আল-জামি` আল-কামিল
9721 - عن ابن عمر قال: إنما تغيَّب عثمان عن بدر، فإنه كانت تحته بنت رسول الله صلى الله عليه وسلم، وكانت مريضة، فقال له النبي صلى الله عليه وسلم:"إن لك أجر رجل ممن شهد بدرا وسهمه".
صحيح: رواه البخاري في فضائل الصحابة (3130) عن موسى بن إسماعيل، ثنا أبو عوانة، ثنا عثمان بن موهب، عن ابن عمر فذكره.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বদরের যুদ্ধ থেকে অনুপস্থিত ছিলেন, কারণ তাঁর অধীনে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কন্যা ছিলেন, আর তিনি (কন্যা) অসুস্থ ছিলেন। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেন: "নিশ্চয় তোমার জন্য বদরের যুদ্ধে অংশগ্রহণকারী ব্যক্তির সমান সওয়াব এবং তার হিস্যা (গনিমার ভাগ) রয়েছে।"
9722 - عن عثمان بن موهب قال: جاء رجل من أهل مصر حج البيت، فرأى قوما جلوسا، فقال: من هؤلاء القوم؟ فقالوا: هؤلاء قريش. قال: فمن الشيخ فيهم؟ قالوا: عبد الله بن عمر. قال: يا ابن عمر، إني سائلك عن شيء فحدثني، هل تعلم أن عثمان فرَّ يوم أحد؟ قال: نعم. قال: تعلم أنه تغيَّب عن بدر ولم يشهد؟ قال: نعم. قال: تعلم أنه تغيَّب عن بيعة الرضوان فلم يشهدها؟ قال: نعم. قال: الله أكبر. قال ابن عمر: تعال أبين لك، أما فراره يوم أحد فأشهد أن الله عفا عنه وغفر له، وأما تغيبه عن بدر فإنه كانت تحته بنت رسول الله صلى الله عليه وسلم وكانت مريضة، فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن لك أجر رجل ممن شهد بدرا وسهمه". وأما تغيبه عن بيعة الرضوان فلو كان أحد أعز ببطن مكة من عثمان لبعثه مكانه، فبعث رسول الله صلى الله عليه وسلم عثمان، وكانت بيعة الرضوان بعد ما ذهب عثمان إلى مكة، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم بيده اليمنى:"هذه يد عثمان". فضرب بها على يده، فقال:"هذه لعثمان". فقال له ابن عمر: اذهب بها الآن معك.
صحيح: رواه البخاري في فضائل الصحابة (3698) عن موسى بن إسماعيل، ثنا أبو عوانة، ثنا عثمان بن موهب قال: فذكره.
روي عن أنس بن مالك قال: لما أمر رسول الله صلى الله عليه وسلم ببيعة الرضوان كان عثمان بن عفان رسول رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى أهل مكة قال: فبايع الناس، قال: فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن عثمان في حاجة الله
وحاجة رسوله" فضرب بإحدى يديه على الأخرى، فكانت يد رسول الله صلى الله عليه وسلم لعثمان خيرا من أيديهم لأنفسهم.
رواه الترمذي (3702) عن أبي زرعة، حدثنا الحسن بن بشر، حدثنا الحكم بن عبد الملك، عن قتادة، عن أنس بن مالك فذكره.
والحكم بن عبد الملك ضعيف عند أهل العلم.
উসমান ইবনে মাওহাব থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: মিশরের এক ব্যক্তি বাইতুল্লাহর হজ্ব করার জন্য এসেছিল। সে বসে থাকা কিছু লোককে দেখতে পেল। সে জিজ্ঞেস করল: এ লোকগুলো কারা? তারা বলল: এরা কুরাইশ গোত্রের লোক। সে জিজ্ঞেস করল: তাদের মধ্যে বৃদ্ধ ব্যক্তিটি কে? তারা বলল: ইনি আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। লোকটি বলল: হে ইবন উমর, আমি আপনাকে একটি বিষয় জিজ্ঞাসা করতে চাই, আপনি আমাকে বলুন। আপনি কি জানেন যে, উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উহুদের দিন পলায়ন করেছিলেন? তিনি বললেন: হ্যাঁ। লোকটি বলল: আপনি কি জানেন যে, তিনি বদরের যুদ্ধে অনুপস্থিত ছিলেন এবং তাতে শরীক হননি? তিনি বললেন: হ্যাঁ। লোকটি বলল: আপনি কি জানেন যে, তিনি বাইআতে রিদওয়ানে অনুপস্থিত ছিলেন এবং তাতে শরীক হননি? তিনি বললেন: হ্যাঁ। লোকটি বলল: আল্লাহু আকবার!
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: এদিকে আসুন, আমি আপনাকে ব্যাখ্যা করে দিচ্ছি। উহুদের দিন তাঁর পলায়নের ব্যাপারে আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, আল্লাহ তাকে ক্ষমা করে দিয়েছেন এবং তাঁকে মাফ করে দিয়েছেন। আর বদর যুদ্ধে তাঁর অনুপস্থিতির কারণ হলো, তাঁর (স্ত্রী) ছিলেন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কন্যা এবং তিনি অসুস্থ ছিলেন। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁকে (উসমানকে) বলেছিলেন: “যে বদরে অংশ গ্রহণ করেছে, তোমার জন্য তার সমপরিমাণ সওয়াব ও তার অংশের (গনিমত) পুরস্কার রয়েছে।” আর বাইআতে রিদওয়ানে তাঁর অনুপস্থিতির কারণ হলো, মক্কার অভ্যন্তরে উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর চেয়ে সম্মানিত যদি অন্য কেউ থাকত, তবে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে তার জায়গায় পাঠাতেন। কিন্তু রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কেই পাঠিয়েছিলেন। উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মক্কায় চলে যাওয়ার পরই বাইআতে রিদওয়ান সংঘটিত হয়েছিল। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখন তাঁর ডান হাত দিয়ে বলেছিলেন: “এটি হলো উসমানের হাত।” অতঃপর তিনি তাঁর হাতটি নিজের হাতের উপর রেখে বললেন: “এটি উসমানের পক্ষ থেকে।” ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সেই লোকটিকে বললেন: এবার এই উত্তরগুলো নিয়ে আপনি আপনার পথে যান।
9723 - عن عبد الرحمن بن سمرة قال: جاء عثمان بن عفان إلى النبي صلى الله عليه وسلم بألف دينار في ثوبه حين جهز النبي صلى الله عليه وسلم جيش العسرة، قال: فصبها في حجر النبي صلى الله عليه وسلم، فجعل النبي صلى الله عليه وسلم يقلبها بيده، ويقول:"ما ضر ابن عفان ما عمل بعد اليوم"، يرددها مرارا.
حسن: رواه الترمذي (3701)، وأحمد (20630)، وابن أبي عاصم في الجهاد (82)، والحاكم (3/ 102) كلهم من حديث ضمرة بن ربيعة، عن عبد الله بن شوذب، عن عبد الله بن القاسم، عن كثير مولى عبد الرحمن بن سمرة، عن عبد الرحمن بن سمرة فذكره.
وإسناده حسن من أجل كثير بن أبي كثير مولى ابن سمرة، فإنه حسن الحديث، فقد روى عنه عدد كثير، ووثّقه العجلي وابن حبان، وأصله ثابت في الصحيح، وإلا فهو"مقبول" كما في التقريب.
আবদুর রহমান ইবনে সামুরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ‘জায়শে উসরা’ (কষ্টের সেনাবাহিনী) প্রস্তুত করছিলেন, তখন উসমান ইবনে আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর কাপড়ের মধ্যে এক হাজার স্বর্ণমুদ্রা (দিনার) নিয়ে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন। তিনি বলেন: এরপর তিনি সেগুলো নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কোলে ঢেলে দিলেন। নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিজের হাতে সেগুলো ওলটপালট করতে লাগলেন এবং বললেন: “আজকের পর ইবনে আফফান যা কিছুই করুক না কেন, তা তাকে কোনো ক্ষতি করবে না।” – তিনি কথাটি বারবার বললেন।
9724 - عن أبي عبد الرحمن أن عثمان حيث حوصر أشرف عليهم وقال: أنشدكم، ولا أنشد إلا أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم: ألستم تعلمون أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"من حفر رومة فله الجنة" فحفرتها، ألستم تعلمون أنه قال:"من جهَّز جيش العسرة فله الجنة" فجهزتها، قال: فصدقوه بما قال.
صحيح: رواه البخاري في الوصايا (778) قال: قال عبدان، أخبرني أبي، عن شعبة، عن أبي إسحاق، عن أبي عبد الرحمن السلمي أن عثمان فذكره.
