، فقلت: يا أبا مسلم، ما هذه الضربة؟ فقال: هذه ضربة أصابتني يوم خيبر، فقال الناس: أصيب سلمة، فأتيت النبي صلى الله عليه وسلم، فنفث فيه ثلاث نفثات، فما اشتكيتها حتى الساعة.
صحيح: رواه البخاري في المغازي (4206) عن المكي بن إبراهيم، حدثنا يزيد بن أبي عبيد فذكره. وتوفي سلمة بن عمرو بن الأكوع سنة 74 هـ.
ইয়াযিদ ইবনে আবি উবাইদ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি সালামাহর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) পায়ে একটি আঘাতের চিহ্ন দেখতে পেলাম। তখন আমি জিজ্ঞাসা করলাম, হে আবু মুসলিম! এই আঘাত কিসের? তিনি বললেন: খায়বারের যুদ্ধের দিন এই আঘাতটি আমাকে লেগেছিল। লোকেরা তখন বলল: সালামাহ আঘাতপ্রাপ্ত হয়েছে। অতঃপর আমি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে আসলাম, তিনি সেখানে তিনবার ফুঁ দিলেন, এরপর থেকে এই মুহূর্ত পর্যন্ত আমি সেই আঘাতের জন্য কোনো কষ্ট ভোগ করিনি।
10029 - عن سُنين أبي جميلة قال: إنه أدرك النبي صلى الله عليه وسلم وخرج معه عام الفتح.
صحيح: رواه البخاري في المغازي (4301) عن إبراهيم بن موسى، أخبرنا هشام، عن معمر، عن الزهري، عن سُنين أبي جميلة قال: فذكره.
সুনাইন আবী জামীলা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নিশ্চয়ই তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সান্নিধ্য লাভ করেছিলেন এবং মক্কা বিজয়ের বছর তাঁর সাথে (জিহাদের উদ্দেশ্যে) বেরিয়েছিলেন।
10030 - عن ابن عباس أن ضمادا قدم مكة، وكان من أزد شَنُوءة، وكان يرقي من هذه الريح، فسمع سفهاء من أهل مكة يقولون: إن محمدا مجنون، فقال: لو أني رأيت هذا الرجل لعل الله يشفيه على يدي، قال: فلقيه، فقال: يا محمد! إني أرقي من هذه الريح، وإن الله يشفي على يدي من شاء فهل لك؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن الحمد لله نحمده ونستعينه من يهده الله فلا مضل له، ومن يضلل فلا هادي له، وأشهد أن لا إله إلا الله وحده لا شريك له وأن محمدا عبده ورسوله، أما بعد". قال: فقال: أعد عليّ كلماتك هؤلاء، فأعادهن عليه رسول الله صلى الله عليه وسلم ثلاث مرات، قال: فقال: لقد سمعت قول الكهنة وقول السحرة وقول الشعراء، فما سمعت مثل كلمات هؤلاء، ولقد بلغن ناعوس البحر، قال: فقال: هات يدك أبايعك على الإسلام، قال: فبايعه، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"وعلى قومك". قال: وعلى قومي، قال: فبعث رسول الله صلى الله عليه وسلم سرية فمروا بقومه، فقال صاحب السرية للجيش: هل أصبتم من هؤلاء شيئا؟ فقال رجل من القوم: أصبت منهم مطهرة، فقال: ردوها، فإن هؤلاء قوم ضماد.
صحيح: رواه مسلم في الجمعة (868) من طرق، عن عبد الأعلى، ثنا داود بن عمرو بن سعيد، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس فذكر الحديث.
وضماد: هو ابن ثعلبة الأزدي، من أزد شنوءة.
وأخرج حديثه هذا الطبراني في المعجم الكبير (8/ 363)، وأسمه فيه:"ضمام" بالميم في آخره، وهذا ليس تحريفا، فإنه يطلق عليه الاسمان"ضماد" و"ضمام" نبّه على ذلك الحافظ ابن حجر في الإصابة (2/ 210).
وفي الصحابة أيضا"ضمام" غير هذا، وهو: ضمام بن ثعلبة السعدي، من بني سعد بن بكر، وهو أشهر وله أحاديث منها حديثه المشهور في محاورته النبي صلى الله عليه وسلم وسؤاله إياه عن أمور الإسلام وهو في الصحيحين.
قوله:"من هذه الريح" المراد بالريح هنا الجنون ومسّ الجن.
وقوله:"فهل لك" أي هل لك رغبة في رقيتي.
