হাদীস বিএন


সহীহ আত তারগীব ওয়াত তারহীব





সহীহ আত তারগীব ওয়াত তারহীব (2916)


2916 - (27) [صحيح] وعن أبي هريرة رضي الله عنه؛ أنَّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم قال:
`بينما رجلٌ يمشي في حُلَّةٍ تُعْجِبُه نَفْسُه، مُرَجَّلٌ رأْسَه يَخْتالُ في مِشْيَتِه، إذْ خسَف الله بِهِ، فهو يَتَجَلْجَلُ في الأرْضِ إلى يَوْمِ القِيامَةِ`.
رواه البخاري ومسلم.
(مرجَّل) أي: ممشط.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: এক ব্যক্তি এমন সুন্দর পোশাক পরে পথ চলছিল, যা তাকে নিজের প্রতি মুগ্ধ করে তুলেছিল। তার মাথা আঁচড়ানো ছিল এবং সে অহংকারের সাথে চলতো, হঠাৎ আল্লাহ তাকে ভূ-গর্ভে ধসিয়ে দিলেন। ফলে সে কিয়ামত পর্যন্ত মাটির গভীরে তলিয়ে যেতে থাকবে। (বুখারী ও মুসলিম)









সহীহ আত তারগীব ওয়াত তারহীব (2917)


2917 - (28) [صحيح] وعن ابن عمر رضي الله عنهما؛ أنَّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم قال:
`مَنْ جَرَّ ثوبَهُ خُيَلاءَ لَمْ يَنْظُرِ الله إليهِ يوَمَ القِيامَةِ`.
فقال أبو بَكْرٍ رضي الله عنه: يا رسول الله! إنَّ إزاري يَسْتَرْخي، إلا أنْ أتَعاهَدَهُ؟ فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم:
`إنَّكَ لَسْتَ مِمَّنْ يَفْعَلُه خُيَلاءَ`.
رواه مالك والبخاري -واللفظ له، وهو أتم-، ومسلم والترمذي والنسائي.
وتقدم في `اللباس` أحاديث منها هذا، [18/ 1].




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “যে ব্যক্তি অহংকারবশত নিজের কাপড় টেনে নিয়ে চলে, কিয়ামতের দিন আল্লাহ তার দিকে (দয়ার দৃষ্টিতে) তাকাবেন না।” তখন আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে আল্লাহর রসূল! আমার লুঙ্গি (বা ইযার) ঢিলে হয়ে যায়, যদি না আমি তার প্রতি খেয়াল রাখি? তখন আল্লাহর রসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাকে বললেন: “নিশ্চয়ই আপনি তাদের অন্তর্ভুক্ত নন, যারা অহংকারবশত এটি করে থাকে।”









সহীহ আত তারগীব ওয়াত তারহীব (2918)


2918 - (29) [صحيح] وعن ابن عمرَ رضي الله عنهما قال: سمعتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يقولُ:
`مَنْ تَعظَّم في نَفْسِه أوِ اخْتَال في مِشْيَتِه؛ لَقِي الله تبارك وتعالى وهو عليه غَضْبانُ`.
رواه الطبراني في `الكبير` -واللفظ له، ورواته محتج بهم في `الصحيح`-، والحاكم بنحوه وقال:
صحيح على شرط مسلم(1).




ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি:
“যে ব্যক্তি নিজের মধ্যে অহংকার করে অথবা অহংকারভরে (গর্বিতভাবে) হাঁটে, সে আল্লাহ তাবারাকা ওয়া তাআলার সাথে এমন অবস্থায় সাক্ষাৎ করবে যে, তিনি তার প্রতি রাগান্বিত থাকবেন।”









সহীহ আত তারগীব ওয়াত তারহীব (2919)


2919 - (30) [صحيح لغيره] وعن خوْلَةَ بنْتِ قيْسٍ رضي الله عنها؛ أنَّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم قال:
`إذا مشَتْ أُمَّتي المُطَيْطاءَ، وخَدمَتْهُمْ فارِسُ والرومُ، سُلِّطَ بعضُهُمْ على بعْضٍ`.
رواه ابن حبان في `صحيحه`.




খাওলা বিনত কায়স (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “যখন আমার উম্মত অহংকারভরে (দোলা দিয়ে) হাঁটবে এবং পারস্য ও রোম (সাম্রাজ্য) তাদের খেদমত করবে, তখন আল্লাহ তাদের এক দলকে আরেক দলের উপর কর্তৃত্ব দেবেন (তাদেরকে পারস্পরিক যুদ্ধে জড়িয়ে দেবেন)।”









সহীহ আত তারগীব ওয়াত তারহীব (2920)


2920 - (31) [صحيح لغيره] ورواه الترمذي وابن حبان أيضاً من حديث ابن عمر.
(المُطَيْطاءَ) بضم الميم وفتح الطاءين المهملتين بينهما ياء مثناة تحت ممدوداً ويقصر: هو التبختر ومد اليدين في المشي.




২৯২০ - (৩১) [সহীহ লি-গাইরিহি]। ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস সূত্রে এটিকে (এই হাদীসটিকে) ইমাম তিরমিযী এবং ইবনু হিব্বানও বর্ণনা করেছেন।
(আল-মুতায়তা) শব্দটি মীম-এ পেশ এবং দুইটি 'ত্বা'-এ ফাতহা সহযোগে গঠিত, যার মাঝখানে দীর্ঘ ও সংক্ষিপ্ত উভয়ভাবেই উচ্চারিত হওয়ার যোগ্য ইয়া রয়েছে: এর অর্থ হলো অহংকারের সাথে চলা এবং হাঁটার সময় দু'হাত লম্বা করে নাড়া।









সহীহ আত তারগীব ওয়াত তারহীব (2921)


2921 - (32) [حسن لغيره] وعن أنسٍ رضي الله عنه قال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم:
`لَوْ لَمْ تُذْنِبوا لخَشيتُ علَيْكُم ما هو أكَبَرُ منْهُ؛ العُجْبُ`.
رواه البزار بإسناد جيد.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যদি তোমরা গুনাহ না করতে, তবে আমি তোমাদের জন্য এর চেয়েও বড় কিছুর ভয় করতাম; তা হলো আত্মগর্ব।"









সহীহ আত তারগীব ওয়াত তারহীব (2922)


2922 - (33) [حسن صحيح] وعن أبي هريرة رضي الله عنه؛ أنَّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم قال:
`لَينْتَهِيَنَّ أقْوامٌ يفْتَخِرونَ بآبائِهِمُ الَّذين مَاتوا، إنَّما هم فَحْمُ جَهَّنم، أو
لَيكونُنَّ أهْونَ على الله مِنَ الجُعَلِ الذي يُدَهْدهُ الخُرْءَ بأنْفِهِ، إنَّ الله [قد](1) أذْهَبَ عنكم عُبِّيَّةَ الجاهِليَّةِ وفَخْرَها بالآباءِ، إنَّما هو مؤمِنٌ تَقِيٌّ، وفاجِرٌ شَقِيٌّ، الناسُ [كلُّهُمْ](2) بنو آدَمَ، وآدَمُ خُلِقَ مِنَ التُّرابِ`.
رواه أبو داود، والترمذي واللفظ له، وقال:
`حديث حسن`.
وستأتي أحاديث من هذا النوع في `الترهيب من احتقار المسلم`، إن شاء الله.
(الجُعَلُ) بضم الجيم وفتح العين المهملة: هو دويبة أرضية.
(يُدَهْدِهُ) أي: يدحرج؛ وزنه ومعناه.
و (العُبِّيَّةُ) بضم العين المهملة وكسرها وتشديد الباء الموحدة وكسرها وبعدها ياء مثناة تحت مشددة أيضاً: هي الكبر والفخر والنخوة.
‌‌23 - (الترهيب من قوله لفاسق أو مبتدع: يا سيدي، أو نحوها من الكلمات الدالة على التعظيم).




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত যে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: অবশ্যই লোকেরা তাদের মৃত পূর্বপুরুষদের নিয়ে গর্ব করা থেকে বিরত থাকবে। কেননা তারা তো জাহান্নামের অঙ্গার। নতুবা তারা আল্লাহ্‌র কাছে ওই গোবরে পোকা থেকেও বেশি নিকৃষ্ট হয়ে যাবে, যা তার নাক দিয়ে গোবর ঠেলে নিয়ে যায়। নিশ্চয়ই আল্লাহ তোমাদের থেকে জাহেলিয়াতের অহংকার এবং পূর্বপুরুষদের নিয়ে গর্ব করার প্রবণতা দূর করে দিয়েছেন। মানুষ হয় মু'মিন, মুত্তাকী; নয়তো ফাসিক, হতভাগা। সকল মানুষ আদম (আঃ)-এর সন্তান, আর আদম (আঃ) মাটি থেকে সৃষ্ট।









সহীহ আত তারগীব ওয়াত তারহীব (2923)


2923 - (1) [صحيح] عن بريدة رضي الله عنه قال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم:
`لا تقولوا للْمنافِقِ: سَيِّداً، فإنَّه إنْ يَكُ سَيِّداً؛ فقدْ أسْخَطْتُم ربَّكم عز وجل`.
[صحيح لغيره] رواه أبو داود والنسائي بإسناد صحيح، والحاكم، ولفظه قال:
`إذا قال الرجلُ للْمنافِقِ: يا سيِّد! فقدْ أغْضَبَ ربَّه`.
وقال: `صحيح الإسناد`. كذا قال(1).
‌‌24 - (الترغيب في الصدق، والترهيب من الكذب).




বুরাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা কোনো মুনাফিককে (কপট ব্যক্তিকে) 'সাইয়্যিদ' (সরদার বা নেতা) বলো না। কেননা, যদি সে সত্যিই নেতা হয়, তবে তোমরা তোমাদের প্রতিপালক পরাক্রমশালী ও মহিমান্বিত আল্লাহকে অসন্তুষ্ট করে দিলে।"









সহীহ আত তারগীব ওয়াত তারহীব (2924)


2924 - (1) [صحيح] عن عبد الله بن كعب بن مالكٍ قال:
سمعتُ كَعْبَ بنَ مالك يُحدِّثُ حديثَهُ حينَ تخلَّفَ عَنْ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم في غزْوَةِ (تبوك)، قال كعبُ بْنُ مالك:
لَمْ أتَخلَّفْ عنْ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم في غَزْوَةٍ غَزاها قَطُّ إلا في غَزْوَةِ (تَبوك)، غيرَ أنِّي قد تخلَّفتُ في غزْوَةِ (بَدْرٍ)، ولَمْ يُعاتِبْ أَحداً تَخلَّفَ عنْها، إنَّما خَرَج رسولُ الله صلى الله عليه وسلم والمسلمون يريدونَ عِيرَ قُريشٍ، حتَّى جمَعَ الله بيْنَهُمْ وبينَ عَدوِّهم على غير ميعاد، ولقدْ شَهِدْتُ معَ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم ليلةَ العقَبةِ حين تَواثَقْنا على الإسْلامِ، وما أُحِبُّ أنَّ لي بها مَشهدَ (بَدْرٍ)، وإنْ كانَتْ (بَدْرُ) أَذْكَرُ في الناسِ مِنْها.
وكانَ مِنْ خَبري حينَ، تخَلَّفْتُ عن رسولِ الله صلى الله عليه وسلم في(1) غزوَةِ (تبوك) أنِّي لَم أَكُنْ قَطُّ أَقْوى ولا أيْسَرَ مِنِّي حينَ تَخلَّفْتُ عنه في تِلكَ الغَزْوةِ، والله ما جَمَعْتُ قبلها راحِلَتَيْنِ قَطُّ، حتى جمعتُهما في تلكَ الغَزْوَةِ، -ولَمْ يكُنْ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يريدُ غزوةً إلا وَرَّى(2) بِغَيْرِها حتَّى كانَتْ تِلْكَ الغزوة-(3) فغَزاها رسولُ الله صلى الله عليه وسلم في حرٍّ شَديدٍ، واسْتَقْبَل سَفَراً بَعيداً ومَفازاً، واسْتقْبلَ عَدُوّاً كثيراً، فَجَلَى لِلْمُسْلِمينَ أمرَهُمْ؛ ليتَأهَّبُوا أُهْبَةَ غَزْوِهْم، وأخْبَرهُمْ بَوجْهِهِمُ الَّذي يُريدُ، والمسلمونَ مَع رسولِ الله صلى الله عليه وسلم كثيرٌ، ولا يَجْمَعُهم كتابٌ حافِظٌ
-يريد بذلك الديوانَ-، قال كعبٌ: فَقَلَّ رجل يريدُ أنْ يَتَغَيَّبَ إلا ظَنَّ(1) أنَّ ذلك سَيَخْفَى [له] ما لَمْ يَنْزِلْ فيهِ وَحْيٌ مِنَ الله عز وجل.
وغَزا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم تلكَ الغزوةَ حينَ طابَتِ الثمارُ والظلالُ، فأنا إليْها أَصْعَرُ(2)، فتَجهَّزَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم والمسلمون مَعَهُ، وطَفِقْتُ أَغدو لِكَيْ أتَجَهَّزَ مَعهُمْ، فأرْجعُ ولَمْ أَقْضِ مِنْ جهازِي شَيْئاً، وأَقُولُ في نفسي: أنا قادِرٌ على ذلك إذا أرَدْتُ، فلَمْ يَزَلْ ذلك يتَمادى بِي حتَّى اسْتَمَرَّ بالناسِ الجِدُّ، فأصْبَح رسولُ الله صلى الله عليه وسلم غادِياً والمسلمونَ معَهُ ولَمْ أقْضِ مِنْ جَهازي شيْئاً، ثُمَّ غدوْتُ فرجَعْتُ ولَمْ أقْضِ شَيْئاً، فَلَمْ يَزَلْ ذلك يَتَمادى بي حتَّى أسْرعوا وتَفَارَطَ(3) الغَزْوُ، فَهَمَمْتُ أنْ أرْتَحِلَ فأدْرِكَهم، -فيا لَيْتَني فعلْتُ- ثُمَّ لَمْ يُقدَّرْ لي ذلك.
وطفِقْتُ إذا خَرجْتُ في الناسِ بعدَ خُروجِ رَسولِ الله صلى الله عليه وسلم يَحْزُنُني أَنِّي لا أرى لي أُسْوَةً إلا رَجُلاً مَغْموصاً(4) عليه في النِّفاقِ، أو رَجُلاً مِمَّنْ عَذر الله مِنَ الضُعفَاءِ، ولَمْ يَذْكُرْني رسولُ الله صلى الله عليه وسلم حَتَّى بلَغَ (تبوكَ)، فقالَ وهو جالِسٌ في القْوِم بـ (تبوك):
`ما فَعَلَ كَعْبُ بنُ مالكٍ؟ `،
فقالَ رجلٌ مِنْ بَني سَلِمَةَ: يا رَسولَ الله! حبَسهُ بُرْداهُ، والنَّظرُ في عِطْفَيْهِ.
فقال له معاذُ بْنُ جَبلٍ: بئْسَ ما قُلْتَ، والله يا رسولَ الله! ما علِمْنا عليهِ إلا خَيْراً. فسكَتَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، فبيَنْا هو على ذلك رأى رجُلاً مُبَيِّضاً يزولُ
به السَّرابُ، فقال رسولُ اللهُ صلى الله عليه وسلم:
`كُنْ أبا خَيْثَمَة`.
فإذا هو أبو خَيْثَمِةَ الأنْصارِيّ، وهو الذي تَصدَّقَ بصاعِ التمْرِ حينَ لَمَزَه المُنافِقونَ.
قال كعبٌ: فلمَّا بلَغني أنَّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم قد تَوجَّه قافِلاً مِنْ (تبوك) حَضَرني بَثِّي، فطَفِقْتُ أتَذكر الكَذِبَ، وأقولُ: بِمَ أَخْرُج مِنْ سخَطِه غَداً؟ وأسْتَعينُ على ذلك بِكُلِّ ذي رأيٍ مِنْ أَهْلي، فلمَّا قيل: إنَّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم قد أظلَّ(1) قادِماً، زاحَ عنِّي الباطِلُ، حتَّى عَرَفْتُ أنِّي لَنْ أنْجُوَ منهُ بِشَيْءٍ أَبداً، فأجْمَعْتُ صِدْقَهُ.
وأصَبح رسولُ الله صلى الله عليه وسلم قادِماً، وكانَ إذا قدِمَ مِنْ سَفَرٍ بدأ بالمسْجِدِ فركَع فيه ركْعَتين، ثُمَّ جلَس لِلناسِ، فلمَّا فَعلَ ذلك جاءَه المخلَّفون، فَطفِقوا يَعْتَذِرونَ إليه وَيحْلِفونَ له، وكانوا بِضْعَةً وثَمانينَ رجُلاً، فَقبِلَ مِنْهُمْ علانِيَتَهُمْ، وبايَعَهُمْ واسْتَغْفَر لَهُمْ، ووَكَلَ سَرائِرَهُمْ إلى الله، حتَّى جِئْتُ، فلمَّا سَلَّمْتُ تَبَسَّمَ تَبسُّمَ المُغْضَبِ ثُمَّ قال:
`تعالَ`. فجئْتُ أمْشي حتى جَلَسْتُ بيْنَ يديْهِ، فقال لي:
`ما خَلَفكَ؟ ألَمْ تَكُنْ قد ابْتَعْتَ ظَهْرَكَ؟ `.
قلتُ: يا رسول الله! إنِّي والله لو جلَسْتُ عندَ غيرِكَ مِنْ أهْل الدنيا لرأَيْتُ أنِّي سَأخْرُج مِنْ سخَطِهِ بِعُذْرٍ، ولقدْ أُعطِيْتُ جَدلاً، ولكنِّي والله لقدْ علِمْتُ لَئْن حدَّثْتُكَ اليومَ حَديثَ كذبٍ ترضَى به عنِّي؛ ليوشِكنَّ اللهُ أن يُسْخِطكَ عليَّ، ولَئِنْ حدَّثتْكُ حديثَ صدق تَجِدُ عليَّ فيه؛ إنّي لأَرْجو فيه عُقْبى الله عز وجل -في رواية: عفو الله- والله ما كانَ لي مِنْ عُذْرٍ، ما كنْتُ قَطُّ أَقْوى
ولا أَيْسَر مِنِّي حين تَخلَّففْتُ عنكَ. قال: فقالَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم:
`أمَّا هذا فَقدْ صدَقَ، فَقُمْ حتى يَقْضِيَ الله فيكَ`.
فقُمْتُ، وثارَ رِجالٌ مِنْ بني سَلِمَةَ فاتَّبعوني فقالوا: والله ما علمْناكَ أذْنَبْتَ ذَنْباً قبلَ هذا، لقدْ عَجَزْتَ في أنْ لا تكونَ اعتذرْتَ إلى رسولِ الله صلى الله عليه وسلم بِما اعْتَذَر [به] إليْهِ المُخلَّفونَ! فقدْ كان كافيكَ ذَنْبَكَ استغفارُ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم لَكَ، قال: فوالله ما زالوا يُؤَنِّبونَني حتَّى أرَدْتُ أنْ أرْجعَ إلى رسولِ الله صلى الله عليه وسلم فأُكَذِّب نفسي. قال: ثمَّ قلتُ لهمْ: هَلْ لَقِيَ هذا مَعي أحَدٌ؟ قالوا: نَعَمْ، لَقِيَهُ معكَ رَجلانِ قالا مثلَ ما قُلْتَ، فقيلَ لَهُما مثلَ ما قيلَ لكَ. قال: قلتُ مَنْ هُما؟ قالوا: مُرارَةُ بْنُ رَبيعَةَ العامِريّ(1) وهِلالُ بْنُ أُميَّةَ الواقِفيّ. قال: فذكروا لي رَجُلَيْنِ صالِحينِ قد شَهِدا (بَدْراً) فيهما أُسْوَةٌ. قال: فَمضَيْتُ حينَ ذَكروهُما لي.
قال: ونَهى رسولُ الله صلى الله عليه وسلم المسلمينَ عَنْ كلامِنا أيُّها الثَلاثةُ مِنْ بينِ مَنْ تَخلَّفَ عنه. قال: فاجْتَنَبَنَا الناسُ، وقال: تَغَيَّروا لنا حتّى تَنَكَّرَتْ لي في نفسي الأرْضُ، فما هِيَ بالأرضِ التي أعْرِفُ. فلَبثْنا على ذلك خَمْسينَ لَيلَةً، فأمَّا صاحِبايَ فاسْتكانا وقَعَدا في بُيوتِهِما يَبْكِيانِ، وأمَّا أنا فكُنْتُ أَشَبَّ القومِ وأجلدَهُم، فكنتُ أَخْرجُ فأشْهَدُ الصلاةَ وأطوفُ في الأسْواقِ، ولا يُكَلِّمُني أحَدٌ، وآتي رسولَ الله صلى الله عليه وسلم وهو في مَجْلسِه بعدَ الصلاةِ فأُسَلِّمُ(2)، فأقولُ في نَفْسي: هلْ حَرَّكَ شَفَتَيْهِ بِرَدِّ السلام أمْ لا؟ ثُمَّ أُصلِّي قريباً منه وأسارِقُهُ النظَر، فإذا أقْبَلْتُ على صلاتي نَظَر إليَّ، فإذا التفَتُّ نحوَهُ أعْرضَ عنِّي، حتَّى إذا