وقول البخاري:"قال عبدان" يحمل على الاتصال، ولذا قال البيهقي (6/ 167): رواه البخاري في الصحيح عن عبدان. وعبدان هو عبد الله بن عثمان بن جبلة، الملقب بعبدان من شيوخ البخاري.
ورواه أحمد (420)، والنسائي (3609)، والدارقطني (4/ 198) كلهم من طريق يونس بن أبي إسحاق، عن أبيه، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن قال: أشرف عثمان من القصر، وهو محصور فقال: أنشد بالله من شهد رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم حراء إذ اهتز الجبل، فركله بقدمه ثم قال:"اسكن حراء، ليس عليك إلا نبي أو صديق أو شهيد" وأنا معه؟ فانتشد له رجال.
قال: أنشد بالله من شهد رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم بيعة الرضوان إذ بعثني إلى المشركين إلى أهل مكة، قال:"هذه يدي، وهذه يد عثمان" فبايع لي؟ فانتشد له رجال.
قال: أنشد بالله من شهد رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"من يوسع لنا بهذا البيت في المسجد ببيت في الجنة؟" فابتعته من مالي، فوسعت به المسجد؟ فانتشد له رجال.
قال: وأنشد بالله من شهد رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم جيش العسرة، قال:"من ينفق اليوم نفقة متقبلة؟" فجهزت نصف الجيش من مالي؟ قال: فانتشد له رجال.
وأنشد بالله من شهد رومة يباع ماؤها ابن السبيل، فابتعتها من مالي، فأبحتها ابن السبيل؟ قال: فانتشد له رجال.
وإسناده صحيح. وقد رواه أيضا الترمذي (3699) من وجه آخر عن زيد بن أبي أنيسة، عن أبي إسحاق به نحوه، وقال:"هذا حديث حسن صحيح غريب من هذا الوجه من حديث أبي عبد الرحمن السلمي عن عثمان".
قلت: لقد رجَّح الدارقطني في العلل (3/ 52) ما رواه شعبة ومن تابعه (يعني زيد بن أبي أنيسة وغيره) ولكن لا يبعد أن يكون لأبي إسحاق شيخان: أحدهما أبو عبد الرحمن السلمي، والثاني أبو سلمة بن عبد الرحمن.
وأما ذكر حراء في الحديث ففيه وهم، والصحيح جبل أحد.
ورواه النسائي (3182، 3606)، وأحمد (511)، وصحّحه ابن خزيمة (2487)، وابن حبان (6920) كلهم من طرق عن حصين (هو ابن عبد الرحمن السلمي)، عن عمرو بن جاوان قال:
قال الأحنف: انطلقنا حجاجا، فمررنا بالمدينة، فبينما نحن في منزلنا إذ جاءنا آت، فقال: الناس من فزع في المسجد. فانطلقت أنا وصاحبي، فإذا الناس مجتمعون على نفر في المسجد، قال: فتخللتهم حتى قمت عليهم، فإذا علي بن أبي طالب والزبير وطلحة وسعد بن أبي وقاص، قال: فلم يكن ذلك بأسرع من أن جاء عثمان يمشي، فقال: أههنا علي؟ قالوا: نعم. قال: أههنا الزبير؟ قالوا: نعم. قال: أههنا طلحة؟ قالوا: نعم. قال: أههنا سعد؟ قالوا: نعم.
قال: أنشدكم بالله الذي لا إله الا هو، أتعلمون أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"من يبتاع مربد بني فلان غفر الله له" فابتعته فأتيت رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقلت: إني قد ابتعته فقال:"اجعله في مسجدنا وأجره لك" قالوا: نعم.
قال: أنشدكم بالله الذي لا إله الا هو، أتعلمون أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"من يبتاع بئر رومة؟" فابتعتها بكذا وكذا، فأتيت رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقلت: اني قد ابتعتها، يعني بئر رومة، فقال:"اجعلها سقاية للمسلمين وأجرها لك"؟ قالوا: نعم.
قال: أنشدكم بالله الذي لا إله إلا هو، أتعلمون أن رسول الله صلى الله عليه وسلم نظر في وجوه القوم يوم جيش العسرة، فقال:"من يجهز هؤلاء غفر الله له" فجهزتهم حتى ما يفقدون خطاما ولا عقالا؟ قالوا: اللهم! نعم. قال: اللهم! اشهد، اللهم! اشهد، اللهم! اشهد، ثم انصرف.
وعمرو بن جاوان -ويقال: عمر بن جاوان- لم يرو عنه غير حصين بن عبد الرحمن، ولم يوثّقه أحد غير ابن حبان على قاعدته في توثيق من لم يعرف فيه جرح، لذا قال الحافظ إنه"مقبول" يعني حيث يُتَابع وإلا فلين الحديث.
ولم أجد له متابعا.
উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন তিনি অবরুদ্ধ ছিলেন, তখন তিনি তাদের দিকে তাকিয়ে বললেন: আমি তোমাদের আল্লাহর কসম দিচ্ছি, আর আমি কেবল রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণকেই কসম দিচ্ছি: তোমরা কি জানো না যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: ‘যে ব্যক্তি রূমা কূপ খনন করবে, তার জন্য জান্নাত রয়েছে’? অতঃপর আমিই সেটি খনন করেছিলাম। তোমরা কি জানো না যে তিনি বলেছেন: ‘যে ব্যক্তি জাইশুল উসরাহ (কষ্টের সেনাবাহিনী) সজ্জিত করবে, তার জন্য জান্নাত রয়েছে’? অতঃপর আমিই তা সজ্জিত করেছিলাম। রাবী বলেন, অতঃপর তারা তাঁর কথাকে সত্য বলে স্বীকার করল।
9725 - عن سعيد بن زيد بن عمرو بن نفيل يقول في مسجد الكوفة: والله! لقد رأيتني وإن عمر لموثقي على الإسلام قبل أن يسلم، ولو أن أحدا ارفضَّ للذي صنعتم بعثمان لكان.
صحيح: رواه البخاري في مناقب الأنصار (3862) عن قتيبة بن سعيد، حدثنا سفيان، عن إسماعيل، عن قيس قال: سمعت سعيد بن زيد بن عمرو بن نفيل في مسجد الكوفة يقول: فذكره.
وفي لفظ:"لو رأيتني موثقي عمرُ على الإسلام أنا وأخته وما أسلم، ولو أن أحدا انقضَّ لما صنعتم بعثمان لكان محقوقا أن ينقضَّ"
رواه البخاري (3867) من وجه آخر عن إسماعيل بن قيس فذكره.
সাঈদ ইবনু যায়দ ইবনু আমর ইবনু নুফাইল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি কুফার মসজিদে বলেন: আল্লাহর কসম! আমি নিজেকে এমন অবস্থায় দেখেছি যে, উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তখনো ইসলাম গ্রহণ করেননি, আর তিনি আমাকে ইসলামের কারণে বেঁধে রেখেছিলেন (বা কঠোরভাবে আটকে রেখেছিলেন)। আর উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে তোমরা যা করেছ, যদি এর কারণে কেউ (দুঃখে) ছিন্নভিন্ন হয়ে যেত বা ভেঙে পড়ত, তবে তা যুক্তিযুক্তই হতো।
অন্য এক বর্ণনায় আছে: "তোমরা যদি আমাকে দেখতে, উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তখনো ইসলাম গ্রহণ করেননি, আর তিনি আমাকে ও তাঁর বোনকে ইসলামের কারণে বেঁধে রেখেছিলেন। আর উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে তোমরা যা করেছ, যদি এর কারণে কেউ (শোকে) ভেঙে পড়ত, তবে তা যথার্থই হতো।"
9726 - عن عبيد الله بن عدي بن الخيار أخبره: أن المسور بن مخرمة وعبد الرحمن بن الأسود بن عبد يغوث قالا له: ما يمنعك أن تكلم خالك عثمان في أخيه الوليد بن عقبة، وكان أكثرَ الناسُ فيما فعل به. قال عبيد الله: فانتصبت لعثمان حين خرج إلى الصلاة، فقلت له: إن لي إليك حاجة، وهي نصيحة، فقال: أيها المرء، أعوذ بالله منك، فانصرفت، فلما قضيت الصلاة جلست إلى المسور وإلى ابن عبد يغوث، فحدثتهما بالذي قلت لعثمان وقال لي، فقالا: قد قضيت الذي كان عليك، فبينما أنا جالس معهما إذ جاءني رسول عثمان، فقالا لي: قد ابتلاك الله. فانطلقت حتى دخلت عليه، فقال: ما نصيحتك التي ذكرت آنفا؟ . قال: فتشهدت، ثم قلت: إن الله بعث محمدا صلى الله عليه وسلم، وأنزل عليه الكتاب، وكنت ممن استجاب لله ورسوله صلى الله عليه وسلم، وآمنت به، وهاجرت الهجرتين الأوليين، وصحبت رسول الله صلى الله عليه وسلم، ورأيت هديه وقد أكثر الناس في شأن الوليد بن عقبة، فحق عليك أن تقيم عليه الحد، فقال لي: يا ابن أخي آدركت رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ قال: قلت: لا. ولكن قد خلص إلي من علمه ما خلص إلى العذراء في سترها. قال: فتشهد عثمان، فقال: إن الله قد بعث محمدا صلى الله عليه وسلم بالحق، وأنزل عليه الكتاب، وكنت ممن استجاب لله ورسوله صلى الله عليه وسلم، وآمنت بما بُعِث به محمد صلى الله عليه وسلم، وهاجرت الهجرتين الأوليين كما قلت، وصحبت رسول الله وبايعته، والله! ما
عصيته ولا غششته حتى توفاه الله، ثم استخلف الله أبا بكر، فوالله ما عصيته ولا غششته، ثم استُخْلِف عمر، فوالله! ما عصيته ولا غششته، ثم استُخْلِفْتُ، أفليس لي عليكم مثل الذي كان لهم عليّ؟ قال: بلى. قال: فما هذه الأحاديث التي تبلغني عنكم؟ فأما ما ذكرت من شأن الوليد بن عقبة فسنأخذ فيه إن شاء الله بالحق، قال: فجلد الوليد أربعين جلدة، وأمر عليا أن يجلده، وكان هو يجلده.