وقوله:"ناعوس البحر" بالنون، وفي بعض الروايات"قاموس البحر" بالقاف أي وسطه، وقيل: قعره الأقصى.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় যিমাদ (ضِمَاد) (যিনি আয্দ শানূআ গোত্রের লোক ছিলেন) মক্কায় আসলেন। তিনি বাতজনিত (জ্বিনজনিত) রোগের জন্য ঝাড়ফুঁক করতেন। তিনি মক্কাবাসীদের কিছু নির্বোধ লোককে বলতে শুনলেন যে, মুহাম্মাদ পাগল। তখন তিনি বললেন: যদি আমি এই লোকটির সাক্ষাৎ পেতাম, তাহলে হয়তো আল্লাহ্ আমার হাতেই তাঁকে আরোগ্য দান করতেন। বর্ণনাকারী বলেন: অতঃপর তিনি তাঁর সাথে সাক্ষাৎ করলেন এবং বললেন: হে মুহাম্মাদ! আমি এই বাতজনিত রোগের জন্য ঝাড়ফুঁক করি, আর আল্লাহ্ যার ইচ্ছা করেন আমার হাতেই আরোগ্য দান করেন। আপনি কি (আমার ঝাড়ফুঁকে) আগ্রহী? তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "নিশ্চয়ই সমস্ত প্রশংসা আল্লাহ্র জন্য, আমরা তাঁর প্রশংসা করি এবং তাঁর কাছে সাহায্য চাই। আল্লাহ্ যাকে হিদায়াত দেন, তাকে কেউ পথভ্রষ্ট করতে পারে না। আর যাকে তিনি পথভ্রষ্ট করেন, তাকে কেউ হিদায়াত দিতে পারে না। আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, আল্লাহ্ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই, তিনি এক ও তাঁর কোনো শরীক নেই। এবং আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, মুহাম্মাদ তাঁর বান্দা ও রাসূল। অতঃপর..." বর্ণনাকারী বলেন: তখন যিমাদ বললেন: আপনার এই কথাগুলো আমার কাছে আবার বলুন। অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তা তিনবার তাঁর নিকট পুনরাবৃত্তি করলেন। বর্ণনাকারী বলেন: তখন যিমাদ বললেন: আমি গণকদের কথা, জাদুকরদের কথা ও কবিদের কথা শুনেছি। কিন্তু আপনার এই কথাগুলোর মতো কথা আমি কখনো শুনিনি। এ কথাগুলো সমুদ্রের গভীরতা পর্যন্ত পৌঁছে গেছে। বর্ণনাকারী বলেন: তখন তিনি বললেন: আপনার হাত দিন, আমি আপনার কাছে ইসলামের উপর বাইয়াত (শপথ) গ্রহণ করি। বর্ণনাকারী বলেন: অতঃপর তিনি বাইয়াত গ্রহণ করলেন। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "আর তোমার কওমের পক্ষ থেকেও।" তিনি বললেন: আমার কওমের পক্ষ থেকেও। বর্ণনাকারী বলেন: অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম একটি সামরিক বাহিনী (সারিয়্যা) প্রেরণ করলেন। তারা যিমাদের গোত্রের পাশ দিয়ে অতিক্রম করার সময় বাহিনীর প্রধান সৈন্যদেরকে বললেন: তোমরা কি এদের কাছ থেকে কিছু নিয়েছ? তখন কওমের এক ব্যক্তি বলল: আমি তাদের কাছ থেকে একটি পানির পাত্র (মাতহারা) নিয়েছি। তখন তিনি বললেন: ওটা ফিরিয়ে দাও। কেননা এরা যিমাদের কওম।
10031 - عن سلمة بن الأكوع قال: خرجنا مع النبي صلى الله عليه وسلم إلى خيبر، فسرنا ليلا، فقال رجل من القوم لعامر: يا عامر، ألا تسمعنا من هنيهاتك؟ وكان عامر رجلا حدَّاء، فنزل يحدو بالقوم يقول:
اللهم لولا أنت ما اهتدينا … ولا تصدقنا ولا صلينا
فاغفر فداء لك ما اتقينا … وثَبِّت الأقدام إن لاقينا
وألقين سكينة علينا … إنا إذا صيح بنا أبينا
وبالصياح عولوا علينا
فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من هذا السائق؟" قالوا: عامر بن الأكوع. قال:"يرحمه الله" قال رجل من القوم: وجبت يا نبي الله، لولا أمتعتنا به؟ فذكر الحديث وفيه:
فلما تصاف القوم كان سيف عامر قصيرا، فتناول به ساق يهودي ليضربه، ويرجع ذباب سيفه، فأصاب عين ركبة عامر، فمات منه. قال: فلما قفلوا، قال سلمة: رآني رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو آخذ بيدي، قال:"ما لك؟" قلت له: فداك أبي وأمي، زعموا أن
عامرا حبط عمله؟ قال النبي صلى الله عليه وسلم:"كذب من قاله، إن له لأجرين - وجمع بين إصبعيه - إنه لجاهِدٌ مجاهد، قَلَّ عربي مشى بها مثله".
متفق عليه: رواه البخاري في المغازي (4196) ورواه مسلم في الجهاد (1802: 123) كلاهما من طريق حاتم بن إسماعيل، عن يزيد بن أبي عبيد، عن سلمة بن الأكوع فذكره. واللفظ للبخاري ولفظ مسلم نحوه.
والحديث مذكور بطوله في غزوة خيبر.
