হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (9641)


9641 - عن أبي سعيد الخدري قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم:"لا تسبوا أصحابي فلو أن أحدكم
أنفق مثل أحد ذهبا ما بلغ مُدَّ أحدهم ولا نصيفه".

متفق عليه: رواه البخاري في فضائل الصحابة (3673)، ومسلم في فضائل الصحابة (2541) كلاهما من حديث الأعمش قال: سمعت ذكوان يحدث عن أبي سعيد الخدري قال: فذكره.

وهذا لفظ البخاري، وفي أوله عند مسلم زيادة وهي قوله: كان بين خالد بن الوليد وبين عبد الرحمن بن عوف شيء، فسبَّه خالد، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تسبوا أحدا من أصحابي …" فذكره.

ورواه مسلم (254: 221) من طريق آخر عن أبي معاوية، عن الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تسبوا أصحابي، لا تسبوا أصحابي، فوالذي نفسي بيده، لو أن أحدكم أنفق مثل أحد ذهبا ما أدرك مُدَّ أحدهم ولا نصيفه".

إلا أن أهل العلم اتفقوا على أن مسلما وهم في هذا، فإن الصواب أنه من حديث أبي سعيد الخدري، نبَّه على ذلك علي بن المديني وخلف الواسطي وأبو مسعود وأبو علي الجياني وغيرهم. انظر: الفتح (7/ 35 - 36).




আবু সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা আমার সাহাবীদের গালি দিও না। কারণ, যদি তোমাদের কেউ উহুদ পাহাড় পরিমাণ সোনাও ব্যয় করে, তবুও তাদের এক মুদ পরিমাণ (দান)-এর সমতুল্য হতে পারবে না, আর না তার অর্ধেকের।"









আল-জামি` আল-কামিল (9642)


9642 - عن عبد الله بن بسر قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"طوبى لمن رآني، وطوبى لمن آمن بي ولم يرني، وطوبى له وحسن مآب".

حسن: رواه يعقوب بن سفيان في المعرفة والتاريخ (2/ 351) عن آدم بن أبي إياس -؛ والضياء في المختارة (9/ 98 - 99) من وجه آخر عن آدم، ومن رواية داود بن رُشيد- كلاهما عن بقية، ثنا محمد بن عبد الرحمن اليحصبي قال: سمعت عبد الله بن بسر يقول: فذكره.

وإسناده حسن من أجل بقية بن الوليد، فإنه حسن الحديث إذا صرَّح.

وفي معناه ما روي عن يوسف بن عبد الله بن سلام أنه قال: سئل رسول الله صلى الله عليه وسلم: أنحن خير أم من بعدنا؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لو أنفق أحدهم أحدا ذهبا ما بلغ مُدَّ أحدكم ولا نصيفه".

أخرجه أحمد في مسنده (23835) عن حسن بن موسى، ثنا ابن لهيعة، ثنا بكير بن الأشج، عن يوسف بن عبد الله بن سلام قال: فذكره. وابن لهيعة فيه كلام معروف.

وفي معناه ما روي أيضا عن أنس قال: كان بين خالد بن الوليد وبين عبد الرحمن بن عوف كلام، فقال خالد لعبد الرحمن: تستطيلون علينا بأيام سبقتمونا بها، فبلغنا أن ذلك ذُكِر للنبي صلى الله عليه وسلم فقال:"دعوا لي أصحابي، فوالذي نفسي بيده، لو أنفقتم مثل أحد -أو مثل الجبال- ذهبا، ما بلغتم أعمالهم".

رواه أحمد (13812) ثنا أحمد بن عبد الملك، ثنا زهير، ثنا حميد الطويل، عن أنس قال: فذكره.

والحديث بهذا الإسناد سئل عنه أبو حاتم فقال:"هذا خطأ، إنما هو حميد عن الحسن، عن النبي صلى الله عليه وسلم مرسل". انظر: علل الحديث لابنه (2590).

وقوله:"مُدَّ أحدهم" هو مكيال معلوم.
وقوله:"النصيف" يعني النصف.

وأما ما روي عن جابر بن عبد الله قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"لا تمس النار مسلما رآني، أو رأى من رآني". فهو ضعيف.

رواه الترمذي (3858)، وابن أبي عاصم في السنة (1525) كلاهما من حديث موسى بن إبراهيم ابن كثير الأنصاري قال: سمعت طلحة بن خراش يقول: سمعت جابر بن عبد الله يقول: فذكره.

وقال الترمذي عقبه:"هذا حديث حسن غريب لا نعرفه إلا من حديث موسى بن إبراهيم الأنصاري، وروى علي بن المديني وغير واحد من أهل الحديث عن موسى هذا الحديث".

قلت: موسى بن إبراهيم بن كثير لم يوثّقه سوى ابن حبان، فإنه ذكره في الثقات (7/ 449) وقال:"كان ممن يخطئ".

وهذا مما أخطأ فيه لوجود النكارة في المتن، وقد قال غير واحد من أهل العلم: إن طلحة بن خراش روى عن جابر مناكير.

وفي الباب عن عبد الله بن مغفل قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"الله الله في أصحابي، لا تتخذوهم غرضا بعدي، فمن أحبهم فبحبي أحبهم، ومن أبغضهم فببغضي أبغضهم، ومن آذاهم فقد آذاني، ومن آذاني فقد آذى الله، ومن آذى الله فيوشك أن يأخذه".

رواه الترمذي (3862)، وأحمد (16803)، وابن حبان (7256) كلهم من حديث عَبيدة بن أبي رائطة، عن عبد الرحمن بن زياد، عن عبد الله بن مغفل فذكره.

قال الترمذي:"هذا حديث غريب لا نعرفه إلا من هذا الوجه".

يعني به: ضعيف. فإن عبد الرحمن بن زياد، وقيل: عبد الله بن عبد الرحمن، وقيل غير ذلك، قال فيه البخاري عقب هذه الرواية:"فيه نظر" ومع ذلك ذكره ابن حبان في الثقات، ولذا قال الحافظ ابن حجر:"مقبول" أي عند المتابعة، ولم أجد له متابعا فهو لين الحديث.

وفي الباب أيضا عن عائشة قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تسبوا أصحابي، لعن الله من سب أصحابي".

رواه الطبراني في الأوسط (5/ 378 رقم: 4768) عن عبد الرحمن بن الحسين الصابوني، ثنا علي بن سهل المدائني، ثنا أبو عاصم الضحاك بن مخلد، عن ابن جريج، عن عطاء، عن عائشة قالت: فذكرته.

وقال الطبراني عقبه:"لم يرو هذا الحديث عن ابن جريج إلا أبو عاصم تفرد به علي بن سهل".

قلت: علي بن سهل المدائني لم يوثّقه أحد.

وأما ابن جريج فقد صرّح أنه إذا قال قال، أو عن عطاء فإنه سمع منه.




আব্দুল্লাহ ইবনে বুসর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "সৌভাগ্য (তূবা) তার জন্য যে আমাকে দেখেছে, এবং সৌভাগ্য তার জন্য যে আমার প্রতি ঈমান এনেছে কিন্তু আমাকে দেখেনি। তার জন্য সৌভাগ্য এবং উত্তম প্রত্যাবর্তনস্থল।"









আল-জামি` আল-কামিল (9643)


9643 - عن أنس بن مالك قال: ذكر أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم مالك بن الدُّخشم عند رسول الله
- صلى الله عليه وسلم، فوقعوا فيه، وشتموه، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"دعوا لي أصحابي" فقالوا: يا رسول الله، إنه كهف المنافقين وملجؤهم الذي يلجؤون إليه، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أليس يشهد أن لا إله إلا الله، وأني رسول الله؟" قالوا: بلى، ولا خير في شهادته، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا يشهد بها عبد صادقا من قلبه، ثم يموت على ذلك، إلا حرمه الله على النار".

صحيح: رواه النسائي في الكبرى (10877)، والبزار في مسنده (7221) من حديث آدم بن أبي إياس، ثنا شيبان، عن قتادة، عن أنس قال: فذكره.

واللفظ للنسائي، ولفظ البزار مختصر، وفيه:"فقالوا: إنه رأس المنافقين، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"دعوا لي أصحابي، لا تسبوا أصحابي".