صحيح: رواه البخاري في مناقب الأنصار (3872) عن عبد الله بن محمد الجعفي، ثنا هشام، أنا معمر، عن الزهري، ثنا عروة بن الزبير، أن عبيد الله بن عدي بن الخيار أخبره فذكره.
وقال بعده:"وقال يونس وابن أخي الزهري، عن الزهري: أفليس لي عليكم من الحق مثل الذي كان لهم".
উবাইদুল্লাহ ইবনু আদী ইবনু আল-খিয়্যার থেকে বর্ণিত, তিনি জানান যে, মিসওয়ার ইবনু মাখরামাহ এবং আবদুর রহমান ইবনু আসওয়াদ ইবনু আব্দে ইয়াগুস তাকে বললেন: আপনার মামা উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে তাঁর ভাই ওয়ালীদ ইবনু উকবার ব্যাপারে কথা বলতে আপনাকে কিসে বাধা দিচ্ছে? ওয়ালীদ যা করেছিল, সে বিষয়ে লোকজনের মধ্যে অনেক বেশি আলোচনা চলছিল।
উবাইদুল্লাহ বলেন: উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যখন সালাতের জন্য বের হলেন, তখন আমি তাঁর সামনে দাঁড়ালাম এবং বললাম: আমার আপনার কাছে একটি প্রয়োজন আছে, আর তা হলো একটি নসিহত (উপদেশ)। তিনি বললেন: ওহে ব্যক্তি! আমি তোমার থেকে আল্লাহর কাছে আশ্রয় চাই। ফলে আমি ফিরে এলাম। যখন সালাত শেষ হলো, আমি মিসওয়ার এবং ইবনু আব্দে ইয়াগুসের কাছে বসলাম। আমি তাঁদেরকে বললাম যে, আমি উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে কী বলেছিলাম এবং তিনি আমাকে কী বলেছিলেন। তখন তাঁরা বললেন: আপনার যা করণীয় ছিল, আপনি তা পূর্ণ করেছেন। আমি যখন তাঁদের দুজনের সাথে বসেছিলাম, তখন উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর দূত আমার কাছে আসলেন। তাঁরা দুজন আমাকে বললেন: আল্লাহ আপনাকে পরীক্ষা করছেন।
আমি তাঁর কাছে গেলাম এবং ভেতরে প্রবেশ করলাম। তিনি বললেন: এইমাত্র তুমি যে নসিহতের কথা বলেছিলে, তা কী? উবাইদুল্লাহ বলেন: তখন আমি শাহাদাত পাঠ করলাম এবং বললাম: নিশ্চয়ই আল্লাহ মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে প্রেরণ করেছেন এবং তাঁর প্রতি কিতাব নাযিল করেছেন। আপনি তাঁদের অন্তর্ভুক্ত, যাঁরা আল্লাহ ও তাঁর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ডাকে সাড়া দিয়েছেন, তাঁর প্রতি ঈমান এনেছেন, প্রথম দিকের দুই হিজরত করেছেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহচর্য লাভ করেছেন এবং তাঁর আদর্শ দেখেছেন। ওয়ালীদ ইবনু উকবার বিষয়ে লোকজনের মধ্যে অনেক বেশি আলোচনা চলছে। সুতরাং তার উপর শরী‘আতের দণ্ডবিধি (হাদ) কার্যকর করা আপনার জন্য আবশ্যক। উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে জিজ্ঞেস করলেন: হে আমার ভাতিজা! আপনি কি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখেছেন? আমি বললাম: না। তবে তাঁর জ্ঞান আমার কাছে এমনভাবে পৌঁছেছে, যেমনভাবে অন্তঃপুরের কুমারীর কাছে তাঁর জ্ঞান পৌঁছে থাকে।
উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) শাহাদাত পাঠ করলেন এবং বললেন: নিশ্চয়ই আল্লাহ মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সত্যসহ প্রেরণ করেছেন এবং তাঁর উপর কিতাব নাযিল করেছেন। তুমি যেমনটি বললে, আমিও তাঁদের অন্তর্ভুক্ত, যাঁরা আল্লাহ ও তাঁর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ডাকে সাড়া দিয়েছেন, মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যা নিয়ে প্রেরিত হয়েছেন, তার প্রতি ঈমান এনেছি, প্রথম দিকের দুই হিজরত করেছি, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহচর্য লাভ করেছি এবং তাঁর কাছে বাই‘আত দিয়েছি। আল্লাহর কসম! তিনি ইন্তিকাল করার আগ পর্যন্ত আমি তাঁর অবাধ্যতা করিনি এবং তাঁর সাথে খেয়ানত করিনি। এরপর আল্লাহ আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে খালীফা বানালেন। আল্লাহর কসম! আমি তাঁর অবাধ্যতা করিনি এবং তাঁর সাথে খেয়ানত করিনি। এরপর উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে খালীফা বানানো হলো। আল্লাহর কসম! আমি তাঁর অবাধ্যতা করিনি এবং তাঁর সাথে খেয়ানত করিনি। এরপর আমাকে খালীফা বানানো হলো। তাঁদের উপর আমার যেমন হক ছিল, আমার উপর কি তোমাদের তেমন হক নেই?
উবাইদুল্লাহ বললেন: হ্যাঁ, অবশ্যই আছে। তিনি বললেন: তাহলে তোমাদের পক্ষ থেকে এসব আলোচনা আমার কাছে পৌঁছায় কেন? আর ওয়ালীদ ইবনু উকবার বিষয়ে তুমি যা উল্লেখ করেছ, ইন শা আল্লাহ আমরা তার উপর ন্যায়সঙ্গত ব্যবস্থা গ্রহণ করব। উবাইদুল্লাহ বলেন: অতঃপর তিনি ওয়ালীদকে চল্লিশ ঘা বেত্রাঘাত করলেন এবং আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে নির্দেশ দিলেন যেন তিনি তাকে বেত্রাঘাত করেন। আর আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-ই তাকে বেত্রাঘাত করেছিলেন।
9727 - عن سعد بن عبيدة قال: جاء رجل إلى ابن عمر، فسأله عن عثمان، فذكر عن محاسن عمله، قال: لعل ذاك يسوؤك؟ قال: نعم. قال: فأرغم الله بأنفك. ثم سأله عن علي، فذكر محاسن عمله، قال: هو ذاك بيته أوسط بيوت النبي صلى الله عليه وسلم، ثم قال: لعل ذاك يسوؤك؟ قال: أجل. قال: فأرغم الله بأنفك، انطلق فاجهد علي جهدك.
صحيح: رواه البخاري في فضائل الصحابة (3704) عن محمد بن رافع، ثنا حسين، عن زائدة، عن أبي حصين، عن سعد بن عبيدة قال: فذكره.
وروي عن طلحة بن عبيد الله قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم:"لكل نبي رفيق، ورفيقي- يعني في الجنة- عثمان".
رواه الترمذي (3698)، وعبد الله بن أحمد في زيادته على الفضائل (860 - 861)، وأبو يعلى (665) كلهم من طريق يحيى بن اليمان، عن شيخ من بني زهرة، عن الحارث بن عبد الرحمن بن أبي ذئاب، عن طلحة بن عبيد الله قال: فذكره. وقال الترمذي:"هذا حديث غريب، وليس إسناده بالقوي، وهو منقطع".