طالَ عليَّ ذلك مِنْ جَفْوَة المسلمين مَشَيْتُ حتى تَسوَّرْتُ جِدارَ حائطِ أبي قَتادةَ، وهو ابْنُ عمِّي، وَأحَبُّ الناسِ إليَّ، فسلَّمْتُ عليه، فَوالله مال رَدَّ عليَّ السلام، فقلتُ له: يا أبا قتادة! أَنْشُدُكَ بالله! هل تَعْلِّمُني أنِّي أُحِبُّ الله ورسولَه؟ قال: فَسكتَ. فعُدْتُ فناشَدْتُه، فسكَتَ، فعُدْتُ فناشَدْتُه، فقال: الله ورسولُه أَعْلَمُ. فَفاضتْ عينايَ، وتَولَّيْتُ حتَّى تَسوَّرْتُ الجِدارَ.
فبينا أنا أمْشي في سوقِ المَدينَة إذا نَبَطِيٌّ مِنْ أنْباطِ أهْلِ الشامِ، مِمَّنْ قَدِمَ بطعام يبيعُه بالمدينَة يقولُ: مَنْ يَدُلُّ على كعْبِ بْنِ مالكٍ؟ قال: فطَفَقَ الناسُ يُشيرونَ لَهُ إليَّ حتَّى جاءَني فدَفَع إليَّ كتاباً مِنْ مَلِك غَسَّانَ، وكنْتُ كاتِباً فقَرأْتُه، فإذا فيه: أمَّا بَعْدُ فإنَّهُ قد بلَغَنا أن صاحِبَكَ قد جَفاك، ولَمْ يَجْعَلْكَ الله بدارِ هَوانٍ ولا مَضْيَعةٍ، فالْحَقْ بِنا نواسِكَ، قال: فَقُلْتُ حين قَرْأتُها: وهذه أيْضاً مِنَ البَلاءِ، فَتَيمَّمْتُ(1) بها التَنُّورَ فَسَجرْتُها [بها]، حتَّى إذا مَضَتْ أرْبَعونَ مِنَ الخَمْسينَ، واسْتَلْبَثَ الوَحْيُ إذا [رسولُ] رسول الله صلى الله عليه وسلم يَأْتيني، فقالَ: إنَّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يَاْمُرك أَنْ تَعْتَزِلَ امْرأَتَك. قال: فقلتُ: أُطَلِّقُها أمْ ماذا أفْعَل؟ قال: لا، بَلِ اعْتَزِلْها فلا تَقْرَبَنَّها، وأرْسَل إلى صاحِبيَّ بِمْثلِ ذلك.
قال: فقلتُ لامْرَأتي: الْحَقي بأَهْلِكِ فكوني عندَهُمْ حتى يَقْضِيَ الله في هذا الأَمْرِ. قال: فجاءَتِ امْرأَةُ هِلالِ بْنِ أمَيَّةَ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم فقالَتْ: يا رسولَ الله! إنَّ هلالَ بْنَ أُمَيَّةَ شيخٌ ضَائعٌ؛ ليسَ له خادِمٌ، فهل تَكْرَهُ أنْ أخْدِمَهُ؟ قال:
`لا، ولكِنْ لا يَقْرَبَنَّكِ`.
قالتْ: إنَّه والله ما بِه حَركَةٌ إليَّ، ووالله ما زالَ يَبْكي مُنْذُ كانَ مِنْ أمْرِه ما كانَ إلى يَوْمِه هذا.
قال: فقال لي بعضُ أهْلي: لوِ اسْتَأْذَنْتَ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم[في امرأتك] فقد أَذِنَ لامْرَأةِ هلالِ بْنِ أُمَيَّةَ أنْ تَخْدِمَهُ. قال: فقلتُ: لا أسْتَأْذِن فيها رسولَ الله صلى الله عليه وسلم، وما يُدْريني ما [ذا] يقولُ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم إذا اسْتَأْذَنْتُه فيها وأنا رجلٌ شاب؟ قال: فلَبِثْتُ بذلك عَشْرَ لَيالٍ، فكَمُلَ لَنا خمسونَ لَيلة مِنْ حِينِ نَهى عنْ كلامِنَا.
قال: ثمَّ صَلَّيْتُ صلاةَ الفَجْرِ صباحَ خَمْسينَ لَيلة على ظهْرِ بَيْتٍ مِنْ بيُوتِنا، فبينَا أنا جالِسٌ على الحالِ التي ذَكَرَ الله عز وجل مِنَّا، قد ضَاقَتْ عَليَّ نَفْسي وضاقَتْ عليَّ الأرْضُ بما رَحُبَتْ، سمعتُ صوتَ صارِخ أوْفَى على (سَلْع) يقولُ بأعْلى صوتِه: يا كَعْبَ بْنَ مالكٍ! أبْشِرْ. قال: فَخَررْتُ ساجِداً وعَرَفتُ أَنْ قد جاءَ فَرجٌ.
قال: فآذَنَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم الناسَ بتوبةِ الله علينا حينَ صلَّى صلاةَ الفَجْرِ، فذهَبَ الناسُ يُبَشِّرونَنا، فذَهب قِبَلَ صاحِبَيَّ مُبَشِّرونَ، ورَكض رجلٌ إليَّ فَرساً، وسَعى ساعٍ مِنْ أسْلمَ قِبَلي، وأَوْفَى على الجبَلَ، فكانَ الصوتُ أَسْرعَ مِنَ الفَرسِ، فلمَّا جاءَني الذي سمعْتُ صَوْتَهُ يُبَشِّرُني، نَزَعْتُ له ثَوْبَيَّ فكَسَوْتُهما إيَّاه بِبَشَارَتِه، والله ما أمْلكُ غيرَهُما يومَئذٍ، واسْتَعَرْتُ ثَوْبَيْن فَلَبسْتُهما. وانْطَلقْتُ أتأمَّم رسولَ الله صلى الله عليه وسلم، يَتلقَّاني الناسُ فَوْجاً فَوْجاً يُهنِّئوني بالتوبَةِ، وَيقولُونَ: لتَهنِئك توبةُ الله عليك. حتَّى دخلنا المسجدَ، فإذا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم حولَه الناسُ، فقامَ طَلْحَةُ بْنُ عُبَيْد [الله] يُهَرْوِلُ حَتّى صافَحَني وهَنَّأَنِي، والله ما قامَ إليَّ رجلٌ مِنَ المهاجِرينَ غيرُه، قال: فكان كَعْبٌ
لا يَنْساها لِطَلْحَةَ، قال كَعْبٌ: فلمَّا سَلَّمْتُ على رسولِ الله صلى الله عليه وسلم قال: وهو يبرُقُ وَجهُهُ مِنَ السرورِ:
`أبْشِرْ بخيرِ يَوْمٍ مَرَّ عليكَ منْذُ وَلَدتْكَ أُمُّكَ`.
قال: فقُلْتُ: أمِنْ عِنْدِكَ يا رسولَ الله! أمْ مِنْ عِنْدِ الله؟ قال:
`بَلْ مِنْ عندِ الله`.
وكانَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم إذا سُرَّ اسْتَنارَ وَجْهُهُ، حتى كأنَّ وجههُ قِطْعَةُ قَمَرٍ، قال: وكنَّا نَعْرِف ذلك مِنْهُ. قال: فلمَّا جَلستُ بينَ يَديْهِ؛ قلتُ: يا رسولَ الله! إنَّ مِنْ توبَتي أنْ أَنْخَلعَ مِنْ مالي صَدَقةً إلى الله وإلى رسولهِ. فقال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم:
`أمْسِكْ عليكَ بَعْض مالِكَ، فهوَ خَيْرٌ لكَ`.
قال: فقلْتُ: فإنِّي أمسِكُ سَهْميَ الذي بخَيْبَر. قال: وقلتُ: يا رسولَ الله! إنَّما أنْجاني الله بالصدْقِ، وإنَّ مِنْ تَوْبَتي أنْ لا أُحدِّثَ إلا صِدْقاً ما بَقيتُ.
قال: فَوَالله ما علمْتُ [أن] أحداً [من السلمين] أبْلاهُ الله في صِدْقِ الحَديثِ مُنْذ ذكرتُ ذلك لِرَسول الله صلى الله عليه وسلم[إلى يومي هذا] أحْسَنَ ممَّا أبْلاني الله [به]، والله ما تَعمَّدْتُ كَذبةً منذ قلتُ ذلك لرَسولِ الله صلى الله عليه وسلم إلى يومي هذا، وإنِّي لأَرْجو أنْ يَحْفَظني اللَّه فيما بَقِيَ.
قال: فَأنْزلَ الله عز وجل: {لَقَدْ تَابَ اللَّهُ عَلَى النَّبِيِّ وَالْمُهَاجِرِينَ وَالْأَنْصَارِ الَّذِينَ اتَّبَعُوهُ فِي سَاعَةِ الْعُسْرَةِ}، حتى بلَغَ {إِنَّهُ بِهِمْ رَءُوفٌ رَحِيمٌ (117) وَعَلَى الثَّلَاثَةِ الَّذِينَ خُلِّفُوا حَتَّى إِذَا ضَاقَتْ عَلَيْهِمُ الْأَرْضُ بِمَا رَحُبَتْ}، حتى بلَغَ {[يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا] اتَّقُوا اللهَ وَكُونُوا مَعَ الصَّادِقِينَ}.
قال كعبْ: والله ما أنْعَم الله على مِنْ نِعْمَةٍ قَطُّ بعدَ إذْ هَداني الله للإِسْلامِ أَعْظَمَ في نفْسي مِنْ صدْقي لِرَسولِ الله صلى الله عليه وسلم أنْ لا أكونَ كَذَبْتُهُ فأهْلِكَ كما
هَلَك الذين كَذبوا، إنَّ الله قال لِلَّذين كَذَّبوا حينَ أَنْزلَ الوحَي شَرَّ ما قالَ لأَحدٍ، فقال: {سَيَحْلِفُونَ بِاللَّهِ لَكُمْ إِذَا انْقَلَبْتُمْ إِلَيْهِمْ لِتُعْرِضُوا عَنْهُمْ فَأَعْرِضُوا عَنْهُمْ إِنَّهُمْ رِجْسٌ وَمَأْوَاهُمْ جَهَنَّمُ جَزَاءً بِمَا كَانُوا يَكْسِبُونَ (95) يَحْلِفُونَ لَكُمْ لِتَرْضَوْا عَنْهُمْ فَإِنْ تَرْضَوْا عَنْهُمْ فَإِنَّ اللَّهَ لَا يَرْضَى عَنِ الْقَوْمِ الْفَاسِقِينَ}.
قال كَعْبٌ: كنَّا خُلِّفْنا أيُّها الثَلاثَةُ عَنْ أمْرِ أولئكَ الذين قَبِلَ منهمْ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم حينَ حَلَفوا له، فبايَعَهُمْ واسْتَغْفَر لَهُمْ، وأَرْجأَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم أَمْرَنا حتَّى قَضَى الله تعالى فيه، فبذلك(1) قال الله عز وجل: {وَعَلَى الثَّلَاثَةِ الَّذِينَ خُلِّفُوا} وليسَ الذي ذكَره مما خُلِّفَنا تَخَلُّفُنا عَنِ الغَزْوِ، وإنَّما هو تَخْليفُه إيَّانا، وإرْجَاؤه أَمْرَنا عَمَّنْ حَلَف له واعْتَذَرَ إليه، فقَبِلَ مِنْهُ`.
رواه البخاري، ومسلم، واللفظ له.
ورواه أبو داود والنسائي بنحوه مفرقاً مختصراً.
وروى الترمذي قطعة من أوله ثم قال: `وذكر الحديث`.
قوله: (وَرَّى) عن الشيء: إذا ذكره بلفظ يدل عليه أو على بعضه دلالة خفية عند السامع.
(المَفَازُ) والمفازة هي: الفلاة لا ماء بها.
(يَتَمادَى بي) أي: يتطاول ويتأخر.
وقوله: (تَفَارَطَ الغزو) أي: فات على من أراده وَبَعُدَ عليه إدراكه.
(المَغْمُوْضُ) بالغين والضاد المعجمتين(2): هو المعيب المشار إليه بالعيب.
(ويزولُ به السَّرابُ) أي: يظهر شخصه خيالاً فيه.
(أوْفَى على سَلْعٍ) أي: طلع عليه. و (سلع): جبل معروف في أرض المدينة.
(أُيَمِّمُ) أي: أقصد.
(أرجأ أمرنا): أخره، والإرجاء: التأخير.
وقوله: (فأنا إليه أَصْعَر) بفتح الهمزة والعين المهملة جميعاً، وسكون الصاد المهملة: أي أميل إلى البقاء فيها واشتهي ذلك؛ و (الصعر): الميل، وقال الجوهري: في الخد خاصة.