وقال البزار:"هذا الحديث لا نعلم رواه عن قتادة، عن أنس إلا شيبان، ولا نعلم رواه عن شيبان إلا آدم".

ومالك بن الدُّخشم، ويقال: بالنون بدل الميم الأنصاري الأوسي، شهد بدرا.

قال ابن عبد البر:"لا يصح عنه النفاق، فقد ظهر من حسن إسلامه ما يمنع من اتهامه بذلك".

وهو الذي قال فيه النبي صلى الله عليه وسلم لما قيل له: -ذاك منافق لا يحب الله ورسوله-:"لا تقل ذلك، ألا تراه قد قال: لا إله إلا الله، يريد بذلك وجه الله …" الحديث.

رواه البخاري في الصلاة (425)، ومسلم في المساجد ومواضع الصلاة (657 - 263).

وفي الباب عن عبد الله بن مَوَلَة قال: بينما أنا أسير بالأهواز، إذا أنا برجل يسير بين يدي على بغل -أو بغلة- فإذا هو يقول: اللهم! ذهب قرني من هذه الأمة، فألحقني بهم، فقلت: وأنا فأدخل في دعوتك. قال: وصاحبي هذا إن أراد ذلك. ثم قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"خير أمتي قرني منهم، ثم الذين يلونهم -قال: ولا أدري أذكر الثالث، أم لا- ثم تخلف أقوام يظهر فيهم السمن، يهريقون الشهادة، ولا يُسألونَها". قال:"وإذا هو بريدة الأسلمي".

رواه أحمد (22960)، وابن أبي شيبة (33081)، وابن أبي عاصم في السنة (1515) كلهم من طرق، عن الجريري، عن أبي نضرة، عن عبد الله بن مولة فذكره.

والْجُريري هو سعيد بن إياس موصوف بالاختلاط، ولكن روى عنه من سمع منه قبل اختلاطه، وهم إسماعيل ابن علية، وحماد بن سلمة، وعبد الأعلى، ولكن فيه عبد الله بن مولة فإنه لم يرو عنه غير أبي نضرة وذكره ابن حبان في الثقات (5/ 48)، ولذا وصفه ابن حجر بأنه"مقبول" يعني حيث يتابع وإلا فلين الحديث، ولم يتابع على هذا الحديث.




আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট মালিক ইবনুদ্ দুখশুমকে আলোচনা করলেন এবং তার সমালোচনা করে তাকে গালি দিলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমার সাহাবীদেরকে আমার জন্য ছেড়ে দাও।" তারা বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল! সে তো মুনাফিকদের আশ্রয়স্থল, তারা তার কাছেই আশ্রয় গ্রহণ করে।" তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সে কি সাক্ষ্য দেয় না যে, আল্লাহ ব্যতীত কোনো ইলাহ নেই এবং আমি আল্লাহর রাসূল?" তারা বললেন: "হ্যাঁ, দেয়। কিন্তু তার সাক্ষ্যে কোনো কল্যাণ নেই।" তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "কোনো বান্দা যদি আন্তরিকভাবে ও সততার সাথে এই সাক্ষ্য দেয় এবং এর ওপরই মৃত্যুবরণ করে, তবে আল্লাহ অবশ্যই তাকে জাহান্নামের জন্য হারাম করে দেবেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (9644)


9644 - عن عمر بن الخطاب قال: إني سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إن خير التابعين رجل يقال له: أويس، وله والدة وكان به بياض، فمروه فليستغفر لكم".

صحيح: رواه مسلم في الفضائل (2542 - 224) من طرق عن عفان بن مسلم، ثنا حماد -هو ابن سلمة-، عن سعيد الجريري، عن أبي نضرة، عن أسير بن جابر، عن عمر بن الخطاب قال: فذكره.




উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “নিশ্চয়ই উত্তম তাবেয়ী হলেন একজন লোক, যাকে উওয়াইস বলা হয়। তাঁর একজন জননী আছেন এবং তাঁর শরীরে শ্বেত রোগ ছিল। সুতরাং তোমরা তাঁকে নির্দেশ দেবে, যেন তিনি তোমাদের জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করেন।”









আল-জামি` আল-কামিল (9645)


9645 - عن * *




৯৬৪৫ - ...হতে বর্ণিত...









আল-জামি` আল-কামিল (9646)


9646 - عن عروة بن الزبير قال: سألت عبد الله بن عمرو عن أشد ما صنع المشركون برسول الله صلى الله عليه وسلم، قال: رأيت عقبة بن أبي معيط جاء إلى النبي صلى الله عليه وسلم وهو يصلي، فوضع رداءه في عنقه، فخنقه به خنقا شديدا، فجاء أبو بكر حتى دفعه عنه فقال: {أَتَقْتُلُونَ رَجُلًا أَنْ يَقُولَ رَبِّيَ اللَّهُ وَقَدْ جَاءَكُمْ بِالْبَيِّنَاتِ مِنْ رَبِّكُمْ} [غافر: 28].

صحيح: رواه البخاري في فضائل الصحابة (3678) عن محمد بن يزيد الكوفي، ثنا الوليد، عن الأوزاعي، عن يحيى بن أبي كثير، عن محمد بن إبراهيم، عن عروة بن الزبير، فذكره.

وفي لفظ:"بينا رسول الله صلى الله عليه وسلم يصلي بفناء الكعبة، إذ أقبل عقبة بن أبي معيط، فأخذ بمنكب رسول الله صلى الله عليه وسلم، ولوى ثوبه في عنقه، فخنقه به خنقا شديدا، فأقبل أبو بكر، فأخذ بمنكبه، ودفع عن رسول الله صلى الله عليه وسلم …".

رواه البخاري في التفسير (4815) عن علي بن عبد الله، ثنا الوليد بن مسلم، ثنا الأوزاعي قال: حدثني يحيى بن أبي كثير، ثني محمد بن إبراهيم التيمي، حدثني عروة بن الزبير قال: فذكره.

وفي لفظ:"بينا النبي صلى الله عليه وسلم يصلي في حجر الكعبة …".

رواه البخاري في مناقب الأنصار (3856) عن عياش بن الوليد، ثنا الوليد بن مسلم به، فذكره.




আব্দুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উরওয়া ইবনু যুবাইর তাকে জিজ্ঞেস করলেন যে, মুশরিকরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সবচেয়ে কঠিন কী আচরণ করেছিল? তিনি বললেন: আমি দেখেছি, উক্ববা ইবনু আবী মুআইত রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এলো যখন তিনি সালাত আদায় করছিলেন। সে তখন তাঁর (নবীর) গলায় নিজের চাদরটি জড়িয়ে দিল এবং তা দিয়ে তাঁকে কঠিনভাবে শ্বাসরোধ করে হত্যা করার চেষ্টা করলো। তখন আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আসলেন এবং তাকে (উক্ববাকে) ধাক্কা মেরে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে সরিয়ে দিলেন এবং বললেন: "তোমরা কি এমন এক ব্যক্তিকে হত্যা করতে চাও, যিনি বলেন, 'আমার রব আল্লাহ,' অথচ তিনি তোমাদের রবের পক্ষ থেকে তোমাদের কাছে স্পষ্ট প্রমাণাদি নিয়ে এসেছেন?" (সূরা গাফির: ২৮)









আল-জামি` আল-কামিল (9647)


9647 - عن عائشة، قالت: لما أسري بالنبي صلى الله عليه وسلم إلى المسجد الأقصى أصبح يتحدث الناس بذلك، فارتد ناس ممن آمنوا به، وصدقوه، وسعوا بذلك إلى أبي بكر، فقالوا: هل لك إلى صاحبك يزعم أنه أسري به الليلة إلى بيت المقدس؟ قال: أو قال ذلك؟ قالوا: نعم. قال: لئن كان قال ذلك لقد صدق. قالوا: أو تصدقه أنه ذهب الليلة إلى بيت المقدس، وجاء قبل أن يصبح؟ قال: نعم إني لأصدقه فيما هو أبعد من ذلك، أصدقه بخبر السماء في غدوة أو روحة؛ فلذلك سمي أبو بكر الصديق.

حسن: رواه الحاكم (3/ 62) ومن طريقه البيهقي في الدلائل (2/ 360 - 361) من طريق محمد ابن كثير الصنعاني قال: حدثنا معمر بن راشد، عن الزهري، عن عروة، عن عائشة فذكرته.
قال الحاكم: صحيح الإسناد.

