হাদীস বিএন


সহীহ আত তারগীব ওয়াত তারহীব





সহীহ আত তারগীব ওয়াত তারহীব (576)


576 - (14) [حسن موقوف] وعن مصعب بن سعد قال:
قلت لأبي: يا أبتاه! أرأيت قوله: {الَّذِينَ هُمْ عَنْ صَلَاتِهِمْ سَاهُونَ} أيُّنا لا يسهو؟ أيُّنا لا يُحَدِّثُ نفسَه؟
قال: ليس ذلك، إنما هو إضاعة الوقت، يلهو حتى يَضيعَ الوقتُ.
رواه أبو يعلى بإسناد حسن.




মুসআব বিন সাদ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি আমার পিতাকে বললাম: হে আব্বা! আপনি আল্লাহ্‌র বাণী {الَّذِينَ هُمْ عَنْ صَلَاتِهِمْ سَاهُونَ}- 'যারা তাদের সালাত সম্পর্কে উদাসীন' সম্পর্কে কী মনে করেন? আমাদের মধ্যে কে আছে যে ভুল করে না? আমাদের মধ্যে কে আছে যে মনে মনে কথা বলে না? তিনি (পিতা) বললেন: বিষয়টি তা নয়। বরং এর অর্থ হলো (নামাযের) সময় নষ্ট করা। সে খেলাধুলা করে, ফলে (সালাতের) ওয়াক্ত পার হয়ে যায়। (এটি আবু ইয়ালা হাসান সনদে বর্ণনা করেছেন।)









সহীহ আত তারগীব ওয়াত তারহীব (577)


577 - (15) [صحيح] وعن نوفل بن معاوية رضي الله عنه؛ أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:
`مَن فاتته صلاةٌ؛ فكأنما وُتِر أهلَه ومالَه`.
رواه ابن حبان في `صحيحه`.




নওফল ইবনু মু'আবিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: ‘যে ব্যক্তির কোনো সালাত ছুটে যায়, সে যেন তার পরিবার ও সম্পদ হারালো।’









সহীহ আত তারগীব ওয়াত তারহীব (578)