কা'ব ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন:

আবদুল্লাহ ইবনে কা’ব ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমি কা’ব ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে তাঁর সেই ঘটনা বর্ণনা করতে শুনেছি, যখন তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাথে তাবুক যুদ্ধে অংশগ্রহণ করা থেকে পিছিয়ে পড়েছিলেন। কা'ব ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কোনো যুদ্ধে আমি কখনও পিছনে পড়ে যাইনি, শুধু তাবুক যুদ্ধ ছাড়া। তবে আমি বদরের যুদ্ধেও অনুপস্থিত ছিলাম, কিন্তু যারা সেই যুদ্ধে পিছিয়ে পড়েছিল, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের কাউকে তিরস্কার করেননি। কারণ, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ও মুসলিমগণ কুরাইশদের বাণিজ্য কাফেলার খোঁজে বের হয়েছিলেন, কিন্তু আল্লাহ্ তাদের ও তাদের শত্রুদের মাঝে পূর্বনির্ধারিত সময় ছাড়াই মোকাবিলা ঘটিয়ে দেন। আমি আকাবার রাতে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সঙ্গে উপস্থিত ছিলাম, যখন আমরা ইসলামের ওপর দৃঢ় অঙ্গীকারবদ্ধ হয়েছিলাম। বদরের যুদ্ধে হাজির থাকার বিনিময়ে আমি সেই রাতে উপস্থিতির মর্যাদা হারাতে চাই না, যদিও মানুষের কাছে বদরের ঘটনা আকাবার রাতের চেয়ে বেশি আলোচিত।

তাবুক যুদ্ধে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে আমার পিছনে থাকার ঘটনাটি ছিল এই যে, আমি সে সময় সবচেয়ে শক্তিশালী ও সামর্থ্যবান ছিলাম। আল্লাহর কসম! এর আগে আমার কখনও দু'টি আরোহী প্রাণী ছিল না, কিন্তু সেবার আমার দু'টি আরোহী প্রাণী ছিল।

—রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কোনো যুদ্ধের ইচ্ছা করলে, অন্য কিছু দ্বারা তা গোপন রাখতেন, যতক্ষণ না এই যুদ্ধটি সামনে আসে— (কারণ এটা বিশাল যুদ্ধ)। তিনি এই যুদ্ধ শুরু করেছিলেন তীব্র গরমে, বহু দূরের সফর ও মরুভূমি অতিক্রমের মুখে, এবং প্রচুর সংখ্যক শত্রুর মোকাবিলায়। তাই তিনি মুসলিমদের সামনে তাদের গন্তব্য স্পষ্ট করে দিয়েছিলেন, যাতে তারা যুদ্ধের জন্য প্রয়োজনীয় প্রস্তুতি নিতে পারে এবং তিনি তাদের জানিয়ে দিয়েছিলেন যে, তিনি কোন দিকে যাচ্ছেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সঙ্গে মুসলিমদের সংখ্যা ছিল অনেক, কিন্তু তাদের নাম কোনো রেজিস্টারে লেখা হতো না (অর্থাৎ সংখ্যা গণনা করা কঠিন ছিল)। কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: যে কেউ অনুপস্থিত থাকতে চাইত, সে মনে করত যে, যদি আল্লাহ তাআলার পক্ষ থেকে তার ব্যাপারে কোনো ওহী না আসে, তবে তার অনুপস্থিতি গোপন থাকবে।

রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এই যুদ্ধে এমন সময়ে যাত্রা করলেন যখন ফল ও ছায়াগুলো সুস্বাদু ছিল, তাই আমি সেগুলোর প্রতি বেশি আকৃষ্ট ছিলাম। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ও তাঁর সঙ্গে থাকা মুসলিমগণ প্রস্তুতি নিতে লাগলেন। আমি তাদের সাথে প্রস্তুতি নেওয়ার জন্য সকালে যেতাম, কিন্তু ফিরে আসতাম আর কোনো সরঞ্জাম গুছাতাম না। আমি মনে মনে বলতাম: আমি যখন চাইব, তখনই প্রস্তুত হতে পারব। এভাবেই দীর্ঘসূত্রিতা চলতে থাকল, এমনকি মুসলিমরা চূড়ান্ত প্রস্তুতি নিয়ে ফেললেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুসলিমদের সাথে সকালে রওনা হয়ে গেলেন, অথচ আমি আমার কোনো প্রস্তুতিই সম্পন্ন করিনি। এরপর সকালে বের হয়ে ফিরে আসতাম এবং কোনো প্রস্তুতিই নিতে পারতাম না। এভাবে আমার দীর্ঘসূত্রিতা চলতে থাকল, আর মুসলিমরা দ্রুত গতিতে চলে গেলেন এবং যুদ্ধ অনেক দূরে এগিয়ে গেল। আমি তখন রওনা হয়ে তাদের সাথে মিলিত হওয়ার সংকল্প করলাম— হায়! যদি তা করতাম!—কিন্তু তা আমার ভাগ্যে জোটেনি।

রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) চলে যাওয়ার পর আমি যখন মানুষের মধ্যে বের হতাম, তখন আমার কষ্ট লাগতো এই দেখে যে, আমার কোনো সঙ্গী নেই, কেবল সেই লোক ছাড়া, যার ওপর মুনাফিকের কলঙ্ক আরোপ করা হয়েছে, অথবা সেই দুর্বল লোক ছাড়া, যাদেরকে আল্লাহ্ (পিছনে থাকার) অনুমতি দিয়েছেন।

রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাবুকে পৌঁছার আগ পর্যন্ত আমার কথা উল্লেখ করেননি। তিনি তাবুকে লোকদের মাঝে বসা অবস্থায় জিজ্ঞাসা করলেন: "কা'ব ইবনে মালিক কী করল?" বনি সালামা গোত্রের এক ব্যক্তি বলল: "হে আল্লাহর রাসূল! তার চাদর এবং নিজের সৌন্দর্যের দিকে তাকানোই তাকে আটকে রেখেছে।" তখন মুআয ইবনে জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে বললেন: "তুমি খুবই খারাপ কথা বলেছ! আল্লাহর কসম, হে আল্লাহর রাসূল! আমরা তার ব্যাপারে ভালো ছাড়া আর কিছুই জানি না।" রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নীরব রইলেন। এই আলোচনার মধ্যেই তিনি এক ব্যক্তিকে দেখলেন, যার সাদা পোশাককে মরীচিকা দুলিয়ে দিচ্ছে। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যদি সে আবু খাইসামা হয়!" আর সে ছিল আবু খাইসামা আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), সেই ব্যক্তি যিনি এক সা’ খেজুর সদকা করেছিলেন, যখন মুনাফিকরা তাকে নিয়ে উপহাস করেছিল।

কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: যখন আমার কাছে এই খবর পৌঁছল যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাবুক থেকে প্রত্যাবর্তন করে ফিরে আসছেন, তখন আমার দুশ্চিন্তা বেড়ে গেল। আমি মিথ্যা অজুহাত চিন্তা করতে লাগলাম এবং বলতে লাগলাম: আগামীকাল আমি কীভাবে তাঁর ক্রোধ থেকে বাঁচব? আমি এ ব্যাপারে আমার পরিবারের প্রতিটি বিচক্ষণ ব্যক্তির সাহায্য চাইলাম। কিন্তু যখন বলা হলো যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একেবারে কাছে চলে এসেছেন, তখন আমার মন থেকে বাতিল (মিথ্যা অজুহাত) দূর হয়ে গেল, এমনকি আমি নিশ্চিত হলাম যে, সত্য ছাড়া কোনো কিছুতেই আমি আর রক্ষা পাব না। তাই আমি সত্য বলার সিদ্ধান্ত নিলাম।

পরের দিন সকালে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফিরে আসলেন। তিনি যখন কোনো সফর থেকে ফিরতেন, তখন প্রথমে মসজিদে গিয়ে দু'রাকাত সালাত আদায় করতেন, তারপর মানুষের জন্য বসতেন। তিনি যখন তা করলেন, তখন অনুপস্থিত থাকা লোকেরা (মুনাফিকরা) তাঁর কাছে এলো এবং অজুহাত পেশ করতে লাগল এবং তাঁর সামনে কসম করতে লাগল। তারা ছিল আশি জনের কিছু বেশি। তিনি প্রকাশ্যে তাদের অজুহাত মেনে নিলেন, তাদের বাইয়াত গ্রহণ করলেন, তাদের জন্য ক্ষমা চাইলেন এবং তাদের ভেতরের বিষয় আল্লাহর কাছে সোপর্দ করলেন। এরপর আমি আসলাম। যখন আমি সালাম দিলাম, তখন তিনি ক্রুদ্ধ ব্যক্তির হাসি হেসে বললেন: "এগিয়ে এসো।" আমি হেঁটে তাঁর সামনে গিয়ে বসলাম। তিনি আমাকে বললেন: "তুমি কেন পিছনে রইলে? তুমি কি তোমার আরোহী প্রাণী সংগ্রহ করোনি?" আমি বললাম: "হে আল্লাহর রাসূল! আল্লাহর কসম! আমি যদি দুনিয়াবাসীর অন্য কারও সামনে বসতাম, তবে আমি মনে করতাম যে, কোনো অজুহাত দিয়ে আমি তার ক্রোধ থেকে মুক্ত হয়ে আসবই। কেননা, আমাকে বাকপটুতা দেওয়া হয়েছে। কিন্তু আল্লাহর কসম, আমি নিশ্চিতভাবে জানি যে, যদি আজ আমি আপনার কাছে কোনো মিথ্যা কথা বলি, যাতে আপনি আমার প্রতি সন্তুষ্ট হন, তবে শীঘ্রই আল্লাহ্ আপনার মনকে আমার ওপর অসন্তুষ্ট করে দেবেন। আর যদি আমি আপনার কাছে সত্য কথা বলি, যদিও আপনি আমার ওপর রাগ করবেন, তবুও আমি এর বিনিময়ে আল্লাহর (ক্ষমার) আশা রাখি। আল্লাহর কসম! আমার কোনো অজুহাত ছিল না। আপনি থেকে আমি পিছনে থাকার সময় আমি কখনও এর চেয়ে বেশি শক্তিশালী এবং সামর্থ্যবান ছিলাম না।" রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এ ব্যক্তি সত্য বলেছে। ওঠো, যতক্ষণ না আল্লাহ্ তোমার ব্যাপারে কোনো ফায়সালা করেন।"

আমি উঠে দাঁড়ালাম। তখন বনি সালামা গোত্রের কিছু লোক উঠে আমার পিছু নিল এবং আমাকে বলল: "আল্লাহর কসম! আমরা এর আগে তোমার কোনো পাপের কথা জানি না। তুমি কেন সেই অনুপস্থিত থাকা লোকদের মতো রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে অজুহাত পেশ করলে না? তোমার পাপের জন্য তো রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ক্ষমা প্রার্থনাই যথেষ্ট ছিল।" আল্লাহর কসম! তারা আমাকে ক্রমাগত ভর্ৎসনা করতে থাকল, এমনকি আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে ফিরে গিয়ে নিজেকে মিথ্যাবাদী সাব্যস্ত করার ইচ্ছা করলাম। এরপর আমি তাদের বললাম: "আমার সাথে আর কেউ কি এমন পরিস্থিতির সম্মুখীন হয়েছে?" তারা বলল: "হ্যাঁ, তোমার মতো একই কথা বলা দু'জন লোক এমন পরিস্থিতির সম্মুখীন হয়েছে, আর তোমাদের যা বলা হয়েছে, তাদেরও তাই বলা হয়েছে।" আমি বললাম: "তারা কারা?" তারা বলল: "মুরারা ইবনে রাবী'আ আল-আমিরী এবং হিলাল ইবনে উমাইয়া আল-ওয়াকিফী।" কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তারা আমাকে এমন দু'জন সৎ ব্যক্তির নাম বললেন, যারা বদরের যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেছিলেন এবং যাদের মাঝে অনুকরণীয় আদর্শ ছিল। কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তারা যখন ওই দু'জনের নাম উল্লেখ করলেন, তখন আমি সেখান থেকে চলে গেলাম।

কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) অনুপস্থিত থাকা অন্যান্যদের মধ্যে কেবল আমাদের তিনজনের সাথে কথা বলতে মুসলিমদের নিষেধ করে দিলেন। কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এরপর লোকেরা আমাদের এড়িয়ে চলতে লাগল এবং আমাদের সাথে এমন পরিবর্তন শুরু হলো যে, আমার নিজের কাছেই পৃথিবী অচেনা মনে হতে লাগল। এটি আর সেই ভূমি ছিল না যা আমি চিনতাম। আমরা এই অবস্থায় পঞ্চাশ রাত কাটালাম। আমার অন্য দু'জন সঙ্গী দুর্বল হয়ে ঘরে বসে কাঁদতে থাকলেন। কিন্তু আমি ছিলাম দলের মধ্যে সবচেয়ে যুবক ও শক্তিশালী। তাই আমি বের হতাম, সালাতে হাজির হতাম এবং বাজারে ঘোরাফেরা করতাম, কিন্তু কেউ আমার সাথে কথা বলত না। সালাতের পর আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মজলিসে এসে তাঁকে সালাম দিতাম, আর মনে মনে ভাবতাম: তিনি কি আমার সালামের জবাব দিতে ঠোঁট নেড়েছেন, নাকি দেননি? এরপর আমি তাঁর কাছেই সালাত আদায় করতাম এবং আড়চোখে তাঁকে দেখতাম। যখন আমি আমার সালাতের দিকে মনোনিবেশ করতাম, তখন তিনি আমার দিকে তাকাতেন; কিন্তু যখন আমি তাঁর দিকে ফিরতাম, তখন তিনি মুখ ফিরিয়ে নিতেন। মুসলিমদের এই বিমুখতা যখন আমার কাছে দীর্ঘ হলো, তখন আমি হেঁটে আমার চাচাতো ভাই আবু কাতাদাহর বাগানের প্রাচীর ডিঙিয়ে ভেতরে প্রবেশ করলাম। সে ছিল আমার কাছে সবচেয়ে প্রিয় মানুষ। আমি তাকে সালাম দিলাম, কিন্তু আল্লাহর কসম, সে আমার সালামের জবাব দিল না। আমি তাকে বললাম: "হে আবু কাতাদাহ! আমি আল্লাহর নামে তোমাকে কসম দিচ্ছি, তুমি কি জানো যে, আমি আল্লাহ ও তাঁর রাসূলকে ভালোবাসি?" সে নীরব রইল। আমি আবারও কসম দিয়ে জিজ্ঞেস করলাম, সে নীরব রইল। আমি তৃতীয়বার কসম দিয়ে জিজ্ঞেস করলাম, তখন সে বলল: "আল্লাহ ও তাঁর রাসূলই ভালো জানেন।" তখন আমার চোখ থেকে অশ্রু গড়িয়ে পড়ল, আর আমি সেখান থেকে ফিরে এসে প্রাচীর টপকে বাইরে চলে এলাম।