وإسناده حسن من أجل الكلام في محمد بن كثير الصنعاني، والخلاصة أنه حسن الحديث في الشواهد.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে মসজিদুল আকসা পর্যন্ত ইসরা (ভ্রমণ) করানো হলো, তখন সকালে মানুষজন এই নিয়ে আলোচনা করতে শুরু করলো। ফলে তাঁর উপর যারা ঈমান এনেছিল এবং তাঁকে যারা সত্যায়ন করেছিল, তাদের কিছু লোক ধর্মচ্যুত (মুরতাদ) হয়ে গেল। তারা এই সংবাদ নিয়ে আবূ বকরের কাছে ছুটে গেল এবং বলল: আপনার বন্ধুর কী খবর? তিনি দাবি করেন যে তাঁকে নাকি গত রাতে বাইতুল মুকাদ্দাস (জেরুজালেম) পর্যন্ত ইসরা করানো হয়েছে? আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তিনি কি সত্যিই এমন কথা বলেছেন? তারা বলল: হ্যাঁ। আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: যদি তিনি তা বলে থাকেন, তবে অবশ্যই তিনি সত্য বলেছেন। তারা বলল: আপনি কি তাঁকে বিশ্বাস করেন যে তিনি এক রাতেই বাইতুল মুকাদ্দাসে গেলেন এবং সকাল হওয়ার আগেই ফিরেও আসলেন? তিনি বললেন: হ্যাঁ, এর চেয়েও দূরের বিষয়ে আমি তাঁকে বিশ্বাস করি। আমি তো তাঁকে সকাল-সন্ধ্যায় আসমানী খবরের বিষয়েও বিশ্বাস করি; এ কারণেই আবূ বকরকে 'সিদ্দিক' (সত্যবাদী) নামে নামকরণ করা হয়েছিল।









আল-জামি` আল-কামিল (9648)


9648 - عن عائشة زوج النبي صلى الله عليه وسلم قالت: لم أعقل أبوي قط إلا وهما يدينان الدين، ولم يمر علينا يوم إلا يأتينا فيه رسول الله صلى الله عليه وسلم طرفي النهار بكرة وعشية. فلما ابتلي المسلمون خرج أبو بكر مهاجرا قبل الحبشة حتى إذا بلغ برك الغماد لقيه ابن الدغنة -وهو سيد القارة- فقال: أين تريد يا أبا بكر؟ فقال أبو بكر: أخرجني قومي، فأنا أريد أن أسيح في الأرض، فأعبد ربي. قال ابن الدغنة: إن مثلك لا يَخرج، ولا يُخرج؛ فإنك تكسب المعدوم، وتصل الرحم، وتحمل الكل، وتقري الضيف، وتعين على نوائب الحق، وأنا لك جار، فارجع فاعبد ربك ببلادك، فارتحل ابن الدغنة، فرجع مع أبي بكر، فطاف في أشراف كفار قريش، فقال لهم: إن أبا بكر لا يَخرج مثله ولا يُخرج، أتخرجون رجلا يكسب المعدوم، ويصل الرحم، ويحمل الكل، ويقري الضيف، ويعين على نوائب الحق؟ .

فأنفذت قريش جوار ابن الدغنة، وآمنوا أبا بكر، وقالوا لابن الدغنة: مر أبا بكر فليعبد ربه في داره، فليصل وليقرأ ما شاء، ولا يؤذينا بذلك، ولا يستعلن به، فإنا قد خشينا أن يفتن أبناءنا ونساءنا. قال ذلك ابن الدغنة لأبي بكر، فطفق أبو بكر يعبد ربه في داره، ولا يستعلن بالصلاة ولا القراءة في غير داره.

ثم بدا لأبي بكر فابتنى مسجدا بفناء داره، وبرز، فكان يصلي فيه ويقرأ القرآن، فيتقصَّف عليه نساء المشركين وأبناؤهم يعجبون وينظرون إليه، وكان أبو بكر رجلا بكاء لا يملك دمعه حين يقرأ القرآن، فأفزع ذلك أشراف قريش من المشركين، فأرسلوا إلى ابن الدغنة، فقدم عليهم، فقالوا له: إنا كنا أجرنا أبا بكر على أن يعبد ربه في داره، وإنه جاوز ذلك، فابتنى مسجدا بفناء داره، وأعلن الصلاة والقراءة، وقد خشينا أن يفتن أبناءنا ونساءنا، فأته فإن أحب أن يقتصر على أن يعبد ربه في داره فعل، وإن أبى إلا أن يعلن ذلك فسله أن يرد إليك ذمتك، فإنا كرهنا أن نخفرك، ولسنا مقرين لأبي بكر الاستعلان.
قالت عائشة: فأتى ابن الدغنة أبا بكر فقال: قد علمت الذي عقدت لك عليه، فإما أن تقتصر على ذلك، وإما أن ترد إلي ذمتي، فإني لا أحب أن تسمع العرب أني أخفرت في رجل عقدت له. قال أبو بكر: فإني أرد إليك جوارك، وأرضى بجوار الله، -ورسول الله صلى الله عليه وسلم يومئذ بمكة- فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"قد أريت دار هجرتكم، رأيت سبخة ذات نخل بين لابتين" وهما الحرتان. فهاجر من هاجر قِبل المدينة حين ذكر ذلك رسول الله صلى الله عليه وسلم، ورجع إلى المدينة بعض من كان هاجر إلى أرض الحبشة، وتجهز أبو بكر مهاجرا، فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم:"على رسلك، فإني أرجو أن يؤذن لي" قال أبو بكر: هل ترجو ذلك بأبي أنت؟ قال:"نعم" فحبس أبو بكر نفسه على رسول الله صلى الله عليه وسلم ليصحبه، وعلف راحلتين كانتا عنده ورق السمر أربعة أشهر.

صحيح: رواه البخاري في الكفالة (2297) عن يحيى بن بكير، حدثنا الليث، عن عُقيل، قال ابن شهاب: فأخبرني عروة بن الزبير أن عائشة زوج النبي صلى الله عليه وسلم قالت. وقال أبو صالح: حدثني عبد الله، عن يونس، عن الزهري قال: أخبرني عروة بن الزبير أن عائشة قالت: فذكرته.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আমার পিতামাতাকে সবসময় ইসলাম ধর্মের অনুসারী হিসেবেই পেয়েছি। এমন কোনো দিন আমাদের উপর দিয়ে যায়নি যেদিন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দিনের দুই ভাগে—সকাল ও সন্ধ্যায়—আমাদের নিকট আসেননি।

যখন মুসলিমদের উপর পরীক্ষা (নির্যাতন) শুরু হলো, তখন আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হাবশার (আবিসিনিয়ার) দিকে হিজরত করার উদ্দেশ্যে বের হলেন। তিনি যখন বারক আল-গিমাদ নামক স্থানে পৌঁছলেন, তখন তাঁর সাথে ইবনুদ্ দাগিন্নাহ্’র সাক্ষাৎ হলো—তিনি ছিলেন ক্বারাহ গোত্রের সর্দার। তিনি জিজ্ঞেস করলেন, “হে আবূ বকর! আপনি কোথায় যেতে চান?” আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, “আমার কওম আমাকে বের করে দিয়েছে, তাই আমি এখন পৃথিবীর বুকে ঘুরে বেড়াতে এবং আমার রবের ইবাদত করতে চাই।”

ইবনুদ্ দাগিন্নাহ্ বললেন, “আপনার মতো মানুষ না তো নিজে বের হয়ে যান, আর না তাঁকে বের করে দেওয়া উচিত। কেননা আপনি অসহায়কে সাহায্য করেন, আত্মীয়তার সম্পর্ক বজায় রাখেন, দুস্থদের বোঝা বহন করেন, মেহমানের আপ্যায়ন করেন এবং সত্যের পক্ষে বিপদে সাহায্য করেন। আমি আপনার জিম্মাদার (আশ্রয়দাতা)। আপনি ফিরে যান এবং আপনার শহরে আপনার রবের ইবাদত করুন।” এরপর ইবনুদ্ দাগিন্নাহ্ আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে ফিরে গেলেন এবং কুরাইশ কাফেরদের সর্দারদের নিকট গেলেন। তিনি তাদেরকে বললেন, “আবূ বকরের মতো লোককে না তো বের করে দেওয়া উচিত, আর না তিনি নিজে চলে যেতে পারেন। আপনারা কি এমন লোককে বের করে দেবেন যিনি অসহায়কে সাহায্য করেন, আত্মীয়তার সম্পর্ক বজায় রাখেন, দুস্থদের বোঝা বহন করেন, মেহমানের আপ্যায়ন করেন এবং সত্যের পক্ষে বিপদে সাহায্য করেন?”