578 - (16) [صحيح] وعن سمرة بن جندب قال:
كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم مما يُكثِرُ أن يقولَ لأصحابه: `هل رأى أحدٌ منكم من رؤيا؟ `، فيُقصُّ عليه ما(1) شاءَ اللهُ أنْ يُقصَّ، وإنه قال لنا ذاتَ غداةٍ:
`إنه أَتاني الليلةَ اثنان، وإنهما ابتَعَثاني، وإنهما قالا لي: انطلقْ، وإني انطلقتُ معهما، وإنا أتينا على رجلٍ مضطجع، وإذا آخرُ قائمٌ عليه بصخرةٍ، وإذا هو يَهوي بالصخرة لرأْسِه فَيَثْلَغُ رأْسَه، فَيَتَدَهْدَهُ الحجرُ، فيأْخذُه، فلا يرجع إليه حتى يَصحِّ رأْسُه كما كان، ثم يعود عليه فيفعل به مثلَ ما فعل المرةَ الأُولى. قال: قلت: سبحان الله! ما هذان؟ قالا لي: انطلق، انطلق.
فأَتينا على رجلٍ مستلقٍ على قفَاه، وإذا آخرُ قائمٌ عليه بِكَلُّوب من
حَديد، وإذا هو يأتي أحدَ شِقَّيْ وَجهه فَيُشَرشِر شِدْقَه إلى قفاه، ومَنْخَرَه إلى قفاه، وعينَه إلى قفاه، (قال: وربما قال أبو رجاء: فَيَشُقُّ)(1)، قال: ثم يتحول إلى الجانبِ الآخرِ، فيفعل به مثلَ ما فعل بالجانب الأول. قال: فما يفرغُ من ذلك الجانبِ حتى يَصحَّ ذلك الجانبُ كما كان، ثم يعودُ عليه فيفعل [مثلَ ما فعل](2) المرةَ الأولى. قال: قلت: سبحان الله ما هذان؟ قالا لي: انطلقْ انطلقْ.
فانطلقنا، فأتينا على مثل التنور(3) -قال: فأَحسَب أنه كان يقول: -فإذا فيه لَغَطٌ وأصواتٌ. قال: فاطَّلَعنا فيه، فإذا فيه رجالٌ ونساءٌ عُراةٌ، فإذا هم يأتيهم لهبٌ من أسفلَ منهم، فإذا أتاهم ذلك اللهبُ ضَوْضَوْا، قال: قلتُ: ما هؤلاءِ؟ قالا لي: انطلقْ انطلقْ. قال:
فانطلقنا، فأتينا على نهرٍ -حسِبتُ أنه كان يقول:- أحمرَ مثلِ الدم، وإذا في النهر رجلٌ سابح، يَسْبَح، وإذا على شطِّ النهر رجل قد جمع عنده حجارةً كثيرةً، وإذا ذلك السابحُ يسبح ما يسبح، ثم يأتي ذلك الذي قد جمع عنده الحجارةَ، فَيَفْغرُ فاه، فيُلْقِمُه حجراً، فينطلقُ فيسبحُ، ثم يرجعُ إليه، كلما رجع إليه فَغَرَ فاه، فألقمه حجراً، قلت لهما: ما هذان؟ قالا لي: انطلق انطلق.
فانطلقنا، فأتينا على رجل كريه المَرآة، كأكره ما أنتَ راءٍ رجلاً مَرآةً، وإذا عنده نارٌ يَحُشُّها، ويسعى حولَها، قال: قلت لهما: ما هذا؟ قال: قالا لي: انطلق انطلق.
فانطلقنا، فأتينا على روضةٍ مُعْتمةٍ(1) فيها من كل نَوْرِ الربيع، وإذا بين ظهرَي الروضة رجلٌ طويلٌ، لا أكادُ أرى رأسَه طُولاً في السماءِ، وإذا حولَ الرجل من أكثرِ ولدانٍ رأيتهم [قط]،(2) قال: قلت: ما هذا؟ ما هؤلاء؟ قالا لي: انطلق انطلق.
فانطلقنا، فأتينا على دوحةٍ(3) عظيمة، لم أرَ دوحةً(4) قط أعظمَ ولا أحسنَ منها، قال: قالا لي: ارقَ فيها، فارتقَيْنا إلى مدينةٍ مبنيةٍ بلَبِنِ ذهبٍ، ولبنِ فضةٍ، فأتينا بابَ المدينةِ، فاستفتحنا، ففُتِحَ لنا، فدخلناها، فتلقانا رجالٌ شطرٌ من خَلقِهم كأحسن ما أنتَ راءٍ، وشطرٌ منهم كأقبح ما أنت راءٍ، قال: قالا لهم: اذهبوا فَقَعوا في ذلك النهر، قال: وإذا نهر معترضٌ يجري كأنَّ ماءَه المحضُ في البياض، فذهبوا، فوقعوا فيه، ثم رجَعوا إلينا قد ذهب ذلك السوء عنهم، فصاروا في أَحسنِ صورةٍ. قال:
قالا لي: هذه جنةُ عدنٍ، وهذا منزلُك، قال: فَسَما بصري صُعُداً، فإذا قصرٌ مثلُ الرَّبابةِ(5) البيضاء، قال: قالا لي: هذا منزلُك، قال: قلت لهما: بارك الله فيكما، فذراني فأَدْخلَه، قالا: أما الآن فلا، وأَنت داخِلُه. قال:
قلت لهما: فإني [قد](6) رأيتُ منذ الليلة عجباً، فما هذا الذي رأيتُ؟ قال: قالا لي: إنا سنخبرُك:
أما الرجلُ الأولُ الذي أتيتَ عليه يُثْلَغُ رأسُه بالحجر، فإنه الرجل يأخذ
القرآنَ فَيرْفُضُه، وينامُ عن الصلاةِ المكتوبِة.
وأما الرجلُ الذي أتيتَ عليه يُشَرْشَرُ شِدقُه إلى قفاه، ومنخرُه إلى قفاه، وعينُه إلى قفاه، فإنه الرجلُ يغدو من بيته فيكذب الكِذبةَ تبلغُ الآفاق.
وأما الرجالُ والنساءُ العُراةُ الذين هم في مِثلِ بناءِ التنور، فإنهم الزُّناةُ والزَّواني.
وأما الرجل الذي أتَيتَ عليه يَسبح في النهر، ويُلقَمُ الحجَر، فإنه آكلُ الربا.
وأما الرجلُ الكريهُ المَرآةِ، الذي عند النار يَحُشُّها ويسعى حولَها، فإنه مالكٌ، خازنُ جهنم.
وأما الرجل الطويل الذي في الروضةِ، فإنه إبراهيم.
وأما الوِلْدان الذين حوله فكلُّ مولودٍ مات على الفطرة`.
قال: فقال بعض المسلمين: يا رسولَ الله! وأولادُ المشركين؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:
`وأولادُ المشركين`.
`وأما القومُ الذين كانوا شطرٌ منهم حسنٌ، وشطرٌ منهم قبيحٌ، فإنهم قومٌ خَلَطوا عملاً صالحاً وآخرَ سيئاً تجاوز الله عنهم`.
رواه البخاري. وذكرته هنا بتمامه لأحيل عليه فيما يأتي إن شاء الله تعالى.
قوله: (يَثْلَغُ رأسه) أي: يشدخ.
قوله: (فيتدهده) أي: فيتدحرج.
و (الكلوب) بفتح الكاف وضمها وتشديد اللام: هو حديدة معوجة الرأس.
وقوله: (يُشَرْشِرُ شدقه) هو بشينين معجمتين، الأولى منهما مفتوحة، والثانية
مكسورة، وراءين، الأولى منهما ساكنة، ومعناه: يقطعه ويشقه.
و (اللغط) محركاً: هو الصخب والجلبة والصياح.
وقوله: (ضَوْضَوا) بفتح الضادين المعجمتين وسكون الواوين: وهو الصياح مع الانضمام والفزع.
وقوله: (ففغر فاه) بفتح الفاء والغين المعجمة معاً بعدهما راء، أي: فتحه.
وقوله: (يَحُشُّها) هو بالحاء المهملة المضمومة والشين المعجمة، أي: يوقدها.
وقوله: (معتمة) أي: طويلة النبات، يقال: اعتمَّ النبت إذا طال.
و (النَّور) بفتح النون: هو الزهر.
و (المحض) بفتح الميم وسكون الحاء المهملة: هو الخالص من كل شيء.
وقوله: (فَسَما بصري صُعُداً) بضم الصاد والعين المهملتين، أي: ارتفع بصري إلى فوق.
و (الربابة) هنا: هي السحابة البيضاء.
قال أبو محمد بن حزم(1):
`وقد جاء عن عُمَرَ، وعبد الرحمن بن عوف، ومعاذ بن جبل، وأبي هريرة، وغيرهم من الصحابة رضي الله عنهم أن من ترك صلاةَ فرضٍ واحدةً متعمداً حتى يخرج وقتها؛ فهو
كافر مرتد. ولا نعلم لهؤلاء من الصحابة مخالفاً`.
(قال الحافظ) عبد العظيم:
قد ذهبتْ جماعة من الصحابة ومن بعدهم إلى تكفير من ترك الصلاة متعمداً لتركها، حتى يخرج جميع وقتها، منهم عمر بن الخطاب، وعبد الله بن مسعود، وعبد الله بن عباس، ومعاذ بن جبل، وجابر بن عبد الله، وأبو الدرداء رضي الله عنهم. ومن غير الصحابة: أحمد بن حنبل، وإسحاق بن راهويه، وعبد الله بن المبارك، والنخعي، والحكم بن عتيبة، وأيوب السختياني، وأبو داود الطيالسي، وأبو بكر بن أبي شيبة، وزهير بن حرب، وغيرهم رحمهم الله تعالى(1).