وهو كما قال: فإن يحيى بن اليمان ضعيف عند أكثر أهل العلم وشيخه مجهول. وحديث الحارث بن عبد الرحمن عن طلحة بن عبيد الله مرسل، وإليه أشار الترمذي بقوله:"وهو منقطع".
وروي عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"لكل نبي رفيق في الجنة، ورفيقي فيها عثمان بن عفان".
رواه ابن ماجه (109) عن أبي مروان محمد بن عثمان العثماني، حدثنا أبي عثمان بن خالد، عن عبد الرحمن بن أبي الزناد، عن أبيه، عن الأعرج، عن أبي هريرة فذكره.
وإسناده ضعيف جدا، فإن عثمان بن خالد (هو: ابن عمر بن عبد الله الأموي أبو عفان المدني)، منكر الحديث، كما قال البخاري وأبو حاتم وغيرهما.
وبه أعله البوصيري في مصباح الزجاجة.
وروي عن أبي هريرة قال: وقف رسول الله صلى الله عليه وسلم على قبر ابنته الثانية التي كانت عند عثمان، فقال:"ألا أبا أيم، ألا أخا أيم يزوجها عثمانَ، فلو كن عشرا لزوجتهن عثمان، وما زوجته إلا بوحي من السماء"، وإن رسول الله صلى الله عليه وسلم لقي عثمان عند باب المسجد، فقال:"يا عثمان، هذا جبريل يخبرني أن الله عز وجل قد زوجك أم كلثوم على مثل صداق رقية، وعلى مثل صحبتها".
رواه ابن ماجه (110)، والطبراني في الكبير (22/ 43) كلاهما من طريق أبي مروان محمد بن عثمان بن خالد العثماني، حدثنا أبي عثمان بن خالد، عن عبد الرحمن بن أبي الزناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة فذكره.
وإسناده ضعيف جدا من أجل عثمان بن خالد، فإنه منكر الحديث كما قال البخاري وأبو حاتم وغيرهما.
وروي عن جابر قال: أتي رسول الله صلى الله عليه وسلم بجنازة رجل ليصلي عليه فلم يصل عليه، فقيل: يا رسول الله! ما رأيناك تركت الصلاة على أحد قبل هذا؟ قال:"إنه كان يبغض عثمان فأبغضه الله".
رواه الترمذي (3709) من طريق عثمان بن زفر، حدثنا محمد بن زياد، عن محمد بن عجلان، عن أبي الزبير، عن جابر قال: فذكره.
وقال:"هذا حديث غريب لا نعرفه إلا من هذا الوجه، ومحمد بن زياد صاحب ميمون بن مهران ضعيف في الحديث جدا، ومحمد بن زياد صاحب أبي هريرة هو بصري ثقة ويكنى أبا الحارث، ومحمد بن زياد الألهاني صاحب أبي أمامة ثقة يكنى أبا سفيان شاميٌّ".
وهو كما قال؛ فإن محمد بن زياد هو الطحان الأعور، متروك الحديث كما قال البخاري والنسائي وأبو حاتم وغيرهم.
সা'দ ইবনে উবাইদা (রহ.) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, এক ব্যক্তি ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এসে উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করল। তখন তিনি উসমানের উত্তম কাজগুলোর কথা আলোচনা করলেন। ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: সম্ভবত এটি তোমাকে খারাপ লাগছে? লোকটি বলল: হ্যাঁ। তিনি বললেন: আল্লাহ তোমার নাক ধূলিধূসরিত করুন। এরপর লোকটি তাঁকে আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করল। তিনি তাঁরও উত্তম কাজগুলোর কথা আলোচনা করলেন এবং বললেন: তিনি তো সেই, যাঁর ঘর নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর ঘরসমূহের মাঝখানে ছিল। এরপর তিনি বললেন: সম্ভবত এটি তোমাকে খারাপ লাগছে? লোকটি বলল: অবশ্যই। তিনি বললেন: আল্লাহ তোমার নাক ধূলিধূসরিত করুন, যাও! তোমার সমস্ত শক্তি দিয়ে আমার বিরুদ্ধে চেষ্টা করো।
তালহা ইবনে উবাইদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "প্রত্যেক নবীরই একজন সঙ্গী থাকে, আর আমার সঙ্গী—অর্থাৎ জান্নাতে—হলেন উসমান।"
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "জান্নাতে প্রত্যেক নবীরই একজন সঙ্গী আছে, আর তাতে আমার সঙ্গী হলেন উসমান ইবনে আফফান।"
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাঁর দ্বিতীয় কন্যার কবরের পাশে দাঁড়ালেন, যিনি উসমানের বিবাহে ছিলেন। তিনি বললেন: "আহ, এমন কি কোনো স্বামী বা ভাই আছে যে উসমানের সাথে তার বিবাহ দেবে? যদি আমার দশটি কন্যাও থাকত, তবে আমি তাদের উসমানের সাথেই বিবাহ দিতাম। আর আমি তাকে বিবাহ দেইনি আসমান থেকে ওহী ছাড়া।" এবং রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম মসজিদের দরজার কাছে উসমানের সাথে দেখা করে বললেন: "হে উসমান! এই যে জিবরীল, তিনি আমাকে জানিয়েছেন যে আল্লাহ তা‘আলা রুকাইয়ার অনুরূপ মোহরানা এবং তাঁর অনুরূপ সাহচর্য দিয়ে উম্মু কুলসুমের সাথে তোমার বিবাহ দিয়েছেন।"
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর কাছে এক ব্যক্তির জানাযা আনা হলো, যেন তিনি তার উপর সালাত আদায় করেন। কিন্তু তিনি তার উপর সালাত আদায় করলেন না। জিজ্ঞাসা করা হলো: হে আল্লাহর রাসূল! এর আগে তো আমরা কখনও দেখিনি যে আপনি কারো জানাযা পরিত্যাগ করেছেন? তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই সে উসমানকে বিদ্বেষ করত, তাই আল্লাহ তাকে বিদ্বেষ করেন।"
9728 - عن ابن عمر قال: ذكر رسول الله صلى الله عليه وسلم فتنةً فمرَّ رجل، فقال:"يقتل فيها هذا المقنَّع يومئذ مظلوما"، قال: فنظرت فإذا هو عثمان بن عفان.
حسن: رواه الترمذي (3708)، وأحمد (5953) كلاهما من حديث الأسود بن عامر، عن سنان بن هارون (هو البرجمي)، عن كليب بن وائل، عن ابن عمر فذكره.
وإسناده حسن من أجل سنان بن هارون، فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث إذا لم يخالف ولم يأت بما ينكر عليه.
وقد صحَّح إسناده ابن حجر في الفتح (7/ 38).
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম একটি ফিতনার (বিপর্যয়ের) উল্লেখ করলেন। অতঃপর এক ব্যক্তি পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন। তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "ঐ দিন এই আবৃত (মাথা-ঢাকা) ব্যক্তিটি এর মধ্যে মাজলুম (নির্যাতিত) অবস্থায় নিহত হবে।" (ইবনু উমর) বলেন, অতঃপর আমি তাকালাম, দেখলাম তিনি হলেন উসমান ইবনু আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)।
9729 - عن أبي الأشعث الصنعاني، أن خطباء قامت بالشام، وفيهم رجال من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقام آخرهم رجل يقال له: مرة بن كعب، فقال: لولا حديث سمعته
من رسول الله صلى الله عليه وسلم ما قمت، وذكر الفتن فقرَّبها، فمر رجل مقنع في ثوب فقال:"هذا يومئذ على الهدى"، فقمت إليه فإذا هو عثمان بن عفان. قال: فأقبلت عليه بوجهه، فقلت: هذا؟ قال:"نعم".
صحيح: رواه الترمذي (3704)، وأحمد (18068)، وصحّحه الحاكم (3/ 102) كلهم من طريق أيوب، عن أبي قلابة، عن أبي الأشعث (وهو شراحيل بن آده) قال: فذكره. وإسناده صحيح.
وصحّحه الترمذي فقال:"هذا حديث حسن صحيح".
ورواه أحمد (18067) عن عبد الرحمن بن مهدي، حدثنا معاوية (هو ابن صالح بن حُدير الحضرمي)، عن سليم بن عامر (هو الكلاعي)، عن جبير بن نفير قال: كنا معسكرين مع معاوية بعد قتل عثمان، فقام كعب بن مرة البهزي فقال: لولا شيء سمعته من رسول الله صلى الله عليه وسلم ما قمت هذا المقام، فلما سمع بذكر رسول الله صلى الله عليه وسلم أجلس الناسَ، فقال: بينما نحن عند رسول الله صلى الله عليه وسلم إذ مر عثمان بن عفان مرجَّلا، قال: فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لتخرجن فتنة من تحت قدمي -أو من بين رجليَّ-، هذا يومئذ ومن اتبعه على الهدى".