তখন কুরাইশরা ইবনুদ্ দাগিন্নাহ্’র জিম্মাদারী মেনে নিল এবং আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে নিরাপত্তা দিল। তারা ইবনুদ্ দাগিন্নাহ্-কে বলল, “আপনি আবূ বকরকে বলে দিন, তিনি যেন নিজ ঘরে তাঁর রবের ইবাদত করেন। তিনি যত ইচ্ছা সালাত আদায় করুন এবং তিলাওয়াত করুন, কিন্তু এর দ্বারা যেন আমাদের কোনো কষ্ট না হয় এবং তিনি যেন প্রকাশ্যে তা না করেন। কারণ আমাদের আশঙ্কা হচ্ছে যে তিনি আমাদের সন্তান ও নারীদেরকে ফিতনায় ফেলে দেবেন।” ইবনুদ্ দাগিন্নাহ্ আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে এই কথা জানালেন। এরপর আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর ঘরের মধ্যেই তাঁর রবের ইবাদত করতে লাগলেন এবং নিজ ঘরের বাইরে সালাত বা কিরাত প্রকাশ্যে আদায় করতেন না।

তারপর আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মনে পরিবর্তন এলো। তিনি তাঁর ঘরের আঙিনায় একটি মসজিদ নির্মাণ করলেন এবং প্রকাশ্যে সেখানে সালাত আদায় ও কুরআন তিলাওয়াত শুরু করলেন। তখন মুশরিকদের নারী ও শিশুরা ভিড় জমিয়ে তাকে দেখত ও বিস্মিত হতো। আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ছিলেন খুব কোমল হৃদয়ের মানুষ, কুরআন তিলাওয়াতের সময় তিনি চোখের পানি নিয়ন্ত্রণ করতে পারতেন না (কেঁদে ফেলতেন)। এ বিষয়টি মুশরিক কুরাইশ সর্দারদেরকে ভীত করে তুলল। তারা ইবনুদ্ দাগিন্নাহ্’র কাছে লোক পাঠালো। তিনি তাদের কাছে এলে তারা বলল, “আমরা আবূ বকরকে এই শর্তে আশ্রয় দিয়েছিলাম যে তিনি তাঁর রবের ইবাদত তাঁর ঘরে করবেন। কিন্তু তিনি এর সীমা লঙ্ঘন করেছেন। তিনি তাঁর ঘরের আঙিনায় একটি মসজিদ বানিয়ে সালাত ও তিলাওয়াত প্রকাশ্যে শুরু করেছেন। আমরা আশঙ্কা করছি যে তিনি আমাদের সন্তান ও নারীদেরকে ফিতনায় ফেলে দেবেন। আপনি তাঁর কাছে যান। তিনি যদি শুধু ঘরে ইবাদত করতে রাজি থাকেন, তবে তা করবেন; আর যদি তিনি প্রকাশ্যে ইবাদত করা ছাড়া অন্য কিছু করতে অস্বীকার করেন, তবে তাঁকে বলুন তিনি যেন আপনার জিম্মাদারী ফিরিয়ে দেন। কারণ আমরা আপনাকে অসম্মানিত করতে চাই না, আর আবূ বকরকে প্রকাশ্যে ইবাদত করার অনুমতি দিতেও রাজি নই।”

আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, এরপর ইবনুদ্ দাগিন্নাহ্ আবূ বকরের নিকট এসে বললেন, “আমি আপনার জন্য যে চুক্তি করেছিলাম, তা তো আপনি জানেন। হয় আপনি সেই শর্তের মধ্যে সীমাবদ্ধ থাকুন, না হয় আপনি আমার জিম্মাদারী আমাকে ফিরিয়ে দিন। কারণ, আমি পছন্দ করি না যে আরবরা শুনুক যে আমি যার সাথে চুক্তি করেছিলাম তাকে রক্ষা করতে ব্যর্থ হয়েছি।” আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, “নিশ্চয়ই আমি আপনার আশ্রয় ফিরিয়ে দিচ্ছি, আর আমি আল্লাহ্‌র আশ্রয়ে সন্তুষ্ট।”—রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখনও মক্কায় ছিলেন। [এই সময়ে] রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, “আমাকে তোমাদের হিজরতের স্থান দেখানো হয়েছে। আমি দুটি লাভা পাথরের মধ্যবর্তী খেজুর গাছ বিশিষ্ট একটি লবণাক্ত ভূমি দেখেছি।” এই দুটি লাভা পাথর হলো ‘আল-হাররাতাইন’ (অর্থাৎ মদীনা)।

যখন রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এই কথা বললেন, তখন যারা হিজরত করার ছিল, তারা মদীনার দিকে হিজরত করল। যারা ইতিপূর্বে হাবশায় হিজরত করেছিল, তাদের মধ্য থেকে কেউ কেউ মদীনায় ফিরে এলো। আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হিজরতের জন্য প্রস্তুতি নিলেন। তখন রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেন, “ধীরে, আমি আশা করছি যে আমাকেও (হিজরতের) অনুমতি দেওয়া হবে।” আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, “আমার পিতা আপনার জন্য কুরবান হোক, আপনি কি সেই আশা করেন?” তিনি বললেন, “হ্যাঁ।” তখন আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে হিজরতের সঙ্গী হওয়ার জন্য নিজেকে আটকে রাখলেন এবং তাঁর কাছে থাকা দুটি সওয়ারীর উটকে বাবলা (সামুর) গাছের পাতা চার মাস ধরে খাওয়ালেন (পুষ্ট করলেন)।









আল-জামি` আল-কামিল (9649)


9649 - عن البراء بن عازب يقول: جاء أبو بكر رضي الله عنه إلى أبي في منزله، فاشترى منه رحلا، فقال لعازب: ابعث ابنك يحمله معي. قال: فحملته معه، وخرج أبي ينتقد ثمنه، فقال له أبي: يا أبا بكر! حدثني كيف صنعتما حين سريت مع رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ قال: نعم، أسرينا ليلتنا ومن الغد حتى قام قائم الظهيرة وخلا الطريق لا يمر فيه أحد، فرفعت لنا صخرة طويلة لها ظل لم تأت عليه الشمس، فنزلنا عنده، وسويت للنبي صلى الله عليه وسلم مكانا بيدي ينام عليه، وبسطت فيه فروة، وقلت: نم يا رسول الله، وأنا أنفض لك ما حولك، فنام، وخرجت أنفض ما حوله، فإذا أنا براع مقبل بغنمه إلى الصخرة، يريد منها مثل الذي أردنا، فقلت: لمن أنت يا غلام؟ فقال لرجل من أهل المدينة أو مكة. قلت: أفي غنمك لبن؟ قال: نعم. قلت: أفتحلب؟ قال: نعم. فأخذ شاة، فقلت: انفض الضرع من التراب والشعر والقذى، قال: فرأيت البراء يضرب إحدى يديه على الأخرى ينفض، فحلب في قعب كثبة من لبن، ومعي إداوة حملتها للنبي صلى الله عليه وسلم يرتوي منها، يشرب ويتوضأ، فأتيت النبي صلى الله عليه وسلم، فكرهت أن أوقظه فوافقته حين استيقظ، فصببت من الماء على اللبن حتى برد أسفله، فقلت: اشرب يا رسول الله. قال: فشرب حتى رضيت ثم قال:"ألم يأن الرحيل؟". قلت: بلى. قال:
فارتحلنا بعد ما مالت الشمس، واتبعنا سراقة بن مالك، فقلت: أُتينا يا رسول الله. فقال:"لا تحزن، إن الله معنا". فدعا عليه النبي صلى الله عليه وسلم، فارتطمت به فرسه إلى بطنها -أرى- في جلد من الأرض -شك زهير- فقال: إني أراكما قد دعوتما عليَّ، فادعوا لي، فالله لكما أن أرد عنكما الطلب، فدعا له النبي صلى الله عليه وسلم فنجا، فجعل لا يلقى أحدا إلا قال: كفيتكم ما هنا، فلا يلقى أحدا إلا رده. قال: ووفى لنا.