একদিন আমি মদীনার বাজারে হেঁটে বেড়াচ্ছিলাম, এমন সময় সিরিয়ার আনবাত (নাবাতীয়) গোত্রের একজন লোককে দেখলাম, যে মদীনায় খাদ্যশস্য বিক্রি করতে এসেছিল। সে জিজ্ঞেস করছিল: "কা'ব ইবনে মালিককে কে দেখিয়ে দেবে?" কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: তখন লোকেরা আমার দিকে ইশারা করতে শুরু করল, যতক্ষণ না সে আমার কাছে এসে গাসসান রাজার কাছ থেকে একটি চিঠি আমার হাতে দিল। আমি লেখক ছিলাম, তাই চিঠিটি পড়লাম। তাতে লেখা ছিল: "এর পর, আমাদের কাছে খবর পৌঁছেছে যে, তোমার সাথী (নবী) তোমার সাথে দুর্ব্যবহার করেছেন। আল্লাহ্ তোমাকে কোনো অপমান বা ধ্বংসের স্থানে রাখেননি। সুতরাং, তুমি আমাদের সাথে এসে যোগ দাও, আমরা তোমাকে সাহায্য করব।" কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: চিঠিটি পড়ার পর আমি বললাম: "এটাও আরেকটি পরীক্ষা।" অতঃপর আমি সেই চিঠিটি নিয়ে চুলার দিকে গেলাম এবং তা জ্বালিয়ে দিলাম।

যখন পঞ্চাশ রাতের মধ্যে চল্লিশ রাত পার হলো এবং ওহী বিলম্বিত হচ্ছিল, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর একজন দূত আমার কাছে আসলেন এবং বললেন: "রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আপনাকে নির্দেশ দিচ্ছেন যে, আপনি আপনার স্ত্রীকে ত্যাগ করুন।" আমি বললাম: "আমি কি তাকে তালাক দেব, নাকি কী করব?" তিনি বললেন: "না, বরং তুমি তাকে একাকী রাখো, তার কাছে যেও না।" আর আমার অন্য দুই সঙ্গীর কাছেও একই নির্দেশ পাঠানো হলো।

কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি আমার স্ত্রীকে বললাম: "তুমি তোমার পরিবারের কাছে যাও এবং আল্লাহ্ এই বিষয়ে কোনো ফায়সালা না করা পর্যন্ত তাদের কাছে থাকো।" হিলাল ইবনে উমাইয়ার স্ত্রী রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল! হিলাল ইবনে উমাইয়া একজন বৃদ্ধ, অসহায় মানুষ, তার কোনো সেবক নেই। আমি তার খেদমত করলে কি আপনি অপছন্দ করবেন?" তিনি বললেন: "না, তবে সে যেন তোমার কাছে না আসে।" স্ত্রী বললেন: "আল্লাহর কসম! তার মধ্যে আমার কাছে আসার মতো কোনো নড়াচড়া নেই। আল্লাহর কসম! যখন থেকে তার এই ঘটনা ঘটেছে, তখন থেকে আজ পর্যন্ত সে শুধু কাঁদছে।" কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমার পরিবারের কেউ কেউ আমাকে বলল: "আপনিও আপনার স্ত্রীর ব্যাপারে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে অনুমতি চান, কারণ তিনি তো হিলাল ইবনে উমাইয়ার স্ত্রীকে তার খেদমত করার অনুমতি দিয়েছেন।" আমি বললাম: "না, আমি এই ব্যাপারে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে অনুমতি চাইব না। আমি যুবক, যদি আমি এই ব্যাপারে অনুমতি চাই, তবে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কী বলেন, তা কে জানে?" এরপর আমরা আরও দশ রাত এই অবস্থায় কাটালাম, ফলে আমাদের সাথে কথা বলা নিষেধ হওয়ার পর থেকে আমাদের পঞ্চাশ রাত পূর্ণ হলো।

কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: এরপর পঞ্চাশতম রাতের সকালে আমি আমাদের ঘরের ছাদে ফজরের সালাত আদায় করলাম। আমি ঠিক সেই অবস্থায় বসেছিলাম, যা আল্লাহ্ তাআলা আমাদের ব্যাপারে উল্লেখ করেছেন—আমার ওপর আমার মন সংকুচিত হয়ে গিয়েছিল এবং বিশাল পৃথিবীও আমার কাছে সংকীর্ণ হয়ে গিয়েছিল—এমন সময় আমি 'সালা' পাহাড়ের ওপর দাঁড়িয়ে থাকা এক চিৎকারকারীকে সর্বোচ্চ আওয়াজে বলতে শুনলাম: "হে কা'ব ইবনে মালিক! সুসংবাদ গ্রহণ করো!" কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি সিজদায় লুটিয়ে পড়লাম এবং বুঝলাম যে, মুক্তি এসে গেছে।

কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফজরের সালাত আদায়ের পর আমাদের ওপর আল্লাহর তাওবা কবুল হওয়ার কথা ঘোষণা করলেন। লোকেরা আমাদের সুসংবাদ দিতে ছুটে গেল। আমার অন্য দুই সঙ্গীর কাছেও সুসংবাদদাতারা গেল। এক ব্যক্তি ঘোড়ায় চড়ে আমার দিকে ছুটে এলো, এবং আসলাম গোত্রের একজন ব্যক্তি হেঁটে আমার দিকে দৌড়ে এলো এবং পাহাড়ের চূড়ায় আরোহণ করল। তবে কণ্ঠস্বর ঘোড়ার চেয়ে দ্রুত ছিল। যখন সেই সুসংবাদদাতা আমার কাছে এলো, যার কণ্ঠ আমি শুনেছিলাম, তখন আমি তাকে সুসংবাদের বিনিময়ে আমার গায়ের কাপড় খুলে পরিয়ে দিলাম। আল্লাহর কসম! সেদিন আমার কাছে ঐ দুটি ছাড়া আর কোনো পোশাক ছিল না। আমি দুটো কাপড় ধার করে পরিধান করলাম এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দিকে দ্রুতবেগে রওনা হলাম। লোকেরা আমাকে দলে দলে অভ্যর্থনা জানাচ্ছিল, আমার তাওবা কবুল হওয়ায় অভিনন্দন জানাচ্ছিল এবং বলছিল: "আল্লাহ্ আপনার তাওবা কবুল করেছেন, এতে আপনি খুশি হোন।"

অবশেষে আমি মসজিদে প্রবেশ করলাম। দেখলাম, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেখানে বসে আছেন এবং তাঁর চারপাশে লোকেরা ভিড় করে আছে। তালহা ইবনে উবাইদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দ্রুত ছুটে এসে আমার সাথে মুসাফাহা করলেন এবং আমাকে অভিনন্দন জানালেন। আল্লাহর কসম! মুহাজিরদের মধ্যে তিনি ছাড়া আর কেউ আমার জন্য দাঁড়াননি। কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর এই কাজ কখনও ভুলতেন না।

কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: যখন আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সালাম দিলাম, তখন আনন্দের কারণে তাঁর মুখমণ্ডল উজ্জ্বল হয়ে উঠেছিল। তিনি বললেন: "তোমাকে তোমার মা জন্ম দেওয়ার পর থেকে আজ পর্যন্ত তোমার জীবনে যে শ্রেষ্ঠ দিনটি এসেছে, তার সুসংবাদ নাও।" আমি বললাম: "হে আল্লাহর রাসূল! এটা কি আপনার পক্ষ থেকে, নাকি আল্লাহর পক্ষ থেকে?" তিনি বললেন: "না, বরং আল্লাহর পক্ষ থেকে।" রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন আনন্দিত হতেন, তখন তাঁর মুখমণ্ডল আলোকিত হয়ে উঠত, মনে হতো যেন তাঁর মুখমণ্ডলের এক টুকরা চাঁদ। কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমরা তাঁর থেকে এটা জানতে পারতাম।

যখন আমি তাঁর সামনে বসলাম, তখন বললাম: "হে আল্লাহর রাসূল! আমার তাওবার অংশ হিসেবে আমি আমার সব সম্পদ আল্লাহ্ ও তাঁর রাসূলের জন্য সাদকা করে দেব।" রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমার কিছু সম্পদ নিজের জন্য রেখে দাও, এটাই তোমার জন্য উত্তম।" আমি বললাম: "তাহলে আমি আমার খায়বারের অংশটি রেখে দিলাম।"

আমি আরও বললাম: "হে আল্লাহর রাসূল! আল্লাহ্ আমাকে সত্যের দ্বারা মুক্তি দিয়েছেন, আর আমার তাওবার অংশ হিসেবে আমি বাকি জীবন কেবল সত্য কথাই বলব।" কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহর কসম! রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এই কথা বলার পর থেকে আমার জীবনে আজ পর্যন্ত আমি এমন কোনো মুসলিমের কথা জানি না, যাকে আল্লাহ্ সত্য কথা বলার ব্যাপারে আমার চেয়ে উত্তম পরীক্ষা দিয়েছেন। আল্লাহর কসম! রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এই কথা বলার পর থেকে আজ পর্যন্ত আমি কখনও ইচ্ছাকৃতভাবে মিথ্যা বলিনি, আর আমি আশা করি যে, আল্লাহ্ আমার অবশিষ্ট জীবনেও আমাকে রক্ষা করবেন।

কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এরপর আল্লাহ্ তাআলা অবতীর্ণ করলেন: "নিঃসন্দেহে আল্লাহ্ ক্ষমা করেছেন নবীকে, মুহাজির ও আনসারদেরকে, যারা কঠিন মুহূর্তে তাঁর অনুসরণ করেছিল..." (সূরা তাওবা: ১১৭) এবং তা পৌঁছালো "নিশ্চয়ই তিনি তাদের প্রতি স্নেহশীল, পরম দয়ালু।" (সূরা তাওবা: ১১৭) এবং "আর ওই তিনজনকে (ক্ষমা করলেন), যাদেরকে পিছনে রাখা হয়েছিল; যতক্ষণ না পৃথিবী প্রশস্ত হওয়া সত্ত্বেও তাদের জন্য তা সংকীর্ণ হয়ে গিয়েছিল..." (সূরা তাওবা: ১১৮) পর্যন্ত এবং পৌঁছালো "হে মুমিনগণ! তোমরা আল্লাহকে ভয় করো এবং সত্যবাদীদের সঙ্গে থাকো।" (সূরা তাওবা: ১১৯) পর্যন্ত।

কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আল্লাহর কসম! ইসলামে হেদায়েত দেওয়ার পর আল্লাহ্ আমার ওপর যত অনুগ্রহ করেছেন, তার মধ্যে সবচেয়ে বড় অনুগ্রহ হলো রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে আমার সত্য বলা, যাতে আমি মিথ্যা বলে ধ্বংস হয়ে না যাই, যেমন মিথ্যাবাদীরা ধ্বংস হয়েছে। যারা মিথ্যা বলেছিল, আল্লাহ্ ওহী নাযিল করে তাদের সম্পর্কে সবচেয়ে নিকৃষ্ট কথা বলেছেন। তিনি বলেছেন: "তোমরা যখন তাদের কাছে ফিরে আসবে, তখন তারা তোমাদের কাছে আল্লাহর কসম করবে, যাতে তোমরা তাদের এড়িয়ে চলো। সুতরাং তোমরা তাদের এড়িয়ে চলো। নিশ্চয়ই তারা অপবিত্র এবং তাদের ঠিকানা হলো জাহান্নাম, যা তাদের কৃতকর্মের ফল।" (সূরা তাওবা: ৯৫) "তারা তোমাদের কাছে কসম করবে, যাতে তোমরা তাদের প্রতি সন্তুষ্ট হও। যদি তোমরা তাদের প্রতি সন্তুষ্টও হও, তবে আল্লাহ্ তো ফাসিক (পাপী) সম্প্রদায়ের প্রতি সন্তুষ্ট হন না।" (সূরা তাওবা: ৯৬)

কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমরা তিনজন সেইসব লোকের (মুনাফিকদের) বিষয়ে পিছিয়ে ছিলাম, যাদের শপথ তিনি কবুল করেছিলেন, যখন তারা তাঁর কাছে শপথ করে অজুহাত পেশ করেছিল, তখন তিনি তাদের বাইয়াত গ্রহণ করেন এবং তাদের জন্য ক্ষমা চান। আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের ব্যাপারটি স্থগিত রেখেছিলেন, যতক্ষণ না আল্লাহ্ তাআলা এর বিষয়ে ফায়সালা দেন। এ কারণেই আল্লাহ্ তাআলা বলেছেন: "আর ওই তিনজনকে (ক্ষমা করলেন), যাদেরকে পিছনে রাখা হয়েছিল।" এই পিছনে রাখা অর্থ এই নয় যে আমরা যুদ্ধ থেকে পিছনে ছিলাম, বরং এর অর্থ হলো, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যাদের শপথ কবুল করেছিলেন ও অজুহাত পেশ করা সত্ত্বেও মেনে নিয়েছিলেন, তাদের ফায়সালা থেকে আমাদের বিষয়টি স্থগিত রাখা হয়েছিল।









সহীহ আত তারগীব ওয়াত তারহীব (2925)


2925 - (2) [صحيح لغيره] وعن عبادةَ بنِ الصامتِ رضي الله عنه؛ أنَّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم قال:
`اضْمَنوا لي سِتّاً مِنْ أَنْفُسِكُمْ؛ أَضْمَنْ لَكُمُ الجَنَّةَ: اصْدُقوا إذا حَدَّثْتُم، وأوْفوا إذا وَعَدْتُم، وأدُّوا إذا ائْتُمِنْتُم، واحْفَظوا فروجَكُمْ، وغُضُّوا أبصارَكُمْ، وكُفُّوا أيدِيَكُمْ`.
رواه أحمد وابن أبي الدنيا، وابن حبان في `صحيحه`، والحاكم والبيهقي؛ كلهم من رواية المطلب بن عبد الله بن حنطب عنه. وقال الحاكم: `صحيح الإسناد`.
(قال الحافظ): `المطلب لم يسمع من عبادة`. [مضى 17 - النكاح/ 1].




উবাদাহ ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: তোমরা আমার জন্য তোমাদের নিজেদের পক্ষ থেকে ছয়টি বিষয়ের দায়িত্ব নাও, আমি তোমাদের জন্য জান্নাতের দায়িত্ব নেব। যখন তোমরা কথা বলবে, তখন সত্য কথা বলবে; যখন ওয়াদা করবে, তখন তা পূরণ করবে; যখন তোমাদের কাছে আমানত রাখা হবে, তখন তা আদায় করবে; তোমাদের লজ্জাস্থানসমূহকে হেফাযত করবে; তোমাদের দৃষ্টিকে অবনত রাখবে; এবং তোমাদের হাতকে (অন্যায় করা থেকে) বিরত রাখবে।









সহীহ আত তারগীব ওয়াত তারহীব (2926)


2926 - (3) [صحيح لغيره] وعن أنسِ بْنِ مالكٍ رضي الله عنه عنِ النبيِّ صلى الله عليه وسلم قال:
`تَقَبَّلوا لي سِتّاً أَتَقبَّل لكُمْ بِالجَنَّةِ: إذا حَدَّثَ أحدُكم فلا يَكْذِبْ، وإذا وَعَد فلا يُخْلِفْ، وإذا ائْتُمِنَ فَلا يَخُنْ، غُضُّوا أبْصارَكُم، وكُفُّوا أْيدِيَكُمْ، واحْفَظُوا فُروجَكُمْ`.
رواه أبو بكر بن أبي شيبة وأبو يعلى والحاكم والبيهقي، ورواتهم ثقات؛ إلا سعد بن سنان.




আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: তোমরা আমার জন্য ছয়টি বিষয়ের জিম্মাদারী নাও, আমি তোমাদের জন্য জান্নাতের জিম্মাদার হব। (১) যখন তোমাদের কেউ কথা বলে, সে যেন মিথ্যা না বলে; (২) যখন সে ওয়াদা করে, তা যেন ভঙ্গ না করে; (৩) যখন তার কাছে আমানত রাখা হয়, সে যেন খেয়ানত না করে; (৪) তোমরা তোমাদের দৃষ্টিকে সংযত করো; (৫) তোমরা তোমাদের হাতকে (অন্যায় করা থেকে) বিরত রাখো; এবং (৬) তোমরা তোমাদের লজ্জাস্থানকে হেফাযত করো।









সহীহ আত তারগীব ওয়াত তারহীব (2927)


2927 - (4) [حسن لغيره] وعن أبي أمامة رضي الله عنه أنَّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم قال:
`أنا زعيمٌ ببَيْتٍ في وَسَطِ الجنَّةِ لِمَنْ تَرك الكَذِبَ وإنْ كان مازِحاً`.
رواه البيهقي بإسناد حسن.(1) ورواه أبو داود، والترمذي وحسنه، وابن ماجه في حديث تقدم في `حسن الخلق`. [مضى 23 - الأدب/ 2].




আবু উমামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: ‘আমি জান্নাতের মধ্যস্থলে একটি ঘরের জামিন, সেই ব্যক্তির জন্য যে মিথ্যা পরিহার করে, যদিও সে রসিকতা করেও তা করে থাকে।’









সহীহ আত তারগীব ওয়াত তারহীব (2928)


2928 - (5) [حسن لغيره] عن عبد الرحمن بن الحارث عن(2) أبي قُرادٍ السلَميِّ رضي الله عنه قال:
كنَّا عندَ النبيِّ صلى الله عليه وسلم فدَعا بِطَهورٍ، فَغَمس يَدَه فَتَوضَّأَ، فتتبَّعناهُ فَحَسوْنَاهُ، فقال النبيُّ صلى الله عليه وسلم:
`ما حَمَلكُمْ على ما فَعَلْتُمْ؟ `.
قلنا: حُبُّ الله ورسولِه. قال:
`فإنْ أَحْبَبْتُمْ أنْ يُحِبُّكُمُ الله ورسولُه؛ فأَدُّوا إذا ائْتُمِنْتُم، واصْدُقوا إذا حَدَّثْتُم، وأحْسِنوا جِوارَ مَنْ جاوَرَكُمْ`.
رواه الطبراني(3).




আবু কুরাদ আস-সুলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট ছিলাম। তিনি ওযুর জন্য পানি চাইলেন, অতঃপর তিনি তাঁর হাত তাতে ডুবালেন এবং ওযু করলেন। আমরা তখন তার (ব্যবহৃত) পানি অনুসরণ করলাম এবং তা পান করলাম। তখন নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: ‘তোমরা যা করলে, তা করতে তোমাদের কিসে উদ্বুদ্ধ করল?’ আমরা বললাম: আল্লাহ্ ও তাঁর রাসূলের প্রতি ভালোবাসা। তিনি বললেন: ‘যদি তোমরা চাও যে আল্লাহ ও তাঁর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তোমাদেরকে ভালোবাসুন, তবে যখন তোমাদের কাছে আমানত রাখা হয়, তখন তা আদায় করো, যখন কথা বলো তখন সত্য বলো এবং তোমাদের প্রতিবেশীর সাথে উত্তম ব্যবহার করো।’









সহীহ আত তারগীব ওয়াত তারহীব (2929)


2929 - (6) [صحيح لغيره] وعن عبد الله بن عمر [و] رضي الله عنهما؛ أنَّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم قال:
`أربَعٌ إذا كُنَّ فيكَ فلا عليكَ ما فاتَكَ مِنَ الدنيا: حِفْظُ أمانَةٍ، وصِدقُ
حديثٍ، وحُسْنُ خَليقَةٍ، وعِفَّةٌ في طُعْمَةٍ`.
رواه أحمد وابن أبي الدنيا والطبراني والبيهقي بأسانيد حسنة. [مضى 16 - البيوع/ 5].




আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: চারটি জিনিস যখন তোমার মধ্যে থাকবে, তখন দুনিয়ার যা কিছু তোমার হাতছাড়া হয়ে গেছে, তাতে তোমার কোনো চিন্তা নেই: আমানত রক্ষা করা, সত্য কথা বলা, উত্তম চরিত্র এবং খাদ্যের ক্ষেত্রে পবিত্রতা।









সহীহ আত তারগীব ওয়াত তারহীব (2930)


2930 - (7) [صحيح] وعن الحسن بن عليّ رضي الله عنهما قال:
حَفِظْتُ مِنْ رَسولِ الله صلى الله عليه وسلم:
`دَعْ ما يُرِيبُكَ إلى ما لا يُريبُكَ، فإنَّ الصدْقَ طُمأْنِينَةٌ، والكَذِبَ رِيبَةٌ`.
رواه الترمذي وقال: `حديث حسن صحيح`، [مضى 16 - البيوع/ 6].




হাসান ইবন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে এ কথা মুখস্থ করেছি: "যা তোমাকে সন্দেহে ফেলে, তা পরিহার করো এবং যা তোমাকে সন্দেহে ফেলে না, তা গ্রহণ করো। কেননা সত্য হচ্ছে প্রশান্তি, আর মিথ্যা হচ্ছে সন্দেহ।"









সহীহ আত তারগীব ওয়াত তারহীব (2931)


2931 - (8) [صحيح] وعنْ عبدِ الله بْنِ عَمْروٍ بْنِ العَاصِ رضي الله عنهما قال:
قلنا: يا نَبِيَّ الله! مَنْ خَيرُ الناسِ؟ قال:
`ذو القَلبِ المَخْمُوم، واللِّسانِ الصَادقِ`.
قال: قلنا: يا نبيَّ الله! قد عرفنا اللِّسانَ الصادِقَ، فما القلبُ المَخْموم؟ قال:
` [هو] التقيُّ النقيُّ؛ الذي لا إِثْمَ فيه، ولا بَغْيَ ولا حَسَدَ`.
قال: قلنا: يا رسول الله! فَمَنْ على أَثَرِهِ؟ قال:
`الذي يَشْنَأُ الدنيا، ويُحِبُّ الآخِرَةَ`.
قلنا: ما نَعْرِفُ هذا فينا إلا رافع مَوْلى رسولِ الله صلى الله عليه وسلم، فَمَنْ على أَثَرِهِ؟ قال:
`مؤمِنٌ في خُلُقٍ حَسَنٍ`.
قلنا: أمَّا هذه فإنها فينا.(1)
رواه ابن ماجه بإسناد صحيح، وتقدم لفظه [هنا/ 21]، والبيهقي وهذا لفظه، وهو أتم.




আব্দুল্লাহ ইবনু আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁরা বললেন, আমরা বললাম: হে আল্লাহর নবী! মানুষের মধ্যে সর্বোত্তম কে? তিনি বললেন: "সেই ব্যক্তি, যার অন্তর পবিত্র (আল-কলবুল মাখমুম) এবং জিহ্বা সত্যবাদী।" তাঁরা বললেন, আমরা বললাম: হে আল্লাহর নবী! সত্যবাদী জিহ্বা সম্পর্কে আমরা জানতে পেরেছি, কিন্তু 'আল-কলবুল মাখমুম' কী? তিনি বললেন: "সে হলো মুত্তাকী, পবিত্র ব্যক্তি; যার মধ্যে কোনো গুনাহ, সীমালঙ্ঘন ও হিংসা নেই।" তাঁরা বললেন, আমরা বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! এরপর তার নিকটবর্তী মর্যাদার অধিকারী কে? তিনি বললেন: "সেই ব্যক্তি, যে দুনিয়াকে ঘৃণা করে এবং আখিরাতকে ভালোবাসে।" আমরা বললাম: আমাদের মধ্যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর আযাদকৃত গোলাম রাফে’ ছাড়া আর কাউকে আমরা এমন গুণসম্পন্ন বলে জানি না। এরপর তার নিকটবর্তী মর্যাদার অধিকারী কে? তিনি বললেন: "সেই মুমিন, যে উত্তম চরিত্রের অধিকারী।" আমরা বললাম: এই গুণটি কিন্তু আমাদের মধ্যে আছে।









সহীহ আত তারগীব ওয়াত তারহীব (2932)


2932 - (9) [صحيح] وعن ابن مسعودٍ رضي الله عنه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:
`عليكُم بالصدْقِ؛ فإنَّ الصدْق يَهْدي إلى البرِّ، والبِرّ يَهْدي إلى الجنَّةِ، وما يَزالُ الرجلُ يَصْدُقُ، وَيتَحرَّى الصِدْقَ حتى يُكْتَبَ عندَ الله صِدِّيقاً، وإيَّاكُمْ والكَذِب! فإنَّ الكَذِبَ يَهدِي إلى الفُجورِ، وإنَّ الفُجورَ يَهْدِي إلى النارِ، وما يزالُ العَبْد يَكْذِبُ ويتَحرَّى الكَذِبَ، حتى يُكْتَبَ عِنْدَ الله كذَّاباً`.
رواه البخاري ومسلم وأبو داود والترمذي، وصححه واللفظ له.




ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: তোমরা অবশ্যই সততাকে অবলম্বন করো। কেননা সততা পুণ্যের দিকে পথ দেখায়, আর পুণ্য জান্নাতের দিকে পথ দেখায়। যখন কোনো লোক সর্বদা সত্য বলে এবং সত্যের উপর অটল থাকতে চেষ্টা করে, পরিশেষে আল্লাহ্‌র নিকট তাকে সিদ্দীক (পরম সত্যবাদী) হিসেবে লিপিবদ্ধ করা হয়। আর তোমরা মিথ্যাকে বর্জন করো! কেননা মিথ্যা পাপের (দুষ্কর্মের) দিকে পথ দেখায়, আর পাপ (দুষ্কর্ম) জাহান্নামের দিকে পথ দেখায়। যখন কোনো বান্দা সর্বদা মিথ্যা বলতে থাকে এবং মিথ্যার উপর অটল থাকতে চেষ্টা করে, পরিশেষে আল্লাহ্‌র নিকট তাকে কায্‌যাব (মহা মিথ্যাবাদী) হিসেবে লিপিবদ্ধ করা হয়।









সহীহ আত তারগীব ওয়াত তারহীব (2933)


2933 - (10) [صحيح] وعن أبي بكرٍ الصديق رضي الله عنه قال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم:
`عليكُمْ بالصدْقِ؛ فإنَّه مَع البِرِّ، وهُما في الجنَّةِ، وإيَّاكمْ والكَذِبَ؛ فإنَّه مَعَ الفجورِ، وهُما في النارِ`.
رواه ابن حبان في `صحيحه`.




আবূ বকর সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: তোমরা অবশ্যই সততাকে আঁকড়ে ধরো। কেননা, তা সৎকর্মের (নেকীর) সাথে থাকে এবং উভয়ই জান্নাতে পৌঁছায়। আর তোমরা মিথ্যাচার থেকে বেঁচে থাকো। কেননা, তা পাপাচারের (ফুজুরের) সাথে থাকে এবং উভয়ই জাহান্নামে পৌঁছায়।









সহীহ আত তারগীব ওয়াত তারহীব (2934)


2934 - (11) [صحيح لغيره] وعن معاوية بن أبي سفيان رضي الله عنهما قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:
`عليكم بالصدقِ فإنه يهدي إلى البِرِّ، وهما في الجنةِ، وإيَّاكم والكَذِبَ فإنه يهدي إلى الفُجورِ، وهما في النار`.
رواه الطبراني في `الكبير` بإسناد حسن.




মু'আবিয়া ইবনে আবী সুফিয়ান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: তোমরা সততাকে (সত্যবাদিতাকে) অবলম্বন করো, কারণ তা পুণ্যের দিকে পরিচালিত করে। আর এই উভয়টি (সততা ও পুণ্য) জান্নাতে রয়েছে। আর তোমরা মিথ্যা থেকে বেঁচে থাকো, কারণ তা পাপাচারের দিকে পরিচালিত করে। আর এই উভয়টি (মিথ্যা ও পাপাচার) জাহান্নামে রয়েছে।









সহীহ আত তারগীব ওয়াত তারহীব (2935)


2935 - (12) [صحيح] وعن سمرة بن جندبٍ رضي الله عنه قال: قال النبيِ صلى الله عليه وسلم:
`رأيتُ الليلةَ رجُلَيْن أتَياني قالا لي(1): الذي رأيْتَه يُشَقُّ شِدْقُهُ فكذَّابٌ، يكذِبُ بالِكذْبَةِ تُحمَلُ عنهُ حتى تَبْلُغَ الآفاقَ، فيُصْنَعُ به هكَذا إلى يومِ القِيامَةِ`.
رواه البخاري هكذا مختصراً في `الأدب` من `صحيحه`. وتقدم بطوله في `ترك الصلاة` [5 - الصلاة/ 40].




সামুরাহ ইবনু জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আমি গত রাতে দু’জন ব্যক্তিকে দেখলাম, তারা আমার কাছে এলো এবং আমাকে বললো: যাকে তুমি দেখলে তার চোয়াল বিদীর্ণ করা হচ্ছে, সে হলো একজন মিথ্যাবাদী। সে এমন মিথ্যা বলতো যা তার থেকে বহন করে (পৃথিবীর) দিগন্তে পৌঁছে যেত। ক্বিয়ামত পর্যন্ত তার সাথে এ রকমই করা হবে।