সালামাহ ইবনুল আকওয়া' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাথে খায়বারের উদ্দেশ্যে রওয়ানা হলাম। আমরা রাতে পথ চলছিলাম। তখন কওমের এক ব্যক্তি ‘আমিরকে বলল, হে আমির! তুমি কি তোমার কিছু কবিতা/বচন আমাদেরকে শোনাবে না? 'আমির ছিলেন একজন বচন/কবিতা আবৃত্তিকারী ব্যক্তি। তখন তিনি নেমে এসে কাফেলাকে উৎসাহ দিতে লাগলেন এবং বলতে লাগলেন:
হে আল্লাহ! তুমি না থাকলে আমরা হেদায়েত পেতাম না, আর না আমরা দান করতাম, আর না সালাত আদায় করতাম।
আমাদের সব গুনাহ ক্ষমা করো, তোমার জন্য আমার জীবন উৎসর্গিত, যা আমরা তোমার কাছে চেয়েছি। আর শত্রুর মোকাবিলা হলে আমাদের পা দৃঢ় রেখো।
আর আমাদের ওপর প্রশান্তি বর্ষণ করো। আমরা যখন আহূত হই, তখন আমরা অস্বীকার করি না।
আর যুদ্ধের ডাকে তারা আমাদের ওপর নির্ভর করে।
রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন, "এই চালক কে?" লোকেরা বলল, ইনি আমির ইবনুল আকওয়া'। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "আল্লাহ তাকে রহম করুন।" কওমের এক ব্যক্তি বলল: হে আল্লাহর নবী! (তার জন্য জান্নাত) ওয়াজিব হয়ে গেছে! আপনি যদি তাকে আমাদের ভোগ করার জন্য রাখতেন (অর্থাৎ দীর্ঘায়ু দিতেন)!
এরপর তিনি পুরো হাদীসটি উল্লেখ করেন এবং এতে আছে: যখন লোকেরা কাতারবদ্ধ হলো, তখন আমিরের তরবারি ছিল খাটো। তিনি তা দিয়ে এক ইয়াহুদির পায়ে আঘাত করতে গেলেন, কিন্তু তার তরবারির ধারালো অগ্রভাগ ফিরে এসে আমিরের হাঁটুর শিরায় আঘাত করল। এর ফলে তিনি মৃত্যুবরণ করলেন।
সালামাহ বলেন, এরপর যখন আমরা ফিরে এলাম, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাকে দেখলেন এবং আমার হাত ধরলেন, বললেন, "তোমার কী হয়েছে?" আমি তাঁকে বললাম: আমার পিতা-মাতা আপনার জন্য উৎসর্গিত হোক, লোকেরা ধারণা করছে যে আমিরের আমল বাতিল হয়ে গেছে? নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন, "যে এটা বলেছে, সে মিথ্যা বলেছে। নিঃসন্দেহে তার জন্য রয়েছে দ্বিগুণ প্রতিদান"— এই কথা বলে তিনি তাঁর দুটি আঙুল একত্র করলেন।— "নিঃসন্দেহে সে ছিল একজন কঠোর সংগ্রামী মুজাহিদ। এমন কম আরবই আছে, যারা তার মতো চলেছে।"
10032 - عن أبي أسامة قال: قال هشام بن عروة: فأخبرني أبي، قال: لما قتل الذين ببئر معونة وأسر عمرو بن أمية الضمري، قال له عامر بن الطفيل: من هذا؟ فأشار إلى قتيل، فقال له عمرو بن أمية: هذا عامر بن فهيرة. فقال: لقد رأيته بعد ما قُتِل رُفِعَ إلى السماء حتى إني لأنظر إلى السماء بينه وبين الأرض، ثم وُضِعَ، فأتى النبي صلى الله عليه وسلم خبرهم فنعاهم، فقال:"إن أصحابكم قد أصيبوا، وإنهم قد سألوا ربهم، فقالوا: ربنا أخبر عنا إخواننا بما رضينا عنك، ورضيت عنا، فأخبرهم عنهم"، وأصيب يومئذ فيهم عروة بن أسماء بن الصلت فسمي عروة به، ومنذر بن عمرو سمي به منذرا.
رواه البخاري في المغازي (4093) عقب حديث الهجرة المروي عن عائشة من رواية البخاري عن عبيد بن إسماعيل، ثنا أبو أسامة، عن هشام، عن أبيه، عن عائشة.
فقال عقبة:"وعن أبي أسامة …" فذكره مرسلا، فهو معطوف على الإسناد السابق، كما قال الحافظ ابن حجر في التغليق (4/ 112)، وإنما فصله ليبين الموصول من المرسل، قاله في الفتح (7/ 390).
يعني رواه من حديث عائشة موصولا، وفيه قصة هجرة النبي صلى الله عليه وسلم إلى المدينة، ثم رواه بالإسناد إلى عروة بن الزبير، فذكر قصة أهل بئر معونة مرسلا عن عروة.
والحديثان رواهما أبو نعيم والإسماعيلي والبيهقي مساقا واحدا موصولا به مدرجا، ولم يفصلوها كما فصله البخاري، ولذلك أورده ابن حجر في كتابه المدرج ليبين أن عمله هذا مدرج، وأن القصة الثانية ليست متصلة بل هي من مراسيل عروة، والله أعلم. وانظر: الفتح (7/ 390).