متفق عليه: رواه البخاري في المناقب (3615)، ومسلم في الزهد والرقائق (2009 - 75) كلاهما من طريق زهير بن معاوية، ثنا أبو إسحاق، قال: سمعت البراء بن عازب يقول: فذكره. وهذا لفظ البخاري، ولفظ مسلم نحوه.




বারা ইবনে আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একদিন আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমার পিতার বাড়িতে এলেন এবং তাঁর কাছ থেকে একটি হাওদা (উট বা ঘোড়ার পিঠের আসন) কিনলেন। তিনি আযিবকে (আমার পিতাকে) বললেন: আপনার ছেলেকে আমার সাথে এটি বহন করার জন্য পাঠান। বারা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি সেটি তাঁর সাথে বহন করলাম। আর আমার পিতা তার দাম পরিশোধের জন্য চলে গেলেন। আমার পিতা তাঁকে বললেন: হে আবু বকর! আপনি যখন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে রাতের বেলা (হিজরতের উদ্দেশ্যে) যাত্রা শুরু করেছিলেন, তখন আপনারা কী করেছিলেন, তা আমাকে বলুন।

আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হ্যাঁ। আমরা আমাদের সে রাতে এবং পরের দিন দুপুর পর্যন্ত চলতে থাকলাম, যখন সূর্যের তেজ সর্বোচ্চ হলো এবং রাস্তা জনশূন্য হয়ে পড়ল, কেউ চলাচল করছিল না। তখন আমরা একটি দীর্ঘ পাথর দেখতে পেলাম, যার এমন ছায়া ছিল, যা সূর্যের আলো স্পর্শ করেনি। আমরা তার কাছে অবতরণ করলাম। আমি আমার নিজের হাতে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ঘুমানোর স্থান সমান করে দিলাম এবং সেখানে একটি চামড়ার বিছানা পেতে দিলাম। আমি বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনি ঘুমিয়ে পড়ুন, আর আমি আপনার চারপাশ থেকে ধুলোবালি ঝেড়ে দিচ্ছি। তিনি ঘুমালেন, আর আমি তাঁর চারপাশের জায়গা ঝেড়ে দিতে বাইরে গেলাম। তখন হঠাৎ দেখলাম, একজন রাখাল তার ছাগল নিয়ে সেই পাথরের দিকে আসছে, সেও আমাদের মতো ছায়া খুঁজছিল। আমি বললাম: হে বালক! তুমি কার লোক? সে বলল: মক্কা বা মদীনার কোনো এক ব্যক্তির। আমি জিজ্ঞেস করলাম: তোমার ছাগলপালে কি দুধ আছে? সে বলল: হ্যাঁ। আমি বললাম: তুমি কি দুধ দোহন করবে? সে বলল: হ্যাঁ। সে একটি ছাগল ধরল। আমি বললাম: ওলান থেকে মাটি, পশম ও ময়লা ঝেড়ে দাও।

(আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন:) আমি বারাকে দেখলাম, তিনি (নির্দেশ অনুযায়ী) ঝেড়ে ফেলার জন্য তার এক হাত দিয়ে অন্য হাতে আঘাত করছেন। এরপর সে একটি কাঠের পাত্রে অল্প পরিমাণ দুধ দোহন করল। আমার কাছে একটি পানির মশক ছিল, যা আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য বহন করেছিলাম, যাতে তিনি তৃষ্ণা মেটাতে পারেন, পান করতে পারেন এবং ওযু করতে পারেন। আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এলাম, কিন্তু তাঁকে জাগানো অপছন্দ করলাম। তিনি যখন জেগে উঠলেন, তখন আমি তাঁর কাছে উপস্থিত হলাম। আমি দুধের উপরে পানি ঢেলে দিলাম, যাতে দুধের নিচের অংশ ঠাণ্ডা হয়ে যায়। আমি বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! পান করুন। তিনি পান করলেন যতক্ষণ না আমি সন্তুষ্ট হলাম। এরপর তিনি বললেন: "এখন কি যাত্রার সময় হয়নি?" আমি বললাম: হ্যাঁ, অবশ্যই।

তিনি বলেন: এরপর সূর্য পশ্চিম দিকে হেলে পড়ার পর আমরা যাত্রা করলাম। তখন সুরাকা ইবনে মালিক আমাদের পিছু নিল। আমি বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমরা আক্রান্ত হয়েছি (ধরা পড়েছি)। তিনি বললেন: "ভয় পেয়ো না, নিশ্চয় আল্লাহ আমাদের সাথে আছেন।"

তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার বিরুদ্ধে (বদ) দোয়া করলেন। ফলে তার ঘোড়া মাটির নরম অংশে তার পেট পর্যন্ত দেবে গেল—(বর্ণনাকারী) যুহায়র সন্দেহ পোষণ করেন—(যে নরম মাটি ছিল)। সুরাকা তখন বলল: আমি বুঝতে পারছি, আপনারা দু'জন আমার বিরুদ্ধে দোয়া করেছেন। আপনারা আমার জন্য দোয়া করুন। আমি আল্লাহর নামে ওয়াদা করছি যে, আমি আপনাদের সন্ধানকারীদের (পিছু নেওয়া) ফিরিয়ে দেব। এরপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার জন্য দোয়া করলেন এবং সে মুক্তি পেল। এরপর সে এমন কাউকে পেল না, যাকে সে বলত না: তোমাদের এখানে আসার দরকার নেই (আমি সব সামলে নিয়েছি)। সে যার সাথেই দেখা করত, তাকেই ফিরিয়ে দিত। আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আর সে আমাদের প্রতি তার ওয়াদা পূর্ণ করেছিল।









আল-জামি` আল-কামিল (9650)


9650 - عن أنس، عن أبي بكر قال: قلت للنبي صلى الله عليه وسلم وأنا في الغار: لو أن أحدهم نظر تحت قدميه لأبصرَنا، فقال:"ما ظنك يا أبا بكر باثنين الله ثالثهما؟".

متفق عليه: رواه البخاري في فضائل الصحابة (3653)، ومسلم في فضائل الصحابة (2381) كلاهما من طريق همام، ثنا ثابت، ثنا أنس بن مالك، أن أبا بكر الصديق حدثه قال: فذكره.

وهذا لفظ البخاري، وزاد مسلم في أوله:"نظرت إلى أقدام المشركين على رؤوسنا ونحن في الغار، فقلت: يا رسول الله، لو أن أحدهم …" فذكره.

وروي عن ابن عمر أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال لأبي بكر:"أنت صاحبي على الحوض، وصاحبي في الغار" رواه الترمذي (3670) عن يوسف بن موسى القطان البغدادي، حدثنا مالك بن إسماعيل، عن منصور بن أبي الأسود، حدثني كثير أبو إسماعيل، عن جميع بن عمير التيمي، عن ابن عمر فذكره.

وكثير هو: ابن إسماعيل أو ابن نافع النواء أبو إسماعيل التميمي ضعيف عند أهل العلم، وشيخه جميع بن عمير ضعيف أيضا عند جمهور أهل العلم.

اختلف أهل العلم في مدة مكثهما في الغار، فقال مجاهد: ثلاثة أيام.

وروي في حديث مرسل أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"مكثت مع صاحبي في الغار بضعة عشر يوما، ما لنا طعام إلا ثمر البرير" يعني: الأراك.

قال ابن عبد البر: هذا غير صحيح عند أهل العلم بالحديث، والأكثر على ما قاله مجاهد."الاستيعاب (1490)".




আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে গুহার মধ্যে বললাম: তাদের কেউ যদি তার পায়ের নিচের দিকে তাকাতো, তবে আমাদেরকে দেখতে পেত। তখন তিনি বললেন: "হে আবূ বকর! যেই দুইজনের তৃতীয়জন আল্লাহ, তাদের সম্পর্কে তোমার কী ধারণা?"