সামুরা ইবনু জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,

রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর সাহাবীগণকে প্রায়ই বলতেন: 'তোমাদের মধ্যে কেউ কি কোনো স্বপ্ন দেখেছো?' অতঃপর আল্লাহ যা চাইতেন, সে তা বর্ণনা করতো। আর তিনি আমাদের এক সকালে বললেন:

'নিশ্চয়ই আজ রাতে আমার কাছে দুজন ব্যক্তি আগমন করেছে। তারা আমাকে জাগিয়ে তুলেছে এবং তারা আমাকে বলেছে, 'চলুন।' আমিও তাদের সাথে চললাম। আমরা এমন এক ব্যক্তির কাছে পৌঁছলাম যে শুয়ে ছিল, আর তার কাছে অন্য একজন পাথর নিয়ে দাঁড়িয়েছিল। সে সেই পাথর দ্বারা লোকটির মাথার উপর আঘাত করে মাথা চূর্ণ-বিচূর্ণ করে দিচ্ছিল। পাথরটি গড়িয়ে পড়লে সে তা আবার কুড়িয়ে নিত। সে তার কাছে ফিরে আসার আগেই তার মাথা আগের মতো সুস্থ হয়ে যেত। এরপর সে আবার তার ওপর আঘাত করত এবং প্রথমবারের মতো একই কাজ করত। আমি বললাম: 'সুবহানাল্লাহ! এরা দুজন কারা?' তারা আমাকে বলল: 'চলুন, চলুন।'

অতঃপর আমরা এমন এক ব্যক্তির কাছে পৌঁছলাম যে চিৎ হয়ে শুয়ে ছিল, আর অন্য একজন লোহার আঁকড়া/হুক (কাল্লুব) নিয়ে তার পাশে দাঁড়িয়েছিল। সে তার মুখের একপাশে এসে তার গাল, নাক ও চোখ তার পেছন পর্যন্ত চিরে দিচ্ছিল। বর্ণনাকারী বলেন: অতঃপর সে অন্য পাশে ঘুরে যেত এবং প্রথম পাশের মতো একই কাজ করত। বর্ণনাকারী বলেন: সে ওই পাশ থেকে ফারেগ হওয়ার আগেই প্রথম পাশটি আবার আগের মতো সুস্থ হয়ে যেত। এরপর সে আবার তার ওপর ফিরে আসত এবং প্রথমবার যা করেছিল তা-ই করত। আমি বললাম: 'সুবহানাল্লাহ! এরা দুজন কারা?' তারা আমাকে বলল: 'চলুন, চলুন।'

আমরা চলতে থাকলাম এবং আমরা তান্নুরের (রুটি সেঁকার চুলার) মতো কিছুর কাছে পৌঁছলাম— তাতে শোরগোল ও চিৎকার শোনা যাচ্ছিল। আমরা তাতে উঁকি দিয়ে দেখলাম, তাতে নারী-পুরুষ সবাই উলঙ্গ অবস্থায় ছিল। তাদের নিচ থেকে আগুনের শিখা আসছিল। যখনই সেই শিখা তাদের ওপর আসত, তখনই তারা চিৎকার করত। আমি বললাম: 'এরা কারা?' তারা আমাকে বলল: 'চলুন, চলুন।'

আমরা চলতে থাকলাম এবং একটি নদীর কাছে পৌঁছলাম— আমার মনে হয় তিনি (বর্ণনাকারী) বলেছিলেন: রক্তের মতো লাল। নদীতে একজন লোক সাঁতরাচ্ছিল। আর নদীর তীরে একজন লোক অনেক পাথর জড়ো করে রেখেছিল। সেই সাঁতারু ব্যক্তিটি যতদূরই সাঁতরাক না কেন, সে তীরে জড়ো করা পাথরকারীর কাছে ফিরে আসত। সে তার মুখ হা করত এবং লোকটি তাকে একটি পাথর গিলিয়ে দিত। এরপর সে চলে গিয়ে আবার সাঁতরাতে থাকত। সে যখনই ফিরে আসত, তখনই সে মুখ হা করত এবং লোকটি তাকে একটি পাথর গিলিয়ে দিত। আমি বললাম: 'এরা দুজন কারা?' তারা আমাকে বলল: 'চলুন, চলুন।'