আবু উসামা থেকে বর্ণিত। তিনি বলেন, হিশাম ইবনে উরওয়া বলেছেন: আমার পিতা (উরওয়া ইবনে যুবাইর) আমাকে খবর দিয়েছেন, তিনি বলেন: যখন বি'রে মাউনাতে লোকজনকে হত্যা করা হলো এবং আমর ইবনে উমায়্যা আদ্-দামরীকে বন্দী করা হলো, তখন আমির ইবনে তুফাইল তাকে (আমরকে) জিজ্ঞেস করল: এই নিহত ব্যক্তিটি কে? সে (আমর) একজন নিহত ব্যক্তির দিকে ইশারা করল। তখন আমর ইবনে উমায়্যা তাকে বলল: ইনি হলেন আমির ইবনে ফুহাইরাহ। আমির ইবনে তুফাইল বলল: আমি তাকে নিহত হওয়ার পর দেখেছি, তাকে আকাশের দিকে তুলে নেওয়া হয়েছে। এমনকি আমি তার ও মাটির মাঝখানে আকাশ দেখতে পাচ্ছিলাম। অতঃপর তাকে নামিয়ে রাখা হলো।
নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে তাদের শাহাদাতের খবর পৌঁছল। অতঃপর তিনি তাদের মৃত্যুর সংবাদ দিলেন এবং বললেন: "নিশ্চয়ই তোমাদের সাথীরা বিপদে পড়েছে (অর্থাৎ শাহাদাত লাভ করেছে)। আর তারা তাদের রবের কাছে প্রার্থনা করেছে। তারা বলেছে: হে আমাদের রব, আমরা তোমার প্রতি সন্তুষ্ট এবং তুমিও আমাদের প্রতি সন্তুষ্ট—এ খবর আমাদের ভাইদের কাছে জানিয়ে দাও। তখন আল্লাহ্ তাদের সম্পর্কে জানিয়ে দিলেন।"
আর সেদিন তাদের মধ্যে উরওয়া ইবনে আসমা ইবনে আস-সলত শাহাদাত বরণ করেন, আর তার নামে উরওয়া নাম রাখা হয়। এবং মুনযির ইবনে আমর শাহাদাত বরণ করেন, তার নামে মুনযির নাম রাখা হয়।
10033 - عن أبي هريرة قال: بعث رسول الله صلى الله عليه وسلم عمر على الصدقة، فقيل: منع ابنُ جميل، وخالد بن الوليد، والعباس عم رسول الله صلى الله عليه وسلم، فذكر الحديث وفيه: ثم قال:
"يا عمر، أما شعرت أن عم الرجل صنو أبيه".
متفق عليه: رواه البخاري في الزكاة (1468)، ومسلم في الزكاة (983 - 11) كلاهما من طريق أبي الزناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة فذكره، والسياق لمسلم، وليس عند البخاري:"يا عمر، أما شعرت أن عم الرجل صنو أبيه".
وبمعناه روي عن علي أن النبي صلى الله عليه وسلم قال لعمر في العباس:"إن عم الرجل صنو أبيه" وكان عمر كلَّمَه في الصدقة.
رواه الترمذي (3760)، وأحمد (725) كلاهما من حديث وهب بن جرير، حدثني أبي، قال: سمعت الأعمش، يحدث عن عمرو بن مرة، عن أبي البختري، عن علي فذكره. والسياق للترمذي.
قال الترمذي:"هذا حديث حسن".
وقال الهيثمي في المجمع (10/ 238):"رواه أحمد ورجاله رجال الصحيح … إلا أن أبا البختري لم يسمع من علي، ولا عمر، فهو مرسل صحيح".
ذكره الهيثمي في المجمع لأجل طول الحديث عند أحمد وإلا فهو ليس على شرطه، وأما أبو البختري فهو كما قال، فإنه لم يدرك عليا ولم يره. قاله شعبة. انظر: المراسيل (278).
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম উমরকে সাদাকা (যাকাত) সংগ্রহের জন্য প্রেরণ করলেন। তখন বলা হলো: ইবনু জামীল, খালিদ ইবনুল ওয়ালীদ এবং রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের চাচা আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যাকাত দিতে অস্বীকার করেছেন। (বর্ণনাকারী) এরপর সম্পূর্ণ হাদীসটি উল্লেখ করলেন এবং এর মধ্যে আছে: অতঃপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন:
"হে উমর, তুমি কি জানো না যে, মানুষের চাচা হলো তার পিতার সমতুল্য (বা পিতার সহোদর)?"
10034 - عن سعد بن أبي وقاص قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم للعباس:"هذا العباس بن عبد المطلب أجود قريش كفًّا وأوصلها".
حسن: رواه أحمد (1610)، والنسائي في فضائل الصحابة (71)، وأبو يعلى (820)، وصحّحه ابن حبان (7052)، والحاكم (3/ 328 - 329) كلهم من طريق محمد بن طلحة التيمي، حدثني أبو سهيل نافع بن مالك، عن سعيد بن المسيب، عن سعد بن أبي وقاص فذكره.
وإسناده حسن من أجل محمد بن طلحة التيمي، فإنه حسن الحديث.