(বুখারীর শব্দ এটি, আর মুসলিমের বর্ণনায় শুরুতে অতিরিক্ত আছে যে, আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন:) আমরা যখন গুহার মধ্যে ছিলাম, তখন আমি মুশরিকদের পাগুলোকে আমাদের মাথার উপরে দেখতে পাচ্ছিলাম। তাই আমি বললাম, 'হে আল্লাহর রাসূল! তাদের কেউ যদি...'"

আর ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত আছে যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: "তুমি হাউজের [কাউসার] উপর আমার সাথী এবং গুহার মধ্যে আমার সাথী।"









আল-জামি` আল-কামিল (9651)


9651 - عن أبي سعيد الخدري قال: خطب النبي صلى الله عليه وسلم، فقال:"إن الله خيَّر عبدا بين الدنيا وبين ما عنده، فاختار ما عند الله"، فبكى أبو بكر رضي الله عنه، فقلت في
نفسي: ما يبكي هذا الشيخ؟ إن يكن الله خيَّر عبدا بين الدنيا وبين ما عنده، فاختار ما عند الله، فكان رسول الله صلى الله عليه وسلم هو العبد، وكان أبو بكر أعلمنا، قال:"يا أبا بكر، لا تبك، إن أمَنَّ الناس عليَّ في صحبته وماله أبو بكر، ولو كنت متخذا خليلا من أمتي لاتخذت أبا بكر، ولكن أخوَّة الإسلام ومودته، لا يبقين في المسجد باب إلا سُدَّ إلا باب أبي بكر".

متفق عليه: رواه البخاري في الصلاة (466)، ومسلم في فضائل الصحابة (2382 - 2) كلاهما من طريق أبي النضر، عن عبيد بن حنين، عن أبي سعيد الخدري قال: فذكره.

وزاد البخاري في روايته عن محمد بن سنان، ثنا فليح، ثنا أبو النضر، عن عبيد بن حنين،"عن بسر بن سعيد"، عن أبي سعيد الخدري.

فزاد بسر بن سعيد بين ابن حنين وأبي سعيد الخدري.

قال البخاري:"هكذا حدث به محمد بن سنان وهو خطأ، وإنما هو عن عبيد بن حنين، وعن بسر بن سعيد" يعني بواو العطف، فعلى هذا يكون أبو النضر سمعه من شيخين، حدَّثه كل منهما عن أبي سعيد.

قلت: روى البخاري في فضائل الصحابة (3654) من وجه آخر عن أبي النضر، عن بسر بن سعيد -وفي مناقب الأنصار (3904) من وجه آخر عن أبي النضر، عن عبيد بن حنين- كلاهما عن أبي سعيد الخدري به نحوه.




আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খুতবা দিলেন এবং বললেন: "নিশ্চয় আল্লাহ একজন বান্দাকে দুনিয়া এবং তাঁর কাছে যা আছে তার মধ্যে এখতিয়ার দিয়েছেন, কিন্তু সে আল্লাহর কাছে যা আছে তাই বেছে নিয়েছে।" তখন আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কেঁদে ফেললেন। আমি মনে মনে বললাম: এই বৃদ্ধ কিসের জন্য কাঁদছেন? (যদি আল্লাহ কোনো বান্দাকে দুনিয়া ও তাঁর কাছে যা আছে তার মধ্যে এখতিয়ার দেন, আর সে আল্লাহর কাছে যা আছে তাই বেছে নেয়) তবে সেই বান্দা ছিলেন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)। আর আবূ বকর ছিলেন আমাদের মধ্যে সবচেয়ে জ্ঞানী। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে আবূ বকর! কেঁদো না। নিশ্চয় তার সাহচর্য ও সম্পদের মাধ্যমে আমার প্রতি সবচেয়ে বড় অনুগ্রহকারী হলেন আবূ বকর। যদি আমি আমার উম্মতের মধ্যে কাউকে অন্তরঙ্গ বন্ধু (খলীল) বানাতাম, তবে আবূ বকরকেই বানাতাম। কিন্তু (আমাদের সম্পর্ক) ইসলামের ভ্রাতৃত্ব ও ভালোবাসার। আবূ বকরের দরজা ছাড়া মসজিদের আর কোনো দরজাই যেন খোলা না থাকে, সব বন্ধ করে দেওয়া হোক।"









আল-জামি` আল-কামিল (9652)


9652 - عن أبي الدرداء قال: كنت جالسا عند النبي صلى الله عليه وسلم إذ أقبل أبو بكر آخذا بطرف ثوبه حتى أبدى عن ركبته، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"أما صاحبكم فقد غامر". فسَلَّم وقال: إني كان بيني وبين ابن الخطاب شيء، فأسرعت إليه، ثم ندمت فسألته أن يغفر لي، فأبى عليَّ، فأقبلت إليك، فقال:"يغفر الله لك يا أبا بكر". ثلاثا، ثم إن عمر ندم، فأتى منزل أبي بكر، فسأل: أثم أبو بكر؟ فقالوا: لا. فأتى إلى النبي صلى الله عليه وسلم، فسَلَّم، فجعل وجه النبي صلى الله عليه وسلم يتمعر حتى أشفق أبو بكر، فجثا على ركبتيه، فقال: يا رسول الله، والله! أنا كنت أظلم، مرتين، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"إن الله بعثني إليكم فقلتم: كذبت، وقال أبو بكر: صدق، وواساني بنفسه وماله، فهل أنتم تاركوا لي صاحبي؟". مرتين، فما أوذي بعدها.

صحيح: رواه البخاري في فضائل الصحابة (3661) عن هشام بن عمار، ثنا صدقة بن خالد، ثنا زيد بن واقد، عن بسر بن عبيد الله، عن عائذ الله أبي إدريس، عن أبي الدرداء قال: فذكره.

وفي لفظ:"كانت بين أبي بكر وعمر محاورة، فأغضب أبو بكر عمر، فانصرف عنه عمرُ مغضبا، فاتبعه أبو بكر يسأله أن يستغفر له، فلم يفعل، حتى أغلق بابه في وجهه، فأقبل أبو بكر إلى
رسول الله صلى الله عليه وسلم …" وذكر الباقي نحوه.




আবুদ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট বসে ছিলাম, এমন সময় আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর কাপড়ের কোনা ধরে এমনভাবে আসলেন যে তাঁর হাঁটু উন্মুক্ত হয়ে গেল। নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমাদের এই সাথী তো ঝগড়া করে এসেছে।" আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সালাম দিলেন এবং বললেন: আমার ও ইবনু খাত্তাবের (উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)) মধ্যে কিছু একটা হয়েছিল। আমি তার সাথে দ্রুত কথা বলে ফেললাম, তারপর আমি অনুতপ্ত হলাম এবং তাকে আমার জন্য ক্ষমা চাওয়ার অনুরোধ করলাম। কিন্তু সে আমার উপর অস্বীকৃতি জানাল। তাই আমি আপনার কাছে চলে আসলাম। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আল্লাহ তোমাকে ক্ষমা করুন, হে আবূ বাকর!" (এ কথা) তিনবার বললেন। অতঃপর উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) অনুতপ্ত হলেন এবং আবূ বাকরের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বাড়িতে এসে জিজ্ঞাসা করলেন: আবূ বাকর কি এখানে আছেন? লোকেরা বলল: না। তখন তিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে আসলেন এবং সালাম দিলেন। নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর চেহারা মুবারক রাগে বদলে গেল (লাল হয়ে গেল), এমনকি আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ভয় পেয়ে গেলেন। তখন তিনি তাঁর হাঁটুর ওপর ভর দিয়ে বসলেন এবং বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আল্লাহর শপথ! আমিই তো অধিক যালেম ছিলাম (অন্যায়কারী ছিলাম)। (এ কথা) দুইবার বললেন। নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখন বললেন: "আল্লাহ আমাকে তোমাদের নিকট রাসূল করে পাঠালেন, তখন তোমরা বললে: তুমি মিথ্যা বলছ। আর আবূ বাকর বলল: সে সত্য বলছে। আর সে তার জান ও মাল দ্বারা আমাকে সহযোগিতা করেছে। এরপরও কি তোমরা আমার সাথীকে আমার জন্য ছেড়ে দেবে না?" (এ কথা) দুইবার বললেন। এরপর তাকে আর কষ্ট দেওয়া হয়নি।









আল-জামি` আল-কামিল (9653)


9653 - عن عائشة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"ما نفعنا مالُ أحدٍ ما نفعنا مالُ أبي بكر".