আমরা চলতে থাকলাম এবং আমরা এমন এক ব্যক্তির কাছে পৌঁছলাম, যাকে দেখতে অত্যন্ত কুৎসিত— আপনি যত কুৎসিত লোক দেখতে পারেন, সে তত কুৎসিত। তার পাশে একটি আগুন ছিল, সে তাতে জ্বালানি দিচ্ছিল এবং তার আশেপাশে দ্রুত হাঁটছিল। আমি তাদের বললাম: 'ইনি কে?' তারা আমাকে বলল: 'চলুন, চলুন।'

আমরা চলতে থাকলাম এবং আমরা ঘন সবুজ এক বাগানে পৌঁছলাম, যেখানে বসন্তকালের সব ধরনের ফুল ছিল। আর বাগানের মাঝে একজন দীর্ঘাকৃতির পুরুষ ছিলেন, যাঁর মাথা আমি যেন আকাশের দিকে লম্বা হওয়ার কারণে দেখতে পাচ্ছিলাম না। আর সেই পুরুষের চারপাশে ছিল এত বেশি শিশু, যা আমি এর আগে কখনও দেখিনি। আমি বললাম: 'এ কে? আর এরা কারা?' তারা আমাকে বলল: 'চলুন, চলুন।'

আমরা চলতে থাকলাম এবং এক বিশাল গাছের কাছে পৌঁছলাম, আমি এর চেয়ে বড় বা সুন্দর কোনো গাছ কখনও দেখিনি। তারা আমাকে বলল: 'এর ওপরে উঠুন।' আমরা একটি শহরের দিকে উঠলাম যা সোনা ও রুপার ইট দিয়ে নির্মিত। আমরা শহরের দরজার কাছে এসে তা খুলতে বললাম। আমাদের জন্য তা খোলা হলো। আমরা তাতে প্রবেশ করলাম। সেখানে কিছু লোক আমাদের অভ্যর্থনা জানাল, যাদের অর্ধেক আকৃতি ছিল দেখতে আপনি যা দেখেছেন তার মধ্যে সবচেয়ে সুন্দর এবং অর্ধেক আকৃতি ছিল দেখতে আপনি যা দেখেছেন তার মধ্যে সবচেয়ে কুৎসিত। তারা (দুই ফেরেশতা) তাদের বলল: 'যাও, ওই নদীতে পড়ে যাও।' দেখলাম সেখানে একটি প্রশস্ত নদী প্রবাহিত, যার পানি ছিল সাদা ধবধবে খাঁটি দুধের মতো। তারা গেল এবং তাতে ঝাঁপ দিল। এরপর তারা যখন আমাদের কাছে ফিরে আসল, তখন তাদের সেই কুৎসিত রূপ দূর হয়ে গেছে এবং তারা সেরা সুন্দর চেহারায় পরিণত হয়েছে। বর্ণনাকারী বলেন: তারা (দুই ফেরেশতা) আমাকে বলল: 'এটি হলো জান্নাতে আদন এবং এটি আপনার আবাসস্থল।' বর্ণনাকারী বলেন: আমার দৃষ্টি উপরের দিকে উঠল। আমি সাদা মেঘের মতো একটি প্রাসাদ দেখলাম। তারা আমাকে বলল: 'এটি আপনার আবাসস্থল।' আমি তাদের বললাম: 'আল্লাহ তোমাদের দুজনের মঙ্গল করুন। আমাকে ছেড়ে দাও যাতে আমি এতে প্রবেশ করি।' তারা বলল: 'এখন নয়, তবে আপনি অবশ্যই এতে প্রবেশ করবেন।'

আমি তাদের বললাম: 'আমি আজ রাতে অনেক আশ্চর্য জিনিস দেখেছি। এই যে আমি দেখলাম, এর ব্যাখ্যা কী?' তারা বলল: 'আমরা আপনাকে বলছি:

প্রথম যে লোকটির কাছে আপনি এসেছিলেন, যার মাথা পাথর দিয়ে চূর্ণ-বিচূর্ণ করা হচ্ছিল, সে হলো সেই ব্যক্তি যে কুরআন গ্রহণ করার পর তা প্রত্যাখ্যান করে (আমল করে না), আর ফরয সালাত থেকে ঘুমিয়ে থাকে।

আর যে লোকটির কাছে আপনি এসেছিলেন, যার গাল, নাক ও চোখ তার পেছন পর্যন্ত চিরে দেওয়া হচ্ছিল, সে হলো সেই ব্যক্তি যে সকালবেলা তার ঘর থেকে বের হয়ে এমন মিথ্যা বলে যা দিগ্বিদিক ছড়িয়ে পড়ে।

আর উলঙ্গ নারী-পুরুষেরা যারা তান্নুরের (চুলার) মতো জায়গায় ছিল, তারা হলো যিনাকারী পুরুষ ও যিনাকারিনী নারী।

আর যে লোকটিকে আপনি দেখলেন যে সে নদীতে সাঁতরাচ্ছে এবং তাকে পাথর গিলিয়ে দেওয়া হচ্ছে, সে হলো সুদখোর (যে রিবা ভক্ষণ করে)।