قال: فقام ابن حوالة الأزدي من عند المنبر، فقال: إنك لصاحب هذا؟ قال: نعم. قال: والله إني لحاضر ذلك المجلس، ولو علمت أن لي في الجيش مصدقا كنت أول من تكلم به.
وإسناده حسن من أجل معاوية بن صالح بن حدير فإنه حسن الحديث.
روي عن كعب بن عجرة قال: كنت عند رسول الله صلى الله عليه وسلم، فذكر فتنة فقرَّبها، فمر رجل متقنع فقال:"هذا يومئذ على الهدى" قال: فاتبعته حتى أخذت بضبعيه، فحولت وجهه إليه، وكشفت عن رأسه، فقلت: هذا يا رسول الله؟ فقال:"نعم" فإذا هو عثمان بن عفان، رضي الله تعالى عنه.
رواه ابن ماجه (111)، وأحمد (18129) كلاهما من طريق هشام بن حسان، عن محمد بن سيرين، عن كعب بن عجرة فذكره.
وإسناده منقطع، فإن حديث محمد بن سيرين عن كعب بن عجرة مرسل، كما قال أبو حاتم. انظر: المراسيل (ص: 187).
وبه أعله البوصيري في مصباح الزجاجة.
মুররাহ ইবনে কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি ফিতনা (বিপর্যয়) প্রসঙ্গে আলোচনা করলেন এবং এর সময়কে নিকটবর্তী বলে উল্লেখ করলেন। [তিনি বলেন]: এমন সময় একজন লোক কাপড়ে মাথা ঢেকে হেঁটে যাচ্ছিলেন। (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "ঐদিন এ ব্যক্তি হিদায়াতের উপর থাকবে।" আমি তখন তার দিকে দ্রুত গেলাম এবং দেখলাম, তিনি হলেন উসমান ইবনে আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। বর্ণনাকারী বলেন, তখন আমি তাঁর (রাসূলের) দিকে মুখ করে ফিরে এসে জিজ্ঞেস করলাম: ইনি? তিনি বললেন: "হ্যাঁ।"
9730 - عن عائشة قالت: أرسل رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى عثمان بن عفان، فأقبل عليه رسول الله صلى الله عليه وسلم، فلما رأينا رسول الله صلى الله عليه وسلم أقبلت إحدانا على الأخرى، فكان من آخر كلام كلَّمه أن ضرب منكبه، وقال:"يا عثمان، إن الله عز وجل عسى أن يلبسك قميصا، فإن أرادك المنافقون على خلعه فلا تخلعه حتى تلقاني، يا عثمان، إن الله عسى أن يلبسك قميصا فإن أرادك المنافقون على خلعه فلا تخلعه حتى تلقاني" ثلاثا. فقلت
لها: يا أم المؤمنين فأين كان هذا عنك؟ قالت: نسيته والله! فما ذكرته. قال: فأخبرته معاوية بن أبي سفيان، فلم يرض بالذي أخبرته حتى كتب إلى أم المؤمنين أن اكتبي إلي به، فكتبت إليه به كتابا.
صحيح: رواه الترمذي (3705)، وأحمد (24566) كلاهما من طريق ربيعة بن يزيد، عن عبد الله بن عامر، عن النعمان بن بشير، عن عائشة فذكرته.
وإسناده صحيح. وللحديث طرق أخرى عن عائشة إلا أني ما ذكرتها أصح.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম উসমান ইবন আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট লোক পাঠালেন। অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর দিকে মনোযোগ দিলেন। আমরা যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে দেখলাম, তখন আমরা একে অপরের দিকে ঝুঁকে গেলাম। সর্বশেষ তিনি তাঁকে যে কথাটি বললেন তা হলো, তিনি তাঁর কাঁধে আঘাত করলেন এবং বললেন: “হে উসমান! আল্লাহ তাআলা সম্ভবত তোমাকে একটি জামা (খিলাফতের দায়িত্ব) পরাবেন। যদি মুনাফিকরা তোমাকে তা খুলে ফেলতে চায়, তবে তুমি আমার সাথে সাক্ষাৎ না করা পর্যন্ত তা খুলবে না। হে উসমান! আল্লাহ সম্ভবত তোমাকে একটি জামা (খিলাফতের দায়িত্ব) পরাবেন। যদি মুনাফিকরা তোমাকে তা খুলে ফেলতে চায়, তবে তুমি আমার সাথে সাক্ষাৎ না করা পর্যন্ত তা খুলবে না।”— এই কথাটি তিনি তিনবার বললেন।
(বর্ণনাকারী) বলেন: আমি তাকে (আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে) বললাম: হে উম্মুল মুমিনীন! আপনার কাছে এটি কিভাবে অজানা ছিল? তিনি বললেন: আল্লাহর শপথ! আমি ভুলে গিয়েছিলাম। আমার মনে ছিল না।
(বর্ণনাকারী) বলেন: অতঃপর আমি মুআবিয়া ইবন আবূ সুফিয়ান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে এ বিষয়ে অবহিত করলাম। আমি যা বললাম, তাতে তিনি সন্তুষ্ট হলেন না। এমনকি তিনি উম্মুল মুমিনীন (আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা))-এর কাছে লিখলেন যেন তিনি তাকে এ বিষয়ে লিখে পাঠান। অতঃপর তিনি (আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)) পত্রের মাধ্যমে তা তার (মুআবিয়ার) নিকট লিখে পাঠালেন।
9731 - عن عائشة قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم في مرضه:"وددت أن عندي بعض أصحابي" قلنا: يا رسول الله، ألا ندعو لك أبا بكر؟ فسكت. قلنا: ألا ندعو لك عمر؟ فسكت. قلنا: ألا ندعو لك عثمان؟ قال:"نعم" فجاء فخلا به، فجعل النبي صلى الله عليه وسلم يكلمه، ووجه عثمان يتغير.
صحيح: رواه ابن ماجه (113)، وصحّحه ابن حبان (6918) كلاهما من طريق إسماعيل بن أبي خالد، عن قيس بن أبي حازم، عن عائشة فذكرته. وإسناده صحيح.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর অসুস্থতার সময় বললেন: "আমি চাই যে আমার কিছু সাহাবী যেন আমার কাছে উপস্থিত থাকে।" আমরা বললাম, ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমরা কি আপনার জন্য আবূ বকরকে ডেকে আনব? তিনি নীরব রইলেন। আমরা বললাম, আমরা কি আপনার জন্য উমরকে ডেকে আনব? তিনি নীরব রইলেন। আমরা বললাম, আমরা কি আপনার জন্য উসমানকে ডেকে আনব? তিনি বললেন: "হ্যাঁ।" অতঃপর তিনি (উসমান) এলেন এবং তাঁর সাথে একান্তে অবস্থান করলেন। এরপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর সাথে কথা বলতে শুরু করলেন, আর উসমানের চেহারা পরিবর্তিত হচ্ছিল।
9732 - عن أبي سهلة مولى عثمان: أن عثمان بن عفان قال يوم الدار: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم عهد إليَّ عهدا، فأنا صابر عليه.
قال قيس: فكانوا يرونه ذلك اليوم.
حسن: رواه الترمذي (3711)، وأحمد (407)، والبزار (402) كلهم من طريق إسماعيل بن أبي خالد، عن قيس بن أبي حازم، قال: حدثني أبو سهلة قال: فذكره.
وقال الترمذي:"هذا حديث حسن صحيح، لا نعرفه إلا من حديث إسماعيل بن أبي خالد".
وإسناده حسن من أجل أبي سهلة، فإنه حسن الحديث.
وقول قيس:"فكانوا يرونه ذلك اليوم" يعني بذلك ما ورد في حديث عائشة المتقدم من كلام النبي صلى الله عليه وسلم مع عثمان في الخلوة.
والحديث ورد في وقتين مختلفين كما هو ظاهر من السياق، لكن لاتحاد القصة ساقه ابن ماجه وابن حبان في مساق واحد.
وقيس بن حازم قد سمع من عائشة أول الحديث، وسمع من أبي سهلة مولى عثمان عن عثمان آخر الحديث، وكلاهما صحيح.