صحيح: رواه الحميدي (250)، وأبو يعلى (4418)، وعبد الله بن أحمد في زوائد الفضائل لأبيه (29) كلهم من طريق سفيان (هو ابن عيينة) قال: حفظت من الزهري، عن عروة، عن عائشة فذكرته. وإسناده صحيح.

وذكره الهيثمي في المجمع (9/ 51) وقال:"رواه أبو يعلى ورجاله رجال الصحيح، غير إسحاق بن إسرائيل، وهو ثقة مأمون".




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "অন্য কারো সম্পদ আমাদের এত উপকার করেনি, যতটা করেছে আবূ বাকরের সম্পদ।"









আল-জামি` আল-কামিল (9654)


9654 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما نفعني مال قط ما نفعني مال أبي بكر"، قال: فبكى أبو بكر، وقال: هل أنا ومالي إلا لك يا رسول الله.

صحيح: رواه النسائي في الفضائل (9)، وابن ماجه (94)، وأحمد (7446)، وصحّحه ابن حبان (6858) كلهم من طريق أبي معاوية، حدثنا الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرة فذكره. وإسناده صحيح.

وأما ما رواه الترمذي (3661) من وجه آخر عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما لأحد عندنا يد إلا وقد كافيناه ما خلا أبا بكر، فإن له عندنا يدا يكافئه الله به يوم القيامة، وما نفعني مال أحد قط ما نفعني مال أبي بكر، ولو كنت متخذا خليلا لاتخذت أبا بكر خليلا، ألا وإن صاحبكم خليل الله" فهو ضعيف.

فيه محبوب بن مُحْرِز، وشيخه داود بن يزيد فكلاهما ضعيفان عند جمهور أهل العلم.

وأما الترمذي فقال:"هذا حديث حسن غريب من هذا الوجه".




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কোনো সম্পদ আমাকে এত উপকার করেনি, যতটা উপকার আবূ বকরের সম্পদ আমাকে করেছে।" বর্ণনাকারী বলেন, (এ কথা শুনে) আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কেঁদে ফেললেন এবং বললেন, "হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমি এবং আমার সম্পদ তো কেবল আপনারই জন্য নিবেদিত।"









আল-জামি` আল-কামিল (9655)


9655 - عن بعض أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم أن رسول الله صلى الله عليه وسلم خرج فاستوى على المنبر، فتشهد فلما مضى تشهده كان أول كلام تكلم به أن استغفر للشهداء الذين قتلوا يوم أحد، ثم قال:"إن عبدا من عباد الله خُيِّرَ بين الدنيا وبين ما عند ربه، فاختار ما عند ربه"، ففطن لها أبو بكر الصديق أول الناس فعرف أنما يريد رسول الله صلى الله عليه وسلم نفسه، فبكى أبو بكر، فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم:"على رسلك يا أبا بكر! سدوا هذه الأبواب الشوارع في المسجد إلا باب أبي بكر، فإني لا أعلم أمرا أفضل عندي يدا في الصحابة من أبي بكر".

صحيح: رواه ابن سعد في الطبقات (2/ 228)، والطبراني في مسند الشاميين (3219) كلاهما من طرق عن الزهري، عن أيوب بن بشير، عن بعض أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم فذكره. وإسناده صحيح.

هكذا رواه الحفاظ الأثبات من أصحاب الزهري، فقالوا:

عن الزهري، عن أيوب بن بشير، عن بعض أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم.
ورواه بعض أصحابه فقالوا: عن الزهري، عن عروة، عن عائشة أن النبي صلى الله عليه وسلم أمر بسد الأبواب إلا باب أبي بكر.

رواه الترمذي (3678)، وابن حبان (6857) من طرق عن الزهري، عن عروة بهذا الإسناد.

وهذه متابعة لأيوب بن بشير إلا أن عروة سمى الصحابي، وهذا الذي أشار إليه البخاري بعد أن أورد الحديث من وجه آخر عن جسرة، عن عائشة، وعن جسرة عن أم سلمة، فقال: حديث الزهري أصح. ثم ذكر المتابعة. التاريخ الكبير (1/ 408).

وأما أبو حاتم فيرى أن حديث عائشة خطأ، والصواب حديث أيوب بن بشير، عن بعض أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم. العلل (2595، 2615).




নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কতিপয় সাহাবী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বের হলেন এবং মিম্বরের উপর আরোহণ করলেন, অতঃপর তাশাহহুদ পাঠ করলেন (আল্লাহর প্রশংসা ও সাক্ষ্য দিলেন)। যখন তিনি তাশাহহুদ শেষ করলেন, তখন তাঁর প্রথম কথা ছিল, উহুদের দিনে নিহত শহীদদের জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করা। অতঃপর তিনি বললেন: "আল্লাহর বান্দাদের মধ্যে একজন বান্দাকে দুনিয়া এবং তার রবের নিকট যা আছে, তার মধ্যে কোনো একটি বেছে নিতে বলা হলো। অতঃপর সে তার রবের নিকট যা আছে, তাই বেছে নিল।" আবু বকর সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)ই সর্বপ্রথম বিষয়টি বুঝতে পারলেন। তিনি বুঝতে পারলেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিজ সত্তার কথাই বলছেন। অতঃপর আবু বকর কেঁদে ফেললেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেন: "হে আবু বকর, তুমি থামো (ধৈর্য ধারণ করো)! মসজিদের দিকে উন্মুক্ত এই সমস্ত দরজা বন্ধ করে দাও, তবে আবু বকরের দরজাটি ব্যতীত। কেননা, সাহাবীদের মধ্যে আমি এমন কাউকে জানি না, যে আমার কাছে আবু বকরের চেয়ে বেশি উপকারকারী (কৃতজ্ঞতার দাবিদার)।"









আল-জামি` আল-কামিল (9656)


9656 - عن عبد الله بن الزبير قال: قال أبو قحافة لأبي بكر: يا بُنيَّ، إني أراك تعتق رقابا ضعافا، فلو أنك إذ فعلت ما فعلت أعتقت رجالا جُلْدا يمنعونك ويقومون دونك؟ قال: فقال أبو بكر: يا أبت، إني إنما أريد ما أريد لله عز وجل، قال: فيُتَحَدَّثُ ما نزل هؤلاء الآيات إلا فيه، وفيما قال له أبوه: {فَأَمَّا مَنْ أَعْطَى وَاتَّقَى (5) وَصَدَّقَ بِالْحُسْنَى (6)} إلى قوله {وَمَا لِأَحَدٍ عِنْدَهُ مِنْ نِعْمَةٍ تُجْزَى (19) إِلَّا ابْتِغَاءَ وَجْهِ رَبِّهِ الْأَعْلَى (20) وَلَسَوْفَ يَرْضَى (21)} [سورة الليل: 5 - 21].

حسن: رواه عبد الله بن أحمد في زوائده على"فضائل الصحابة" لأبيه (66)، وصحّحه الحاكم (2/ 525) كلاهما من طريق محمد بن إسحاق، حدثني محمد بن عبد الله بن أبي عتيق، عن عامر بن عبد الله بن الزبير، عن أبيه قال: فذكره.

وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق، ومن أجل شيخه محمد بن عبد الله بن أبي عتيق، ذكره ابن حبان في الثقات ووثّقه الدارقطني، وقال الذهبي: مقارب الحديث.

تنبيه: وورد في فضائل الصحابة:"عن عامر بن عبد الله بن الزبير، عن بعض أهله" وهو كذلك في سيرة ابن هشام (1/ 319) لكنه ورد عند الحاكم مصرحا:"عن أبيه" يعني:"عبد الله بن الزبير".

وعبد الله بن الزبير لم يشهد القصة، لأنه وُلِد بالمدينة بعد الهجرة، فهو مرسل صحابي، ومراسيل الصحابة مقبولة عند الجمهور.