আর যে কুৎসিত চেহারার লোকটিকে আগুনের পাশে জ্বালানি দিতে এবং তার আশেপাশে দ্রুত হাঁটতে দেখেছেন, সে হলো জাহান্নামের রক্ষক (মালিক)।

আর বাগানে যে দীর্ঘাকৃতির পুরুষকে দেখেছেন, তিনি হলেন ইবরাহীম (আঃ)। আর তাঁর চারপাশে যে শিশুরা ছিল, তারা হলো সেই সব শিশু যারা ফিতরাতের ওপর (স্বাভাবিক প্রকৃতিতে) মৃত্যুবরণ করেছে।'

বর্ণনাকারী বলেন: অতঃপর কিছু মুসলমান জিজ্ঞাসা করলেন, 'হে আল্লাহর রাসূল! মুশরিকদের (মূর্তিপূজকদের) সন্তানরাও কি?' রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: 'মুশরিকদের সন্তানরাও।'

'আর যে লোকেরা, যাদের অর্ধেক আকৃতি সুন্দর ও অর্ধেক আকৃতি কুৎসিত ছিল, তারা হলো সেইসব লোক যারা ভালো কাজ ও খারাপ কাজ মিশিয়ে ফেলেছিল, আল্লাহ তাদের ক্ষমা করেছেন।'

[হাদীসটি বুখারী বর্ণনা করেছেন]









সহীহ আত তারগীব ওয়াত তারহীব (579)


579 - (1) [صحيح] عن أم حبيبة رَمْلةَ بنتِ أبي سفيانَ رضي الله عنهما قالت: سمعتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يقول:
`ما من عبدٍ مسلم يصلي لله تعالى في كل يوم ثِنْتَي عَشْرَةَ ركعةً تطوعاً غيرَ فريضة(2)؛ إلا بَنىَ الله تعالى له بيتاً في الجنة، أو: إلا بُنِيَ له بيتٌ في الجنةِ`.
رواه مسلم وأبو داود والنسائي والترمذي، وزاد:
أربعاً قبلَ الظهر، وركعتين بعدها، وركعتين بعد المغرب، وركعتين بعد العشاء، وركعتين قبل صلاة الغداة(3).




উম্মে হাবীবা রামলা বিনতে আবী সুফ্ইয়ান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "এমন কোনো মুসলিম বান্দা নেই, যে প্রতিদিন ফরয ছাড়া অতিরিক্ত বারো রাকআত নফল সালাত (নামায) আল্লাহ তাআলার জন্য আদায় করে; আল্লাহ তাআলা তার জন্য জান্নাতে একটি ঘর নির্মাণ করেন, অথবা তার জন্য জান্নাতে একটি ঘর তৈরি করা হয়।"

(হাদীসটি) মুসলিম, আবূ দাঊদ, নাসাঈ এবং তিরমিযী বর্ণনা করেছেন। আর তিরমিযী তাতে যোগ করেছেন: (সেই বারো রাকআত হলো) যোহরের পূর্বে চার রাকআত, এরপরে দুই রাকআত, মাগরিবের পরে দুই রাকআত, ইশার পরে দুই রাকআত এবং ফাজরের সালাতের পূর্বে দুই রাকআত।









সহীহ আত তারগীব ওয়াত তারহীব (580)


580 - (2) [صحيح لغيره] وعن عائشة رضي الله عنها قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:
`من ثابر على ثِنْتَيْ عَشْرةَ ركعةً في اليوم والليلةِ دخلَ الجنةَ، أربعاً قبل
الظهر، وركعتين بعدها، وركعتين بعد المغرب، وركعتين بعد العشاء، وركعتين قبل الفجر`.
رواه النسائي -وهذا لفظه-، والترمذي وابن ماجه من رواية المغيرة بن زياد عن عطاء عن عائشة. وقال النسائي:
هذا خطأ، ولعله أراد عنبسة بن أبي سفيان فصحف(1).
ثم رواه النسائي عن ابن جريج عن عطاء عن عنبسة بن أبي سفيان عن أم حبيبة. وقال:
`عطاء بن أبي رباح لم يسمعه من عنبسة` انتهى.
(ثابر): بالثاء المثلثة وبعد الألف باء موحدة ثم راء، أي: لازم وواظب.
‌‌2 - (الترغيب في المحافظة على ركعتين قبل الصبح).




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যে ব্যক্তি দিন ও রাতে বারো রাকাতের উপর নিয়মিত লেগে থাকে (আদায় করে), সে জান্নাতে প্রবেশ করবে। (সেগুলো হলো) যুহরের আগে চার রাকাত, এর পরে দুই রাকাত, মাগরিবের পরে দুই রাকাত, এশার পরে দুই রাকাত, এবং ফজরের আগে দুই রাকাত।









সহীহ আত তারগীব ওয়াত তারহীব (581)


581 - (1) [صحيح] عن عائشة رضي الله عنها عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:
`ركعتا الفجر خيرٌ من الدنيا وما فِيها(1) `.
رواه مسلم والترمذي. وفي رواية لمسلم:
`لهما أحب إليَّ من الدنيا جميعاً`.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ফজরের দু’রাকাআত (সুন্নাত) দুনিয়া ও এর মধ্যে যা কিছু আছে, সব কিছু থেকে উত্তম।"
(এটি বর্ণনা করেছেন মুসলিম ও তিরমিযী।)
আর মুসলিমের এক বর্ণনায় আছে: "ঐ দু’রাকাআত আমার কাছে সমগ্র দুনিয়া থেকে অধিক প্রিয়।"