উসমান ইবনে আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি গৃহবন্দী থাকার দিন (ইয়াওমুদ দার) বলেন: নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার কাছে একটি অঙ্গীকার করেছিলেন, আর আমি তার উপর ধৈর্যশীল থাকব।
কাইস (বর্ণনাকারী) বলেন: তারা সেই দিন তাঁকে (উসমানকে) এর (অঙ্গীকারের) উপর ধৈর্যশীল হিসেবেই দেখত।
9733 - عن سعد بن أبي وقاص قال: أمر معاوية بن أبي سفيان سعدا، فقال: ما منعك أن تسب أبا التراب؟ فقال: أمَّا ما ذكرت ثلاثا قالهن له رسول الله صلى الله عليه وسلم فلن أسبه. لأن تكون لي واحدة منهن أحب إلي من حمر النعم، سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول له، خلَّفه فى بعض مغازيه، فقال له علي: يا رسول الله! خلفتني مع النساء والصبيان؟ فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أما ترضى أن تكون مني بمنزلة هارون من موسى، إلا أنه لا نبوة بعدي". وسمعته يقول يوم خيبر:"لأعطين الراية رجلا يحب الله ورسوله ويحبه الله ورسوله". قال: فتطاولنا لها، فقال:"ادعوا لي عليا". فأتي به أرمد، فبصق في عينه، ودفع الراية إليه، ففتح الله عليه، ولما نزلت هذه الآية: {فَقُلْ تَعَالَوْا نَدْعُ أَبْنَاءَنَا وَأَبْنَاءَكُمْ} [آل عمران: 61] دعا رسول الله صلى الله عليه وسلم عليا وفاطمة وحسنا وحسينا فقال:"اللهم هؤلاء أهلي".
صحيح: رواه مسلم في فضائل الصحابة (2404 - 32) من طرق، عن حاتم بن إسماعيل، عن بكير بن مسمار، عن عامر بن سعد بن أبي وقاص، عن أبيه قال: أمر معاوية فذكره.
সাদ ইবনে আবি ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মু'আবিয়া ইবনে আবি সুফিয়ান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সাদকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আদেশ করে বললেন: "তোমাকে আবুত তুরাবকে (আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর উপনাম) গালি দেওয়া থেকে কিসে বাধা দিল?"
তিনি (সাদ) বললেন: "আপনি তিনটি বিষয় উল্লেখ করেছেন, যা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁকে (আলীকে) বলেছেন। এই কারণে আমি তাঁকে কখনো গালি দেব না। এই তিনটি বিষয়ের মধ্যে একটিও যদি আমার জন্য থাকে, তবে তা আমার কাছে মূল্যবান লাল উটের চেয়েও বেশি প্রিয়।
আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে তাঁর (আলীর) সম্পর্কে বলতে শুনেছি—যখন তিনি তাঁকে কোনো এক যুদ্ধে (তাবুক) রেখে গিয়েছিলেন। তখন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বললেন: 'ইয়া রাসূলুল্লাহ! আপনি কি আমাকে নারী ও শিশুদের সাথে রেখে গেলেন?' তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁকে বললেন: 'তুমি কি এতে সন্তুষ্ট নও যে, তুমি আমার কাছে হারুনের কাছে মূসার (আঃ) অবস্থানে আছ? তবে আমার পরে আর কোনো নবুওয়ত নেই।'
আর খায়বারের দিন আমি তাঁকে বলতে শুনেছি: 'আমি অবশ্যই এমন এক ব্যক্তির হাতে পতাকা অর্পণ করব, যে আল্লাহ ও তাঁর রাসূলকে ভালবাসে এবং আল্লাহ ও তাঁর রাসূলও তাকে ভালবাসেন।' সাদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমরা (সাহাবীগণ) সবাই তার জন্য মুখিয়ে উঠলাম। তখন তিনি বললেন: 'তোমরা আলীকে আমার কাছে ডাকো।' তাঁকে আনা হলো, তখন তিনি ছিলেন চক্ষু রোগে আক্রান্ত। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর চোখে থুথু দিলেন এবং তাঁর হাতে পতাকা তুলে দিলেন। ফলে আল্লাহ তাঁর মাধ্যমে বিজয় দান করলেন।
আর যখন এই আয়াতটি নাযিল হলো: {আপনি বলুন: এসো, আমরা আহ্বান করি আমাদের পুত্রদের এবং তোমাদের পুত্রদের} [সূরা আলে ইমরান: ৬১], তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আলী, ফাতিমা, হাসান এবং হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে ডাকলেন এবং বললেন: 'হে আল্লাহ! এরা আমার আহল (পরিবার)।'"
9734 - عن يزيد بن حيان قال: انطلقت أنا وحصين بن سبرة وعمر بن مسلم إلى زيد بن أرقم، فلما جلسنا إليه قال له حصين: لقد لقيت يا زيد! خيرا كثيرا، رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم، وسمعت حديثه، وغزوت معه، وصليت خلفه، لقد لقيت يا زيد! خيرا كثيرا، حدثنا يا زيد! ما سمعت من رسول الله صلى الله عليه وسلم. قال: يا ابن أخي، والله! لقد كبرت سني، وقدم عهدي ونسيت بعض الذي كنت أعي من رسول الله صلى الله عليه وسلم، فما حدثتكم فاقبلوا وما لا فلا تكلّفونيه. ثم قال: قام رسول الله صلى الله عليه وسلم يوما فينا خطيبا بماء يدعى خما بين مكة والمدينة، فحمد الله، وأثنى عليه، ووعظ وذكَّر، ثم قال:"أما بعد، ألا أيها الناس، فإنما أنا بشر يوشك أن يأتي رسول ربي فأجيب، وأنا تارك فيكم ثقلين، أولهما كتاب الله، فيه الهدى والنور، فخذوا بكتاب الله واستمسكوا به". فحث على كتاب الله، ورغَّب فيه ثم قال:"وأهل بيتي أذكركم الله في أهل بيتي، أذكركم الله في أهل بيتي، أذكركم الله في أهل بيتي". فقال له حصين: ومن أهل بيته يا زيد؟ أليس
نساؤه من أهل بيته؟ قال: نساؤه من أهل بيته ولكن أهل بيته من حرم الصدقةَ بعده. قال: ومن هم؟ قال: هم آل علي، وآل عقيل، وآل جعفر، وآل عباس. قال: كل هؤلاء حُرِم الصدقةَ؟ قال: نعم.
صحيح: رواه مسلم في فضائل الصحابة (2408 - 36) من طرق عن ابن علية، ثني أبو حيان، ثني يزيد بن حيان قال: انطلقت أنا فذكره.
وفي لفظ لمسلم:"ألا وإني تارك فيكم ثقلين: أحدهما كتاب الله عز وجل، هو حبل الله، من اتبعه كان على الهدى، ومن تركه كان على ضلالة". وفيه فقلنا: من أهل بيته؟ نساؤه؟ قال: لا وأيم الله، إن المرأة تكون مع الرجل العصر من الدهر، ثم يطلقها فترجع إلى أبيها وقومها. أهل بيته أصله وعصبته الذين حرموا الصدقة بعده.
رواه مسلم فيه (37) من وجه آخر عن يزيد بن حيان، عن زيد بن أرقم فذكر نحو حديث أبي حيان، غير أنه قال: فذكره.