আব্দুল্লাহ ইবনুয যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আবূ কুহাফা আবূ বকরকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: "হে আমার পুত্র, আমি দেখছি তুমি দুর্বল দাসদের মুক্ত করছ। তুমি যদি মুক্ত করেই থাকো, তবে এমন শক্তিশালী পুরুষদের কেন মুক্ত করো না যারা তোমাকে রক্ষা করবে এবং তোমার পক্ষে দাঁড়াবে?" আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: "হে আমার পিতা, আমি কেবল আল্লাহ আযযা ওয়া জাল-এর সন্তুষ্টির জন্যই তা করছি।" বর্ণনাকারী বলেন: এই আয়াতগুলো শুধু তাঁরই (আবূ বকর) ব্যাপারে এবং তাঁর পিতাকে দেওয়া তাঁর উত্তরের প্রেক্ষিতে নাযিল হয়েছে— “সুতরাং যারা দান করেছে এবং তাকওয়া অবলম্বন করেছে। আর যা উত্তম তা বিশ্বাস করেছে।” (সূরা লাইল, আয়াত ৫-৬) থেকে আল্লাহ্‌র বাণী: “আর তার প্রতি কারও এমন কোনো অনুগ্রহ নেই যার প্রতিদান দিতে হয়। শুধু তার মহান রবের সন্তুষ্টি লাভের জন্যই (সে দান করে)। আর সে অবশ্যই সন্তুষ্ট হবে।” (সূরা লাইল, আয়াত ১৯-২১)।









আল-জামি` আল-কামিল (9657)


9657 - عن أبي سعيد الخدري أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إن من أمَنِّ الناس عليَّ في صحبته وماله أبا بكر، ولو كنت متخذا خليلا من أمتي لاتخذت أبا بكر إلا خلة الإسلام، لا يبقين في المسجد خوخة إلا خوخة أبي بكر".

متفق عليه: رواه مالك في الموطأ (944 - رواية محمد بن الحسن الشيباني) عن أبي النضر مولى
عمر بن عبيد الله، عن عبيد بن حنين، عن أبي سعيد الخدري فذكره.

ورواه البخاري في مناقب الأنصار (3904)، ومسلم في فضائل الصحابة (2382 - 2) كلاهما من طريق مالك به.




আবূ সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই আবূ বকর তার সাহচর্য ও সম্পদ দ্বারা আমার প্রতি মানুষের মধ্যে সবচেয়ে বেশি অনুগ্রহকারী। আমি যদি আমার উম্মতের মধ্য থেকে কাউকে খলীল (ঘনিষ্ঠ বন্ধু) বানাতাম, তবে আবূ বকরকেই বানাতাম, তবে ইসলামের বন্ধুত্ব ছাড়া (অন্য কোনো বিশেষ বন্ধুত্ব নয়)। আবূ বকরের ছোট দরজাটি ছাড়া মসজিদের মধ্যে আর কোনো ছোট দরজা যেন খোলা না থাকে।"









আল-জামি` আল-কামিল (9658)


9658 - عن ابن عباس قال: خرج رسول الله صلى الله عليه وسلم في مرضه الذي مات فيه عاصبا رأسه بخرقة، فقعد على المنبر، فحمد الله وأثنى عليه، ثم قال:"إنه ليس من الناس أحد أمنَّ عليَّ في نفسه وماله من أبي بكر بن أبي قحافة، ولو كنت متخذا من الناس خليلا لاتخذت أبا بكر خليلا، ولكن خلة الإسلام أفضل، سدوا عني كل خوخة في هذا المسجد غير خوخة أبي بكر".

صحيح: رواه البخاري في الصلاة (467) عن عبد الله بن محمد الجعفي، ثنا وهب بن جرير، ثنا أبي، سمعت يعلى بن حكيم، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.

ورواه في فضائل الصحابة (3656) من وجه آخر عن أيوب، عن عكرمة به بلفظ:"لو كنت متخذا من أمتي خليلا لاتخذت أبا بكر ولكن أخي وصاحبي".

ورواه في فضائل الصحابة (3657) من وجه آخر عن أيوب به، وفيه:"ولكن أخوة الإسلام أفضل".




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর সেই অসুস্থতার সময়ে বের হলেন, যে অসুস্থতায় তিনি ইন্তেকাল করেন, তখন তিনি একখণ্ড কাপড় দ্বারা তাঁর মাথা বেঁধে রেখেছিলেন। অতঃপর তিনি মিম্বরের উপর বসলেন এবং আল্লাহর প্রশংসা ও গুণগান করলেন। এরপর বললেন, "নিশ্চয়ই মানুষের মধ্যে আবু বকর ইবনু আবী কুহাফা ব্যতীত অন্য কেউ নেই যে আমার প্রতি তার জীবন ও সম্পদ দিয়ে এত অধিক দয়াশীলতা দেখিয়েছে। যদি আমি মানুষকে বন্ধু (খলিল) হিসেবে গ্রহণ করতাম, তবে আমি অবশ্যই আবু বকরকে খলিল হিসেবে গ্রহণ করতাম। কিন্তু ইসলামের বন্ধুত্বই উত্তম। আবু বকরের ছোট দরজাটি ব্যতীত এই মসজিদের সমস্ত ছোট দরজা (খওখা) আমার জন্য বন্ধ করে দাও।"









আল-জামি` আল-কামিল (9659)


9659 - عن عبد الله بن أبي مليكة قال: كتب أهل الكوفة إلى ابن الزبير في الجد، فقال: أما الذي قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لو كنت متخذا من هذه الأمة خليلا لاتخذته" أنزله أبا، يعني أبا بكر.

صحيح: رواه البخاري في فضائل الصحابة (3658) عن سليمان بن حرب، أنا حماد بن زيد، عن أيوب، عن عبد الله بن أبي مليكة فذكره.




আব্দুল্লাহ ইবনে আবি মুলাইকাহ থেকে বর্ণিত: কূফাবাসীরা (উত্তরাধিকারের ক্ষেত্রে) দাদা/দাদু (Jadd)-এর অংশ সম্পর্কে ইবনুয-যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে পত্র লিখেছিল। অতঃপর তিনি বললেন: যার সম্পর্কে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছিলেন: “যদি আমি এই উম্মতের মধ্য থেকে কাউকে অন্তরঙ্গ বন্ধু (খলীল) হিসেবে গ্রহণ করতাম, তবে অবশ্যই তাকে গ্রহণ করতাম,” তাকে তিনি (অর্থাৎ আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)) পিতার মর্যাদায় স্থান দিয়েছিলেন। অর্থাৎ আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে।









আল-জামি` আল-কামিল (9660)


9660 - عن عبد الله بن مسعود، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لو كنت متخذا خليلا لاتخذت أبا بكر خليلا ولكنه أخي وصاحبي، وقد اتخذ الله صاحبكم خليلا".

صحيح: رواه مسلم في فضائل الصحابة (2383 - 3) عن محمد بن بشار العبدي، ثنا محمد بن جعفر، ثنا شعبة، عن إسماعيل بن رجاء، سمعت عبد الله بن أبي الهذيل، عن أبي الأحوص، سمعت عبد الله بن مسعود فذكره.

وفي لفظ:"لو كنت متخذا من أمتي أحدا خليلا …".

رواه مسلم (2383 - 4) من وجه آخر عن أبي إسحاق، عن أبي الأحوص به.

وفي لفظ:"لو كنت متخذا من أهل الأرض خليلا لاتخذت ابن أبي قحافة خليلا، ولكن صاحبكم خليل الله" رواه مسلم (2383 - 6) من وجه آخر عن واصل بن حيان، عن عبد الله بن أبي الهذيل، عن أبي الأحوص به.
وفي لفظ آخر:"ألا إني أبرأ إلى كل خل من خله، ولو كنت متخذا خليلا لاتخذت أبا بكر خليلا، إن صاحبكم خليل الله" رواه مسلم (2383 - 7) من وجه آخر عن عبد الله بن مرة، عن أبي الأحوص به.




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “আমি যদি কাউকে খলীল (ঘনিষ্ঠ বন্ধু) হিসেবে গ্রহণ করতাম, তবে আমি আবূ বকরকে খলীল হিসেবে গ্রহণ করতাম। কিন্তু সে তো আমার ভাই এবং আমার সঙ্গী। আর আল্লাহ তোমাদের এই সাথীকে খলীল হিসেবে গ্রহণ করেছেন।”