সহীহ আত তারগীব ওয়াত তারহীব (582)


582 - (2) [صحيح] وعنها قالت:
لم يكن النبيُّ صلى الله عليه وسلم على شيء من النوافل أشدَّ تعاهداً منه على رَكْعَتَيِ الفجر.
رواه البخاري ومسلم وأبو داود والنسائي، وابن حزيمه في `صحيحه`.
وفي رواية لابن خزيمة: قالت:
`ما رأيتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم إلى شيءٍ من الخير أسرعَ منه إلى الركعتين قبلَ الفجر، ولا إلى غنيمة`.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফজরের দুই রাকআত সুন্নাত অপেক্ষা অন্য কোনো নফল ইবাদতের উপর এত অধিক যত্নবান ছিলেন না।

হাদীসটি বর্ণনা করেছেন বুখারী, মুসলিম, আবূ দাঊদ, নাসাঈ এবং ইবনু খুযাইমাহ তাঁর সহীহ গ্রন্থে।

ইবনু খুযাইমার এক বর্ণনায় আছে, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে কোনো ভালো কাজের প্রতি ফজরের দুই রাকআতের চেয়ে অধিক দ্রুতগামী হতে দেখিনি, এমনকি কোনো গনিমত (যুদ্ধলব্ধ সম্পদ)-এর প্রতিও না।









সহীহ আত তারগীব ওয়াত তারহীব (583)


583 - (3) [صحيح لغيره] وعن ابن عمر رضي الله عنهما قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:
` {قُلْ هُوَ اللَّهُ أَحَدٌ} تَعدلُ ثلث القرآن، و {قُلْ يَا أَيُّهَا الْكَافِرُونَ} تَعدِلُ ربعَ القرآن`، وكان يقرؤهما في ركعتي الفجر. . .(2).
رواه أبو يعلى بإسناد حسن، والطبراني في `الكبير`، واللفظ له.
‌‌3 - (الترغيب في الصلاة قبل الظهر وبعدها).




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “কুল হুওয়াল্লাহু আহাদ (সূরা ইখলাস) এক-তৃতীয়াংশ কুরআনের সমতুল্য, আর কুল ইয়া আইয়ুহাল কাফিরুন (সূরা আল-কাফিরুন) এক-চতুর্থাংশ কুরআনের সমতুল্য।” আর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এই দু’টি সূরা ফাজরের (সুন্নাতের) দুই রাকা‘আতে পাঠ করতেন।









সহীহ আত তারগীব ওয়াত তারহীব (584)


584 - (1) [حسن صحيح] عن أم حبيبة رضي الله عنها قالت: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:
`مَن يُحافظُ على أربعِ ركعاتٍ قبلَ الظهر، وأربعٍ بعدها؛ حَرَّمَه الله على النار`.
رواه أحمد وأبو داود والنسائي والترمذي من رواية القاسم أبي عبد الرحمن صاحب أبي أمامة، عن عنبسة بن أبي سفيان عن أمّ حبيبة. وقال الترمذي:
`حديث حسن صحيح غريب، والقاسم [هو] ابن عبد الرحمن، [يكنى أبا عبد الرحمن](1) شامي ثقة` انتهى.
وفيِ رواية للنسائي:
`فتَمَسَّ وجهَهُ النارُ أبداً`.
ورواه ابن خزيمة في `صحيحه` عن سليمان بن موسى عن محمد بن أبي سفيان عن أخته أم حبيبة.
قال الحافظ رضي الله عنه: `ورواه أبو داود والنسائي وابن خزيمة في `صحيحه` أيضاً وغيرهم من رواية مكحول عن عنبسة، ومكحول لم يسمع من عنبسة. قاله أبو زرعة وأبو مُسهِر والنسائي وغيرهم، ورواه الترمذي أيضاً وحسنه، وابن ماجه؛ كلاهما من رواية محمد ابن عبد الله الشُّعَيْثي عن أبيه عن عنبسة، ويأتي الكلام على محمد`.




উম্মে হাবীবা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "যে ব্যক্তি যুহরের (ফরযের) পূর্বে চার রাকাত এবং এরপর চার রাকাতের উপর যত্নবান থাকে, আল্লাহ তাকে জাহান্নামের আগুনের জন্য হারাম করে দেন।"

নাসায়ীর এক বর্ণনায় আছে: 'আগুন কখনো তার মুখ স্পর্শ করবে না।'









সহীহ আত তারগীব ওয়াত তারহীব (585)


585 - (2) [حسن لغيره] ورُوي عن أبي أيوب رضي الله عنه عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:
`أربعٌ قبلَ الظهرِ. . .، تُفتح لهن أبوابُ السماء`.
رواه أبو داود -واللفظ له- وابن ماجه، وفي إسنادهما احتمال للتحسين.(2)
[حسن لغيره] ورواه الطبراني في `الكبير` و`الأوسط`، ولفظه: قال:
لما نزل رسولُ الله صلى الله عليه وسلم عليّ رأيته يديم أربعاً قبل الظهر، وقال:
`إنه إذا زالت الشمسُ فتِحَتْ أبوابُ السماءِ، فلا يُغلقُ منها بابٌ حتى يُصلى الظهرُ، فأنا أَحبُّ أن يُرفعَ لي في تلك الساعة خير`.(1)