যায়িদ ইবনু আরকাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, ইয়াযিদ ইবনু হাইয়ান বলেন: আমি, হুসাইন ইবনু সাবরাহ এবং উমার ইবনু মুসলিম - আমরা যায়িদ ইবনু আরকামের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নিকট গেলাম। যখন আমরা তাঁর কাছে বসলাম, তখন হুসাইন তাঁকে বললেন: হে যায়িদ! আপনি তো অনেক কল্যাণ লাভ করেছেন। আপনি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখেছেন, তাঁর হাদীস শুনেছেন, তাঁর সাথে যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেছেন এবং তাঁর পেছনে সালাত আদায় করেছেন। হে যায়িদ! আপনি তো অনেক কল্যাণ লাভ করেছেন। আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছ থেকে আপনি যা শুনেছেন, তা আমাদের বলুন।
তিনি (যায়িদ) বললেন: হে আমার ভ্রাতুষ্পুত্র! আল্লাহর কসম, আমার বয়স বেড়ে গেছে, সময় অনেক দীর্ঘ হয়ে গেছে এবং আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছ থেকে আমি যা মুখস্থ রেখেছিলাম, তার কিছু অংশ ভুলে গেছি। সুতরাং, আমি তোমাদের যা বর্ণনা করি তা গ্রহণ করো এবং যা বর্ণনা করি না, তার জন্য আমাকে কষ্ট দিও না।
এরপর তিনি বললেন: একদা আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কা ও মদীনার মধ্যবর্তী 'খুম' নামক একটি পানির উৎসের কাছে আমাদের মাঝে দাঁড়িয়ে ভাষণ দিলেন। তিনি আল্লাহর প্রশংসা ও স্তুতি জ্ঞাপন করলেন, উপদেশ দিলেন এবং স্মরণ করিয়ে দিলেন। অতঃপর তিনি বললেন: "অতঃপর শোনো, ওহে লোক সকল! আমি তো একজন মানুষ। শীঘ্রই আমার রবের দূত (মৃত্যুর ফেরেশতা) আমার কাছে আসবেন এবং আমি সাড়া দেব। আমি তোমাদের মাঝে দু'টি ভারী জিনিস (ছাক্বালাইন) রেখে যাচ্ছি। প্রথমটি হলো আল্লাহর কিতাব। তাতে রয়েছে হিদায়াত ও নূর। সুতরাং তোমরা আল্লাহর কিতাবকে গ্রহণ করো এবং তা মজবুতভাবে আঁকড়ে ধরো।" তিনি আল্লাহর কিতাবের প্রতি উৎসাহ দিলেন এবং এর প্রতি আগ্রহ সৃষ্টি করলেন। এরপর তিনি বললেন: "এবং (দ্বিতীয়টি হলো) আমার আহলে বাইত (পরিবার-পরিজন)। আমি তোমাদেরকে আমার আহলে বাইতের ব্যাপারে আল্লাহর কথা স্মরণ করিয়ে দিচ্ছি। আমি তোমাদেরকে আমার আহলে বাইতের ব্যাপারে আল্লাহর কথা স্মরণ করিয়ে দিচ্ছি। আমি তোমাদেরকে আমার আহলে বাইতের ব্যাপারে আল্লাহর কথা স্মরণ করিয়ে দিচ্ছি।"
তখন হুসাইন তাকে (যায়িদকে) বললেন: হে যায়িদ! তাঁর আহলে বাইত কারা? তাঁর স্ত্রীরা কি তাঁর আহলে বাইতের অন্তর্ভুক্ত নন? তিনি (যায়িদ) বললেন: তাঁর স্ত্রীরা তাঁর আহলে বাইতের অন্তর্ভুক্ত বটে, কিন্তু তাঁর (প্রকৃত) আহলে বাইত তারাই, যাদের উপর তাঁর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পরে সাদাকাহ (যাকাত) হারাম করা হয়েছে। হুসাইন জিজ্ঞেস করলেন: তারা কারা? তিনি বললেন: তারা হলেন আল-আলী (আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পরিবার), আল-আকীল (আকীল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পরিবার), আল-জাফর (জাফর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পরিবার) এবং আল-আব্বাস (আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পরিবার)। হুসাইন জিজ্ঞেস করলেন: এদের সবার উপর সাদাকাহ হারাম করা হয়েছে? তিনি বললেন: হ্যাঁ।
মুসলিমের অপর এক বর্ণনায় এসেছে: "সাবধান! আমি তোমাদের মাঝে দু'টি ভারী জিনিস রেখে যাচ্ছি। তাদের একটি হলো আল্লাহর কিতাব। তা হলো আল্লাহর রজ্জু। যে ব্যক্তি তা অনুসরণ করবে, সে হেদায়েত লাভ করবে। আর যে তা বর্জন করবে, সে গোমরাহ হবে।" তাতে (ঐ বর্ণনায়) আরো এসেছে, আমরা জিজ্ঞেস করলাম: তাঁর আহলে বাইত কারা? তাঁর স্ত্রীগণ? তিনি বললেন: না, আল্লাহর কসম! কেননা নারী পুরুষের সাথে একটি নির্দিষ্ট সময় পর্যন্ত থাকে, এরপর সে তাকে তালাক দিলে সে তার পিতা ও গোত্রের কাছে ফিরে যায়। তাঁর আহলে বাইত হলো তাঁর মূল ও নিকটাত্মীয়রা, যাদের উপর তাঁর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পরে সাদাকাহ হারাম করা হয়েছে।
9735 - عن سعد بن أبي وقاص أن رسول الله صلى الله عليه وسلم خرج إلى تبوك، واستخلف عليا، فقال: أتخلِّفني في الصبيان والنساء؟ قال:"ألا ترضى أن تكون منى بمنزلة هارون من موسى؟ إلا أنه ليس نبي بعدي".
متفق عليه: رواه البخاري في المغازي (4416)، ومسلم في فضائل الصحابة (2404 - 31) كلاهما من طريق شعبة، عن الحكم، عن مصعب بن سعد، عن أبيه فذكره.
সা'দ ইবনু আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাবুক অভিযানের উদ্দেশ্যে বের হলেন এবং আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে (মদীনার) প্রতিনিধি নিযুক্ত করলেন। তখন তিনি (আলী) বললেন: আপনি কি আমাকে শিশু ও মহিলাদের মধ্যে রেখে যাচ্ছেন? তিনি (নবী) বললেন: "তুমি কি এতে সন্তুষ্ট নও যে, আমার নিকট তোমার মর্যাদা মূসার নিকট হারুনের মর্যাদার মতো হবে? তবে আমার পরে কোনো নবী নেই।"
9736 - عن جابر بن عبد الله أن النبي صلى الله عليه وسلم قال لعلي:"أنت مني بمنزلة هارون من موسى إلا أنه لا نبي بعدي".
حسن: رواه الترمذي (3730) عن محمود بن غيلان، حدثنا أبو أحمد الزبيري، حدثنا شريك، عن عبد الله بن محمد بن عقيل، عن جابر بن عبد الله فذكره.
وإسناده حسن من أجل الكلام في شريك وهو ابن عبد الله النخعي وهو مختلف فيه، فوثّقه ابن سعد والعجلي وغيرهما غير أنه تغير حفظه منذ ولي القضاء بالكوفة فيخطئ، والغالب أنه لم يخطئ في هذا الحديث لكثرة شواهده.
ومن هذا الطريق رواه أيضا أحمد (14638).
জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: "তুমি আমার নিকট মূসা (আঃ)-এর নিকট হারূণ (আঃ)-এর মর্যাদার মতো। তবে আমার পরে কোনো নবী নেই।"
9737 - عن أسماء بنت عُميس، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال لعليّ:"أنت مني بمنزلة هارون من موسى، إلّا أنّه ليس بعدي نبيٌّ".
حسن: رواه أحمد (27081)، والنسائيّ في الكبرى (8143)، والطبرانيّ في الكبير (ج 24/ 146 - 147)، وابن أبي عاصم في السنة (1381 - بتحقيق باسم) كلّهم من طريق موسى الجهنيّ قال: دخلتُ على فاطمة بنت عليّ، فقال لها رفيقي أبو مَهَل: كم لكِ؟ قالت: ستة وثمانون سنة. قال: ما سمعتِ من أبيك شيئًا؟ قالت: حدَّثتني أسماءُ بنتُ عميس فذكرت الحديث.
وإسناده حسن من أجل فاطمة بنت علي بن أبي طالب، روى عنها جماعة ولم يوثّقها أحدٌ غير أنّ ابن حبان ذكرها في الثقات (5/ 301).
فقول الحافظ في التقريب:"ثقة". لعلّه يعود إلى شهرة أخبارها الخاصة كما ذكرها المزي في تهذيب الكمال عن الزبير بن بكار وغيره، وإلّا فإنّ كلمة"ثقة" تحتاج إلى تنصيص أحد الأئمّة.
وأورده الهيثميّ في"المجمع" (9/ 109) وقال:"رواه أحمد، والطبرانيّ ورجال أحمد رجال الصحيح غير فاطمة بنت علي وهي ثقة".
ووهم من جعلها فاطمة بنت الحسين بن علي بن أبي طالب، لأنّه لا يوجد من الرّواة عنها موسى الجهنيّ.
আসমা বিনত উমাইস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: "তুমি আমার কাছে ঠিক হারুন (আঃ) এর কাছে মূসা (আঃ)-এর মর্যাদার সমতুল্য। তবে এতটুকু যে, আমার পরে কোনো নবী নেই।"
9738 - عن سهل بن سعد قال: استعمل على المدينة رجل من آل مروان. قال: فدعا سهل بن سعد، فأمره أن يشتم عليا. قال: فأبى سهل. فقال له: أما إذا أبيت فقل: لعن الله أبا التراب، فقال سهل ما كان لعلي اسم أحب إليه من أبي التراب، وإن كان ليفرح إذا دعي بها. فقال له أخبرنا عن قصته، لم سمي أبا تراب؟ قال: جاء رسول الله صلى الله عليه وسلم بيت فاطمة فلم يجد عليًا في البيت فقال:"أين ابن عمك؟" قالت: كان بيني وبينه شيءٌ فغاضبني فخرج، فلم يَقِلْ عندي، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم لإنسان:"انظر. أين هو؟" فجاء فقال: يا رسول الله هو في المسجد راقد. فجاءه رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو مضطجع قد سقط رداءُه عن شِقِّه وأصابه تراب فجعل رسول الله صلى الله عليه وسلم يمسحه عنه ويقول:"قم أبا التراب، قم أبا التُراب".