قال الهيثمي في المجمع (9/ 268):"رواه أحمد والبزار بنحوه، وأبو يعلى والطبراني في الأوسط، وفيه محمد بن طلحة التيمي وثّقه غير واحد، وبقية رجال أحمد وأبي يعلى رجال الصحيح".
وروي عن ابن عباس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"العباس مني وأنا منه".
رواه الترمذي (3759)، والنسائي (4775)، وأحمد (2734)، وصحّحه الحاكم (3/ 325) كلهم من طريق إسرائيل، عن عبد الأعلى، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس فذكره.
قال الترمذي:"هذا حديث حسن صحيح غريب لا نعرفه إلا من حديث إسرائيل".
وعبد الأعلى هو ابن عامر الثعلبي ضعيف عند أكثر أهل العلم، وبه أعلَّه الذهبي في السير (2/ 99، 102).
والسياق للترمذي، وساق أحمد والنسائي بسياق أطول، وهو الآتي:
عن ابن عباس: أن رجلا من الأنصار وقع في أب للعباس كان في الجاهلية، فلطمه العباس، فجاء قومه، فقالوا: والله لنلطمنه كما لطمه. فلبسوا السلاح، فبلغ ذلك رسول الله صلى الله عليه وسلم، فصعد المنبر، فقال:"أيها الناس، أي أهل الأرض أكرم على الله؟" قالوا: أنت. قال:"فإن العباس مني، وأنا منه، فلا تسبوا أمواتنا، فتؤذوا أحياءنا" فجاء القوم، فقالوا: يا رسول الله، نعوذ بالله من غضبك.
وروي أيضا عن عبد المطلب بن ربيعة بن الحارث بن عبد المطلب أن العباس بن عبد المطلب دخل على رسول الله صلى الله عليه وسلم مغضبا وأنا عنده، فقال:"ما أغضبك؟" قال: يا رسول الله! ما لنا ولقريش، إذا تلاقوا بينهم تلاقوا بوجوه مبشرة، وإذا لقونا لقونا بغير ذلك. قال: فغضب رسول الله صلى الله عليه وسلم احمر وجهه، ثم قال:"والذي نفسي بيده، لا يدخل قلب رجل الإيمان حتى يحبكم لله ورسوله" ثم قال:"يا أيها الناس، من آذى عمي فقد آذاني، فإنما عم الرجل صنو أبيه".
رواه الترمذي (3758)، وأحمد (17515)، والنسائي في فضائل الصحابة (73)، وصحّحه الحاكم (3/ 333) كلهم من طريق يزيد بن أبي زياد، عن عبد الله بن الحارث، حدثني عبد المطلب بن ربيعة بن الحارث بن عبد المطلب فذكره.
قال الترمذي:"هذا حديث حسن صحيح".
وليس كما قال، فإن يزيد بن أبي زياد هو الهاشمي مولاهم الكوفي ضعيف عند جمهور أهل العلم، وكان شيعيا.
وروي أيضا عن العباس بن عبد المطلب قال: كنا نلقى النفر من قريش، وهم يتحدثون، فيقطعون حديثهم، فذكرنا ذلك لرسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال:"ما بال أقوام يتحدثون، فإذا رأوا الرجل من أهل بيتي قطعوا حديثهم. والله، لا يدخل قلب رجل الإيمان حتى يحبهم لله ولقرابتهم مني".
رواه ابن ماجه (140) عن محمد بن طريف، حدثنا محمد بن فضيل، حدثنا الأعمش، عن أبي سبرة النخعي، عن محمد بن كعب القرظي، عن العباس بن المطلب فذكره.
ومن هذا الوجه صحّحه الحاكم (4/ 75).
وأبو سبرة النخعي يقال: اسمه عبد الله بن عابس، قال ابن معين: لا أعرفه، وذكره ابن حبان في الثقات، ولذا قال عنه الحافظ:"مقبول" يعني حيث يُتَابَع، ولم أجد له متابعا.
ومحمد بن كعب القرظي لم يدرك العباس.
وبه أعله البوصيري في مصباح الزجاجة.
وروي أيضا عن عبد الله بن عمرو، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن الله اتخذني خليلا كما اتخذ إبراهيم خليلا. فمنزلي ومنزل إبراهيم في الجنة يوم القيامة تجاهين. والعباس بيننا مؤمن بين خليلين".
رواه ابن ماجه (141) عن عبد الوهاب بن الضحاك، حدثنا إسماعيل بن عياش، عن صفوان بن
عمرو، عن عبد الرحمن بن جبير بن نفير، عن كثير بن مرة الحضرمي، عن عبد الله بن عمرو فذكره.
وعبد الوهاب بن الضحاك هو: ابن أبان أبو الحارث الحمصي متروك.
وبه أعلَّه البوصيري.