আবু আইয়ুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যোহরের (ফরযের) পূর্বে চার রাকাত... এর জন্য আকাশের দরজাসমূহ খুলে দেওয়া হয়।"

এটি আবূ দাউদ (শব্দচয়ন তাঁর) ও ইবনু মাজাহ বর্ণনা করেছেন। তাদের উভয়ের সানাদে تحسين (হাসান) হওয়ার সম্ভাবনা রয়েছে।

আর এটি ত্বাবারানী ‘আল-কাবীর’ ও ‘আল-আওসাত্ব’ গ্রন্থে বর্ণনা করেছেন। তাঁর শব্দচয়ন হল: তিনি (আবু আইয়ুব) বলেন, যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার কাছে অবতরণ করেন (আমার বাড়িতে অবস্থান নেন), তখন আমি তাঁকে দেখতাম যে তিনি যোহরের পূর্বে চার রাকাত সালাত নিয়মিত আদায় করতেন। আর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সূর্য যখন হেলে যায়, তখন আকাশের দরজাসমূহ খুলে দেওয়া হয়। যোহরের সালাত আদায় না করা পর্যন্ত সেগুলোর কোনো দরজা বন্ধ করা হয় না। সুতরাং আমি পছন্দ করি যে, সেই সময়ে আমার জন্য কোনো ভালো কাজ উপরে উঠানো হোক।"









সহীহ আত তারগীব ওয়াত তারহীব (586)


586 - (3) [حسن لغيره] وعن قابوس عن أبيه قال:
أرسل أبي إلى عائشة: أيَّ صلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم كان أحبُّ إليه أن يواظب عليها؟ قالت:
كان يصلي أربعاً قبل الظهر، ويطيلُ فيهن القيامَ، وُيحسنُ فيهن الركوع والسجود.
رواه ابن ماجه.
وقابوس هو ابن أبي ظبيان؛ وثَّقَ، وصحح له الترمذي وابن خزيمة والحاكم وغيرهم، لكن المرسَلُ إلى عائشة مبهم. والله أعلم.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, [قابوس عن أبيه] তার পিতা আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে লোক পাঠিয়ে জানতে চাইলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কোন সালাত তাঁর কাছে সবচেয়ে প্রিয় ছিল, যা তিনি নিয়মিতভাবে আদায় করতেন?
তিনি বললেন: তিনি যুহরের পূর্বে চার রাক‘আত সালাত আদায় করতেন। আর তিনি সেগুলোতে কিয়াম (দাঁড়িয়ে থাকা) দীর্ঘ করতেন এবং রুকূ‘ ও সিজদাহ উত্তমরূপে আদায় করতেন।









সহীহ আত তারগীব ওয়াত তারহীব (587)


587 - (4) [صحيح] وعن عبد الله بن السائبِ رضي الله عنه:
أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يصلي أربعاً بعد أن تزول الشمسُ قبلَ الظهرِ،(2) وقال:
`إنَّها ساعةٌ تُفتحُ فيها أبوابُ السماءِ، فأُحِبُّ أنْ يَصعد لي فيها عملٌ صالحٌ`.
رواه أحمد، والترمذي، وقال: `حديث حسن غريب`.
‌‌4 - (الترغيب في الصلاة قبل العصر).




আবদুল্লাহ ইবন সায়িব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সূর্য হেলে যাওয়ার পর যুহরের পূর্বে চার রাকাত সালাত আদায় করতেন এবং তিনি বলেন, ‘এটি এমন একটি সময় যখন আসমানের দরজাগুলো খুলে দেওয়া হয়। তাই আমি ভালোবাসি যে, এই সময়ে আমার কোনো নেক আমল উপরে উঠুক (কবুল হোক)।’









সহীহ আত তারগীব ওয়াত তারহীব (588)


588 - (1) [حسن] عنِ ابن عُمرَ رضي الله عنهما عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:
`رَحِمَ اللهُ امرَأً صلّى قبلَ العصرِ أربعاً`.
رواه أحمد وأبو داود والترمذي وحسنه، وابن خزيمة وابن حبان في `صحيحيهما`.

‌‌5 - (الترغيب في الصلاة بين المغرب والعشاء).




ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: আল্লাহ্‌ সেই ব্যক্তির প্রতি রহম করুন, যে আসরের পূর্বে চার রাক‘আত সালাত আদায় করে।









সহীহ আত তারগীব ওয়াত তারহীব (589)