متفق عليه: رواه البخاري في الصلاة (441)، ومسلم في فضائل الصحابة (2409) كلاهما عن قتيبة بن سعيد، ثنا عبد العزيز بن أبي حازم، عن أبي حازم، عن سهل بن سعد فذكره.
وفي لفظ زاد البخاري بعد قوله:"وإن كان ليفرح إذا دعي بها":"وما سماه أبو تراب إلا النبي صلى الله عليه وسلم".
সাহল ইবনু সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মারওয়ান বংশের এক ব্যক্তিকে মদীনার গভর্নর নিযুক্ত করা হলো। সে সাহল ইবনু সা'দকে ডেকে পাঠিয়ে তাঁকে আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে গালি দেওয়ার নির্দেশ দিল। সাহল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তা করতে অস্বীকার করলেন। তখন লোকটি তাঁকে বলল: যেহেতু আপনি অস্বীকার করলেন, তাই বলুন, ‘আল্লাহু আবু তুরাবকে অভিশাপ দিন।’ সাহল বললেন, আলীর নিকট ‘আবু তুরাব’ নামের চেয়ে প্রিয় কোনো নাম ছিল না। যখনই তাঁকে এই নামে ডাকা হতো, তিনি খুশি হতেন। (আর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ব্যতীত অন্য কেউ তাঁকে ‘আবু তুরাব’ বলে ডাকেননি)। লোকটি তখন তাঁকে বলল, আপনি এর ঘটনাটি আমাদের জানান—কেন তাঁকে আবু তুরাব নামে ডাকা হতো? সাহল বললেন, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ঘরে এলেন, কিন্তু ঘরে আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে পেলেন না। তিনি জিজ্ঞাসা করলেন, "তোমার চাচাতো ভাই কোথায়?" ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, "আমার ও তাঁর মধ্যে কিছুটা মনোমালিন্য হয়েছিল। তিনি রাগ করে বেরিয়ে গেছেন এবং (দুপুরের) বিশ্রাম আমার কাছে নেননি।" তখন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একজনকে বললেন, "দেখো, সে কোথায় আছে?" লোকটি এসে জানাল, "হে আল্লাহর রাসূল! তিনি মসজিদে শুয়ে আছেন।" এরপর আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর কাছে গেলেন। তখন তিনি শুয়ে ছিলেন, তাঁর চাদর তাঁর একপাশ থেকে নিচে পড়ে গিয়েছিল এবং তাঁর শরীরে মাটি লেগেছিল। আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিজ হাতে মাটি ঝেড়ে দিচ্ছিলেন এবং বলছিলেন: "ওঠো, হে আবুত তুরাব! ওঠো, হে আবুত তুরাব!"
9739 - عن سلمة بن الأكوع قال: كان علي قد تخلف عن النبي صلى الله عليه وسلم في خيبر، وكان به رمد، فقال: أنا أتخلف عن رسول الله صلى الله عليه وسلم، فخرج علي فلحق بالنبي صلى الله عليه وسلم، فلما كان مساء الليلة التي فتحها الله في صباحها، قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لأعطين الراية -أو ليأخذن الراية- غدا رجلا يحبه الله ورسوله، أو قال: يحب الله ورسوله، يفتح الله عليه". فإذا نحن بعلي، وما نرجوه، فقالوا: هذا علي، فأعطاه رسول الله صلى الله عليه وسلم، ففتح الله عليه.
متفق عليه: رواه البخاري في فضائل الصحابة (3702) وفي المغازي (4209)، ومسلم في فضائل الصحابة (2407) كلاهما من طريق حاتم بن إسماعيل، عن يزيد بن أبي عبيد، عن سلمة ابن الأكوع قال: فذكره.
সালামাহ ইবনুল আকওয়া' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) খায়বার যুদ্ধে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে যোগ দিতে পারেননি। কারণ তাঁর চোখে পীড়া ছিল (চোখ ওঠা/প্রদাহ)। তিনি (আলী) বললেন, "আমি কি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সঙ্গ ত্যাগ করে পেছনে পড়ে থাকব?" অতঃপর আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বেরিয়ে পড়লেন এবং নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে মিলিত হলেন। আল্লাহ যে রাতের সকালে তা (খায়বার) জয়যুক্ত করেন, সেই রাতের সন্ধ্যায় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আগামীকাল আমি অবশ্যই এমন একজন ব্যক্তিকে পতাকা (ঝান্ডা) দেব— অথবা (তিনি বললেন,) সে পতাকা নেবে— যাকে আল্লাহ ও তাঁর রাসূল ভালোবাসেন, অথবা (রাবী বললেন,) সে আল্লাহ ও তাঁর রাসূলকে ভালোবাসে। আল্লাহ তার মাধ্যমে বিজয় দান করবেন।" হঠাৎ আমরা আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে দেখলাম, যদিও আমরা তাঁর (উপস্থিতির) আশা করিনি। লোকেরা বলল, "এই তো আলী!" তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে পতাকা দিলেন এবং আল্লাহ তাঁর মাধ্যমে বিজয় দান করলেন।
9740 - عن سهل بن سعد أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال يوم خيبر:"لأعطين هذه الراية رجلا يفتح الله على يديه، يحب الله ورسوله، ويحبه الله ورسوله". قال: فبات الناس يدوكون ليلتهم أيهم يعطاها. قال: فلما أصبح الناس غدوا على رسول الله صلى الله عليه وسلم كلهم يرجون أن يعطاها فقال:"أين علي بن أبي طالب؟". فقالوا: هو يا رسول الله، يشتكى عينيه. قال: فأرسلوا إليه، فأتي به، فبصق رسول الله صلى الله عليه وسلم في عينيه، ودعا له فبرأ، حتى كأن لم يكن به وجع، فأعطاه الراية، فقال علي: يا رسول الله، أقاتلهم حتى يكونوا مثلنا. فقال:"انفذ على رسلك حتى تنزل بساحتهم، ثم ادعهم إلى الإسلام، وأخبرهم بما يجب عليهم من حق الله فيه، فوالله! لأن يهدي الله بك رجلا واحدا خير لك من أن يكون لك حمر النعم".
متفق عليه: رواه البخاري في الجهاد (2942) وفي فضائل الصحابة (3701) وفي المغازي (4210)، ومسلم في فضائل الصحابة (2406) كلاهما من طريق عبد العزيز بن أبي حازم، عن أبيه، عن سهل بن سعد سمع النبي صلى الله عليه وسلم فذكره.
সাহল ইবনে সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খায়বার যুদ্ধের দিন বললেন, "আমি অবশ্যই এমন এক ব্যক্তিকে এই পতাকা দেব যার হাতে আল্লাহ বিজয় দান করবেন। সে আল্লাহ ও তাঁর রাসূলকে ভালোবাসে এবং আল্লাহ ও তাঁর রাসূলও তাকে ভালোবাসেন।" তিনি (সাহল) বলেন, এরপর লোকেরা সারা রাত দ্বিধা-দ্বন্দ্বে কাটাল যে তাদের মধ্যে কাকে এই পতাকা দেওয়া হবে। তিনি বলেন, যখন সকাল হলো, তারা সবাই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট গেল। তাদের প্রত্যেকেই আশা করছিল যে তাকেই পতাকা দেওয়া হবে। তখন তিনি বললেন, "আলী ইবনে আবী তালিব কোথায়?" তারা বলল, ইয়া রাসূলাল্লাহ! তিনি তো তাঁর চোখের পীড়ায় ভুগছেন। তিনি বললেন, তার কাছে লোক পাঠাও। এরপর তাঁকে নিয়ে আসা হলো। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর দুই চোখে থুথু দিলেন এবং তাঁর জন্য দুআ করলেন। ফলে তিনি এমনভাবে সুস্থ হয়ে গেলেন যেন তাঁর আর কোনো কষ্টই ছিল না। এরপর তিনি তাঁকে পতাকা দিলেন। তখন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি কি তাদের সাথে ততক্ষণ পর্যন্ত যুদ্ধ করব যতক্ষণ না তারা আমাদের মতো হয়ে যায়? তিনি বললেন, "তুমি শান্তভাবে চলতে থাকো যতক্ষণ না তুমি তাদের মাঠে/অঙ্গনে পৌঁছাও। এরপর তাদের ইসলামের দিকে দাওয়াত দাও এবং তাদেরকে আল্লাহর যে হক তাদের ওপর ফরজ করা হয়েছে, সে বিষয়ে অবহিত করো। আল্লাহর কসম! তোমার মাধ্যমে আল্লাহ যদি একজন মানুষকেও হিদায়াত দেন, তবে তা তোমার জন্য মূল্যবান লাল উটপালের চেয়েও উত্তম হবে।"