সা'দ ইবনু আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: "এই আব্বাস ইবনু আবদুল মুত্তালিব হলেন কুরাইশদের মধ্যে হাতের দিক থেকে সবচেয়ে দানশীল এবং তাদের সাথে সবচেয়ে বেশি আত্মীয়তার বন্ধন রক্ষাকারী।"
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আব্বাস আমার থেকে, আর আমি তাঁর থেকে।"
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত যে, একজন আনসারী আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর জাহেলিয়াতের সময়ের কোনো পূর্বপুরুষ সম্পর্কে খারাপ মন্তব্য করলে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে চপেটাঘাত করলেন। তখন তার গোত্রের লোকেরা এসে বলল: "আল্লাহর কসম! সে যেমন তাকে চপেটাঘাত করেছে, আমরাও তাকে চপেটাঘাত করব।" অতঃপর তারা অস্ত্রসজ্জিত হলো। এই খবর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে পৌঁছলে তিনি মিম্বরে আরোহণ করলেন এবং বললেন: "হে লোক সকল! পৃথিবীর কোন ব্যক্তি আল্লাহর কাছে সর্বাধিক সম্মানিত?" তারা বলল: "আপনি।" তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই আব্বাস আমার থেকে, আর আমি তাঁর থেকে। তোমরা আমাদের মৃতদের গালমন্দ করো না, তাহলে তোমরা আমাদের জীবিতদের কষ্ট দেবে।" তখন ঐ গোত্রের লোকেরা এসে বলল: "হে আল্লাহর রাসূল! আমরা আপনার ক্রোধ থেকে আল্লাহর কাছে আশ্রয় চাই।"
আব্দুল মুত্তালিব ইবনু রাবী'আহ ইবনু আল-হারিস ইবনু আব্দুল মুত্তালিব থেকে বর্ণিত যে, আব্বাস ইবনু আব্দুল মুত্তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমার উপস্থিতিতে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে রাগান্বিত অবস্থায় প্রবেশ করলেন। তিনি জিজ্ঞেস করলেন: "তোমার রাগের কারণ কী?" তিনি বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল! কুরাইশদের সাথে আমাদের কী হবে? যখন তারা নিজেরা মিলিত হয়, তখন হাসিখুশি মুখে মিলিত হয়, আর যখন আমাদের সাথে মিলিত হয়, তখন অন্যভাবে মিলিত হয়।" বর্ণনাকারী বলেন, এতে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ক্রুদ্ধ হলেন, তাঁর চেহারা লাল হয়ে গেল। অতঃপর তিনি বললেন: "যার হাতে আমার প্রাণ, তাঁর কসম! কোনো ব্যক্তির অন্তরে ততক্ষণ পর্যন্ত ঈমান প্রবেশ করবে না, যতক্ষণ না সে আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের জন্য তোমাদের ভালোবাসে।" অতঃপর তিনি বললেন: "হে লোক সকল! যে আমার চাচাকে কষ্ট দিল, সে অবশ্যই আমাকে কষ্ট দিল। কেননা মানুষের চাচা হলো তার পিতার সমতুল্য।"
আব্বাস ইবনু আব্দুল মুত্তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা কুরাইশদের একদল লোকের সাথে সাক্ষাত করতাম যারা নিজেদের মধ্যে আলোচনা করছিল, কিন্তু তারা আমাদের দেখলেই তাদের আলোচনা বন্ধ করে দিত। আমরা বিষয়টি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে উল্লেখ করলে তিনি বললেন: "কী হলো সেই লোকগুলোর? যারা কথা বলছিল, কিন্তু যখন আমার আহলে বাইতের (পরিবারের) কোনো ব্যক্তিকে দেখল, তখন তারা তাদের কথা বন্ধ করে দিল? আল্লাহর কসম! কোনো ব্যক্তির অন্তরে ঈমান প্রবেশ করবে না, যতক্ষণ না সে আল্লাহ ও আমার সাথে তাদের আত্মীয়তার কারণে তাদের ভালোবাসে।"
আব্দুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই আল্লাহ আমাকে খলীল (অন্তরঙ্গ বন্ধু) হিসেবে গ্রহণ করেছেন, যেমন তিনি ইব্রাহীম (আঃ)-কেও খলীল হিসেবে গ্রহণ করেছিলেন। কিয়ামতের দিন জান্নাতে আমার স্থান এবং ইব্রাহীমের স্থান হবে মুখোমুখি। আর আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হবেন আমাদের দুজনের মাঝখানে, দুই খলীলের মধ্যবর্তী মু'মিন।"
10035 - عن عمر قال: كُتِبَ إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم كتاب فقال لعبد الله بن أرقم:"أجب هؤلا". فأخذ عبد الله بن أرقم فكتبه ثم جاء بالكتاب فعرضه على رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال:"أحسنت". فما نال ذلك في نفسي حتى وليت، فجعلته على بيت المال.
حسن: رواه البزار (267) عن عمر بن الخطاب السجستاني، نا إبراهيم بن المنذر (هو الحزامي)، نا محمد بن صدقة الفدكي، نا مالك، عن زيد بن أسلم، عن أبيه، عن عمر فذكره.
وإسناده حسن من أجل محمد بن صدقة الفدكي، قال عنه الدارقطني: ليس بالمشهور ولكن ليس به بأس وذكره ابن حبان في الثقات وقال:"يعتبر حديثه إذا بين السماع في روايته فإنه كان يسمع من قوم ضعفاء عن مالك، ثم يدلس عنه" وقد بين السماع.