589 - (1) [صحيح] وعن أنس رضي الله عنه
في قوله تعالى: {تَتَجَافَى جُنُوبُهُمْ عَنِ الْمَضَاجِعِ}:
نزلت في انتظار الصلاةِ التي تُدعى العَتَمَة.
رواه الترمذي، وقال: `حديث حسن صحيح غريب`.
[صحيح] وأبو داود؛ إلا أنه قال:
كانوا يتيقظون(1) ما بين المغرب والعشاء، يصلون.
وكان الحسن(2) يقول: قيام الليل.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মহান আল্লাহর বাণী, "{তাদের পার্শ্বদেশ শয্যা থেকে বিচ্ছিন্ন থাকে}" (সূরা সিজদা, ৩২:১৬)—এর ব্যাখ্যায় তিনি বলেন: এটি 'আতামাহ' (ইশার সালাত) নামক সালাতের (নামাযের) অপেক্ষায় (অবস্থায়) নাযিল হয়েছিল। ইমাম তিরমিযী হাদিসটি বর্ণনা করেছেন এবং বলেছেন, হাদিসটি হাসান সহীহ গারীব। ইমাম আবু দাউদও এটি বর্ণনা করেছেন। তবে তিনি বলেছেন, তারা মাগরিব ও ইশার মধ্যবর্তী সময়ে জেগে থাকত এবং সালাত আদায় করত। আর হাসান (আল-বাসরী) বলতেন, (আয়াতটি দ্বারা উদ্দেশ্য হলো) রাতের সালাত (কিয়ামুল লাইল)।









সহীহ আত তারগীব ওয়াত তারহীব (590)


590 - (2) [صحيح] وعن حذيفة رضي الله عنه قال:
أتيتُ النبيَّ صلى الله عليه وسلم فصليت معه المغربَ، فصلى إلى العشاء.
رواه النسائي(3) بإسناد جيد.
‌‌6 - (الترغيب في الصلاة بعد العشاء).
وفي الباب أحاديث:




হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলাম এবং তাঁর সাথে মাগরিবের সালাত আদায় করলাম। অতঃপর তিনি ঈশার সালাত পর্যন্ত (নফল) সালাত আদায় করতে থাকলেন।









সহীহ আত তারগীব ওয়াত তারহীব (591)


591 - (1) [صحيح] `أن النبيَّ صلى الله عليه وسلم كان إذا صلى العشاء ورجعَ إلى بيتِهِ صلى أربعَ رَكعاتٍ`.(1)
أضربت عن ذكرها لأنها ليست من شرط كتابنا.(2)

‌‌7 - (الترغيب في صلاة الوتر، وما جاء فيمن لم يوتر).




নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন ইশার সালাত আদায় করতেন এবং নিজ গৃহে প্রত্যাবর্তন করতেন, তখন তিনি চার রাকাত সালাত আদায় করতেন।









সহীহ আত তারগীব ওয়াত তারহীব (592)


592 - (1) [صحيح لغيره] عن علي رضي الله عنه قال:
الوترُ ليس بِحَتْمٍ كصلاتِكم(3) المكتوبة، ولكن سَنَّ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، [و] قال:
`إن الله وترٌ يحب الوتر، فأوتروا يا أهلَ القرآنِ`.
رواه أبو داود والترمذي -واللفظ له- والنسائي وابن ماجه، وابن خزيمة في `صحيحه`، وقال الترمذي:
`حديث حسن`.




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: বিতর সালাত তোমাদের ফরয সালাতগুলোর মতো বাধ্যতামূলক (হাত্ম/ফরয) নয়। কিন্তু রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম এটিকে সুন্নাত করেছেন এবং বলেছেন: "নিশ্চয় আল্লাহ বেজোড় (এক), তিনি বেজোড়কে পছন্দ করেন। অতএব, হে কুরআনের অনুসারীরা, তোমরা বিতর সালাত আদায় করো।"









সহীহ আত তারগীব ওয়াত তারহীব (593)


593 - (2) [صحيح] وعن جابرٍ رضي الله عنه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:
`من خاف أن لا يقومَ مِنْ آخر الليلِ فليوتِرْ أوَّله، ومن طَمع أن يقومَ آخرَه فليوتِر آخرَ الليل؛ فإن صلاةَ آخرِ الليل مشهودةٌ محضورةٌ، وذلك أفضلُ`.
رواه مسلم والترمذي وابن ماجه وغيرهم.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যে ব্যক্তি ভয় করে যে সে রাতের শেষাংশে (তাহাজ্জুদের জন্য) উঠতে পারবে না, সে যেন রাতের প্রথমাংশেই বিতর পড়ে নেয়। আর যে ব্যক্তি রাতের শেষাংশে (তাহাজ্জুদের জন্য) উঠতে আকাঙ্ক্ষা করে, সে যেন রাতের শেষাংশেই বিতর পড়ে। কেননা রাতের শেষাংশের সালাত উপস্থিত (ফেরেশতাদের দ্বারা) সাক্ষ্যপ্রাপ্ত হয়, আর এটাই সর্বোত্তম।









সহীহ আত তারগীব ওয়াত তারহীব (594)


594 - (3) [حسن صحيح] وعنه(1) رضي الله عنه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:
`يا أهل القرآن أوتروا؛ فإن الله وترٌ يحبُّ الوتر`.
رواه أبو داود.




তাঁর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "হে কুরআনের অনুসারীগণ, তোমরা বিতর (সালাত) আদায় করো; কারণ আল্লাহ্ বিজোড়, এবং তিনি বিজোড়কে ভালোবাসেন।" এটি আবূ দাঊদ বর্ণনা করেছেন।









সহীহ আত তারগীব ওয়াত তারহীব (595)


595 - (4) [صحيح] ورواه ابن خزيمة في `صحيحه` مختصراً من حديث أبي هريرة رضي الله عنه:
إن الله وتر، يحبُّ الوترَ(2).




আবূ হুরাইরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই আল্লাহ্ বিজোড় (একক), আর তিনি বিজোড়কে পছন্দ করেন।