وشيخ البزار عمر بن الخطاب السجستاني وشيخ شيخه إبراهيم بن المنذر صدوقان.
إلا أن الدارقطني يرى أن المرسل صحيح، لأنه قال: رواه غيره عن مالك فأرسله وهو الصحيح.
وللحديث أسانيد أخرى غير أن ما ذكرته هو أصحها.
উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে একটি চিঠি এল। তখন তিনি আবদুল্লাহ ইবনে আরকামকে বললেন: "এদের উত্তর দাও।" তখন আবদুল্লাহ ইবনে আরকাম চিঠিটি নিলেন এবং এর উত্তর লিখলেন। এরপর তিনি চিঠিটি নিয়ে এসে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে পেশ করলেন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি খুবই উত্তম করেছো।" আমার (উমরের) মনে সেই (তাঁর যোগ্যতার) বিষয়টি সব সময় ছিল, অবশেষে যখন আমি খিলাফতের দায়িত্ব গ্রহণ করলাম, তখন আমি তাকে বায়তুল মালের দায়িত্বে নিযুক্ত করলাম।
10036 - عن عبد الله بن ثعلبة بن صُعير - وكان رسول الله صلى الله عليه وسلم قد مسح عنه - أنه رأى سعد بن أبي وقاص يوتر بركعة.
صحيح: رواه البخاري في الدعوات (6356) عن أبي اليمان، أخبرنا شعيب، عن الزهري قال: أخبرني عبد الله بن ثعلبة بن صُعير فذكره.
ورواه أحمد (23667) بهذا الإسناد ولفظه:"وكان رسول الله صلى الله عليه وسلم قد مسح وجهه زمن الفتح أنه رأى سعد بن أبي وقاص - وكان سعد قد شهد بدرا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم يوتر بركعة واحدة بعد صلاة العشاء - يعني العتمة - لا يزيد عليها حتى يقوم من جوف الليل.
আব্দুল্লাহ ইবনু সা'লাবাহ ইবনু সু'আইর থেকে বর্ণিত—যাঁর চেহারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কা বিজয়ের সময় মুছে দিয়েছিলেন (স্পর্শ করেছিলেন)—তিনি সা'দ ইবনু আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে দেখেছেন। আর সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে বদরের যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেছিলেন। তিনি ইশার সালাতের (অর্থাৎ আ'তামার) পরে এক রাকাআত বিতর আদায় করতেন এবং রাতের মধ্যভাগ পর্যন্ত তিনি এর বেশি আর পড়তেন না।
10037 - عن ابن أبي مليكة قال: قال ابن الزبير لابن جعفر رضي الله عنهم أتذكر إذ تلقينا رسول الله صلى الله عليه وسلم أنا وأنت وابن عباس؟ قال: نعم، فحملنا وتركك.
متفق عليه: رواه البخاري في الجهاد (3082)، ومسلم في فضائل الصحابة (2427 - 65) كلاهما
من طريق حبيب بن الشهيد، عن ابن أبي مليكة قال: فذكره. وهذا لفظ البخاري، ولفظ مسلم نحوه إلا قوله:"قال ابن الزبير لابن جعفر" ففي صحيح مسلم:"قال عبد الله بن جعفر لابن الزبير".
ইবনুয যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি ইবনু জাফর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: "আপনার কি মনে আছে, যখন আমি, আপনি এবং ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সাক্ষাৎ করতে গিয়েছিলাম?" তিনি (ইবনু জাফর) বললেন: "হ্যাঁ, তখন তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের দু'জনকে (বাহনে) তুলে নিয়েছিলেন, আর আপনাকে রেখে গিয়েছিলেন।"
10038 - عن عبد الله بن جعفر قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا قدم من سفر تُلُقي بصبيان أهل بيته، قال: وإنه قدم من سفر فسبق بي إليه فحملني بين يديه، ثم جيء بأحد ابني فاطمة، فأردفه خلفه، قال: فأدخلنا المدينة ثلاثة على دابة.
صحيح: رواه مسلم في فضائل الصحابة (2428 - 66) من طرق عن أبي معاوية، عن عاصم الأحول، عن مورّق العجلي، عن عبد الله بن جعفر قال: فذكره.
وفي لفظ:"كان النبي صلى الله عليه وسلم إذا قدم من سفر تلقي بنا، قال: فتلقي بي وبالحسن أو بالحسين، قال: فحمل أحدنا بين يديه، والآخر خلفه حتى دخلنا المدينة.
رواه مسلم (2428 - 67) من وجه آخر عن عاصم الأحول به.
আবদুল্লাহ ইবনে জা‘ফর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন কোনো সফর থেকে ফিরতেন, তখন তাঁর পরিবারের ছোট শিশুরা তাঁর সাথে সাক্ষাৎ করত। তিনি বলেন, তিনি এক সফর থেকে ফিরলেন এবং আমাকে তাঁর কাছে দ্রুত নিয়ে যাওয়া হলো। তিনি আমাকে তাঁর সামনে বসালেন। এরপর ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর দুই ছেলের একজনকে আনা হলো এবং তিনি তাকে তাঁর পেছনে বসালেন। তিনি বলেন, এভাবে আমরা একটি সওয়ারীর ওপর তিনজন আরোহণ করে মদীনায় প্রবেশ করলাম।
অন্য এক বর্ণনায় আছে: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন সফর থেকে ফিরতেন, তখন আমরা তাঁর সাথে সাক্ষাৎ করতাম। তিনি বলেন, আমার সাথে হাসান অথবা হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাক্ষাৎ হতো। তিনি আমাদের একজনকে সামনে এবং অন্যজনকে পেছনে বসালেন, এভাবে আমরা মদীনায় প্রবেশ করলাম।
10039 - عن عبد الله بن جعفر قال: أردفني رسول الله صلى الله عليه وسلم ذات يوم خلفه، فأسرَّ إلي حديثا لا أحدث به أحدا من الناس.
صحيح: رواه مسلم في فضائل الصحابة (2429) عن شيبان بن فروخ، ثنا مهدي بن ميمون، ثنا محمد بن عبد الله بن أبي يعقوب، عن الحسن بن سعد مولى الحسن بن علي، عن عبد الله بن جعفر قال: فذكره ..
আবদুল্লাহ ইবনে জাফর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে তাঁর পিছনে সওয়ারীতে তুলে নিলেন। অতঃপর তিনি আমার কাছে একটি গোপন কথা বললেন, যা আমি মানুষের মধ্যে আর কাউকে কখনও বলিনি।
10040 - عن أسماء: أنها حملت بعبد الله بن الزبير، قالت: فخرجت وأنا متمّ فأتيت المدينة فنزلت بقباء، فولدته بقباء، ثم أتيت النبي صلى الله عليه وسلم فوضعته في حجره، ثم دعا بتمرة فمضغها، ثم تفل في فيه فكان أول شيء دخل في جوفه ريق رسول الله صلى الله عليه وسلم، ثم حنكه بتمرة، ثم دعا له وبرَّك عليه، وكان أول مولود ولد في الإسلام.
متفق عليه: رواه البخاري في مناقب الأنصار (3909)، ومسلم في الآداب (26: 2146) كلاهما من طريق أبي أسامة، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن أسماء فذكرته.
ورواه مسلم (25: 2146) من طريق آخر عن هشام بن عروة، حدثني عروة بن الزبير وفاطمة بنت المنذر بن الزبير، أنهما قالا: خرجت أسماء بنت أبي بكر، حين هاجرت وهي حبلى بعبد الله ابن الزبير، فقدمت قباء، فنُفِست بعبد الله بقباء، ثم خرجت حين نُفِست إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم ليُحَنِّكه، فأخذه رسول الله صلى الله عليه وسلم منها فوضعه في حجره، ثم دعا بتمرة، قال: قالت عائشة: فمكثنا ساعة نلتمسها قبل أن نجدها، فمضغها، ثم بصقها في فيه، فإن أول شيء دخل بطنه لريق رسول الله صلى الله عليه وسلم، ثم قالت أسماء: ثم مسحه وصلى عليه وسماه عبد الله، ثم جاء وهو ابن سبع سنين أو ثمان،
ليبايع رسول الله صلى الله عليه وسلم، وأمره بذلك الزبير، فتبسم رسول الله صلى الله عليه وسلم حين رآه مقبلا إليه، ثم بايعه.
আসমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি আব্দুল্লাহ ইবনে যুবায়েরকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) গর্ভে ধারণ করেছিলেন। তিনি বলেন, আমি তখন পূর্ণ গর্ভবতী অবস্থায় (মাতুম) মক্কা থেকে বেরিয়েছিলাম এবং মদীনায় এসে কুবায় অবস্থান করি। আমি কুবাতেই তাকে প্রসব করি। এরপর আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলাম এবং তাকে তাঁর কোলে রাখলাম। অতঃপর তিনি একটি খেজুর চাইলেন ও তা চিবালেন। এরপর তিনি তাঁর মুখে থুথু দিলেন (লালা দিলেন)। এভাবে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর লালাই সর্বপ্রথম তাঁর পেটে প্রবেশ করেছিল। এরপর তিনি খেজুর দ্বারা তাঁর তাহনীক (মুখ মিষ্টি) করলেন এবং তার জন্য দোয়া করলেন ও তাতে বরকত দিলেন। আর ইসলামের (হিজরতের পর) তিনিই ছিলেন প্রথম নবজাতক।
অন্য বর্ণনায় এসেছে: আসমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, অতঃপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে মাসাহ করলেন, তাঁর জন্য সালাত আদায় করলেন এবং তাঁর নাম আব্দুল্লাহ রাখলেন। এরপর যখন তাঁর বয়স সাত বা আট বছর হলো, তখন তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর হাতে বাইয়াত (আনুগত্যের শপথ) করার জন্য আসেন। যুবায়ের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে এরূপ করার নির্দেশ দিয়েছিলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে এগিয়ে আসতে দেখে মুচকি হাসলেন এবং পরে তাঁর বাইয়াত গ্রহণ করলেন।
